मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

शब्द संधान / एक था राजा / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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एक था राजा। राजा का अपना एक ‘राज’ था। उसपर वह ‘राज’ करता था। उसकी पुत्री ‘राज-कन्या’ थी। वह ‘राज-कुमारी’ कहलाती थी। उसका पुत्र ‘राज-कुंवर’ था। वह ‘राज-कुमार’ कहलाता था। उसकी पत्नी ‘राज-महिषी’ थी; और उसकी माता ‘राज-माता’ हुआ करती थी। राजा को ‘राज-काज’ चलाने के लिए ‘राजस्व’ की आवश्यकता होती थी। वह अपने राज में अपनी प्रजा पर ‘कर’ लगाता था और इस ‘राज-कर’ से ही उसे राजस्व प्राप्त होता था जो ‘राज-कोष’ में जमा हुआ करता था। राजा अपने ‘राज-प्रासाद’ में करता था जो ‘राज-महल’ या ‘राजभवन’ भी कहलाता था। राजा का बाकायदा ‘राज्याभिषेक’ किया जाता था; ‘राज-तिलक’ होता था। उसके बाद ही वह ‘राज-गद्दी’ हासिल कर पाता था और ‘राज-सिंहासन’ पर बैठने का हकदार हो पाता था। राज करने के लिए वह अपनी एक ‘राज-प्रणाली’ या कहें, ‘राजतंत्र’, विकसित करता था। वह ‘राजाज्ञाएं’ प्रसारित करता था और जो लोग उसकी राजाज्ञाओं को नहीं मानते थे, वे ‘राज-दंड’ के अधिकारी होते थे। राजा के राज में राज-काज के लिए एक भाषा होती थी जिसे ‘राज-भाषा’ कहा जाता था। लेनदेन और व्यापार के लिए एक मुद्रा होती थी जिसपर उसकी ‘राजमुहर’ रहती थी। राजा ‘राज-विद्या’ और ‘राजनीति’ में दक्ष माना जाता था। यह विद्या उसे बहुत-कुछ विरासत में अपने ‘राज-कुल’ और ‘राजवंश’ से मिलती थी। राजा ‘राजसी’ ठाठ से रहता था। उसका एक ‘राज-दरबार’ हुआ करता था जिसमें अपने अपने क्षेत्र के कुछ दक्ष चाटुकार उसके सलाहकार होते थे। राजा की सवारी ‘राज-रथ’ पर निकलती थी। राजा के राज्य के चारों ओर जो अन्य राज हुआ करते थे वे उसके राज के ‘राज-मंडल’ हुआ करते थे। वह इस ‘राज-मंडल’ को अपने अधिकार में लेने के लिए राजा ‘राज-सूय’ यज्ञ कराता था ताकि वह राजा से सम्राट होने का अधिकार प्राप्त कर सके।

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आज प्रजातंत्र के ज़माने में न तो कोई राजा रहा न ही उनका राज रहा है। अब केवल ‘राज कथाएँ’ रह गईं हैं। ‘राज-चिह्न’ शेष बचे हैं। लेकिन व्यंजनात्मक रूप से ‘राज-रोग’ से लोग अभी भी पीड़ित हैं। ‘राज-पुरुष’ आज भी हैं। राज भवन आज भी हैं। ‘राज-सभाएं’ भी हैं। राज कोष और राज-कर भी है। ‘राज-द्रोह’ आज भी होते हैं। मंत्री, प्रधान मंत्री आदि, आज भी अपना कथित ‘राज-धर्म’ निभाने का दंभ भरते हैं। क्षेत्र भले बदल गए हों पर कुछ ख़ास प्रकार के लोगों को “राज- संरक्षण’ आज भी प्राप्त है। ‘राज सेवाएं’ बरकरार हैं। उपाधियाँ और राज-पुरस्कार भी यथावत मिल रहे हैं। देश और हर प्रदेश की अलग अलग ‘राजधानियां’ हैं। बस राजा नहीं है। राजा का स्थान बहुत-कुछ प्रधान-मंत्री और मुख्य-मंत्रियों ने ले लिया है।

‘राज’ शब्द ने अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखी है। हिन्दी भाषा में उसका समासगत रूप बाकायदा कायम है। कुछ शारीरिक रोग वास्तव में ‘राज-रोग’ ही कहलाते हैं, जैसे टी बी। स्वादिष्ट फलों वाला कदंब का पेड़ ‘राज-कदम्ब’ है। अमलतास को ‘राजद्रुम’ कहा गया है। परवल की बेल को ‘राज-कूलक’ कहते हैं। बड़ा बेर ‘राजकोल’ कहलाता है। तरोई या निनुआ को ‘राजकोशातकी’ कहते हैं। तरबूज को ‘राजतिमिश’ कहा गया है। बड़े जामुन और पिंड- खजूर को ‘राजजम्बू’ भी कहते हैं। भले ही ये सारे नाम बहुत प्रचलित न हों, पर संस्कृत / हिन्दी भाषा में ये विद्यमान हैं।

आम ‘राजफल’ है। ‘राजभोग’ एक मिठाई का नाम है। सामान्यत: हम सबके साधारण कान होते हैं लेकिन हाथी की सूंड ‘राज-कर्ण’ है। ‘राजगवी’ गाय की जाति का एक पशु है। एक प्रकार के बड़े गिद्ध ‘राज- गिद्ध’ कहलाते है। हंसों में ‘राजहंस’ है। मगध का एक पर्वत ‘राजगिरी’ है। चन्द्रमा की कलाओं में एक कला ‘राज-कला’ भी है। संगीत में ताल के आठ भेदों में से एक ‘राजचूड़ामणि’ है। शहर की बड़ी सड़क ‘राजपथ’ कहलाती है। राजस्थान ‘राजपूताना’ है। ‘राजर्षि’ और ‘राजमुनि’ भी हैं। रजोगुण से उत्पन्न गुण ‘राजसिक” कहा गया है।

माताएं अपने लाढलों को “राजा” कहती हैं। पत्नी के लिए भी उसका पति ‘राजा’ और वह खुद ‘रानी’ है। कई व्यक्तियों का नाम भी राजा/ रानी होता है। राजा शब्द में ही बड़ा आकर्षण हैं। अब राजा नहीं हैं पर राजा अमर है।

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*डा. सुरेन्द्र वर्मा मो. ९६२१२२२७७८ १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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