मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

वेलेंटाइन डे विशेष - शुभ्रता मिश्रा की कविता वसंत-विलाप

कविता
वसंत-विलाप

देखो आज वसंत कैसा कर रहा विलाप है।
प्रकृति के मधुमास में आना बना अभिशाप है?
अभिशप्त है वह काल के इस ग्रास में आने के लिए,
अभितप्त है वह प्रकृति के इस त्रास में जाने के लिए,
वसंत की इस आह से आहत धरा संताप है।
देखो आज वसंत कैसा कर रहा विलाप है।।1।।

देखो आज वसंत कैसा कर रहा विलाप है।
खग-वृंदों में चकित फैला, ये कैसा आलाप है?
सोचता है खग भी, ये कैसा मधुमास है?
न सौंदर्य का वास है, न प्रकृति में उल्लास है?
मधुमास की संवेदना के संग, हाय ! कैसा पाप है।
देखो आज वसंत कैसा कर रहा विलाप है।।2।।

देखो आज वसंत कैसा कर रहा विलाप है।
छिन गईं रागनियाँ, सायरनों का साम्राज्य है।
"प्रदूषण का देवता" अब "प्रकृति का आराध्य" है।
अब वो वासंती समीर कहाँ ? चिमनियों का ताप है।
धरणि के संग छल-चाल का ये कैसा कलाप है।
देखो आज वसंत कैसा कर रहा विलाप है।।3।।

देखो आज वसंत कैसा कर रहा विलाप है।
वसंत के बौराने का कारण आज वासंती नहीं, हम-आप हैं।
पागलों सा खोजता वह, उन वृक्ष के आवास को,
काट आए हैं जिन्हें हम, बनाने निज-वास को,
कहीं मिल गई पलाश की उस लाश से लिपट,
कितना रोया था वसंत, आह ! प्रकृति का होगा ऐसा दारुण अंत।
प्रकृति को विज्ञान का मिला ये कैसा श्राप है।
देखो आज वसंत कैसा कर रहा विलाप है।।4।।


वसंत के इस विलाप में चेतावनी है भरी पड़ी,
लेनी पड़ेगी अब हमें संकल्पों, शपथों की लड़ी,
जो न अब सम्भले, तो कठिनाइयों का साथ होगा,
वसंत के विलाप के संग, हम-आप का भी आलाप होगा।
जब चारों तरफ विलाप होगा, तनिक भी न हास होगा,
सृष्टि के रचियता के संग, क्या यह न परिहास होगा? ।।5।।

हे देव त्वरित ही वसंत को विलाप से मुक्त कर दो!
प्रकृति को पुनश्च शुचि-संगीत से आकण्ठ भर दो!
प्रकृति का आराध्य बदल, निज देवता का दान दे दो!
विज्ञान के देवता तुम, श्राप नहीं वरदान दे दो।।6।।

रचना- डॉ. शुभ्रता मिश्रा
वास्को-द-गामा, गोवा

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