शब्द संधान / मेरी छाया मेरा साया / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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एक प्रसिद्ध फिल्मी गाने के बोल हैं, “तू जहां जहां चलेगा मेरा साया साथ होगा’I अगर इसी बात को प्रेमिका की जगह उसका प्रेमी कहता तो शायद बोल कुछ इस प्रकार होते, “ तू जहां जहां चलेगी मेरी छाया साथ होगी”| तो क्या ‘छाया’ और ‘साया’ शब्दों में केवल लिंग का भेद है - ‘छाया’ स्त्रीलिंग और ‘साया’ पुल्लिंग़ हैI

लगता तो ऐसा ही हैI छाया और साया हिन्दी में समानार्थक शब्द हैंI लेकिन शब्द ‘छाया’ संस्कृत भाषा से हिन्दी में आया है जब की ‘साया’ मूलत: फारसी का लफ़्ज़ हैI फारसी में संभवत: “छ” करके कोई वर्ण होता ही नहीं है, अत: संभावना यही है कि संस्कृत/हिन्दी का ‘छाया’ फारसी में ‘साया’ हो गया होI हिन्दी ने दोनों को ही अपना लिया हैI दोनों का उच्चारण भी काफी नज़दीक है और और हिन्दी में दोनों काफी-कुछ समानार्थक भी हैंI दोनों का ही ‘छाँह’ और ‘परछाईं’ के अर्थ में इस्तेमाल होता हैI लाक्षणिक रूप से भी ‘आश्रय’ या ‘संरक्षक’ के रूप में दोनों का ही उपयोग होता है, (आपके साए में या आपकी छाया में मेरा बच्चा रहेगा तो कुछ सीख जाएगा)I शीशे पर जो प्रतिबिम्ब या अक्स पड़ता है उसे भी वस्तु का साया या उसकी छाया कहा गया हैI भूत-प्रेत का प्रभाव या सुहबत के असर को भी छाया या साया ही कहा जाता हैI हमेशा साथ साथ रहने को, कभी एक-दूसरे से विलग न होनी को, भी साए की तरह रहना या छाया की तरह बने रहना ही कहा जाता हैI

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लेकिन हिन्दी में किसी की फोटो को ‘छाया-चित्र’ कहते हैं किन्तु उसे ‘साया-चित्र’(?) नहीं कहतेI हिन्दी भाषा में छाया का अच्छा-खासा साम्राज्य हैI संगीत में ‘छाया-नट’ जैसी राग है तो हट-योग तंत्र के अनुसार योगी को आकाश में अपनी ही छाया रूप आकृति ‘छाया-पुरुष’ दिखाई देती हैI ग्रहों की गति को हम ‘छाया-गणित’ द्वारा समझ पाते हैं और ग्रह-अनिष्ट की शान्ति के लिए किया जाने वाला एक विशेष दान ‘छाया दान’ कहलाता हैI लेकिन ‘छाया-ग्रह’ अनिष्ट करने वाला ग्रह न होकर, वह शीशा या आईना है जिसमें हम अपनी छाया देखते हैंI धूप से बचने के लिए हम छाया प्रदान करने वाली ‘छतरी’ लगाते हैं, जिसे ‘छाया-मित्र’ भी कहते हैंI हिन्दू मिथक के अनुसार एक राक्षसी का नाम जिसने छाया के जरिए हनुमान को पकड़ लिया था ‘छाया-ग्राहिणी’ हैI देवी दुर्गा को भी ‘छाया’ कहा जाता हैI ‘छाया-पथ’ आकाश-गंगा है तो ‘छाया-मान’ चन्द्रमा हैI चन्द्रमा को ‘छाया-मृगधर’ भी कहते हैंI ‘छाया-लोक’ अदृश्य लोक तो है ही, ‘स्वप्न जगत’ भी हैI

हिन्दी साहित्य में भी छाया का वर्चस्व रहा हैI पूरा का पूरा एक छायावादी युग (१९१८-’३५) हिन्दी कविता में प्रतिष्ठित हैI छायावादी प्रवृत्ति हिन्दी की वह काव्यगत शैली है जिसमें व्यक्तिगत संवेदना, अज्ञेय के प्रति जिज्ञासा और निराकार के प्रति आकर्षण व्यक्त हुआ हैI निराला ने अपनी एक यथार्थवादी कविता, ‘वह तोड़ती पत्थर’ में भी ‘’कोई न छायादार, वृक्ष यह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार’’ में पत्थर तोड़नेवाली के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की हैI

यदि हिन्दी में छायावाद का बोलबाला रहा है तो उर्दू शायरी में भी साए (साया) के तमाम रंग देखे जा सकते हैंI “ये कैसा वक्त मुझपर आ गया है / मिरे क़द से मेरा साया बड़ा है !” उर्दू ज़बान में ‘लुत्फे साया’ भी है और ‘साया-ए-गुल’ भी हैI ऐसा भला कौन होगा जिसने किसी पेड़ के नीचे घने साए का लुत्फ़ न उठाया होI फूल तो खूबसूरत होते ही हैं, उनका साया भी कोई कम नाज़ुक नहीं होताI हमारा पड़ोसी हमारा ‘हमसाया’ होता हैI मुसीबत पड़ने पर सबसे पहले वही तो काम आता हैI पड़ोसी का घर ‘खाना-ए-हमसाया’ हैI पर सबसे बड़ा तो ‘हमसाया-ए-खुदा’ ही हैI

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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