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व्यंग्य / बुद्धिमान की मूर्खता / वीरेन्द्र ‘सरल‘

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लेखन का शौक घर पर सफेद हाथी बाँधने जैसा महंगा है। यह शौक घरवालों की नजरों में सिरफिरा सिद्ध करने लिए पर्याप्त है और समाज से निठल्ले की उपमा प्राप्त करने में सहायक। पता नहीं कैसे मेरे दिमाग पर यह फितूर समाया कि चाहे जो भी हो पर मैं इस महंगे शौक को जरूर पालूँगा। स्कूल के दिनों में बात शायरी से शुरू हुई थी और अब डायरी में इस तरह से घुस पड़ी है कि केवल किताब के शक्ल में बाहर निकलना चाहती है। एक पाण्डुलिपि पूर्ण होते ही मेरी कमर पर लेखकीय अकड़न की शुरूआत हो गई। गर्दन इतनी तन गई है कि किसी के हाथ में फूलमाला देखे बिना और प्रशस्ति गान सुने बिना झुकने को तैयार ही नहीं होती। दिमाग से विनया ददाति विनयं का आदर्श ऐसे छू-मंतर हो गया है जैसे पुलिस की वर्दी पहनने पर दयालुता और कुर्सी मिलने पर संवेदना हो जाती है। मैंने एक पाण्डुलिपि क्या तैयार कर ली, मानो एवरेस्ट फतह कर लिया। अब मुझे इस अजन्मे शिशु के नामकरण की चिन्ता सताने लगी। खूब सोच-विचार करके मैंने इसका नाम भी तय कर लिया ‘बुद्धिमान की मूर्खता‘

नाम सुझाने के बाद मेरे सामने जो दूसरी समस्या खड़ी थी वह थी भूमिका लेखन की। आखिर कौन लिखेगा मेरी मूर्खता मतलब बुद्धिमान की मूर्खता की भूमिका। पहले मन में विचार आया कि अखबार के आवश्यकता है वाले कॉलम में इश्तहार दे दूँ ‘एक कुशल भूमिका लेखक की आवश्यकता है‘ पर इससे आने वाली मुसीबतों की सामना करने में मैं अपने आप को असमर्थ पाया इसलिए यह विचार त्याग दिया।

एक दिन मित्र मंडली के बीच इसी विषय पर गहन विचार-विमर्श हुआ तो मित्र अनूठे लाल ने वरिष्ठ जी ‘बुद्धिजीवी‘ का नाम सुझाया। अनूठे लाल ने कहा-‘‘वैसे वरिष्ठ जी तीस साल पहले ही लिखना छोड़ चुके हैं और वरिष्ठ का तमगा गले पर लटकाये फिर रहे है। उनकी उम्र तो अभी ज्यादा नहीं हुई है पर वरिष्ठता के कारण उनकी नजर काफी कमजोर पड़ गई है। पर तुम चिन्ता मत करो, जब भी उनके पास जाओ तो कुछ पत्रम्-पुष्पम्, चरणवंदन, सम्मान-पत्र और उनके लिए एक मात्र श्रेष्ठ लेखक होने का खिताब लेते जाना। इन सब चीजों से उनको ताकत मिलती है और कुछ समय के लिए उनकी नजरों में चमक लौट आती है। अन्यथा, नव लेखकों के लेखन में उन्हें कमियों के सिवा और कुछ नहीं दिखता। हम दोनों की बातचीत से पास बैठे बाकी मित्र वरिष्ठता को कोई भयंकर बीमारी समझने लगे थे।

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मैं अनूठेलाल से लगातार वरिष्ठ जी के मिज़ाज की जानकारी लेता रहा। एक दिन उन्होंने सूचना दी कि आज वरिष्ठ जी बड़े अच्छे मूड में हैं तुरन्त उनके पास पहुँच जाओ। मैंने फटाफट तैयारी की और अपनी पाण्डुलिपि लेकर वरिष्ठ जी के बंगले तक पहुँच गया। बंगले के गेट पर लगा नेमप्लेट पढ़कर मुझे लगा यह नेमप्लेट तो उनसे भी ज्यादा वरिष्ठ है। लगता है इसे मुगलकाल में बनवाया गया है। गेट के पास ही वरिष्ठ जी का कुत्ता जंजीरों से जकड़ा हुआ मुझ पर भौंकने लगा था। शायद वह वरिष्ठ जी के अहसानों की जंजीर से बंधा हुआ था। मैंने काॅलबेल बजाया। एक आदमी बाहर आया, कुत्ते को कुछ समझाया और मुझे अंदर ले जाकर वरिष्ठ जी के कमरे तक छोड़ आया।

वरिष्ठ जी अपनी वरिष्ठता के सिरहाने पर अपना सिर रखकर लेटे हुए थे। उनकी नजर किताब पर गड़ी हुई थी। मैंने चरणस्पर्श करते हुए ‘जय वरिष्ठ ज्ञान गुण सागर, सर्वश्रेष्ठ तिहुं लोक उजागर। विद्यावान गुणी अति चातुर, मठाधीश बनने को आतुर का गायन अविलंब प्रारंभ किया। मैंने जैसे ही इस चालीसा की रफ्तार तेज की वैसे ही वरिष्ठ जी की आँखों की चमक बढ़ गई। वे खुशी के मारे बिस्तर से उछलकर सोफे पर बैठ गए और बोले-‘‘ अरे! आप खड़े क्यों हैं भाई। तशरीफ रखिए, आप बहुत दिनों के बाद दिख रहे हैं।  और बताइए आजकल क्या लिख रहे है? एक बात कहूँ, बुरा मत मानना। मुझे चापलूसी बिल्कुल पसंद नहीं है। इस शब्द से मुझे बेहद नफरत है, आप मेरी बात समझ रहे हैं न?

मुझे यह स्पष्ट तौर पर समझ आ गया था कि अपनी प्रशंसा सुनकर वरिष्ठ जी के मन में न केवल लड्डू फूट रहे हैं बल्कि लड्डुओं की आतिशबाजी हो रही है। वरिष्ठ जी पर मेरी चालीसा का असर शुरू हो चुका था। हालांकि वरिष्ठ जी से मेरी यह पहली मुलाकात ही थी। बहुत दिनों के बाद दिखने का तो सवाल ही नहीं था। ये तो अनूठे लाल द्वारा सुझाये हुए कारगर उपाय का ही कमाल था। जिसके कारण वरिष्ठ जी की कृपादृष्टि मुझ पर होने लगी थी। मैंने इस रहस्य से पर्दा उठाना उचित नहीं समझा। मन-ही-मन डर भी रहा था कि कहीं रहस्य से पर्दा उठते ही वरिष्ठ जी का मिज़ाज मौसम की तरह बदल न जाये। मौसम विभाग की जानकारी भी कई बार गलत साबित हो जाती है तो अनूठे लाल की वरिष्ठ जी के मिज़ाज संबंधी जानकारी की क्या औकात?

मैं डरते-सहमते हुए वरिष्ठ जी को अपना आने का उद्देश्य बतलाया और सम्मान-पत्र देने के अंदाज में अपनी पाण्डुलिपी उनके हाथों में थमा दी। वरिष्ठ जी मेरी पाण्डुलिपि को लगभग फेंकने के अंदाज में एक कोने पर रखा और मुझे प्यार भरी नजरों से देखने लगे। फिर उन्होंने मुस्कराते हुए पूछा-‘‘पहले आप ये बताइये, आप अपना आदर्श लेखक किसे मानते हैं?‘‘

वरिष्ठ जी का प्रश्न सुनकर मेरे कान खड़े हो गए। मुझे महाभारत की दो घटनाएं याद आ गई। पहला, द्रोणाचार्य जी के द्वारा अपने शिष्यों को पूछा गया यह प्रश्न कि तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है? सभी शिष्यों ने अपने चारों ओर देखकर विस्तार से उत्तर देने की कोशिश की और परीक्षा में फेल हो गये। अर्जुन ने दिमाग लगाया और कहा, मुझे केवल चिड़िया की आँख दिखाई दे रही है और वह पास हो गया क्योंकि गुरुदेव यही सुनना चाहते थे। दूसरी घटना यक्ष और युधिष्ठिर प्रश्नोत्तरी का यक्ष के मनोवांछित जवाब नहीं दे पाने के कारण पांच पाण्डवों में से चार भाई तो मूर्छित हो गये और युधिष्ठिर बाजी मार गया। यहाँ सवाल सही उत्तर देने का नहीं बल्कि वरिष्ठ जी के मनमाफिक उत्तर देने का था। मैंने तुरन्त उत्तर दिया-‘‘आप के सिवा इस संसार में कोई दूसरा आदर्श लेखक और कौन हो सकता है सर।‘‘

वरिष्ठ जी ने कहा-‘शाबाश‘ बहुत तरक्की करोगे। अच्छा ये बताओ, क्या आपने किसी मठाधीश से दीक्षा ली है? मैंने कहा-‘‘अभी तक तो नहीं ली है। मैं तो आपसे ही दीक्षा लेने के लिए यहाँ आया हूँ। वरिष्ठ जी ने खुश होते हुए कहा-‘वैरी गुड‘। लगता है, अभी आप किसी गुट में शामिल नहीं हुए हैं? मैंने कहा-‘‘मैं तो आपके ही गुट में शामिल होने का इच्छुक हूँ गुरुवर! जाऊँ कहाँ, तजि चरण तुम्हारे।‘‘ मैं महसूस कर रहा था कि वरिष्ठ जी की प्रसन्नता का पारा लगातार चढ़ रहा था। जब उन्होंने आशीर्वाद देने की मुद्रा में कहा-‘‘बहुत आगे तक जाओगे‘‘ तब मुझे पक्का विश्वास हो गया, अब वरिष्ठ जी अपनी गिरोह की सदस्यता का प्रमाण-पत्र मुझे तुरन्त दे देंगे।

वरिष्ठ जी ने अंतिम प्रश्न करते हुए कहा-‘‘तुम किस जाति के हो?‘‘ और यहीं उत्तर देने में मुझसे चूक हो गई। मैंने उन्हें अपनी जाति बतला दी। वरिष्ठ जी मेरा उत्तर सुनकर आग बबूला हो गये। आक्रामक मुद्रा अख्तियार करते हुए बोले-‘‘आपको ये पहले बताना था न? मैं अपनी जाति के लेखकों के अलावा किसी के लिए कुछ भी नहीं लिखता। यदि तुम हमारी जाति के होते तो तुम्हारे कचरा लेखन के लिए भी पाँच-दस पृष्ठ में प्रशंसा के कसीदे गढ़ देता। खंडकाव्य को भी महाकाव्य साबित कर देता पर--।‘‘

स्थिति बिगड़ती देख मैंने अतिरिक्त विनम्रता के साथ वरिष्ठ जी से निवेदन किया-‘‘गुरुदेव! मैं आपके पास अपनी जाति प्रमाण-पत्र बनवाने नहीं बल्कि अपनी किताब की भूमिका लिखवाने का निवेदन करने आया था। कम-से कम एक बार इसे पढ़ तो लीजिए। फिर आप जो कहेंगे वह मुझे शिरोधार्य होगा। विद्वानों का कहना है कि जात न पूछो साधु की ,पूछ लीजिए ज्ञान। मैं इससे ज्यादा कह पाता,उससे पहले ही वरिष्ठ जी ने कहा-‘‘हमको विद्वता मत सिखाओ बबुआ! ये बहुत पुराना दोहा है इसका नवीन संस्करण इस तरह हो गया है। सुनो, ‘जाति ही देखो साधु की, मत देखो कुछ ज्ञान। अपनी जाति का ही है बस इतना रखो ध्यान।‘ और क्या तुम अपने आप को साधु समझते हो?

मैंने कहा-‘‘यदि आप केवल वेशभूषा से ही किसी को साधु समझते हैं तो आपको बस मेरी दाढ़ी बढ़ने तक ही इंतजार करना पड़ेगा। बाकी साधु ड्रेस, कंठी-माला, कमंडल-चिमटा धारण करके तो मैं कल ही आपके दरबार में हाजिर हो सकता हूँ।

चिमटा शब्द वरिष्ठ जी पर बहुत गहरा असर कर गया। वे आक्रामक से आत्म रक्षा की मुद्रा पर आ गए। बोले-‘‘ठीक है, मैं लिख दूंगा। तुम दो महीने बाद यहाँ आना।‘‘

वरिष्ठ जी को ज्यादा छेड़ना मुझे बर्र के छत्ते पर हाथ डालने के समान खतरनाक लगा सो मैं अविलंब वहाँ से निकल गया।

मैं वरिष्ठ जी से इतना अधिक आतंकित हो गया था कि उनके सामने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था पर अपनी इकलौती पाण्डुलिपि का मोह दो माह के बाद मुझे उनके दरवाजे तक खींच लाया। मुझ पर नजर पड़ते ही वरिष्ठ जी ने कहा-‘‘तुम इतनी जल्दी फिर आ गए। जाओ फिर दो महीने बाद आओ। ये दो-दो महीने के चक्कर में पूरा साल बीत गया। अन्ततः वरिष्ठ जी के व्यवहार से मुझे भी गुस्सा आ गया। मैंने कहा-‘‘आप ये कोर्ट में पेशी की तारीख की तरह बार-बार तारीख क्यों बढ़ा रहे है। जो फैसला करना है अभी कीजिए। लिखिए या छोड़िये। वरिष्ठ जी तमतमा गए बोले-‘‘अजीब पागल लड़के हो, बुजुर्गों का सम्मान करना भी नहीं जानते?‘‘ मैंने भी भुनभुनाते हुए कहा-‘‘तो क्या कनिष्ठों का अपमान करने का अधिकार आपको विरासत में मिला है? लाइए, मेरी पाण्डुलिपि ही वापस कर दीजिए।‘‘

वरिष्ठ जी झल्लाकर बोले-‘‘अब वादा किया है तो लिखना ही पड़ेगा। तुम यहीं ठहरो मैं अभी लिखकर ला रहा हूँ।‘‘ वरिष्ठ जी जितनी फुर्ती से अंदर गए थे उससे कहीं ज्यादा फुर्ती से लौटे। मेरी पाण्डुलिपि मेरे हाथों पर थमाते हुए बोले-‘‘देख लो, मैंने लिख दिया है ‘ठीक है‘।‘‘

मैंने देखा, मेरी पाण्डुलिपि के ऊपर एक कागज लगा है जिस पर केवल दो शब्द लिखे हैं, ‘ठीक है‘। नीचे वरिष्ठ जी ‘बुद्धिजीवी‘ का एक लम्बा हस्ताक्षर हुआ है। मैंने रुंधे गले से पूछा-‘‘आपने तो केवल ‘ठीक है‘ ही लिखा है, क्या भूमिका इन्हीं दो शब्दों की होती है?‘‘

वरिष्ठ जी कुटिल मुस्कराहट के साथ बोले-‘‘मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि ठीक है लिख दूंगा। क्या तुमको याद नहीं है?

वरिष्ठ जी की इस हरकत से मुझे बड़ी पीड़ा हुई। मैं निःशब्द हो गया। मैं अपनी नम आँखों को छिपाते हुए सोचने लगा-‘‘जैसे चुनाव जीतने से पहले जो पार्टी किसान से उनकी अनाज के एक-एक दाना खरीदने का वादा करती है वही सरकार बनने के बाद  बहुत कम मात्रा में अनाज खरीदती है और वादा याद दिलाने पर कहती है, हम तो पहले ही बोल चुके है कि हमारी सरकार बनेगी तो हम किसानों के अनाज का केवल एक एक दाना ही खरीदेंगे। बाकी किसान जाने और उसका काम, हमें क्या? वरिष्ठ जी का वादा भी कुछ इसी तरह का था।‘‘

मैं भीगी पलकें लिए वरिष्ठ जी के बंगले से बाहर निकला। एक विचार बार-बार मेरे दिमाग पर चोट कर रहा था, जब यहाँ खुद को बुद्धिजीवी कहने वाले भी जाति, वर्ग, वर्ण, मठ, गुट और दल जैसे दल-दल में फँसे हों तो समाज किससे अपेक्षा करे? आखिर कुछ बरगद इतने ऊँचे और घने क्यों होते हैं जो अपनी छाया तले किसी नन्हे पौधे को उगने और पनपने तक नहीं देना चाहतें? अपनी अल्प समझ के आधार पर ही सही मगर मैंने अपनी किताब के लिए कितना सटीक शीर्षक चुना है ‘बुद्धिमान की मूर्खता‘।

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वीरेन्द्र ‘सरल‘

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

मो-7828243377

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