शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

शब्द संधान / मैं भी मुंह में ज़बान रखता हूँ / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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मिर्ज़ा ग़ालिब के इस मशहूर शेर –“मैं भी मुंह में ज़बान रखता हूँ / काश पूछो कि मुद्दा क्या है”, में ‘जबान’ से मतलब सिर्फ उस जीभ या जिह्वा से नहीं है जिससे हम स्वाद लेते हैं, बल्कि बोलने की उस काबिलीयत से भी है जिसे भाषा कहते हैं। जी हाँ, ज़बान सिर्फ रसेंद्रिय नहीं है बल्कि किसी भी देश की बोली जाने वाली भाषा भी है – उर्दू ज़बान, हिन्दी ज़बान, अंग्रेज़ी ज़बान, फारसी ज़बान वगैरह वगैरह। जिसके पास ज़बान है, वो ज़ाहिर है, बोलता भी है। लेकिन बोलने के लिए कोई मुद्दा तो हो।

‘ज़बां’ या ज़बान मूलत: एक फारसी का लव्ज़ है। लेकिन वह हिन्दी-हिन्दुस्तानी में ऐसा रच बस गया है कि आम आद्मी इसे हिन्दी का ही एक शब्द समझता है। ज़बान का अर्थ जिसे संस्कृत में ‘जिह्वा’ कहते हैं से है। जिह्वा हिन्दी में भी अपना लिया गया है लेकिन इसके लिए ठेठ हिन्दी का शब्द ‘जीभ’ है। जिह्वा या जीभ से अलग ज़बान का एक अर्थ और है और वह है, बोली या भाषा। (“आती है उर्दू ज़बां धीरे धीरे”!) ध्यातव्य है कि जिह्वा या जीभ “ज़बान” की तरह कभी भाषा के अर्थ में इस्तेमाल नहीं होता। हम हिन्दी ज़बान तो कहते हैं लेकिन हिन्दी जिह्वा (या जीभ) कभी नहीं कहते। हाँ, अंगरेजी में मादरे-ज़बान की तरह mother tongue बोला जाता है, पर हिन्दी में मातृभाषा ही कहा जाता है, मातृ-जिह्वा (?) नहीं। ज़बान का एक तीसरा अर्थ भी है, वचन देना या वादा करना। मैं तुम्हें ज़बान देता हूँ अर्थात मैं वादा करता हूँ। अब यह दूसरी बात है कि लोग ‘जबान देकर’ मुकर जाएं। लेकिन सब ऐसे नहीं होते। कुछ लोग ‘ज़बान के पक्के’ भी होते हैं। हिन्दी में ज़बान को लेकर कितने ही मुहावरे बन गए है।

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‘ज़बान चलाना’ एक ऐसा ही मुहावरा है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो चुप नहीं रह सकते, बल्कि दूसरों की ‘ज़बान बंद कर’ देते हैं। उनकी खुद की ज़बान तो “चलती” ही रहती है। बोलते हैं तो बोलते ही चले जाते हैं। मुंहजोरी करना कोई उनसे सीखे। यह ज़बान भी क्या अजीब शै है। हम सिर्फ चलाते ही नहीं, ‘ज़बान देते’ भी हैं और ‘ज़बान हार’ भी जाते हैं। हमेशा कहाँ निभा पाते हैं अपने वादे ? लेकिन बाज़ नहीं आते। बात बेबात ज़बान लड़ाते हैं, भला-बुरा कहते है और अपनी ज़बान निकाले बिना नहीं रहते, भले ही बाद में ज़बान पलटना ही क्यों न पड़े। इस हुनर में हमारे राजनेता तो बहुत ही पक्के हैं।

कभी कभी हम बोलना नहीं चाहते, पर ‘ज़बान खोलने’ के लिए मजबूर हो जाते हैं। हर कोई ‘ज़बां-फरोश’ नहीं हो सकता। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें ज़बां-फरोशी मानों घुट्टी में मिली होती है। वे अपनी वाचाल प्रवृत्ति से बाज़ नहीं आते। उन्हें ‘ज़बान के चटकारे’ लेने में मज़ा आता है। तरह तरह के इंसान हैं। कुछ की “कड़वी ज़बान” होती है, तो कुछ “शीरीं ज़बान” भी होते हैं। मीठा बोलते हैं। सामान्य व्यवहार में बात करते समय किसी की बात बीच में ‘काटना’ अच्छा नहीं माना जाता, पर अक्सर ऐसा होता तो है ही। कुछ बाते ‘ज़बान पर चढ़’ जाती हैं और हम बार बार उन्हें दोहराते रहते हैं। भूल जाते हैं कि हम कह क्या रहे थे। बड़ी मुश्किल से ‘बात पर आ’ पाते हैं।

ज़बान को लेकर न जाने कितने शब्द बन गए है। हैं तो ये सारे शब्द फारसी के ही लेकिन हिन्दी में भी पूरी तरह से अपना लिए गए हैं। ‘ज़बानगीर’ जासूस को कहा गया है तो ‘ज़बांनदां’ ऐसे भाषविद को कहते है जिसका किसी ज़बान पर पांडित्य होता है। ‘ज़बानी’ याद हो जाना रट जाना है। ऊपरी तौर पर दिखावे के लिए जो केवल मौखिक रूप से कहा गया हो वह भी बस ‘ज़बानी’ जमा-खर्च ही होता है।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद – २११००१

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