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व्यंग्य \ ज्ञानी जी का ज्ञान \ वीरेन्द्र ‘सरल‘

बांस की कलाकृति

बुजुर्गों का कहना है कि पहले हमारे गाँव में बुद्धिमान लोग ही रहा करते थे। जो वैज्ञानिक चेतना से सम्पन्न थे और जिन्हें कार्य-कारण को समझकर जीवन जीने की कला  आती थी। मंत्र-तंत्र, टोना-टोटका, भूत-प्रेत और चमत्कारों पर उन्हें कोई भरोसा नहीं था। पता नहीं किस मनहूस घड़ी में एक स्वघोषित ज्ञानी जी का आगमन इस गाँव में हुआ। जब वे आये तो उनके पास लम्बी दाढ़ी, घुंघराले केश और क्षीणकाय काया के सिवाय एक ढेला भी नहीं था। उनसे जब उनका पता ठिकाना पूछा जाता तो वे खुद को रमता जोगी बहता पानी बताते थे। लेकिन कुछ ही समय में वह जोगी हमारे गाँव में ऐसे रम गया कि उनकी पूरी गृहस्थी ही बस गई। गृहस्थी अर्थात चेले-चपाटे एकत्रित होने लगे। पहले एक छोटा सा आश्रम बना जो देखते ही देखते हनुमान की पूंछ और द्रौपदी की चीर की तरह बढ़ने लगा। आश्रम का प्रवेश द्वार सुरसा के मुख के समान विशाल और भयानक होता जा रहा था। आश्रम का आशय ही है कि वहाँ आने वाले भक्तों के श्रम से निर्मित अट्टालिका।

भक्त लोग ज्ञानी जी को अपना गुरु मानते थे पर ज्ञानी जी अपने आप को ‘महागुरू‘ समझते थे। दिनों-दिन ज्ञानी जी की सुख-समृद्धि कोर्ट में पेशी की तारीख की तरह बढ़ने लगी थी। पानी ठहरकर सड़ने लगा था पर सड़ांध अभी किसी को महसूस नहीं हो रही थी। ज्ञानी जी की धार्मिकता गाँव वालों एवं आसपास  के भक्तों को अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़ने लगी थी। ज्ञानी जी का एक ही कार्य था बस प्रवचन देना। इसी के बल और फल पर उनका शरीर पहलवानों जैसा बलिष्ठ हो गया था। चेहरे का रंग एकदम दूधिया हो गया था मानो किसी सुपर डिटरजेन्ट से धोया गया हो। उनकी वाणी में इतनी मिठास आ गई थी कि सुनने वालों को डायबिटिज होने का खतरा महसूस होता था। भरपूर दक्षिणा मिलने पर उनकी वाणी की मिठास और ज्यादा बढ़ जाया करती थी और कम होने पर चेहरा हीटर की तरह दहकने लगता था। वैसे तो ज्ञानी जी निरक्षर थे मगर अपने ज्ञान का प्रदर्शन ऐसा करते थे जैसे फिल्मों में हीरोइन अंग प्रदर्शन करती हैं। उन्होंने अपनी वेशभूषा कुछ इस तरह से बना रखी थी कि उनके आभामंडल में केवल और केवल ज्ञान ही मंडराते हुए नजर आता था। गाँव वाले उन्हें पहले केवल बाबा जी ही कहते थे पर उन्होंने अंगूठा लगाकर गाँव वालों को शपथ पत्र और अखबारों में इश्तहार दिया कि मैं बाबा नहीं बल्कि परम ज्ञानी हूँ। इसलिए मुझे इसी नाम से पुकारा जाय। आज से कोई मुझे यदि भूल से भी बाबा कहेगा तो मैं उसे श्राप दे दूँगा। तभी से डर के मारे सारे भक्त उन्हें ज्ञानी जी  कहने लगे।

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ज्ञानी जी को तर्क करने वालों से विशेष घृणा है। वे तार्किक और विवेकी व्यक्ति को अपना जानी दुश्मन समझते हैं और अंधभक्तों को परम हितैषी। क्षेत्र के विवेकी माननीयगण इन महागुरू की वास्तविकता से भली-भांति परिचित हैं पर अंधभक्तों की भीड़ का आकर्षण उन्हें उनसे आशीर्वाद लेने के लिए बाध्य कर देता है। किसी विषय पर तर्क करने पर परम ज्ञानी जी ऐसे चिल्लाने लगते हैं मानो शांति समिति की बैठक की अध्यक्षता कर रहे हों। वे आज भी भूकंप आने को शेषनाग का सिर हिलाना और बाढ़ आने को गंगा मैया का साक्षात प्रकट होना समझते है। बाढ़ या किसी भी प्राकृतिक विपदा से पीड़ित लोगों की व्यथा को वे उनका पूर्वजन्मों का पाप समझते है। विज्ञान और तर्क संबंधी चर्चा को वे घृणित और तुच्छ कार्य समझते ।

जीवन और जगत के जटिल से जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिए वे सबसे पहले प्रवचन पद्धति का प्रयोग करते हैं। उनसे गरीबी, भुखमरी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोटी की बात करो तो वे पारलौकिक दुनिया पर झन्नाटेदार प्रवचन झाड़ देते हैं। लौकिक दुनिया की चर्चा करना छोड़कर वे पारलौकिक दुनिया की बातें इतना विश्वास के साथ करते हैं जैसे वे बीच-बीच में वहाँ सफर के लिए जाते हों और सब कुछ अपनी आँखों से देखकर आ गये हो। भक्त यदि उनकी प्रवचन पद्धति से सन्तुष्ट न हो तो व शांति पाठ और हवन पद्धति को प्रयोग में लाते हैं।

उनसे यदि कोई राशन कार्ड, जाब कार्ड, स्मार्ट कार्ड या गरीबी रेखा कार्ड नहीं बनने से होने वाली परेशानी की बात करे या भूल से भी अपने दैनिक उपयोग की वस्तुओं यथा टी वी , कूलर या पंखा  के बिगड़ने की भी बात कह बैठे तो वे सीधे शांति पाठ कराने की सलाह देते है। माया महा ठगनी हम जानी की भजन झूम-झूमकर गाते हैं और दक्षिणा कम मिलने पर भड़क जाते हैं। जीवों पर दया करना चाहिए का लम्बा प्रवचन सुनाते हैं लेकिन यदि कोई बकरी आश्रम के किसी पत्ती पर भी मुँह मार दे तो उसकी ऐसी धुनाई करवाते हैं कि डर के मारे तितलियां तक फूलों पर मंडराना छोड़ देती है। दान की महिमा का खूब बखान करते हैं पर देश पर आने वाली प्राकृतिक विपदाओं के समय पीड़ित की सहायता के लिए आश्रम की अरबों-खरबों की सम्पत्ति में से एक दमड़ी भी दान नहीं देते।

ज्ञानी जी की प्रवचन के समय एक विशेष बात यह भी होती है, प्रवचन के पहले और बाद में ‘‘लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ ऐसे‘‘ का गीत जरूर बजता है। पर भक्तजनों को छुपाऊँ ऐसे की जगह छुपाऊँ कैसे सुनाई देता है। जिसे वे ज्ञानी जी की महानता और विनम्रता मानते है। आश्रम में सालभर में प्राप्त दक्षिणा और प्रवचन से प्राप्त धन राशि का हिसाब लगाया जाता है। इस बार जब मार्च के अन्त में चेलों ने आश्रम की वार्षिक आमदनी का हिसाब लगाया तो उनके होश उड़ गये। रिपोर्ट ज्ञानी जी तक पहुँची तो उनके माथे पर भी चिन्ता की लकीरें उभरने लगी। कारण पता लगाने पर पता चला कि भक्तों की संख्या कुछ कम हो रही है। स्थिति सुधारने के लिए अब ज्ञानी जी अपने एक घंटे के प्रवचन में दस मिनट प्रवचन करते और पचास मिनट दान की महिमा का विज्ञापन। पर स्थिति में कुछ ज्यादा सुधार नहीं आ रहा था। आश्रम में रोज रात्रि इस विषय पर विचार मंथन होने लगा कि साल भर दोनों हाथों से बटोरने के बाद एकाध दिन भक्तों के लिए भंडारे का आयोजन ही होता है। भंडारे में कोई विशेष खर्च भी नहीं किया जाता। ये सब तो भक्तों के मुँह को बंद करने के लिए ही होता है। वे भोजन नहीं बल्कि प्रसाद ही ग्रहण करते हैं फिर भी आमदनी कम हो रही है। आखिर किसकी नजर लग गई हमारी आमदनी को? कहीं सोशल मीडिया का भूत तो हमारे पीछे नहीं पड़ गया। सत्यानाश हो व्हाटसप और फेसबुक का। ये तो हमारा धंधा चौपट करने पर तुल गया है। ज्ञानी जी आसमान की ओर देखते हुए अपनी झोली फैलाकर कर बुदबुदाने लगते कि प्रेम से आपको तो वश में किया जा सकता है पर दूर संचार के इन आधुनिक यंत्रों को वश में कैसे किया जाय। खिसकते हुए भक्तों को वश में करने का कुछ तो उपाय बताइये।

अब ज्ञानी जी पैंतरा बदलते हुए अपने अगले प्रवचन से अपने भक्तों को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सीख देने का अभियान छेड़ दिया। कहने लगे वो जो ऊपर बैठा हैं वो सबके लिए इंतजाम करता है। आपको अपने परिवार की चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर अपने प्रमुख चेले की ओर देखकर अपनी बायीं आंख दबाकर कहते बच्चे ज्यादा होंगे तो कमाई भी ज्यादा होगी, है ना? प्रमुख चेले रहस्यमयी मुस्कराहट के साथ सहमति में सिर हिलाते हुए  जोरदार ताली बजाते फिर भक्तों की भीड़ से तालियों की जोरदार गड़गड़ाहट गूँजने लगती। ज्ञानी जी इसी संदेश को अपना एकसूत्रीय कार्यक्रम मानकर लगातार प्रसारित कर रहे थे। इससे उनका एक कनिष्ठ चेला असहमत था। बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती समस्याओं से चेला भली भांति अवगत था। एक दिन रात्रिकालीन सत्संग की बेला के बाद जब ज्ञानी जी अपने कक्ष में आराम फरमाते हुए आश्रम की आमदनी वृद्धि पर चिन्तन-मनन करते हुए ध्यानस्थ थे तभी एकांत पाकर उस नौसिखुए चेले ने कहा-‘‘गुरुजी! आप ये किस मुहिम में लग गये, जो भक्तों को ज्यादा बच्चे पैदा करने का संदेश देते हुए नहीं अघा रहे हैं। कहीं परिवार नियोजन वालों को पता चल जायेगा तो वे हाथ धोकर हमारे पीछे पड़ जायेंगे। यदि मामला कोर्ट-कचहरी में चला गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे। एक बार कहीं कोर्ट के चक्कर में हम पड़ गये तब तो ऊपर वाला ही मालिक है। फिर कोई शांति पाठ और हवन काम आने वाला नहीं है।  हमारे सात जन्मों के बाद भी कोई फैसला सुनने के लिए मिल गया तो ये भी किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। आप इस चक्कर में न पड़े तो ही हमारी और आश्रम की सेहत के लिए ठीक रहेगा। इस चक्कर में आश्रम की सारी सम्पत्ति स्वाहा हो जायेगी और हम सबको ‘भिक्षाम् देहि‘ कहते हुए दर-दर भटकना पड़ जायेगा। आप ज्ञानी है तो आपका ज्ञान समाज के हित में होना चाहिये। समाज सुधार और जागरूकता ही हमारा धर्म होना चाहिये पर आप तो लोगों के उल्टा पाठ पढ़ाकर सदियों पीछे धकेलने का प्रयास कर रहे हैं। ज्ञान वही अच्छा जिससे सबका भला हो।

चेले की बातें सुनकर क्रोध को जीत लेने का दावा करने वाले ज्ञानी जी आग-बबूला हो गये। दाँत किटकिटाते हुए बोले-‘‘अच्छा! तू मुझे समझायेगा? अभी तेरा प्रशिक्षण पूरा भी नहीं हुआ और तू जुबान चलाने लगा। ट्रेनिंग पीरियड में तेरा यह हाल है तो आगे जाकर तू क्या करेगा? लगता है तू बेरोजगारी के डर से मेरा चेला बना था। तू देखने में जितना सुन्दर है अक्ल से उतना ही मूढ़। तुझे सुदर्शन देखकर और वाकपटु जानकर मैंने अपना चेला बनाया था कि तू इस धंधे में चार-चाँद लगायेगा। मैंने सोचा था कि तुझे ही इस आश्रम का मैंनेजिंग डाइरेक्टर बनाऊँगा पर तुमने मेरी आशाओं पर पानी फेर दिया। तुझे धंधे की तमीज नहीं है। मूरख! तुझे तो इतना भी पता नहीं है कि सबसे अच्छा ज्ञान वही होता है जिससे किसी का भला हो या न हो पर अपना और अपनों का भला जरूर हो, समझा?‘‘

--

वीरेन्द्र ‘सरल‘

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

मो-7828243377

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