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एक विवाह ऐसा भी - महाशिवरात्रि विशेष / शैलेश त्रिपाठी

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इसे संयोग ही कहा जाये कि अभी अभी हम एक ऐसे तथाकथित प्रेम के विशेष त्यौहार से रूबरू हुए और उसके ठीक बाद प्रेम का एक ऐसा त्यौहार जो सनातन भी है और पुरातन् भी । ऐसे में हमें  सत् चित आनन्द तीनों की प्राप्ति का सुंदर अवसर मिलता है। ये बात सही है की भारत एक ऐसा देश है जहां हर मौका ख़ुशी का हो तो उसे त्यौहार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा जा सकता है । इसीलिये आज का यह शुभ अवसर,शुभ दिन जिसे हम महाशिवरात्रि कहते है। महाशिवरात्रि आज के जगद् गुरु शंकर का विवाह माता पार्वती से हुआ जिसके सन्दर्भ में कहा गया- 


   शिव: शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभावितुम।
न चेदेवं देव: न खलु कुशल: स्पन्दितुमपि।।
    


विवाह का अर्थ,विवाह का उद्देश्य इन सभी का उत्तर हमें इस विशेष पर्व से मिलता है । प्रायः हम दो तरह से विवाह को बोलते है एक विवाह दूसरा बियाह।
यदि शादी राम के प्रेरणा से करेंगे तो विवाह-वाह बन जायेगा ।
यदि शादी वासना के प्रेरणा से करेंगे तो बियाह-आह! बन जायेगा।
भगवान शंकर का विवाह राम के प्रेरणा से हुआ है इसलिए उनका विवाह आज वाह वाह है।
काशी में इस पर्व का अपना अलग मज़ा है,इसको मनाने का अपना अलग अंदाज़ है। यहां आज के दिन पंचक्रोशी यात्रा की जाती है ।
इस यात्रा का प्रारंभ या तो मणिकर्णिका कुंड से संध्या के समय करते हैं, या फिर अस्सी घाट से मध्यरात्रि के आस-पास यात्रा का प्रारंभ करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी चलने की क्षमता के अनुसार यह यात्रा 1, 3 या 5 दिनों में पूरी करता है।
यह यात्रा पुरुषोत्तम मास में भी की जा सकती है। जिसे हिन्दू तिथिपत्र या पंचांग के अनुसार मलमास या अधिक मास भी कहा जाता है, जो हर 2-3 सालों में आता है। मेरा तर्क कहता है, क्योंकि, यह अधिक मास है तो इस यात्रा के लिए यह शुभ काल भी हो सकता है।
हिन्दू तिथिपत्र के फालगुन, वैशाख और चैत्र महीनों में भी यह यात्रा की जा सकती है।
मेरा मानना है कि, अगर आप स्वयं तैयार है तो आप कोई भी तीर्थ यात्रा कभी भी कर सकते हैं।

पंचक्रोशी यात्रा पर जाने का मार्ग

पञ्च क्रोशी यात्रा सूचना पट्ट
पंचक्रोशी यात्रा का आरंभ मणिकर्णिका कुंड से होता है। यह एक छोटा सा जलाशय है जो प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट के पास स्थित है। कहा जाता है कि यह कुंड वाराणसी में बहनेवाली गंगा से भी प्राचीन है। उपाख्यानों ने इस कुंड को शिव, शक्ति और विष्णु से जोड़ते हुए हिन्दू धर्म के तीनों संप्रदायों के लिए इसे महत्वपूर्ण बताया गया है। भक्त इस कुंड में डुबकी लगाकर अपनी अंजुली में पानी लेकर यात्रा करने का संकल्प करते हैं। यह एक प्रकार से यात्रा पूरी करने का वचन है। अगर आप के मन कोई इच्छा हो तो उसकी पूर्णता की कामना करने का यही अच्छा समय है। और आपकी इच्छा पूर्ण होने के बाद आपको फिर से यहां पर माथा टेकने आना होता है।   मणिकर्णिका कुंद में संकल्प ले भक्तगण नाव से अस्सी घाट की ओर बढ़ते हैं, जो वाराणसी में गंगा के दक्षिणी क्षेत्र की ओर स्थित है। यहीं से यात्रा का वास्तविक आरंभ होता है। इसके बाद आपको रास्ते में 5 पड़ावों से गुजरते हुए जाना है, जो 50 मील या करीब-करीब 80 कि.मी. के मार्ग पर स्थित है। पंचक्रोशी यात्रा का यह मार्ग, तीर्थ यात्रा का बहुत ही प्राचीन मार्ग है। इस मार्ग पर आपको अनेकों सूचना पट्ट दिखेंगे जो इस पूरी यात्रा में आपका मार्गदर्शन करेंगे इस यात्रा में कुल पांच पड़ाव है जैसे-  

मणिकर्णिका से कर्दमेश्वर – 3 कोस
कर्दमेश्वर से भीम चंडी – 5 कोस यानी कुल 8 कोस
भीम चंडी से रामेश्वर – 7 कोस यानी कुल 15 कोस
रामेश्वर से शिवपुर – 4 कोस यानी कुल 19 कोस
शिवपुर से कपिलधारा – 3 कोस यानी कुल 22 कोस
कपिलधारा से मणिकर्णिका – 3 कोस यानी कुल 25 कोस ।

कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान राम ने अपने तीनों भाइयों और पत्नी सीता के साथ पंचक्रोशी यात्रा की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग रामेश्वर मंदिर में पाये जाते हैं। भगवान राम ने यह यात्रा अपने पिताजी दशरथ को श्रवण कुमार के माता-पिता के श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए की थी।।                
द्वापर युग में पांडवों ने यह यात्रा द्रौपदी के साथ की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग शिवपुरी के पांडव मंदिर में पाये जाते हैं। इस मंदिर के पास में ही एक जलकुंड है, जिसे द्रौपदी कुंड के नाम से जाना जाता है। पांडवों ने यह यात्रा अपने निर्वासन काल या अज्ञात वास के दौरान की थी।
ये सभी इस बात के द्योतक है काशी में किस तरह से इस महापर्व का आयोजन किया जाता होगा । इस दिन लोग भगवान शंकर के विवाह में  बराती के रूप में सम्मिलित होते है और इस सनातन मांगलिक कार्यक्रमों के हिस्सा बनते है।
भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित हुई। पार्वती की तरफ से कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते।               जब शिव और पार्वती का विवाह होने वाला था, तो एक बड़ी सुंदर घटना हुई। उनकी शादी बहुत ही भव्य पैमाने पर हो रही थी। इससे पहले ऐसी शादी कभी नहीं हुई थी। शिव – जो दुनिया के सबसे तेजस्वी प्राणी थे – एक दूसरे प्राणी को अपने जीवन का हिस्सा बनाने वाले थे। उनकी शादी में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग शामिल हुए। सभी देवता तो वहां मौजूद थे ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंचे। आम तौर पर जहां देवता जाते थे, वहां असुर जाने से मना कर देते थे और जहां असुर जाते थे, वहां देवता नहीं जाते थे।
शिव को पशुपति कहा गया हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे।


बाबा के विवाह में घटी एक अजीब घटना-
भगवान शिव और देवी पार्वती की वंशावली के बखान की रस्म

वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है जो उसके जीवन का गौरव होता है। तो पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया गया। यह कुछ देर तक चलता रहा। आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े, जिधर वर शिव बैठे हुए थे।
सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर शिव के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। वधू का परिवार ताज्जुब करने लगा, ‘क्या उसके खानदान में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उसके वंश की महानता के बारे में बता सके?’ मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहां नहीं आया था क्योंकि उसके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने साथियों, गणों के साथ आया था जो विकृत जीवों की तरह दिखते थे। वे इंसानी भाषा तक नहीं बोल पाते थे और अजीब सी बेसुरी आवाजें निकालते थे। वे सभी नशे में चूर और विचित्र
भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित हुई। पार्वती की तरफ से कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते। आइये जानते हैं आगे क्या हुआ…

भगवान शिव की शादी में आए हर तरह के प्राणी

जब शिव और पार्वती का विवाह होने वाला था, तो एक बड़ी सुंदर घटना हुई। उनकी शादी बहुत ही भव्य पैमाने पर हो रही थी। इससे पहले ऐसी शादी कभी नहीं हुई थी। शिव – जो दुनिया के सबसे तेजस्वी प्राणी थे – एक दूसरे प्राणी को अपने जीवन का हिस्सा बनाने वाले थे। उनकी शादी में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग शामिल हुए। सभी देवता तो वहां मौजूद थे ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंचे। आम तौर पर जहां देवता जाते थे, वहां असुर जाने से मना कर देते थे और जहां असुर जाते थे, वहां देवता नहीं जाते थे।

शिव पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे। उनकी आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी। मगर यह तो शिव का विवाह था, इसलिए उन्होंने अपने सारे झगड़े भुलाकर एक बार एक साथ आने का मन बनाया। शिव पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे। यह एक शाही शादी थी, एक राजकुमारी की शादी हो रही थी, इसलिए विवाह समारोह से पहले एक अहम समारोह होना था।


भगवान शिव और देवी पार्वती की वंशावली के बखान की रस्म

वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है जो उसके जीवन का गौरव होता है। तो पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया गया। यह कुछ देर तक चलता रहा। आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े, जिधर वर शिव बैठे हुए थे।

सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर शिव के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। वधू का परिवार ताज्जुब करने लगा, ‘क्या उसके खानदान में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उसके वंश की महानता के बारे में बता सके?’ मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहां नहीं आया था क्योंकि उसके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने साथियों, गणों के साथ आया था जो विकृत जीवों की तरह दिखते थे। वे इंसानी भाषा तक नहीं बोल पाते थे और अजीब सी बेसुरी आवाजें निकालते थे। वे सभी नशे में चूर और विचित्र अवस्थाओं में लग रहे थे।


फिर पार्वती के पिता पर्वत राज ने शिव से अनुरोध किया, ‘कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताइए।’ शिव कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही शादी को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था।
शिव कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही शादी को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था। वह बस अपने गणों से घिरे हुए बैठे रहे और शून्य में घूरते रहे। वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे यह सवाल पूछते रहे क्योंकि कोई भी अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से नहीं करना चाहेगा, जिसके वंश का अता-पता न हो। उन्हें जल्दी थी क्योंकि शादी के लिए शुभ मुहूर्त तेजी से निकला जा रहा था। मगर शिव मौन रहे।


समाज के लोग, कुलीन राजा-महाराजा और पंडित बहुत घृणा से शिव की ओर देखने लगे और तुरंत फुसफुसाहट शुरू हो गई, ‘इसका वंश क्या है? यह बोल क्यों नहीं रहा है? हो सकता है कि इसका परिवार किसी नीची जाति का हो और इसे अपने वंश के बारे में बताने में शर्म आ रही हो।’  फिर नारद मुनि, जो उस सभा में मौजूद थे, ने यह सब तमाशा देखकर अपनी वीणा उठाई और उसकी एक ही तार खींचते रहे। वह लगातार एक ही धुन बजाते रहे – टोइंग टोइंग टोइंग। इससे खीझकर पार्वती के पिता पर्वत राज अपना आपा खो बैठे, ‘यह क्या बकवास है? हम वर की वंशावली के बारे में सुनना चाहते हैं मगर वह कुछ बोल नहीं रहा। क्या मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से कर दूं? और आप यह खिझाने वाला शोर क्यों कर रहे हैं? क्या यह कोई जवाब है?’ नारद ने जवाब दिया, ‘वर के माता-पिता नहीं हैं।’ राजा ने पूछा, ‘क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वह अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानता?’


‘नहीं, इनके माता-पिता ही नहीं हैं। इनकी कोई विरासत नहीं है। इनका कोई गोत्र नहीं है। इसके पास कुछ नहीं है। इनके पास अपने खुद के अलावा कुछ नहीं है।’ पूरी सभा चकरा गई। पर्वत राज ने कहा, ‘हम ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने पिता या माता के बारे में नहीं जानते। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हो सकती है। मगर हर कोई किसी न किसी से जन्मा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी का कोई पिता या मां ही न हो।’ नारद ने जवाब दिया, ‘क्योंकि यह स्वयंभू हैं। इन्होंने खुद की रचना की है। इनके न तो पिता हैं न माता। इनका न कोई वंश है, न परिवार। यह किसी परंपरा से ताल्लुक नहीं रखते और न ही इनके पास कोई राज्य है। इनका न तो कोई गोत्र है, और न कोई नक्षत्र। न कोई भाग्यशाली तारा इनकी रक्षा करता है। यह इन सब चीजों से परे हैं। यह एक योगी हैं और इन्होंने सारे अस्तित्व को अपना एक हिस्सा बना लिया है। इनके लिए सिर्फ एक वंश है – ध्वनि। आदि, शून्य प्रकृति ने जब अस्तित्व में आई, तो अस्तित्व में आने वाली पहली चीज थी – ध्वनि। इनकी पहली अभिव्यक्ति एक ध्वनि के रूप में है। ये सबसे पहले एक ध्वनि के रूप में प्रकट हुए। उसके पहले ये कुछ नहीं थे। यही वजह है कि मैं यह तार खींच रहा हूं।’ इसलिए शंकर को स्वयंभू कहा गया है ।

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भूत परेत बनलबा बराती
आठों अंग भेला की भभूती
गरवा सांप मारे ला फुंफकारी
लोग देखि कठुआय गइलन हो बाबा
गौरा दुआरे आई गइली बरतिया
गौरा क सखियां निहारें सुरतिया
नाऊन जो चलली करे परछन को
फेंक के मूसरा पराय गईली हो बाबा
मचल हाहाकार सखी गौरा की नगरिया
देखि-देखि मयना पीटें आपन छतिया
अइसन तपसी से बेटी ना बियहबों
भले रहि जइहें गौरा कुंआर हो बाबा
शिव जी आए मदारी बन के बाबा.
चल देखि आई बरतिया हो सखी
चल चलीं हिमाचल की पार
बरतिया देखि आंई सखी
आगे-आगे ब्रम्हा चलें
पीछे-पीछे विष्णु
शिव बूढ़े बैल असवार हो सखी
चल देखि आंई बरतिया हो सखी
माथे सोहें गंगा लीलरा
चनरमा
संपवा गरे में सोहे चार हो सखी
चल देखि आई बरतिया हो सखी
केहू के गोड़ नाहीं
हाथ नाहीं केहू के मुंहवां से दीखे आरपार हो सखी
चल देखि आई बरतिया हो सखी।।।

 

यह पर्व हमें अपनी जिम्मेदारी,हमारे मायने,हमारे कर्तव्य की ओर विमुख करता है इसलिए शिव के जीवन में त्याग,प्रेम,विनम्रता सब कुछ जो जीवन को वाह बनाता है, आह नहीं।
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शैलेश त्रिपाठी
छात्र-काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
विदेशी भाषा अध्ययन विभाग एवम्
भारतीय प्रतिनिधि,
संचेतना हिंदी पत्रिका,क्वांगचौ चीन

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