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देवो में देव महादेव / महाशिवरात्रि विशेष / “मानस शिरोमणि” डॉ. नरेन्द्र कुमार मेहता

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सभी मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को 'शिवरात्रि' कहा जाता है किन्तु माघ (फाल्गुन पूर्णिमान्त) अर्थात फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी जो कि सबसे महत्वपूर्ण है इसे ही 'महाशिवरात्रि' कहा जाता है। शिवपुराण की कोटिरूद्रसंहिता में उल्लेख है कि महाशिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु एवं पार्वतीजी के पूछने पर भगवान महादेव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है।

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जो भक्त इस दिन उपवास करके बिल्व पत्तियों से भगवान शिव की पूजा अर्चना वन्दना करता है और रात्रिभर 'जागरण' करता है, शिवजी उसे नरक से बचाते हैं और आनन्द एवं मोक्ष प्रदान करते हैं तथा व्यक्ति स्वयं शिव हो जाता है। महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक पर्व है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। अंग्रेजी कलेण्डर के अनुसार यह दिन फरवरी अथवा मार्च माह में ही प्रायः आता है। इस वर्ष यह पर्व 17 फरवरी मंगलवार को आ रहा है।

महाशिवरात्रि उत्सव के सम्बन्ध में गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण, पद्मपुराण एवं अग्निपुराण आदि पुराणों में बड़ा ही सुन्दर वर्णन है। इन पुराणों में कहीं-कहीं वर्णनों में अन्तर है किन्तु प्रमुख बातें एक समान ही वर्णित है।

-शिव ही देवों के देव महादेव कैसे-

सृष्टि में महान या बड़़ा बनने के लिये त्याग, तपस्या, धैर्य, उदारता, सहिष्णुता जैसे अनेक गुण होना चाहिये। संसार के विष को अपने भीतर ही पीकर अपने भक्तों आश्रितों के लिये अमृत देने वाले और विरोधों विषमताओं को भी सन्तुलित रखने वाले परिवार में सुदृढ़ एकता बनाने वाला ही महादेव होता है। इनके निकट पार्वतीजी का सिंह तो दूसरी ओर वृषभ (बैल) शरीर पर साँप है तो कुमार कार्तिकेय का मोर, गणेशजी का वाहन मूषक है। विष है तो अमृतमयी गंगा का जल, शिव कभी पिनाकी धनुर्धर वीर हैं तो नरमुण्डधारी कपाली, कही अर्धनारीश्वर तो कहीं महाकाली के पैरों में लुण्ठित, कभी मृड अर्थात् सर्वधनी तो कभी दिगम्बर, निर्माण देव भव और संहारदेवरूद्र कभी, भूतनाथ कभी विश्वनाथ आदि अनेक विरोधी बातों का जिनके प्रताप से एक जगत् पावन संगम होता हो, वे ही आशुतोष तो देवों के देव महादेव ही हो सकते हैं।

-महाशिवरात्रि उसके अनेक रूप-

महाशिवरात्रि पर्व कई तरह से मनाया जाता है। प्रायः यह माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन से ही होली पर्व का प्रारम्भ हो जाता है। अनेक शिव भक्त ईख एवं बेर तब तक नहीं खाते, जब तक महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को अर्पित न कर दें। सामान्य रूप से शिवजी को बेलपत्र, जलाभिषेक कर पूजन किया जाता है। ऐसा मानना है कि महाशिवरात्रि के ही दिन नही शंकरजी का विवाह पार्वतीजी से हुआ था। उनकी बारात निकली थी। इस दिन व्रत धारण करने से पापों का नाश होता है। मनुष्य की हिंसक प्रवृत्ति का नाश होता है। उसके हृदय में दयाभाव उपजता है। ईशान संहिता में स्पष्ट उल्लेख है-

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशनत्।

चाण्डाल मनुष्याणां भुक्ति मुक्ति प्रदायकं।।

पूजा कैसे करें

दिनभर यथाशक्ति जप करना चाहिये अर्थात् जो द्विज है और जिनका विधिवत यज्ञोपवीत संस्कार हुआ है तथा नियमपूर्वक यज्ञोपवीत धारण करते हैं, उन्हें ''ऊँ नमः शिवाय'' महामंत्र का जप करना चाहिये किन्तु जो द्विजेतर अनुपनीत एवं स्त्रियाँ हैं, उन्हें प्रणवरहित केवल शिवाय नमः मंत्र का ही जप करना श्रेष्ठकर है। रूग्ण, अशक्त और वृद्धजन दिन में फलाहार कर रात्रि में पूजा कर सकते हैं, वैसे यथाशक्ति बिना फलाहार ग्रहण किये रात्रि पूजा करना उत्तम माना गया है। इस दिन अष्टाध्यायी का पाठ, हवन, पूजन तथा अनेक प्रकार से महादेवजी की पूजा कर अर्चना-वन्दना करनी चाहिये। मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर उसमें बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल डालकर शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिये। यदि घर के आसपास शिवालय न हो तो शुद्ध गीली मिट्टी से भी शिवलिंग निर्मित कर पूजना भी उत्तम होता है।

शिवजी तनिक सेवा से ही प्रसन्न होकर बड़े से बड़े पापी का उद्धार कर देते हैं इसीलिये इन्हें महादेव एवं आशुतोष कहा गया है। वे भक्त की दौड़कर रक्षा करते हैं। शिवजी की पूजा अनजाने में हो जाने पर व्यर्थ नहीं जाती है। सभी वर्ण के लोग एक होकर पूजा कर सकते हैं। देव, गंधर्व, राक्षस, किन्नर, नाग, मानव सभी उनके आराधक हैं। शिवलिंग पर तीन पत्ती वाला बेलपत्र और बून्द-बून्द जल चढ़ाना, सत्, रज और तम तीन गुणों को शिव को अर्पित कर उनकी अर्चना की जाती है। बून्द-बून्द जल जीवन के एक-एक क्षण का प्रतीक है। इसका सारांश यह है कि जीवन का प्रत्येक क्षण शिव की उपासना में समर्पित होना चाहिये।

अन्त में महादेवजी की श्रेष्ठतासूचक महाभारत का एक वाक्य निवेदन स्वरूप लिख कर इतिश्री करता हूँ-

नास्ति शर्वसमो देवो नास्ति शर्वसमा गतिः।

नास्ति शर्वसमो दाने नास्ति शर्वसमो रणे।।

- अनुशासन पर्व 15/11

अर्थात् शिव के समान देव नहीं है, शिव के समान गति नहीं है, शिव के समान दाता नहीं है, शिव के समान यौद्धा(वीर) नहीं है।

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मानस शिरोमणि” डॉ. नरेन्द्र कुमार मेहता

Sr. MIG-103, व्यास नगर,

ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)

Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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