मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति - रमेशराज

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हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति

- रमेशराज

+|| क्या ग़ज़ल एक फ्रेम का नाम है ?? ||

ग़ज़ल विशेषांकों की कड़ी में अपनी भी एक कड़ी जोड़ते हुए संपादक श्री श्याम अंकुर ने ‘सौगात’ का अप्रैल-2009 अंक ‘ग़ज़ल-विशेषांक’ के रूप में निकाला। अन्य ग़ज़ल विशेषांकों की तरह यहाँ भी उन्होंने ग़ज़ल के कथ्य [आत्मा] को नहीं, शिल्प [शरीर] को खँगाला। सम्पादकीय का सार यह है-‘‘ग़ज़ल एक फ्रेम है, छंद नहीं। ग़ज़ल में एक से अधिक छंदों के प्रयोग के कारण हिन्दी के ग़़ज़़लकार उसे ग़़ज़ल से खारिज कर देते हैं । अपनी ग़लती की समझ न होने से खड़ा हो जाता है-‘हिन्दीग़ज़ल’ और ‘उर्दू-ग़ज़ल’ का मसला।’’

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल की कितनी समझ ?? ||

हिन्दी ग़ज़लकारों पर बेहद सटीक टिप्पणी करने वाले श्री श्याम अंकुर को भी आखिर ग़ज़ल की समझ कितनी है, यह तथ्य भी काबिले-गौर है-वे इसी सम्पादकीय में लिखते हैं-‘‘ ग़ज़ल पर कुछ लिखने के लिये मैं अधिकृत पात्र नहीं हूँ और न ग़ज़ल-अंक के सम्पादन का पात्र।’’

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| क्यों है ऐसे ‘ग़ज़ल-विशेषांक’ निकालने की लालसा ||

‘सौगात’ के इस ग़ज़ल विशेषांक के माध्यम से आखिर किस निर्णय तक पहुँचा जाये। जब इस विशेषांक के सम्पादक ग़ज़ल पर कुछ लिखने के अधिकृत पात्र हैं ही नहीं तो ‘ग़ज़ल-विशेषांक’ निकालने की लालसा के वशीभूत होकर विशेषांक निकालना, पानी के भीतर केवल पत्थरों को उबालना नहीं तो और क्या है? जिसे स्वादिष्ट व्यंजन बताकर पाठकों के समक्ष परोसा गया है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल-सम्पादक क्यों भेद नहीं करते तेवरी और ग़ज़ल में ||

जब श्याम अंकुरजी बकौल खुद-‘ग़ज़ल अंक के सम्पादन के योग्य हैं ही नहीं’ तो उनकी अयोग्यता की झलक इस विशेषांक में मिलना स्वाभाविक है। मसलन, उन्होंने रमेशराज के तेवरी शतक ‘ऊधौ कहियो जाय’ की एक तेवरी को ग़ज़ल मानकर पृ.13 पर छापा है। यह रचना ग़ज़ल इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि इस रचना का सम्पूर्ण कथ्य एक ही संदेश या भाव को सम्प्रेषित करता है। इस रचना की समस्त आठों की आठों पंक्तियाँ समान कथ्य की पोषक हैं। जबकि ग़ज़ल के हर शे’र का कथ्य दोहे के समान प्रथकता और सम्पूर्णता लिये हुए होता है। यह तेवरी दोहा छंद में अवश्य कही गयी है लेकिन ठीक उसी प्रकार यह दोहा न होकर तेवरी है जिस प्रकार कबीर के दोहे, दोहे न होकर साखी, सबद, रमैनी बतलाये गये हैं।

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+|| तेवरी इसलिये भी ग़ज़ल नहीं ||

‘सौगात’ के ग़ज़ल विशेषांक में प्रकाशित तेवरी इसलिये भी ग़ज़ल नहीं है क्योंकि इसमें कोरे रूप-सौन्दर्य का मायाजाल नहीं है। इसमें प्रेमालाप या कामक्रियाओं का भूचाल नहीं है। फिर भी अन्य कई सम्पादकों की तरह सीत्कार और चीत्कार में भेद न कर पाना इस अंक के संपादक के लिये भी उतना ही सरल हो गया है जितना अन्य ग़ज़ल विशेषांकों के सम्पादकों के लिये रहा है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| क्या तेवरी यूँ ही ग़ज़ल मानी जायेगी? ||

ग़ज़ल विशेषांक निकालने की इस भेड़चाल को लेकर यह सवाल, मलाल के रूप में उभरना लाजिमी है कि ‘सही को सही कहने या मानने की समझ’ हम हिन्दी वालों में कब आयेगी? क्या तेवरी यूँ ही ग़ज़ल मानी जायेगी? ग़ज़ल को एक फ्रेम या ढाँचा बताने वाले उसकी मूल आत्मा पर बात करने से क्यों कतराते हैं? ग़ज़ल का वास्तविक अर्थ यदि ‘प्रेमिका से प्रेम पूर्ण बातचीत’ नहीं तो और क्या है? यदि इसके विपरीत कोई अर्थ बनता है तो उसका सार्थकता ‘तेवरी’ में अन्तर्निहित नहीं तो किसमें है?

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+|| क्या कोठे की चम्पाबाई को रानी लक्ष्मीबाई बोला जा सकता है? ||

ग़ज़ल को जनवादी स्वरूप प्रदान करने वालों को इसके नाम की सार्थकता पर भी विचार करना चाहिए। क्या कोठे पर बैठने वाली चम्पाबाई में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की आत्मा को टटोला जा सकता है? क्या चम्पाबाई को रानी लक्ष्मीबाई बोला जा सकता है? इस सवाल पर भीष्म पितामह की तरह मौन धारण किये हुए कथित ग़ज़ल के पंडित क्या कभी मौन तोड़ेंगे या तेवरी के हर सवाल का उत्तर ग़ज़ल से ही जोड़ेंगे?

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+|| हिन्दी ग़ज़़लकार उरूज से नाक-भौं क्यों सिकोड़ते हैं ||

ग़ज़ल के शास्त्रीय पक्ष का अधकचरा ज्ञान हो सकता है ऐसे लोगों को महान बनाने का प्रयास हो जो हिन्दी में ग़ज़ल तो लिखना चाहते हैं लेकिन उसके शिल्प/ छंदशास्त्र अर्थात् उरूज से नाक-भौं सिकोड़ते हैं। रुक्न-अर्कान से बनने वाली ‘बहर ’ से मुक्ति पाने के लिये उर्दू या बहर के जानकारों को गरियाते हैं।

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+|| आलेख ‘समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के परिदृश्य से गुजरते हुए’ में अधकचरा चिन्तन ||

‘सौगात’ के इसी ग़ज़ल विशेषांक में ऐसे ही अधकचरे चिन्तन का एक और नमूना एक आलेख ‘समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के परिदृश्य से गुजरते हुए’ में हिन्दी ग़ज़ल के महारथी श्री विज्ञानव्रत ने उरूज को लेकर बेशुमार तीर छोड़े हैं। उनकी दलीलों की कीलों को अगर उरूज में ठोंक दिया गया तो बिना उरूज के ग़ज़ल की जो शक्ल बनेगी, उस पर ग़ज़ल के शास्त्रीय जानकारों की पूरी की पूरी जमात हँसेगी। ग़ज़ल में हिन्दी छन्दों का ‘स्वतः स्फूर्त प्रयोग’ ग़ज़ल को किसी ऊँचाई तक ले जायेगा या ग़ज़ल को बीमार बनायेगा? इस सवाल पर विज्ञानव्रत का यह लेखनुमा शोध महज एक निरर्थक दिशाहीन क्रोध बनकर रह गया है।

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+|| ये कैसे ग़ज़ल-विशेषांक ||

हिन्दी की पत्रिकाओं के ये कैसे ग़ज़ल-विशेषांक निकल रहे हैं, जिनमें ग़ज़ल के शास्त्रीय पक्ष [ शिल्प और कथ्य ] से मुक्ति पाकर ग़ज़ल को प्राणवान बनाये जाने की घोषणाएँ की जा रही हैं।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| क्या ग़ज़ल ने अपने को सामाजिक सरोकारों से जोड़ लिया है ||

कुतर्कों के मायाजाल के अंतर्गत ग़ज़ल के शास्त्रीय पक्ष [ शिल्प और कथ्य ] से मुक्ति पाकर ग़ज़ल को प्राणवान बनाये जाने की घोषणाओं का एक नमूना और देखिए-

‘सौगात’ के एक अन्य सम्पादक श्री ओम प्रकाश शाहू के ‘तुम्हारे लिए’ ग़ज़ल संग्रह के समीक्षा-कथन के अनुसार- अब ‘‘ग़ज़ल ने अपने को सामाजिक सरोकारों से जोड़ लिया है।’’

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ‘ग़ज़ल' के सामाजिक सरोकारों का सच ||

‘‘ग़ज़ल ने अपने को सामाजिक सरोकारों से जोड़ लिया है।’’ साहूजी की इस बात में कितना दम है, इसके लिए 'सौगात' के ग़ज़ल विशेषांक में प्रकाशित हिसामुद्दीन रजा, उषा यादव, विज्ञानव्रत, डाॅ. बेकस, विनयमिश्र, मिर्जा हसन नासिर, साहिल, चंचल, डाॅ. प्रभा दीक्षित, विश्व प्रताप भारती, पुरुषोत्तम यकीन, बेकल, शाकिर, कमल किशोर भावुक, ख्याल खन्ना आदि की ग़ज़लों को देखा/परखा जाता सकता है, जिनका आक्रोश से नहीं, प्रेमी को बाँहों में भरने के जोश से नाता है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल में रदीफ-काफियों का उपहास ||---1

निश्चित तुकांत व्यवस्था को ही ग़ज़ल मानने या समझने वाले हिन्दी ग़ज़लकारों की सौगात के ग़ज़ल विशेषांक में प्रकाशित कई ग़ज़लें रदीफ-काफियों को लेकर भी उपहास की मुद्रा में हैं। ओम साहू की ग़ज़ल में काफिया के रूप में चार बार ‘दार’ का प्रयोग एक संक्रामक रोग की तरह उपस्थित है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल में रदीफ-काफियों का उपहास ||------2

निश्चित तुकांत व्यवस्था को ही ग़ज़ल मानने या समझने वाले हिन्दी ग़ज़लकारों की सौगात के ग़ज़ल विशेषांक में प्रकाशित कई ग़ज़लें रदीफ-काफियों को लेकर भी उपहास की मुद्रा में हैं। डाॅ. बेकस ने अपने मतला शे’र में ‘ढली’ की तुक ‘खुली’ से मिलायी है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल में रदीफ-काफियों का उपहास ||------3

निश्चित तुकांत व्यवस्था को ही ग़ज़ल मानने या समझने वाले हिन्दी ग़ज़लकारों की सौगात के ग़ज़ल विशेषांक में प्रकाशित कई ग़ज़लें रदीफ-काफियों को लेकर भी उपहास की मुद्रा में हैं। यायावरजी ‘जिन्दगी’ की तुक ‘सादगी’, के बाद ‘आवारगी’ से भी जोड़ते हैं। ये सब इस प्रकार ग़ज़ल के घाव छोड़ते हैं और उस पर नीबू निचोड़ते हैं।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल में रदीफ-काफियों का उपहास ||------4

निश्चित तुकांत व्यवस्था को ही ग़ज़ल मानने या समझने वाले हिन्दी ग़ज़लकारों की सौगात के ग़ज़ल विशेषांक में प्रकाशित कई ग़ज़लें रदीफ-काफियों को लेकर भी उपहास की मुद्रा में हैं। गोबिन्द कुमार सिंह ‘यहां’ की तुक ‘सिया’ ‘जिया’, ‘गया’ से मिलाकर ग़ज़ल-ग़ज़ल चिल्लाते हैं।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल में रदीफ-काफियों का उपहास ||------5

निश्चित तुकांत व्यवस्था को ही ग़ज़ल मानने या समझने वाले हिन्दी ग़ज़लकारों की सौगात के ग़ज़ल विशेषांक में प्रकाशित कई ग़ज़लें रदीफ-काफियों को लेकर भी उपहास की मुद्रा में हैं। मुनव्वर अली ताज ‘सरकार’ की तुक ‘लाचार’ से मिलाकर ‘चित्कार, ‘दरकार’ से भी भिड़ाते हैं। सयुंक्त रदीफ-काफियों में कही या लिखी गयी इस ग़ज़ल में अपनी स्वतः स्फूर्त अज्ञानता निभाते हैं।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़लकारों की ग़ज़ल के प्रति एक अंधी रति ||

एक स्वतः स्पफूर्त अज्ञानता को सार्थक और सारगर्भित सिद्ध करने के लिये विज्ञानव्रत का एक कुतर्क इसी विशेषांक में उनके लेख-‘समकालीन ग़ज़ल के परिदृश्य से गुजरते हुए’ में मौजूद है-‘‘ग़ज़ल केवल तकनीक का विषय नहीं, बल्कि एक क्रिएटिव और कल्पनाशील तथा संवेदनशील व्यक्ति की स्वतः स्फूर्त कृति है।’’ देखा जाये तो यही ‘सर्वाधिक लोकप्रिय विधा ’ के रूप में ग़ज़ल के प्रति हिन्दी ग़ज़लकारों की अंधी रति है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दी ग़ज़़लकारों की अंधी रति ' की समापन किश्त ]

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------1

+रमेशराज

गज़़ल़ अपनी सारी शर्तों के साथ हिन्दी में लिखी जाये। उसकी सार्थकता उसके सही शास्त्राीय पक्ष के साथ शिल्प और कथ्य से पहचानी, सराही और मानी जाए, इस बात पर किसे आपत्ति हो सकती है।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------2

+रमेशराज

गज़़ल़ के नाम पर गज़़ल़ का कचूमर निकालकर उसे प्राणवान घोषित किया जाए, यह बात गज़़ल़ के संदर्भ में गले नहीं उतरती। ऐसी गज़़ल़ों को लेकर यदि सवाल या बवाल उठते हैं तो गज़़ल़कारों को अपनी कमजोरियों-त्रुटियों को स्वीकारने बजाय भ्रकुटियों को तानना नहीं चाहिए। ग़लती को मानने, उसे दूर करने का प्रयास ही ग़ज़ल की समझ को बढ़ायेगा। एक यही रास्ता है जो उजाले की ओर ले जाएगा।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------3

+रमेशराज

ग़ज़़ल-ज्ञान के प्रति अपनी असमर्थता को स्वीकारने के बावजूद गज़़ल़ के बारे में ऊल-जुलूल बातें करने वालों की समझ की पोल उस ढोल की तरह है जो गुमकता तो खूब है लेकिन उसके भीतर खालीपन ही खालीपन है, जिसे भर दिया जाए तो गुमकना बन्द।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------4

+रमेशराज

ग़ज़़ल के प्रश्न पर ढोल की तरह गुमकते गज़़ल़कारों के बीच एक भारी-भरकम नाम है-विज्ञानव्रत। ‘सौगात’ के अप्रैल-2009 [गज़़ल़ विशेषांक] में पृ. 9-10 पर ‘समकालीन हिन्दी गज़़ल़ के परिदृश्य से गुजरते हुए’ में विज्ञानव्रत गज़़ल़ के उरूज को लेकर ऐसे उछलते हैं जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। वे चीखते हुए ऐसा अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं जो तर्कसंगत कतई नहीं है। उनके चिंतन-मनन का नमूने के तौर पर क्रन्दन देखिए-वे कहते हैं-‘‘ ....व्याकरण भाषा का होता है...।’’

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------5

+रमेशराज

काव्य को भाषा से काटकर केवल छन्द-शास्त्र के रूप में महिमामंडित करने वाले ग़ज़़ल के महान पंडित विज्ञानव्रतजी को इतना तो पता होना ही चाहिए कि यदि व्याकरण भाषा का होता है तो क्या काव्य, भाषा नहीं होता? काव्य-भाषा से ही तो व्याकरण का जन्म हुआ है। महर्षि पाणिनी या आध्ुनिक हिन्दी के पाणिनी आचार्य किशोरी दास का व्याकरण का इतिहास बिना काव्य को भाषा का आधार बनाये पूर्ण हुआ है? क्या उन्होंने काव्य की भाषा को नहीं छुआ है? काव्य का भाषा से या भाषा का काव्य से अंतरंग सम्बन्ध है। इन तथ्यों को दरकिनार करना क्या इतना आसान है? जबकि पूरी की पूरी आदिकालिक भाषा यहाँ तक कि व्याकरण की भाषा भी काव्यमय है।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------6

+रमेशराज

भले ही छन्द-शास्त्र या उरूज जानने से ही काव्य न बनता हो और न जिन लोगों ने ग़ज़़ल पर पी.एच.डी. या डी.लिट की हो, उनका ग़ज़़ल कहने या लिखने पर डाॅक्टराना अधिकार हो, लेकिन विज्ञान व्रत का यह सवाल करना कि-‘‘ महर्षि बाल्मीकि, संत तुलसीदास, कालीदास, निराला, कबीर.. आदि आदि क्या वैयाकरण थे?’’ बेहद हास्यास्पद और बेतुका है? इस सवाल के बदले यदि यह सवाल किया होता कि ‘ छन्द/ उरूज, भाषा के ज्ञान के बिना क्या काव्य की केवल दो पंक्तियों का भी सृजन सम्भव है?’ तो यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण होता।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------7

+रमेशराज

कवि छन्द/उरुज/भाषा आदि के प्रति ज्ञानवान होने के कारण ही कविता लिख पाता है। जिस कवि को प्रयुक्त होने वाली भाषा के अंग-उपांग जैसे मुहावरे, प्रतीक, मिथक, सार्थक-निरर्थक शब्द, उपसर्ग, प्रत्यय, वर्तनी, शब्दार्थ, वाक्य-गठन, लिंग, वचन, कारक आदि का ज्ञान नहीं होगा, वह न तो काव्य में अच्छी उपमाएँ ला सकता है, और न काव्य को रसाद्र बना सकता है। काव्य को काव्य-दोषों से वही बचा सकता है जो काव्य की भाषा के साथ-साथ छन्द-शास्त्र का ज्ञाता ही नहीं, मर्मज्ञ हो। इसलिए

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------8

+रमेशराज

बकौल विज्ञान व्रत भले ही ‘‘काव्य या ग़ज़़ल केवल तकनीक का विषय नहीं, बल्कि एक क्रियेटिव और कल्पनाशील और संवेदनशील व्यक्ति की स्वतः स्फूर्ति कृति हो’’ लेकिन इस कल्पनाशीलता, संवेदनशीलता को काव्य की भाषा या छन्द-शास्त्र के नियमों से अलग नहीं किया जा सकता। इन नियमों को नजरंदाज करने के परिणाम कितने घातक होते या हो सकते हैं, इसे किसी और की नहीं स्वयं विज्ञान व्रत की पृ. 12 पर प्रकाशित ग़ज़़ल के माध्यम से समझा जा सकता है।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------9

+रमेशराज

विज्ञानव्रत की 'सौगात' के ग़ज़ल-विशेषांक में एक ग़ज़ल प्रकाशित है| इस ग़ज़़ल में पांच शेरों का प्रयोग किया है। संयुक्त रदीफ-काफियों की [पता नहीं कही गयी या लिखी गयी] इस ग़ज़़ल के पर गौर फरमाएँ-

सोलह मात्राओं या फैलुन, फैलुन, फैलुन फैलुन’ बहर में पांच शेरों के सुज्ञान या सम्पूर्ण विवेक के साथ कहीं या लिखी गयी इस ग़ज़़ल में स्वतः स्फूर्त अज्ञान का समावेश भी है। दो मतला शेरों के तुकांत ‘पूछूंगा’, ‘ढूढूंूगा’, ‘मिलूंगा’, ‘लगूंगा’ तो शास्त्राीय दृष्टि से सही हैं किन्तु तीसरे शेर में ‘निकलूंगा’ और पूर्व में मतला शेर के तुकांत ‘मिलंूगां’ के बीच न तो काफिए का पता चलता है न रदीफ का।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------10

+रमेशराज

विज्ञानं व्रत की इसी ग़ज़ल के तीसरे शे’र के कथ्य में स्वतः स्पूर्ति का आलम यह है कि ग़ज़़लकार अभिसार की बातें करते-करते आयी हुई सुबह के बीच सूरज बनकर निकलने के लिए बेताब होने लगता है। जब सुबह आ ही गयी है तो सूरज भी निकला ही होगा, रोशनी बिखरी ही होगी, ऐसे में सूरज होकर निकलने का औचित्य क्या है? रात के अंधेरे को चीरने के लिये यदि यह सुकर्म किया गया होता तो यह स्वतः स्फूर्त शे’र निस्संदेह सार्थकता ग्रहण कर लेता।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------11

+रमेशराज

प्रेमिका को बाँहों में भरकर प्रेमिका के सामने सूरज और रोशनी का यह बखान ग़ज़़लकार विज्ञान व्रत को महान बनाता है तो बनाता होगा क्योंकि बकौल उन्हीं के-‘‘कवि रचना करते समय अपना शास्त्र भी गढ़ता है, वह लकीर का फकीर नहीं होता। वह किसी तथाकथित साहिबे-उरुज का गुलाम नहीं।’’

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------12

+रमेशराज

उरूज के साहिबों, उस्तादों या गुरुओं से नाक-भों सिकोड़ने वाले ग़ज़़लकार विज्ञानव्रत की दृष्टि में ‘बाल्मीकि और देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' छन्दशास्त्र के अज्ञानी हैं ,’ तो क्या इस कथन के आधार पर यह मान लिया जाये कि विज्ञान व्रत भी छन्द शास्त्र का ज्ञान नहीं रखते हैं। फिर भी इसमें संदेह नहीं कि उनका स्वतः स्फूर्त अज्ञान उन्हें काव्य के क्षेत्र में लगातार ऊँचाइयाँ प्रदान कर रहा है। उनकी ग़ज़़लों में बिना तर्कशीलता के ही संवेदनशीलता, कल्पनाशीलता का ओज भर रहा है। क्या ग़ज़़ल कहने या लिखने की उनकी सारी तमीज एक विवेकहीनता का परिणाम है?

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------13

+रमेशराज

विज्ञान व्रत के लेख ‘समकालीन हिन्दी ग़ज़़ल के परिदृश्य से गुजरते हुए’ को पढ़कर यह तो कतई ध्वनित नहीं होता कि विज्ञान व्रत काव्य, छंद, भाषा या व्याकरण के ज्ञाता नहीं हैं। उन्हें पाणिनी की पुस्तक ‘सिद्धांत कौमुदी’ की जानकारी है। वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा की मौलिकता और उसकी धार से प्यार करते हैं। वे अपनी बात को पुष्ट करने के लिए बाणभट्ट, कालीदास, भवभूति, ठाकुर, रैदास, आर्यभट्ट, लीलावती, श्रीनिवास, बल्लाल आदि के उदाहरण इस लेख में ठूँसते या भरते हैं। ऐसा वे क्यों करते हैं? इस सवाल का उत्तर भले ही जटिल लगे, पर है।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------14

+रमेशराज

बात सिर्फ इतनी भर है कि विज्ञान व्रत को आतंकित करता हुआ एक डर है, जिसका नाम है उरूज। उरूज का सम्बन्ध् उर्दू में ग़ज़ल लिखने और ग़ज़़लकार से है। किंतु विज्ञान व्रत जी हिंदी-छंदों में ग़ज़ल कहते या लिखते हैं। सम्भवतः हिन्दी-छन्दों में ग़ज़़ल कहने या लिखने के व्यामोह ने ही उनसे यह कहने के लिये प्रेरित किया है।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------15

+रमेशराज

चूंकि विज्ञान व्रत हिन्दी में ग़ज़़लों को लिखते या कहते हैं और हिन्दी छन्दों का बहर से खारिज होना स्वभाविक है, अतः उरूज को लेकर वे उर्दू के जानकारों के बीच अपनी बात को गुर्राते हुए चाकू की तरह तानते हैं। उन्हें आतंकित करते हुए कहते हैं-‘‘छन्द शास्त्र/ उरूज जानने से ही काव्य बनता है? या फिर कवि को बस छंद शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए। लोगों ने ग़ज़़लों में पी.एच.डी. या डी.लिट. की है। क्या यह डाॅक्टर लोग अच्छे ग़ज़़लकार हैं? इतिहास या ज्ञान परम्परा का निर्वाह किसी हद तक वांछित है, किन्तु क्या ग़ज़़ल का इतिहास पढ़कर ही ग़ज़़लगो बना जा सकता है?’’ विज्ञान व्रत की एक दलील ये भी है-‘‘ उरूज, तकनीक के चलते एक परिधि में बाँध सकता है, वज़्न, अरकान सिखा या बता सकता है, ग़ज़़लकार नहीं बना सकता’’।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------16

+रमेशराज

देखा जाये तो विज्ञान व्रत की उपरोक्त सारी दलीलें हवाई हैं अर्थात् बीरबल के उस हवामहल की तरह हैं जिसमें ‘गारा लाओ, पानी लाओ तो चिल्लाया जा रहा है। किंतु बिना ईंट, पत्थर, बालू, सीमेंट, पानी अर्थात् उरूज के, ग़ज़़ल का असल रूप कैसा होगा, इस प्रश्न पर विचार नहीं किया जाना चाहिए?

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------17

+रमेशराज

उरूज के जानकार आलोचक या समीक्षकों का कार्य ग़ज़़ल को ग़ज़़ल की कसौटी पर जांचना या परखना होता है, ग़ज़़लें कहना या लिखना नहीं। अगर ग़ज़़ल के उरूज के जानकार उस ग़ज़़ल को बीमार घोषित कर देते हैं, जो ग़ज़़ल की आवश्यक शर्तों जैसे मतला, मक्ता, रदाफ-काफिया, कथ्य, बहर की दृष्टि से कमजोर हैं, तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------18

+रमेशराज

ग़ज़़ल कहने का ही अर्थ यह है कि उसके मूल शास्त्राीय स्त्रोतों, शर्तों तक पहुंचा जाए। ग़ज़़ल का महल बीरबल के हवामहल की तरह खड़ा नहीं किया जाए। इस सत्य या तथ्य से परहेज करने वाले विज्ञान व्रत भी लेख के अन्त में पता नहीं स्वतः स्फूर्त होकर, उरूज के जानकारों के आलोचना कर्म को गरियाते-गरियाते खुद हिन्दी ग़ज़़ल के आलोचक बन जाते हैं। ग़ज़ल के बारे में चीखते-चिल्लाते हैं-‘‘ग़ज़़लकार जरा दुष्यंत की सभी ग़ज़़लों को कसौटी पर कसवाएँ/ कसवाकर देखें जिस उरूज को और जिन उर्दू शायरों को हम सर-माथे पर रखते हैं, जरा पूछें कि उनके इस थोपे हुए हीरो का क्या स्थान है ग़ज़़ल में?

+|| ग़ज़ल की स्वतः स्फूर्त अज्ञानता ||----------19

+रमेशराज

हिन्दी में बेवज़्न बहरों, गलत रदीफ-काफियों के प्रयोगों, परम्परागत कथ्य से भटकाव, ग़ज़़ल का गीतनुमा आकार, मतला-मक्ता शे’रों का अभाव घाव तो पैदा करेगा ही। वह घाव विज्ञान व्रत को टीस दे या दुष्यंत या किसी अन्य के। हिन्दी वालों को आतंकित करने वाला भूत केवल उरूज का ही नहीं है। ऐसे कई अन्य भूत भी हैं जो ग़ज़़ल के शास्त्राीय सरोकार से जुड़े हैं। इन भूतों से पिण्ड छुड़ाने का एक ही रास्ता है या तो हिदी वाले ग़ज़़लें लिखना छोड़ दें या ग़ज़़ल के शास्त्राीय सरोकारों को आत्मसात करें।

|| समाप्त ]

+रमेशराज

-रमेशराज

+|| हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ||

हिन्दी में ग़ज़ल अपने विशुद्ध शास्त्रीय सरोकारों के साथ कही या लिखी जाए, इस बात पर किसे आपत्ति हो सकती है। ग़ज़ल का ग़ज़लपन यदि उसके सृजन में परिलक्षित नहीं होगा तो उसे ग़ज़ल मानने या मनवाने की जोर-जबरदस्ती केवल धींगामुश्ती ही कही जाएगी।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ||

हिन्दी में थोक के भाव ग़ज़ल-संग्रह निकल रहे हैं और हर ग़ज़ल संग्रह में ग़ज़ल के शिल्प और कथ्य के सत्य को दूसरों को समझाने या बताने के लिए लम्बी-चैड़ी भूमिका के रूप में बयानबाजी भी [ग़ज़ल के पंडित या किसी मुल्ला-काजी की तरह] उसमें मौजूद है। इससे ग़ज़ल का क्या भला होगा, यह सोचने का विषय इसलिए है क्योंकि हर हिन्दी ग़ज़लकार ग़ज़ल के इश्किया रचाव से बँधा हुआ है और ग़ज़ल को सामाजिक क्रान्ति का जरूरी औजार भी बता रहा है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ||

हिन्दी में आकर यदि ग़ज़ल की शक़्ल क्रान्तिकारी हो गयी है तो उन ग़ज़लों के बारे में क्या कहा जाएगा जिनमें रनिवास, प्यास, देह के रास का मधुप्रास मौजूद है। हिन्दी में आकर यदि ग़ज़ल एक अग्निलय है तो उससे चुम्बन-आलिंगन का परिचय नहीं मिलना चाहिए। एक ही ग़ज़ल के एक शे’र में अभिसार के क्षणों का सीत्कार और दूसरे शे’र में बलत्कृत, शोषित, पीडि़त नारी का चीत्कार, क्या यह नहीं दर्शाता कि ग़ज़लकार किसी मानसिक हीनग्रन्थि का शिकार है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दीग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं डॉ. प्रभाकर माचवे ||

प्रेमिका को बाँहों में भरकर सामाजिक आक्रोश या सामाजिक सरोकारों के होश की बातें करना ग़ज़ल के क्षेत्र में इधर -उधर मुँह मारने के सिवा क्या हो सकता है? सम्भवतः ग़ज़लकारों की इसी कलाकारी से खीजकर डाॅ. प्रभाकर माचवे ने सटीक टिप्पणी की- ‘‘बाजार में माल चल गया, फिर शुद्ध के नाम पर क्या-क्या वनस्पतियाँ मिलावट में आ गयीं, जिसका विश्लेषण सामान्य पाठक तो नहीं कर पाता। हिन्दी के सम्पादक भी नहीं कर पाते। हिन्दी में लिखी जाने वाली ‘ग़ज़ल’ नामक रचना न उत्तम कविता है, न उत्तम गीत।... आज ग़ज़ल के नाम पर हिन्दी में जो कुछ छप रहा है, ऐसी रचनाओं को देखकर ही कभी समर्थ रामदास ने मराठी में कहा था-‘‘ शायरी घास की तरह उगने लगी है। किसी ने उर्दू में कहा-‘‘ शायरी चारा समझकर सब गधे चरने लगे। [प्रसंगवश,फर.-1994, पृ.51

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

सवाल यह है कि डॉ. प्रभाकर माचवे यह कहकर कि ' हिन्दी में लिखी जाने वाली ‘ग़ज़ल’ नामक रचना न उत्तम कविता है, न उत्तम गीत', हिन्दी ग़ज़ल को उत्तम कविता क्यों नहीं मानते? इस सवाल के उत्तर के लिए आइए ग़ज़ल के उस शास्त्रीय पक्ष पर नजर डालें, जिससे उसका ग़ज़लपन तय होता है-

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| क्या है ग़ज़ल का शब्दकोशीय अर्थ ||

‘‘ग़ज़ल मूलतः अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है-‘नारी के सौन्दर्य का वर्णन तथा नारी से बातचीत’। नालंदा अद्यतन कोष में ग़ज़ल का अर्थ [ फारसी और उर्दू में ] ‘ शृंगार की कविता’ दिया गया है। लखनऊ हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित 'उर्दू-हिन्दी शब्दकोष' में ग़ज़ल का अर्थ-‘प्रेमिका से वार्तालाप है।’

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल का क्या अर्थ बताती हैं डॉ. नीलम महतो ||

डॉ. नीलम महतो का भी मानना है-‘ ग़ज़ल अरबी शब्द है जिसका अर्थ-‘सूत का ताना है। जब यह शब्द स्त्रियों के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है तो उनसे प्रेम-मोहब्बत की बातें करना हो जाता है। उनकी सुन्दरता की तारीफ करना हो जाता है। उनके साथ आमोद-प्रमोद करना हो जाता है।’’ {तुलसी प्रभा, सित-2000 पृ. 18}

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दी ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं हिन्दी ग़ज़लकार ||---1

हिन्दी ग़ज़लकार या इसके पैरोकार इसी प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बातचीत करने वाली विधा ग़ज़ल के कैसे-कैसे अर्थ निकालते हैं, उन पर गौर फरमाइएँ-

डॉ . पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी कहते हैं-‘‘ग़ज़ल की विधा उर्दू से हिन्दी में क्या आयी कि गोया गुल्लो-बुलबुल की सहोदर से निकलकर जीवन की सीमाओं में दाखिल हो गयी।’’

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दी ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं हिन्दी ग़ज़लकार ||---2

हिन्दी ग़ज़लकार या इसके पैरोकार इसी प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बातचीत करने वाली विधा 'ग़ज़ल' के कैसे-कैसे अर्थ निकालते हैं, उन पर गौर फरमाइएँ-

डॉ. गोपालकृष्ण शर्मा कहते हैं - ‘‘स्वयं ग़ज़लकारों ने अपने जीवन में सामाजिक विसंगतियों को भोगा और झेला है, तभी तो उनका चित्रण विश्वसनीय और यथार्थ बन पड़ा है। उनके रचना-संग्रहों के स्वर बड़े बेवाक सशक्त और मनमस्तिष्क को आन्दोलित करने वाले हैं।’’

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दी ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं हिन्दी ग़ज़लकार ||---3

हिन्दी ग़ज़लकार या इसके पैरोकार इसी प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बातचीत करने वाली विधा ग़ज़ल के कैसे-कैसे अर्थ निकालते हैं, उन पर गौर फरमाइएँ-

हिन्दी ग़ज़ल के वरिष्ठ हस्ताक्षर डॉ. शेरजंग गर्ग ने भी यही रट लगायी कि-‘‘ हिन्दी ग़ज़ल का उदय देश की आज़ादी के साथ हुआ और आज़ादी के बाद देश की व्यवस्था से मोहभंग की स्थिति तथा वर्गसंघर्ष ने इसे जनवादी स्वरूप प्रदान किया।’’ {सौगात, अप्रैल-09, पृ.3}

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दी ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं हिन्दी ग़ज़लकार ||----4

हिन्दी ग़ज़लकार या इसके पैरोकार इसी प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बातचीत करने वाली विधा ग़ज़ल के कैसे-कैसे अर्थ निकालते हैं, उन पर गौर फरमाइएँ-

डॉ. प्रभा दीक्षित के स्वरों से भी हिन्दी ग़ज़ल को लेकर ‘हाँ-हाँ’ उभरी और उन्होंने भी ग़ज़ल के तेवरों को बदलते हुए उसे जनवादी जेबर पहनाये और अपना बयान दर्ज कराया-‘‘ आज भूमण्डलीकरण के दौर में जब साम्राज्यवादी उपभोक्ता, अपसंस्कृति मिलकर आम आदमी को गुलाम या मशीन बनाने का प्रयास कर रही है, ऐसी स्थिति में जो साहित्य आमजन की पक्षधरता में अपनी साहित्य-धर्मिता का निर्वाह कर रहा है, उसमें आधुनिक ग़ज़ल अपने जनवादी तेवरों के साथ अगली पंक्ति में दृष्टिगत हो रही है।’’ {सौगात, अप्रैल-2009, पृ.4}

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| एक जरूरी प्रश्न अवहेलना या उपेक्षा की खाक में ||

ग़ज़ल में चारित्रिक बदलाव और उसके नये जनवादी चरित्र के रचाव को लेकर दिये गये बयानों से इतर भी ग़ज़ल के यथार्थवादी स्वर को लेकर अच्छा-खासा हो हल्ला है। इस हो-हल्ले के बीच एक सार्थक सवाल कि ग़ज़ल के इस बदले हुए चरित्र का आकलन कैसे किया जाए या इस चरित्र को नया क्या नाम दिया जाए, एक बवाल बनकर रह गया है। इससे हर कोई अपनी जान छुड़ाने की फिराक में है। कुल मिलाकर यह एक जरूरी प्रश्न अवहेलना या उपेक्षा की खाक में है? खाक को कौन छाने?

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| कोठे पर बैठने वाली चम्पाबाई और रानी लक्ष्मी बाई में अंतर कब महसूस करेंगे हिदी ग़ज़लकार ? ||

ग़ज़ल में कथित रूप से आये चारित्रिक बदलाव जिसमें ग़ज़ल अब कोठे पर बैठने वाली चम्पाबाई के स्थान पर रानी लक्ष्मी बाई बन अब तलवार लेकर शोषकों पर वार कर रही है, इसे फिर भी ग़ज़ल क्यों कहा जाये या रानी लक्ष्मी बाई के स्थान पर इसे चम्पाबाई ही क्यों पुकारा जाये , इस प्रश्न का सही और सार्थक उत्तर हिन्दी ग़ज़लकार के पास नहीं है। उसके पास तो हिन्दी ग़ज़ल के जनवादी तेवर की काँव-काँव है। मेंढ़क जैसी टर्र-टर्र है। बन्दर जैसी घुड़की है कि ग़ज़ल के इस बदले हुए रूप को जानो-पहचानो और मानो। ग़ज़ल अगर कथित उर्दू से हिन्दी में आकर हाथों में लगी मशाल हो गयी है, तो हिन्दी में थोक के भाव लिखी जा रही ऐसी ग़ज़लों को क्या पुकारा जाये, जिनके कथन में आज भी देह का मधुमास है, मिलन की प्यास है, संयोग-वियोग का रत्यात्मक इतिहास है। इस प्रश्न पर हर ग़ज़लकार मौन है |

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दी की ग़ज़लों के पास अपनी कोई सार्थक ज़मीन है ही नहीं ||

हिन्दी में प्रेमी से अभिसार, चुम्बन की बौछार करने वाली विधा का नाम भी ग़ज़ल और जनवादी तेवर के जेबर पहनने वाली विधा का नाम भी ग़ज़ल | अंतर्विरोधों से भरी हुयी है हिंदीग़ज़ल की शक़ल। दो विपरीत चरित्रों के घालमेल की खिचड़ी का आस्वादन करने के बाद ही सम्भवतः ज्ञान प्रकाश विवेक ने यह बात कही-‘‘ इधर लिखी जा रही अधिसंख्य ग़ज़लों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दी की ग़ज़लों के पास अपनी कोई सार्थक ज़मीन है ही नहीं।’’ [प्रसंगवश, फरवरी-94, पृ. 52]

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दी की ग़ज़लों के पास अपनी कोई सार्थक ज़मीन है ही नहीं ||---2

ग़ज़ल के प्रणयानुभूति में सामाजिक सरोकारों की विभूति देखकर ही संभवतः कैलाश गौतम ने तो यहाँ तक कह दिया- ‘‘आज ग़ज़ल धीरे-धीरे गरीब की बीवी होती जा रही है। लोग उसकी सिधाई [सीधापन] का भरपूर और ग़लत फायदा उठा रहे हैं। हर रचनाकार ग़ज़ल पर हाथ साफ कर रहा है और ग़ज़ल ‘टुकुर-टुकुर’ मुँह देख रही है।’’ [प्रसंगवश, पफर.-94 पृ. 51]

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| प्रेमिका को आगोश में लेकर उसमें असंतोष, विरोध, विद्रोह और जोश ||

हिन्दी में आकर ‘ग़ज़ल’ शब्द का अर्थ इतना असमर्थ और लाचार हो चुका है कि न तो उसका कोई शास्त्रीय सरोकार शेष बचा है और न उसे किसी भी तरह का ‘आज का बदलाव’ पचा है। किन्तु हिन्दी में आयी ग़ज़ल के पैरोकार हैं कि फिर भी मगजमारी कर रहे हैं । प्रेमिका को आगोश में लेकर उसमें असंतोष, विरोध, विद्रोह और जोश भर रहे हैं। ‘जोर लगा के हैईशा’ की तर्ज पर ग़ज़ल के शास्त्रीय या शब्दकोषीय मूल अर्थ को पीछे धकेल रहे हैं। उसमें नया जनवादी चरित्र फिट कर रहे हैं।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिन्दी ग़ज़ल के बारे में डॉ . संतोष कुमार तिवारी फरमाते हैं---- ||

‘‘औरत अगर घर सम्हालने और प्रसव पीड़ा सहने के अलावा सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय होकर संघर्ष करने लगी तो क्या वह औरत नहीं रहीं? जैसे मनुष्य के शरीर का, चिन्तन का और कर्मक्षेत्र का विकास होता है, हिन्दी ग़ज़ल ने भी उसी तरह सार्थक विकास पाया है। अब ग़ज़ल के तेवर रोमानी दुनिया से ऊपर उठकर दमन-शोषण के खिलाफ सुलगती हुई मशाल बन गये हैं। यह उसके कथ्य का उल्लेखनीय विस्तार है।’’ [प्रसंगवश, फर.-94-पृ. 46]

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल यदि हिन्दी में आकर मशाल बन गयी है तो उस 'मशाल ' कहो 'ग़ज़ल ' नहीं ||

ग़ज़ल के रोमानी तेवर भले ही आज दमन-शोषण के खिलाफ जलती हुर्ठ मशाल बन गये हों, किन्तु इन तेवरों का आकलन क्या ग़ज़ल की पृष्ठभूमि, उसके उद्भव या शास्त्रीय आधार पर किये गये नामकरण के द्वारा किया जा सकता है? यह सवाल आज भारी अफसोस और मलाल के साथ उत्तर की प्रतीक्षा में खड़ा है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| हिंदी ग़ज़ल में सीत्कार और चीत्कार को एक ही खाने में फिट करने का फार्मूला हिट ||

माना औरत, औरत ही होती है, किन्तु जब वह किसी से ब्याह कर लेती है तो ब्याहता कहलाती है। प्रसव-पीड़ा सहने के बाद शिुशु को जन्म देती है तो माँ बन जाती है। वही औरत जब सामाजिक संघर्ष में कूदती है तो और कुछ कहलाये न कहलाये-वीरांगना कहलाती है। नारी के कमक्षेत्र को स्पष्ट करने के लिये नारी के जो स्वरूप बनते हैं, उनकी सार्थकता इन्हीं सार्थक नामों या संज्ञा विशेषणों में नहीं है तो आखिर किसमें है? नारी के सीत्कार और चीत्कार को एक ही खाने में फिट करने का फार्मूला भले ही हिट है, पर ये ऐसी गिटपिट है जिसमें तुकें तो मिलती हैं लेकिन नाम की सार्थकता को खोकर।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ऐसे न तो ग़ज़ल का भला होगा न हिन्दी ग़ज़ल का ||

ग़ज़ल का रोमानी संस्कारों को त्यागकर दमन-शोषण के खिलाफ मशाल बनकर यदि यही कथ्य का ही उल्लेखनीय विस्तार है तो क्या इसी तर्ज पर लघुकथा का विस्तार उपन्यास तक किया जा सकता है! अगर यह सम्भव है तो क्या ऐसे उपन्यास को उपन्यास नहीं ‘लघुकथा’ बताया जा सकता है? जाहिर है, इस प्रकार के विचारों या चिन्तन से न तो ग़ज़ल का भला होगा न हिन्दी ग़ज़ल का। हिन्दी में ग़ज़ल की यदि कोई नयी पहचान बनी है तो यह पहचान एक नये नाम की मांग भी कर रही है?

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल की बहर ||-----1

‘‘ग़ज़ल में लयात्मक ओज भरने के लिये विशिष्ट छन्द अर्थात् बहर का प्रयोग किया जाता है। ब-हर उन खास शब्दों को कहते हैं जिन पर शे’र को तोला जाता है और जाँचा जाता है कि शे’र का वज़्न ठीक है या नहीं। बहर जिन टुकड़ों से बनती है, उनको अरक़ान और उसके हर किस्से को रुक़्न कहते हैं। उर्दू शायरी में कुल 9 रुक्न- ‘फऊलुन’, ‘फाइलुन,’ ‘मुफाईलुन’, ‘मुस्तफलुन’, ‘मुतफाइलुन’, ‘फाइलातुन’, मऊफलात, ‘फऊल’, ‘फेलुन’ प्रचलित हैं। [ विनोद कुमार उइके ‘दीप’, तुलसीप्रभा, फर. 09पृ. 17 ]

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल की बहर ||-----2

रुक़्न से अरक़ान तक के सधे हुए प्रयोग से ग़ज़ल की बहर बनती है। एक ग़ज़ल में एक ही प्रकार की बहर का प्रयोग ग़ज़ल के हर मिसरे में किया जाता है। ग़ज़ल का ग़ज़लपन उसकी बहर के बिना तय नहीं किया जा सकता। रुक़्न या अरकान भी ग़ज़ल की जान होते हैं। किन्तु हिन्दी में ग़ज़ल की इस शक़्ल से हिन्दी ग़ज़लकार नाक-भौं सिकोड़ता है, वह ग़ज़ल के साथ अपनी ही एक ख़ासियत जोड़ता है। बहर के भीतर का ओज निचोड़ता है, उसे तोड़ता-फोड़ता है और एक नया जुमला छोड़ता है-‘‘ फैलुन-फाइलातुन’ ये सब क्या है? क्या हिन्दी और संस्कृत के व्याकरण व छन्द शास्त्र इतने गरीब हैं कि इसका जवाब हमारे पास नहीं है।’’ ;विज्ञानव्रत, सौगात, अप्रैल-09, पृ.9द्ध

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल की बहर ||-----3

जहाँ तक हिन्दी और संस्कृत के व्याकरण या छन्द-शास्त्र का सवाल है तो इस पर शंका-आशंका करना, आसमान पर थूकने के समान होगा। बात उरुज/ फैलुन-फाइलुन से दामन छुड़ाने और ग़ज़ल में हिन्दी-छन्दशास्त्र अपनाने की है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल की बहर ||-----4

ग़ज़ल के छंदशास्त्र [उरूज ] से नाक-भों सिकोड़ने वाले हिन्दी के छंद-शास्त्र की कोई भी विधा अपना सकते हैं और स्वाभिमान के साथ बता सकते हैं कि हम हिन्दी में ग़ज़ल की नकल नहीं करेंगे? ग़ज़ल की विषय-वस्तु या उसकी बहरों से तो भारी विद्रोह, पर ग़ज़ल शब्द के साथ महामोह में खरपतवार की तरह होता हिन्दी ग़ज़ल का सृजन संदिग्ध तो रहेगा ही।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल की बहर ||-----5

ग़ज़ल में हिन्दी छंदों के प्रयोग को लेकर उर्दू की बहर के जानकार क्या कहते हैं आइये देखें -‘‘ ग़ज़ल एक बेहद महीन काव्य-शैली है। इसका मिजाज और सुझाव काफी लजीज होता है। दरअसल जो अब तक इन बारीकियों को ठीक से नहीं समझ पाये हैं, वे ही ग़ज़ल को मात्रिक छन्द मानने की कुचेष्टा करने में लगे हुए हैं। [डॉ. मधुसूदन साहा, तुलसी प्रभा सित-07 पृ. 20]

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल की बहर ||-----6

हिन्दी ग़ज़ल में मात्रिक छन्द से पैदा किया गया मकरन्द उर्दू वालों के लिये क्यों कसैला है? क्या इस बात पर हिन्दी वालों को सोचना नहीं चाहिए? जापान से हाइकु हिन्दी में आया लेकिन बदशक्ल नहीं हुआ। उर्दू वालों ने दोहे लिखे किन्तु दोहे की सम्पूर्ण शर्तों के साथ। दोहे में रुक्न और अरकान का विधान उन्होंने दोहे की शान के खिलाफ समझा, जबकि दोहे के लिए एक नयी बहर ईजाद की जा सकती है किन्तु, ऐसे दोहे से क्या हिन्दी कविता समृद्धि पा सकती है? अगर दोहे के साथ रुक्न-अरकान का जोड़-घटाव दोहे के घाव पैदा कर सकता है तो क्या हिन्दी छन्दों के प्रयोग से उर्दू के जानकारों के मन में टीस या घाव पैदा नहीं होंगे?

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल की बहर ||-----7

बहर और हिन्दी-छन्द के घालमेल को लेकर सशक्त हिन्दी ग़ज़लकार जहीर कुरैशी को आत्मग्लानि का ऐसा बुखार चढ़ा कि उन्हें यह स्पष्ट करना ही पड़ा कि-‘‘दोहा मात्रिक छंद में ग़ज़ल नहीं हो सकती। अतः ग़ज़ल को मात्रिक और वर्णिक छन्द में बांधने के लिये यह एक प्रबल अवरोध का प्रश्न खड़ा करेगा। मैंने भी यही सब सोचकर दोहा-ग़ज़ल कहना समाप्त कर दिया है। [तुलसी प्रभा, सित-09, पृ.20]

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल की बहर ||-----8

हिन्दी में ग़ज़ल नहीं, ‘ग़ज़ल-गीतशैली’, ‘ग़ज़ल-गीत’, ‘ग़ज़ल मर्सिया-शैली’, ‘दोहा-शैली’, ‘ग़ज़लमिश्रित-शैली’ की भरी हुई थैली खूब बिक रही है। इस हिन्दी ग़ज़ल में बहर को तलाशना मना है। हिन्दी ग़ज़लकार ग़ज़ल नाम पर तो फिदा है, लेकिन उसकी ग़ज़लों से उरूज, बहर, रुक्न, अरकान का लयात्मक ओज लापता है। उर्दू के जानकारों के लिये ये खता है तो खता है? इस खता पर यह कहकर पर्दा डाला नहीं जा सकता कि-‘‘ जिस व्याकरण को हम नहीं जानते और जो हिन्दी भाषा के ‘मूड’ के ठीक विपरीत पड़ती है उसे ‘टच’ करना हमारी मौलिकता को लांछित करेगा ही।’ डॉ. उर्मिलेश, ग़ज़ल से ग़ज़ल तक, पृ.11द्ध

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----1

ग़ज़ल के हर शेर की सत्ता स्वतंत्र होती है जैसे एक दोहे के कथ्य से दूसरे दोहे की विषयवस्तु को अलग करके रख जाता है, ठीक उसी प्रकार ग़ज़ल का हर शे’र गीत की तरह एक दूसरे का पूरक या बँधा हुआ नहीं होना चाहिए। ‘अफसाने-सुखन’ नामक पुस्तक में जनाब मुमताजुर्रशीद लिखते हैं-‘ ग़ज़ल वह नज्म है, जिसका हर शे’र बजाते खुद मुकम्मल और दूसरों से बेनियाज होता है।’’

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----2

शे’र की इस स्वतंत्र सत्ता के अन्तर्गत चूंकि बाँधना ग़ज़ल को ही होता है, अतः शे’रों के स्वतंत्र कथन का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि ग़ज़ल का ग़ज़लपन [प्रेमानुभूति] ही खण्डित हो जाए। परस्पर घोर विरोधी कथनों को उजागर करने वाले एक ग़ज़ल के विभिन्न शे’र रस की परिपक्व अवस्था को खण्डित कर सकते हैं। अतः रसाभास से बचने के लिए शे’रों का स्वतंत्र अस्तित्व भी ग़ज़ल के किसी विशिष्ट या स्थायी भाव का पूरक अवश्य होना चाहिए।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----3

ग़ज़ल के हर शे’र की स्वतंत्र सत्ता का अर्थ यह कैसे सम्भव है, कि एक शेर में व्यवस्था विरोध तो दूसरे शे’र में नायिका के विरह की आग में जलने का बोध-

हर कदम पर है यहाँ खूने-तमन्ना-कत्ले आम / काम था जो भेडि़ए का आदमी करते रहे।

बिस्तरे गुल पर मोहब्बत हो रही थी बेकरार / शम्मा की लौ पर मगर हम शायरी करते रहे।

शम्मा की लौ पर की गयी उक्त शायरी से बनी ग़ज़ल के बिम्ब चूंकि परस्पर विरोधी हैं अतः यह न तो शृंगार तक पहुँचाएँगे और न आदमी के भेडि़येपन का ‘विरोध’ कर पाएँगे। ऐसी ग़ज़ल की कहन से या तो रसाभास पैदा होगा या उपहास। ऐसे में ग़ज़ल के ग़ज़लपन की मिठास बेमानी हो जाएगी।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----3

एक ही विषय पर कहे गये दस दोहों का आस्वादन जैसे मन के भीतर रस की उत्तरोत्तर वृद्धि कर सकता है, ठीक उसी प्रकार ग़ज़ल के तीन, पांच या सात शे’र स्वतंत्र होते हुए भी ग़ज़ल को एक ही रस की ऊँचाइयाँ प्रदान करते हैं तो ग़ज़ल की उत्तमता असंदिग्ध् होगी। सार यह है कि ग़ज़ल का हर शे’र भले ही दोहे की तरह अपनी विषयवस्तु को लेकर स्वतंत्र होता है लेकिन इन शे’रों से रचित ग़ज़ल को यही शे’र एक ही जमीन, एक ही स्थायी भाव या रस प्रदान करते हुए होने चाहिए।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----4

ग़ज़ल के संदर्भ में इन सब बातों को जानते या मानते हुए या अनजाने हिन्दी के ग़ज़लकारों की मति की लय, ग़ज़ल के आशय के उस परिचय को धो देना चाहती है जो शे'र की स्वतंत्र सत्ता को खंडित नहीं करता बल्कि एक समान प्रकार की रसात्मकता में एक प्रकार के विष को घुलने या घोलने से बचाता है । हिंदी ग़ज़लकार तो ग़ज़ल के नाम पर शे’रों का एक ऐसा जंगल बो देना चाहता है जिसमें काँटे ही काँटे हों, चाँटे ही चाँटे हों।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----5

हिन्दी ग़ज़ल के प्रखर प्रवक्ता डॉ . उर्मिलेश परमाते हैं-‘‘ डॉ . यायावर ने उर्दू ग़ज़ल के पारम्परिक मिथक को तोड़ते हुए कुछ अलग हटकर कार्य किया है। मसलन, उर्दू ग़ज़ल में हर शे’र स्वतंत्र सत्ता रखता है, लेकिन डॉ . यायावर की अधिसंख्य ग़ज़लों के शे’र एक ही विषयवस्तु को आगे बढ़ाते हैं। गीत में जैसे एक ही केन्द्रीय भाव को विविध बंधों -उपबंधों में निबद्ध किया जाता है, उसी तरह डॉ . यायावर भी अपनी ग़ज़लों में गीत की इसी प्रक्रिया को दुहराते-से नजर आते हैं [सीप में समंदर, पृ.8]।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----7

लीक से हटकर कार्य करने की सनक से ग़ज़ल के पारम्परिक स्वरूप के मिथक को तोड़ने के परिणाम भले ही हिन्दी ग़ज़लकार को विवादास्पद बना दे, किन्तु परिणाम की चिन्ता से लापरवाह आज का हिन्दी ग़ज़लकार यह गुनाह कर रहा है। ग़ज़ल को गीत बना रहा है और उसे ‘हिन्दीग़ज़ल’ बता रहा है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----7

ग़ज़ल के पारम्परिक मिथकों की तोड़-फोड़ की होड़ ने ग़ज़ल को कैसा रूप प्रदान किया है, बानगी-प्रस्तुत है- '' सन्ध्या डूबी खिली चांदनी/ लौट नहीं पाया है नथुआ, सोच रही माँ खड़ी द्वार पर/ क्यों न आज आया है नथुआ।'' -सीप में समन्दर, पृ. 77

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----8

डॉ. रामसनेही लाल ‘यायावर’ की हिन्दी ग़ज़ल के शे’र- [सन्ध्या डूबी खिली चांदनी/ लौट नहीं पाया है नथुआ, सोच रही माँ खड़ी द्वार पर/ क्यों न आज आया है नथुआ]

को देखकर यह पता लगा पाना कठिन है कि यह किसी गीत का मुखड़ा है या किसी ग़ज़ल का मतला है। इसमें सन्ध्या के डूबने, चाँद के निकलने के बेशक जीवंत और मार्मिक बिम्ब हैं। इन्हीं जीवंत-मार्मिक बिम्बों के बीच द्वार पर खड़ी नथुआ की माँ चिन्ताग्रस्त है। चिन्ता का कारण नथुआ का देर रात तक घर न आना है। माँ के मन के भीतर ‘क्यों’ की ‘शृंखलाबद्ध चिन्ता-लड़ी’ बेटे को सकुशल पाने के लिए घटनाक्रम को आगे बढ़ने या बढ़ाने का आभास दे रही है। अतः स्पष्ट है कि यह पंक्तियाँ गीत का उम्दा मुखड़ा तो हो सकती हैं, ग़ज़ल का मतला शे’र नहीं।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----9

इसी पुस्तक के पृ. 75 पर प्रकाशित एक ग़ज़ल के प्रारम्भ के दो शेरों की शक़्ल देखिए-

महामहिम श्रीमान! आपसे क्या कहिए, नवयुग के भगवान! आपसे क्या कहिए

पाँच साल के बाद कुटी तक आ पहुँचे, जय-जय कृपानिधान आपसे क्या कहिए।

हिन्दी ग़ज़ल के उपरोक्त दो शे’रों में से प्रथम शे’र में महामहिम, श्रीमान, नवयुग का भगवान कौन है, जिस पर ग़ज़लकार व्यंग्य की बौछार कर रहा है? इस प्रश्न का उत्तर प्रथम शे’र में नहीं है, और कहीं है। आइए उसे टटोलते हैं। यायावरजी दूसरे शे’र में क्या बोलते हैं। जिसे वे ‘श्रीमान’, ‘महामहिम’, ‘नवयुग का भगवान’ बता रहे हैं, वह इसी शेर में पाँच साल के बाद आया है, जिसकी ‘कृपानिधान’ कहकर जय-जयकर की जा रही है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----10

भारतीय नेता के चरित्र की बखिया उधेड़ती ग़ज़ल के शे'र - [ महामहिम श्रीमान! आपसे क्या कहिए, नवयुग के भगवान! आपसे क्या कहिए पाँच साल के बाद कुटी तक आ पहुँचे, जय-जय कृपानिधन आपसे क्या कहिए ] का कथन माना व्यंग्य-भरा है, युगबोध की सही पहचान कराता है और सत्योन्मुखी है किंतु इस ग़ज़ल की भी शक़्ल बता रही है कि यह अपने ग़ज़लपन से भयभीत है। कारण यह कि यह ग़ज़ल, ग़ज़ल के नाम पर कुकुरमुत्ते की तरह उगता हुआ गीत है। दोनों शे’रों का कथन एक दूसरे का चूंकि पूरक है, अतः यह ग़ज़ल नहीं, ग़ज़ल का मुलम्मा है, जिसे गीत पर चढ़ा दिया गया है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के हर शेर की स्वतंत्र सत्ता ||-----11

इस लेख के बढ़ते हुए क्रम के आधार पर यदि ग़ज़ल के ग़ज़लपन को हिन्दी ग़ज़ल के साथ जोड़कर आकलन किया जाए तो स्पष्ट है कि हिन्दी में ग़ज़ल अपने पारम्परिक चरित्र [ प्रेमालाप ] से तो काटी ही गयी है, उसकी बहरों की भी शल्यक्रिया कर दी गयी है। यही नहीं उसके शे’रों की मुकम्मलबयानी को धूल चटा दी गयी है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----1

‘ग़ज़ल के चरित्र, ‘बहर और शे’र’ का कचूमर निकालने के बाद ग़ज़ल में उसके प्राण-तत्व रदीफ और काफिया और शेष रह जाते है। हिन्दी ग़ज़लकार के पैने औजार इन्हें भी काट-छाँट कर कैसा रूप दे रहे हैं, इस कौतुक का ‘लुक’ भी ध्यान से देखने योग्य है-

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||------2

किसी पद्य के चरणों के अन्त में जब एक जैसे स्वर सहित अक्षर आते हैं, तब इन अक्षरों की आवृत्ति को-वर्ण मैत्री को-‘तुक’ कहा जाता है। तुक का दूसरा नाम अन्त्यानुप्रास है। उर्दू-फारसी में उसे काफिया कहा गया है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----3

[फने शाइरी ] ले. अल्लामा इख्लाक दहलवी के अनुसार-वो मुअय्यन हुरूफ [निश्चित अक्षर] जो मुख्तलिफ भिन्न-भिन्न अल्फाज [शब्दों] में मतला और बैत [एक शेर] के हर मिसरा [पंक्ति] और हर शे’र के दूसरे मिसरा के आखिर में मुकर्रर [बार-बार] आएं और मुस्तकिल [स्थायीद्ध न हों, काफिया कहलाते हैं। -महावीर प्रसाद मूकेश, ग़ज़ल छन्द चेतना, पृ.91

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----4

यदि ग़ज़ल में काफियों की व्यवस्था को देखें तो समान स्वर के बदलाव को बाधित न करने वाली तुक का नाम काफिया है। जबकि रदीफ वह है जो शब्दों के रूप में काफिये के बाद ज्यों की त्यों दुहराया जाता है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----5

ग़ज़ल में काफिये की बन्दिश को लेकर काफी सजग रहना पड़ता है। मतला शे’र के दोनों मिसरों में काफिया मिलाया अवश्य जाता है, लेकिन आगे के शे’र में काफियों का रूप कैसा होगा, इस विधान का निर्धारण भी मतला ही तय करता है। मसलन, मतला में यदि ‘नदी’ की तुक ‘सदी’ से मिलायी गयी है तो इस ग़ज़ल के आगे के उत्तम काफिये ‘द्रौपदी’, 'लदी' ‘बदी’ आदि ही सम्भव हैं। यदि मतला में ‘नदी’ की तुक ‘आदमी’ से मिलायी गयी है तो आगे के शे’रों में ‘रोशनी’, जि़न्दगी, ‘भली’, ‘सखी’ आदि तुकें आसानी से प्रयुक्त हो सकती हैं।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----6

काफिये के रूप में समान स्वर के बदलाव का आधार यदि ‘आ’ है तो इसकी तुक ‘ई’,‘ई’, ‘उ’, ‘उफ’, ‘ए’, ‘ऐ’ स्वर के साथ बदलाव नहीं उलझाव को प्रकट करेगी। इसी प्रकार ‘आकाश’ की तुक ‘प्यास’, ‘मन’ की तुक ‘प्रसन्न’, ‘हँसता’ की तुक ‘खस्ता’ ग़ज़ल में ओज नहीं, अंधकार भरेगी।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----7

तुकों के सधे हुए प्रयोग से ही ग़ज़ल का ग़ज़लपन सुरक्षित रखा जा सकता है। ग़ज़ल के प्रारम्भ के दो तीन शेरों में ‘हार’ की तुक ‘प्यार’, ‘वार’ लाना और उसके आगे के शेरों में ‘याद’, ‘संवाद’ ‘दाद’ आदि तुकों को क्रमबद्ध तरीके से सजाना हर प्रकार नियम के विरुद्ध है। ग़ज़ल के काफियों का केवल वही रूप शुद्ध है जिसमें समान स्वर के आधार पर बदलाव परिलक्षित होता हो।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----8

हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले काफियों का रूप तो देखिए हिन्दी ग़ज़लकार ‘रुठे’ की तुक ‘फूटे’ और ‘मूठें’ निभा रहा है [शेरजंग गर्ग, प्रसंगवश, फर. 94, पृ.116] और इसे श्रेष्ठ हिन्दी ग़ज़ल बता रहा है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----9

हिंदी ग़ज़ल में तुकों यह खेल भले ही बेमेल हो लेकिन इसमें नकेल डालने को कोई तैयार नहीं। मतला में ‘सुलाया’ की तुक ‘जलाया’ लाने के बाद ‘लगाया’, ‘मुस्काया’ [डॉ. यायावर, सीप में संमदर, पृ.55] लाने का प्रावधान हिन्दी ग़ज़लकार को कथित रूप से महान बनाता है तो बनाता है। यह तो हिन्दी ग़ज़लकार का काफियों से ऐसा नाता है जिसमें तुक ‘रात’ के साथ ‘हाथ’ मिल रहे हैं। अनूठे सृजन के कमल खिल रहे हैं।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----10

हिन्दी ग़ज़ल के सम्राट विष्णुविराट की एक ग़ज़ल में काफिया और रदीफ किस तकलीफ से गुजरते हुए प्रयुक्त हुए हैं, यह तो विराट जानें, लेकिन ‘प्रसंगवश फर. 94 पृ. 73’ पर प्रकाशित उनकी ग़ज़ल के मतला में काफिया ‘सजाने’ और ‘जलाने’ तथा रदीफ दोनों मिसरों में ‘वाले’ है, तो अगले शे'र में तुक के रूप में शब्द ‘मकड़जाले’ ने रदीफ और काफिये की व्यवस्था को सुबकने और सिसकने पर मजबूर कर दिया है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----11

हिन्दी ग़ज़लकार नित्यानंद तुषार की प्रसंगवश पत्रिका के इसी अंक में पृ.89 पर संयुक्त रदीफ-काफिये में लिखी हुई ग़ज़ल प्रकाशित है। तुकों के विधान के रूप में लाये गये शब्दों ‘तीरगी’, ‘रोशनी’ ‘कभी’, ‘नमी’, ‘त्रासदी’, ‘घड़ी’ और ‘तभी’ को यदि मिलाकर देखा जाए तो ऐसा भूत नजर आता है, जिसके दर्शन कर मन थर्राता है। भूत धमकाता है, इसे हिन्दीग़ज़ल मानो। इसमें लापता हुए रदीफ-काफियों को ढूंढो-छानो।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| नवोदित कैसे समझें क्या है हिंदी ग़ज़ल ||

हिन्दी में ग़ज़ल के रदीफ-काफियों के ये उन दिग्गजों के उदाहरण हैं, जो हिन्दीग़ज़ल लिखकर ही नहीं, अपने-अपने तर्क देकर इसे ऊँचाईयाँ प्रदान करना चाहते हैं। उन बेचारे नवोदित ग़ज़लकारों के बारे में क्या कहना जो इनकी छत्रछाया में ग़ज़ल के बारे में सोच-समझ रहे हैं और ग़ज़ल लिख रहे हैं।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल के रदीफ और काफिये ||-----12

अस्तु! सार यही है कि हिन्दी ग़ज़ल का भविष्य ग़ज़लकारों की दृष्टि में भले ही उज्जवल हो, लेकिन हिन्दीग़ज़ल की इस चकाचौंध ने ग़ज़ल के पारम्परिक चरित्र के अर्थ, उसकी बहर , शे’र की स्वतंत्र सत्ता, रदीफ-काफियों को अँधा बना दिया है। और इसी अंधेपन के सहारे ग़ज़ल हिन्दी में अपने ग़ज़लपन को खोज रही है। हिन्दीग़ज़लकार है कि अपने इस कारनामे को लेकर अट्टहास की मुद्रा में है।

[ रमेशराज के लेख ' हिन्दीग़ज़ल में कितनी ग़ज़ल? ' की क्रमशः प्रस्तुति ]

+|| ग़ज़ल का कचूमर निकालकर हिन्दी ग़ज़ल बनाओ ||

हिन्दी ग़ज़ल में ग़ज़ल के नाम पर एक महारास हो रहा है | इस महारास का अर्थ यह है कि यदि हिंदी में ग़ज़ल लिखनी है तो- ‘‘1.मतला और मक्ता से मुक्ति पाओ 2. शे’र की स्वतंत्र सत्ता का पत्ता काट दो 3. रूमानी कथ्य से किनारा कर लो 4. सीमित बहर अपनाओ और थोक में हिन्दी छन्द लाओ 5. गेयता लयात्मकता से जितनी जल्दी हो सके अपना पिण्ड छुड़ाओ। [महेश अनघ, प्रसंगवश, फर. 39 ] अर्थ यह कि ग़ज़ल का कचूमर निकालकर हिन्दी ग़ज़ल बनाओ।

{ समाप्त } ---रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||--------1

हिन्दी में ग़ज़लकारों की एक पूरी की पूरी जमात इस बात का पूरे जोर-शोर के साथ प्रचार कर रही है कि अब ग़ज़ल किसी सुहागरात की न तो चूडि़यों की खन-खन है और न किसी प्रेमिका का आलिंगन है। न एकांत में चोरी-चोरी छुपकर लिया गया चुम्बन है। इसे न अब इश्क का बुखार है, न हुस्न से दरकार है। गुलो-बुलबुल, शमा-परवाने, साकी-पैमाने के कथन अब पुराने जमाने की बातें हो गयी हैं।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------2

ग़ज़ल के बारे में डॉ. अनंतराम मिश्र ‘अनंत’ कहते हैं-‘‘जर्जर ग़ज़ल ने अपना कायाकल्प करके और रंगभूमि की झंकार को विस्मरण के शून्य में सुलाकर आजकल आम आदमी की समस्याओं तो शोषित-दलित वर्ग की दुरवस्थाओं के चित्रण एवं उनके विवरण की युक्तियाँ बतलाने का दायित्व वहन कर रखा है। [ग़ज़ल से ग़ज़ल तक, पृ. 18]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------3

आइए डॉ. अनंत के हिन्दी ग़ज़ल के बारे में कहे गये इस तथ्य के सत्य को परखने के लिये हिन्दी ग़ज़ल के विद्वान ग़ज़लकार डॉ. महेश्वर तिवारी जी की ग़ज़ल से शुरुआत करें। आपने तेवरीकारों को लम्बे समय तक गरियाया है और यह बताया है कि तेवरी ग़ज़ल की भौंड़ी नकल है। ऐसे साहित्य के सुधी पंडित की एक ग़ज़ल के दो शे’र देखिए-

हरहराती हुई नदी जैसे, आप आये खुली हँसी जैसे।

जि़न्दगी उस नज़र से देखें हम, मेमना देखता छुरी जैसे।

-प्रसंगवश, फर. 94, पृ. 80

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------4

डॉ. महेश्वर तिवारी की उक्त पन्क्तियों- "हरहराती हुई नदी जैसे, आप आये खुली हँसी जैसे। जि़न्दगी उस नज़र से देखें हम, मेमना देखता छुरी जैसे।" [प्रसंगवश, फर. 94, पृ. 80] अर्थात ग़ज़ल के इन दो शे’रो में सामाजिक चेतना और दायित्व-बोध की गति क्या है? मतला शे’र में यदि ‘खुली हँसी’, ‘हरहराती नदी’ जैसी सौगात लेकर आयी प्रेमिका को देखकर चित्त प्रसन्न है तो दूसरे शे’र में इसी प्रसन्नता के साथ प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बात करते हुए कवि मानो प्रेमिका को बता रहा है कि जि़न्दगी के प्रति हमारी दृष्टि इस तरह की होनी चाहिए जैसे मैमना छुरी को देखता है। मैमने पर तनी हुई छुरी के यथार्थ का प्रेमिका को बाँहों में भरकर किया गया यह अवलोकन यदि हिन्दी ग़ज़ल का जुझारूपन है तो यहां सिर्फ यही कहा जा सकता है कि यह एक वैचारिक खस्सीपन है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------5

हिन्दी ग़ज़ल के एक अन्य हस्ताक्षर डा. उर्मिलेश फरमाते हैं-‘‘हिन्दी ग़ज़ल अपने सहज, निष्छल, जीवंत और परिचित स्वरूप के जरिए आज के मनुष्य के दुःखों, संघर्षों और संवेगों से हमारा नितांत सीधा और अंतरंग साक्षात्कार कराती है। [ग़ज़ल से ग़ज़ल तक, पृ.11]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------6

डा. उर्मिलेश के उक्त कथन की मार्मिकता को आइए उनकी ग़ज़ल की ही कहन से परखें और जानें कि वे किसके लिए और क्यों ग़ज़ल कह रहे हैं। उनकी आँखों के आँसू किस यथार्थबोध के बीच बह रहे हैं। उनकी एक ग़ज़ल के दो शे’र प्रस्तुत हैं-

आयी है उनकी याद, ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं

कितने दिनों के बाद ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं।

हालात के डर से या हवालात के डर से

चुप हैं मेरे उस्ताद, ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------7

डा. उर्मिलेश की एक ही ग़ज़ल के उक्त दो शे’रों की कहन में हालात या हवालात का डर, ग़ज़ल के उस्तादों को तो ग़ज़ल कहने पर चुप कर रहा है, लेकिन ग़ज़लकार के रूप में डा. उर्मिलेश के मन में प्रेमिका से मधुर मिलन के पलों के स्मरण का जादू उतर रहा है। ग़ज़लकार ग़ज़ल कह रहा है, भावना में बह रहा है। भले ही हालात और हवालात से समझौते या पलायन का यह समीकरण अपनी प्रेमिका की यादों की गोद में बैठकर हिन्दी ग़ज़ल को सहज, निष्छल और जीवंत बनाने का सुकर्म हो, फिर भी ऐसे यथार्थ-बोध के शोध का सार यही निकलेगा कि हिन्दी ग़ज़ल प्रेयसि की स्मृतियों में डूबे हुए कवि के उन आँसुओं की अभिव्यक्ति है, जिन्हें वह सामाजिक सरोकारों के रूमालों से पौंछकर प्रगतिशील होना चाहता है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------8

‘ग़ज़ल से ग़ज़ल तक’ नामक पुस्तक के पृ. 106 पर अपनी ग़ज़ल में ‘कथा’ की तुक ‘व्यथा’ से मिलाने के बाद ‘गुँथा’ को भी काफिये के रूप में लाकर और इस ग़ज़ल के काफियों को सहज बताकर भले ही वर्षासिंह ने अबोधपन का परिचय दिया हो, किन्तु ग़ज़ल के कथ्य को लेकर वे भी इसी सत्य को उजागर करती हैं कि-‘‘जीवन की तमाम विसंगतियों, त्रासदियों और संघर्षों को बड़ी आत्मीयता और पैनेपन से उकेरने वाली ग़ज़ल विधा वर्तमान समय में अपने पुरातन ‘हुस्न और ईश्क की शायरी’ को अर्थात्मकता देने वाले परम्परागत स्वरूप को त्यागकर, पूरी तरह से प्रगतिशीलता को अभिव्यक्ति देने में सक्षम होकर उभरी है।" [ग़ज़ल से ग़ज़ल तक, पृ.13]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------9

वर्षा सिंह की उक्त ग़ज़ल संग्रह में पृ. 106 पर प्रकाशित ग़ज़ल में भले ही संघर्षों को उकेरने का पैनापन न हो, किन्तु उनके हिन्दी ग़ज़ल के बारे में दिये उपरोक्त बयान के आलोक में यदि हम प्रसिद्ध ग़ज़लकार चांद शेरी के ग़ज़ल कहने के अन्दाज को परखें तो उन्हें भी प्रेम का बुखार है, जिसका एक सामाजिक सरोकार है, जो ग़ज़लकार को प्रगतिशील बनाये रखने के लिये बेहद जरूरी है। उनकी ग़ज़ल के दो शे’र प्रस्तुत हैं-

कैसे कह दूँ कि वो कामरानों में है, इश्क मेरा अभी इम्तिहानों में है।

कट गये जंग में हाथ उनके मगर, हौसला फिर भी उनका कमानों में है।

{तुलसी प्रभ, सित. 2000 पृ.77}

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------10

चांद शेरी के उक्त शे’रों पर गौर करें तो ग़ज़लकार इश्क की परीक्षा की गलियों में हाथ-पैर पटकते-पटकते उन्हीं क्षणों में यकायक युद्ध में कटे हुए हाथों वाले साहसी आदमियों के प्रति करुणा का रस घोलने लगता है। इश्क की परीक्षा की गलियों में हाथ-पैर पटकते-पटकते, घनी रति के बीच उन्नति की भाषा बोलने लगता है। शायद इसी तरह हिन्दी ग़ज़ल बनती है, जो चुम्बन की तरह मीठी है पर चाकू-सी तनती है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------11

इश्क और त्रासदियों के तल्ख अनुभवों को एक साथ जीने का प्रयास चांद शेरी की उक्त हिन्दी ग़ज़ल में मौजूद है। इस बात को हम ऐसे भी सोच सकते है कि हिन्दी ग़ज़लकार के पास एक ऐसा इश्क का अघपका अमरूद है जिसका इस्तेमाल वह असंगति, विसंगति, अनाचार या व्यभिचार के विरुद्ध चाकू की तरह करना चाहता है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------12

अपने हिन्दी ग़ज़ल संग्रह ‘सीप में समन्दर’ के पृ. 15 पर हिन्दी ग़ज़ल के महायोद्धा डा. रामसनेही लाल ‘यायावर’ घोषणा करते हैं कि-‘‘मेरी ये ग़ज़लें अव्यवस्था के जिम्मेदार, व्यवस्था के ठेकेदारों के विरुद्ध कलमबद्ध बयान हैं। ये अपने समय के प्रश्नों को हल करने का दावा नहीं करतीं, किन्तु उन्हें ललकारने का साहस जरूर दिखाती है।’’

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------१३

आइये-यायावरजी की एक ग़ज़ल के माध्यम से इस कथन के रहस्य को जानें और पहचानें कि उनके वर्तमान गलीज व्यवस्था के विरुद्ध कमलबद्ध बयानों में इस व्यवस्था के ठेकेदारों को ललकारने, उन्हें फटकारने, दुत्कारने का उनमें साहस कितना है? उनकी एक ग़ज़ल के तीन शे’र बानगी के तौर पर प्रस्तुत हैं-

यह असभ्य यह वन्य जि़न्दगी, कितनी हुई जघन्य जि़न्दगी।

हिंसा, घृणा, घोर बर्बरता, हमें चाहिए अन्य जिंदगी।

सरिता-कूल विहँसते हम-तुम, होते-होती धन्य जि़न्दगी। -सीप में समन्दर, पृ.21

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------14

असभ्य और वन्य सामाजिक वातावरण का रूप-स्वरूप भले ही जघन्य हो, लेकिन इस असभ्यता-वन्यता की जघन्यता, जिसमें हिंसा, घृणा, घोर बर्बरता है, के विरुद्ध ‘यायावरजी’ के कलमबद्ध बयान हैं। इन बयानों की पोल ग़ज़ल के तीसरे शे’र में खुलती है। ग़ज़लकार त्रासद, तल्ख, असहनीय हालत के अत्याचार या हाहाकार को ललकारने का साहस दिखाने के बजाय सरिता के कूल पर आ जाता है। वहां ईलू-ईलू गाता है, अपनी प्रेमिका के साथ ठहाके लगाता है। इस प्रकार वह अपनी जि़न्दगी को धन्य मानने लगता है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------15

वन्य और जघन्य वातावरण के बीच ‘धन्य’ होने के जोश का ही नाम यदि आक्रोश है तो निस्संदेह कहा जा सकता है कि हिन्दी ग़ज़ल का यह जनधर्मी चरित्र ऐसा इत्र है जिसकी सुगन्ध के बीच इस व्यवस्था के दुःशासन, कुम्भकरण और मारीच और भी बड़े दुराचारी, व्यभिचारी और बलात्कारी होकर उभरेंगे।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------16

हिन्दी ग़ज़ल के जनधर्मी चरित्र की स्थापना के लिए श्री शिवओम अम्बर का स्वर भी युद्ध के शंखनाद के समान है। उनकी दृष्टि में हिन्दी ग़ज़ल इसलिए महान है, क्योंकि ‘‘आज की हिन्दी ग़ज़ल किसी शोख नाजनीन की ईंगुरी हथेली पर रची हुई मेंहदी की दन्तकथा नहीं है। युवा आक्रोश की मुट्ठी में बँधी बगावत की मशाल है। भाषा के भोज-पत्र पर अंकित विल्पव की अग्नि-ऋचा है।’’

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------17

अम्बरजी के उक्त कथन के झूठ के पुलिन्दे की पोल उन्हीं की एक ग़ज़ल कैसे खोलती है, आइए इसका अवलोकन करें-

सिसकियों को दबा रही होगी, वो ग़ज़ल गुनगुना रही होगी।

ओढ़कर के सोहाग इक लड़की, खत पुराने जला रही होगी।

लोग यूँ ही खफा नहीं होते, आपकी भी खता रही होगी।

हादसों से मुझे बचा लायी, वो किसी की दुआ रही होगी।

खैरियत से कटे सफर मेरा, आज माँ निर्जला रही होगी। ;ग़ज़ल से ग़ज़ल तक, पृ.113द्ध

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------18

‘अम्बरजी’ की उपरोक्त हिन्दी ग़ज़ल में जनधर्मी चरित्र की प्रगतिशीलता का धारदार ब्लेड कौन-सी विसंगति या असंगति के बढ़े हुए नाखूनों को काटता या छीलता है? ‘खता’ पर ‘खफा’ होना युग की कौन-सी कड़वाहट को उजागर करता है? क्या सिसकियों को दबाकर ग़ज़ल पढ़ने का अंदाज अन्तर्मन से उठती ‘ईलू-ईलू की आवाज नहीं है?

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------19

शादी के बाद आशिक के खतों को जला देने के मर्म में ये कैसा जनधर्म है, जिसे समझाने या बताने का औचित्य क्या है? किसी की दुआओं के असर से हादिसों से बचकर घर सकुशल आ जाना ही यदि भाषा के भोज-पत्र पर अंकित विप्लव की अग्निऋचा है तो कहने के लिये क्या बचा है? ग़ज़लकार ने ग़ज़ल के माध्यम से कथित विसंगति का जो भी ब्यूह रचा है, उसके दर्शन तो फिलहाल इस ग़ज़ल में नहीं होते?

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------२०

सफर पर गये ग़ज़लकार की स्मृतियों में पत्नी या प्रेमिका का सिसकियाँ दबाकर ग़ज़ल पढ़ने, विवाहित लड़की द्वारा आशिक के खत जलाने, किसी की खता पर खफा हो जाने, दुआओं के असर से सकुशल घर वापस आने के स्मरण-बिम्ब की विशेषताएँ क्या हिन्दी ग़ज़ल की हथेली पर रची हुई मेंहदी की दन्तकथाएं नहीं हैं! घोर शृंगार के बाद ग़ज़ल के अन्तिम शे’र के माध्यम से वात्सल्य का पुट देना अगर हिन्दी ग़ज़ल को सामाजिक सरोकारों से जोड़ना है तो ऐसी हिन्दी ग़ज़ल के क्रान्ति-दर्शन को दूर से ही प्रणाम।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------21

हिन्दी ग़ज़ल को सामाजिक-त्रासदी से जोड़कर परखने-देखने-जाँचने वाला इस चर्चा के क्रम में पुनः एक और नाम-डा. रोहिताश्व अस्थाना। आपका मानना है कि-

दर्द का इतिहास है हिन्दी ग़ज़ल, एक शाश्वत प्यास है हिन्दी ग़ज़ल।

प्रेम-मदिरा, रूप, साक़ी से सजा, अब नहीं रनिवास है हिन्दी ग़ज़ल।

[प्रसंगवश, फरवरी-94, पृ. 101]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------22

डॉ. अस्थाना की उक्त ग़ज़ल के शे’रों को पढ़कर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि आज की हिन्दी ग़ज़ल भले ही प्रेम-मदिरा-रूप-साकी से सजा रनिवास न हो लेकिन उसके भीतर जो दर्द है-प्यास है, इस दर्द और प्यास का अनुप्रास ग़ज़ल को वही ला पटकता है, जहाँ देह-भोग का रास होता है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------23

इस बात पर विश्वास करने या कराने के लिये नित्यानंद तुषार की एक ग़ज़ल के दो शे’र देखिए-

तुम्हें खूबसूरत नजर आ रही हैं, ये राहें तबाही के घर जा रही हैं।

अभी तुमको शायद पता भी नहीं है, तुम्हारी अदाएँ सितम ढा रही हैं।

[ग़ज़ल से ग़ज़ल तक, पृ.66] उक्त ग़ज़ल के मतला शेर में ग़ज़लकार महबूबा की अदाओं की अदाकारी को लेकर मदमस्त है-मदहोश है। उजाले का चोला ओढ़े हुए अँधेरे से सावधान करने का यह कैसा तरीका या सलीका है जिसका पतन या स्खलन महबूबा की अदाओं की गुपफाओं में जाकर होता है?

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------24

‘‘महेश अनघ ने अपने लेख ‘हिन्दी ग़ज़लः शिल्प का सवाल’ में हिन्दी ग़ज़ल के रूपायन [फार्म] पर बहुत ही गम्भीरता से विचार करते हुए बताया है कि हिन्दी ग़ज़ल एक परिवर्तन का आयाम है-एक नवीनता का सृजन है, उसकी स्वतंत्र मौलिकताएँ होना स्वाभाविक है।’’ [डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, प्रसंगवश, पफरवरी-94 पृ. 39]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------25

हिन्दी ग़ज़ल में गम्भीर परिवर्तन के आयाम क्या हैं, जिनमें नवीनता का सृजन स्वतंत्र, मौलिक और स्वाभाविक तरीके से किस प्रकार होता है, अनघजी की एक ग़ज़ल के दो शे’रों के माध्यम से आइए आकलन करें। शे’र इस प्रकार हैं-

दिल बहुत कमजोर है, कब तक करुण क्रन्दन सुनें

अब चलो, चलकर किसी रसवंत का प्रवचन सुनें।

‘जो नहीं है’ वो तो सारे देशवासी सुन रहे

‘जो यकीनन है’ उसे दीवार या दर्पन सुनें। [तुलसीप्रभा, सित.2000, पृ.51]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------26

‘अनघजी’ [ग़ज़ल के उपरोक्त दो शे’रों के माध्यम से] जैसा ग़ज़लकार समाज के करुण क्रन्दन को सुनकर दिल के कमजोर होने का रोना क्यों रो रहा है? क्या सामाजिक परिवेश की आह-कराह के बीच से रसवंत का प्रवचन सुनने के लिये किये गये दायित्व-बोध् के पलायन से क्रन्दन के स्वर मंद पड़ जाएंगे? समाज को अत्याचार से मुक्त कराने का यह कैसा उपाय है, जो भोग-विलास के अनुप्रास का पर्याय है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------27

इस व्यवस्था के उस शब्द-जाल, जिसमें श्री महेश अनघ के अनुसार- ‘जो नहीं है’, उसे सारे देशवासी सुन रहे हैं’ और जो यकीन के तौर पर -‘है’, उसे दीवार या दर्पन को सुनाने से किसी ‘नवीनता’ का सृजन होता है होता होगा? हिन्दी ग़ज़ल के शिल्प या कथ्य में मौलिकपन आता है तो आता होगा? जहाँ तक इस घिनौनी व्यवस्था में बदलाव की बात है, तो उक्त दोनों शे’रों का कथन चूंकि कायराना है, अतः सामाजिक क्रदन को और भी बढ़ते जाना है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------२८

सामाजिक क्रन्दन को खत्म करने की छटपटाहट या अकुलाहट डॉ . कुँअर ‘बेचैन’ में भी है। उनके पास भी हिन्दी ग़ज़ल के माध्यम से समाज को अत्याचार और हाहाकार से मुक्त कराने के क्या उपाय हैं, आइए उन्हें भी परखें।

उनकी एक ग़ज़ल के दो शे’र प्रस्तुत हैं-

औरों के ग़म में जरा रो लूँ तो सुबह हो, दामन पै लगे दाग धो लूँ तो सुबह हो।

कुछ दिन से मेरे दिल में नयी चाह जगी है, सर रखके तेरी गोद में सो लूँ तो सुबह हो।

[तुलसी प्रभा, सित.-2000, पृ. 40]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------29

औरों के गम में ‘जरा-सा’ रोने से दामन पै लगे दागों को धोने वाले ग़ज़लकार डॉ. बेचैन के दामन पर दाग किसने और क्यों लगाये हैं, जिन्हें धोने या ये कहें कि गिरती हुई साख को बचाने के लिए ग़ज़लकार को ‘ओरों के गम में ‘जरा-सा शरीक होने’ का नाटक करना पड़ रहा है? नाटक इसलिए बताया जा रहा है क्योंकि ग़ज़लकार को सामाजिक दायित्व-बोध की रस्म निभाने के बाद अगले शे’र में प्रेयसि की गोद में सिर रखकर सोने और उसके बाद सुबह होने की चिन्ता सता रही है। इस ग़ज़ल की भी दिशा और दशा बता रही है कि हिन्दी ग़ज़लकार अभिसार या शृंगार का व्यापार करते हुए दुःखी संसार की त्रासदियों में शरीक होना चाहता है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------30

श्री विनोद कुमार उइके ‘दीप’ को भी हिन्दी ग़ज़ल की अक़्ल सुधारनी सँवारनी है, अतः वे भी यही राग अलापते हैं कि-‘‘सर्वप्रथम ग़ज़ल का उत्स एवं कथ्य भले ही प्रेम, शृंगार एवं मदिरा रहे हों किन्तु आज ग़ज़ल उन परिधियों को तोड़कर मानव-जीवन के प्रत्येक अंग को स्पर्श करने में समर्थ है। सामाजिक विसंगतियाँ, राजनीतिक दोगलापन और शोषण की पीड़ाएँ आदि की समस्त व्यंजनाएँ आज ग़ज़ल में समाहित हो चुकी है।’’ [तुलसी प्रभा, सित-2000, पृ. 16]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------३१

अगर विनोद उइके ‘दीप’ इस बात को जानते और मानते हैं कि आज ग़ज़ल अपने मूल रूप [साकी, प्रेयसि, नर्तकी, नटिनी, व्यभिचारिणी, भोग-विलासिनी, नगरवधू आदि] को त्यागकर अब कोठे पर बैठने वाली चम्पाबाई के स्थान पर रानीलक्ष्मीबाई की भूमिका में है और उसने पाप और अत्याचार से समाज को आजाद कराने की ठान ली है तो ऐसी अभिव्यक्ति को चम्पाबाई के स्थान पर रानी लक्ष्मी बाई कहने में उनका या उन जैसे विद्वानों का हलक क्यों सूखता है?

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------32

बदले हुए चरित्र के अनुसार नये नाम की सार्थकता का विरोध करना किस समझदारी के अन्तर्गत आता है? ग़ज़ल के इस बदले हुए रूप को यदि ‘तेवरी’ नाम से संबोधित किया जा रहा है तो इस नाम पर आपत्ति दर्ज कराने के पीछे क्या कोई हीनग्रन्थि काम नहीं कर रही?

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------३३

खैर... ग़ज़ल के इस बदले हुए रूप को विनोद कुमार उइके ‘दीप’ हिन्दी ग़ज़ल मानते हैं तो मानते हैं । क्योंकि वे जानते हैं कि हिन्दी ग़ज़ल का स्वामी विवेकानंद जैसे प्रवचन देने वाला ब्रह्मचारी या सन्यासी अन्ततः भोग तो नारी-देह का लगायेगा ही और अपनी इस काम-क्रिया को सामाजिक सरोकारों की पवित्र प्रक्रिया बताएगा ही। विश्वास न हो तो श्री विनोद कुमार उइके की एक गीत जैसी हिन्दी ग़ज़ल के शे’रों की लहलहाती फसल देख लें-

ग़ज़ल वो ग़ज़ल जो ग़ज़ल-सी लगे, अपने महबूब की हमशक़ल-सी लगे।

जुल्फ, रुख्सार पर बिखरे अशआर ज्यों, मतला पुरनम निगाहों की छल-सी लगे। [तुलसीप्रभा, सित. 2000, पृ. 63]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------३४

'छल-सी लगे' के अशुद्ध लिंग-प्रयोग को अपनाकर और इस तरह ग़ज़ल यदि हिन्दी में आकर भी आशिक की महबूबा की हमशकल है, उसके अशआर, रुख्सार पर फैली जुल्फों का जुदाई संसार हैं तो उस पर सामाजिक सरोकारों की हल्दी चढ़ाने से क्या फायदा? उसके हाथों में जनधर्मी चिन्तन के हथौड़े शोभा नहीं देंगे। इश्क की गलियों में क्रान्ति लाने के लिये की गयी शब्दों की यह तलवारबाजी, उस हाजी या मौलवी की तरह होगी जो धर्म-धर्म तो चिल्ला रहा है, लेकिन निर्दोषों को मारने या मरवाने के लिये बमों की महत्ता का पाठ भी पढ़ा रहा है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------35

हिन्दी ग़ज़ल की सत्योन्मुखी, मंगलकारी छवि आज, उस रवि की तरह दिखाई देती है, जिसका चरित्र उजालों से नहीं, अँधेरों से बना है। लेकिन हिन्दी ग़ज़लकार चीख-चीख कर बता रहा है, समझा रहा है कि हिन्दी ग़ज़ल में उजाला घना है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------36

सामाजिक विकृतियों, त्रासदियों, शोषण, व्यभिचार भरे माहौल को बदलने के लिये क्रान्ति के विचार को मन में पाला-पासा बड़ा और बलशाली किया जाता है। जो विचार काँटे की तरह कसकने लगे, उसका उपचार किया जाना आवश्यक है। उसे निकालकर बाहर फेंक देने में ही समझदारी है। लेकिन हमारे ग़ज़लकार हैं कि इसी कांटे-सी कसकने वाली क्रिया और उससे उत्पन्न पीड़ा को क्रान्ति का एक जरूरी औजार बनाने पर तुले हैं-

हर आदमी के दिल में मचलने लगी ग़ज़ल, अपनी जमीन पाके सँभलने लगी ग़ज़ल।

चुभती थी दिल में आके कभी फाँस की तरह, काँटे-सी अब तो पाँव में गड़ने लगी ग़ज़ल। [प्रसंगवश, फर. 94, पृ. 11]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------37

‘मचलने’ की तुक ‘संभलने’ से मिलाने के बाद ‘गड़ने’ जैसी निकृष्ट तुक पाकर यदि हिन्दी में ग़ज़ल संभल रही है, अपनी जमीन पर आ गयी है, लोगों के दिलों मचल रही है, पाँव में काँटे-सी गड़े होने के बावजूद क्रान्ति के मैदान में अड़ रही है, लड़ रही है, आगे बढ़ रही है तो अचरज कैसा? ऐसा भी होता है। आज के सूरज की कोख में अंधकार का वास होना आम बात है। ग़ज़ल के हिस्से में पहले भी रात थी, अब भी रात है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------38

आप कहेंगे कि ये भी कोई बात है! तो लीजिए ऐसी ही हिन्दी ग़ज़ल का एक और उदाहरण-

हारी-हारी ग़ज़ल, कारी-कारी ग़ज़ल, आजकल मैं कहूँ ढेर सारी ग़ज़ल।

जुल्म को, लूट को, झूठ को, फूट को, दे रही चोट सबको करारी ग़ज़ल।

[नूर मोहम्मद नूर तुलसीप्रभा सित. 2000, पृ.8]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------39

उपरोक्त हिन्दीग़ज़ल यदि हार के विचार से ग्रस्त है, पस्त है, उसके ओजस स्वरूप का सूर्य अस्त है तो जुल्म को, झूठ को, फूट को, लूट को करारी मात या चोट कैसे दे रही है? यह सोचने का विषय है? यह कैसी अग्निलय है जो सीत्कार में बहते हुए चीत्कार को टटोल रही है। प्रेमिका को बाँहों में भरने के जोश को आक्रोश समझ रही है। चुम्बन के बीच सामाजिक क्रन्दन को सँवारने का नाम ही लगता है हिन्दी ग़ज़ल है??

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------40

प्रेमिका के आगमन की प्रतीक्षा में आँखों को दीप-सा जलाये रखना और इन्हीं दीप-सी जलती हुई प्रतीक्षारत आँखों से वर्ग-संघर्ष को उभारना, अँधेरे से उल्लू [शोषक] के तीर मारना है। यह कैसे होता है, एक ग़ज़ल के शे’र प्रस्तुत हैं-

जलें निरंतर राह में इन आँखों के दीप, कब आओगे तुम मेरे दिल में रखने दीप।

तरसें दिवले गार के यूँ गरीब के द्वार, तेल समूचा पी गये कुछ सोने के दीप।

[पुरुषोत्तम ‘यकीन’, तुलसी प्रभा सित.200 पृ.47]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------41

निकृष्ट तुकों के साथ कही गयी ‘यकीनजी’ की उपरोक्त हिन्दी ग़ज़ल के दो शे’रों में ‘आँखों के’, ‘सोने के’-दो दीपक जल रहे हैं। दोनों दीपकों के प्रकाश की चकाचौंध के बीच शोषण का जाप प्रेमालाप के साथ है। यह उजाले भरा वैचारिक माहौल है या उसका मखौल है? -रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------42

व्यवस्था को ललकारने और प्रेमिका को पुचकारने की क्रिया एक साथ हो तो उमर खय्याम और सुकरात के जहर भरे प्याले को एक ही खाने में फिट किया जा सकता है। और कहीं हो अथवा न हो, हिन्दी ग़ज़ल में यह फार्मूला हिट किया जा सकता है, देखिये-

कभी बने सुकरात कभी हम बने उमर खय्याम,

लेकिन बुझी न प्यास, हो गयी यद्यपि उम्र तमाम।

[आलोक यादव, ग़ज़ल से ग़ज़ल तक, पृ.35]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------43

ये कैसी एक जैसी प्यास है, जो सुकरात और उमर खय्याम का आकलन समान तरीके से कर रही है और तमाम उम्र ग़ज़लकार को सताती है? क्या ऐसे ही हिन्दी ग़ज़ल कही जाती है?

वक्त आया तो तेरे दिल की ग़ज़ल कह जाऊँगा

एक दिन तुझसे मैं मंजिल की ग़ज़ल कह जाऊँगा।

यूँ ही गर हिंसा की बातें आप करते ही रहे

एक ही नुक्ते में मकतल की ग़ज़ल कह जाऊँ \गा।

डॉ. राजकुमार निजात, ग़ज़ल से ग़ज़ल तक, पृ. 94

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------44

एक अन्य हिंदीग़ज़लकार अशोक आलोक के तेवरों में भी वही वैचारिक स्खलन है। हिन्दी के अन्य ग़ज़लकारों की तरह वे पहले तो इन्कलाब की आग उगलते हैं और फिर दूसरे पल उसी देहभोग की ओर जाने वाली प्रेम की पगडंडी पर चलते हैं-

इन्क़लाबी आग जलने दीजिए, भावनाओं से निकलने दीजिए।

रात के आँचल में टाँकेगा हँसी, चाँद आँगन में उतरने दीजिए।

[तुलसी प्रभा, सित. 2000पृ. 32]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------45

आलोकजी की ग़ज़ल के उपरोक्त ‘मतला’ में ‘जलने’ की तुक ‘निकलने’ से मिलाने के बाद अगले शे’र में तुक के रूप में ‘उतरने’ का अशुद्ध प्रयोग यदि हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य को व्यापक बनाने में सहायता दे सकता है??

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------46

‘आकाश’ की तुक ‘विश्वास’ से मिलाकर ग़ज़लकार प्रेम किरण भी हिन्दी ग़ज़ल की बहर को नदी के पास सकते हैं। मोर की तरह पंख फैलाकर नृत्य कर सकते हैं। वे शब्दों को कैसे थिरकाते हैं और क्या बताते हैं आइए देखें-

कथ्य का व्यापक खुला आकाश रखती है ग़ज़ल

दर्द के अनुवाद में विश्वास रखती है ग़ज़ल।

शब्द में हैं इक थिरकते मोर की-सी मस्तियाँ

बहर को बहती नदी के पास रखती है ग़ज़ल। [प्रेमकिरण, तुलसीप्रभा, सित.2000, पृ. 48] ग़ज़ल के उक्त दो शे’रों के कथन से जाहिर है कि बहर की बहती नदी के पास जो मोर की मस्तियाँ है, उसमें मोरनी से वियोग का रोग भी है जो दर्द के अनुवाद में विश्वास रखता है, क्या यही हिंदी ग़ज़ल के खुले आकाश जैसे कथ्य की व्यापकता है?

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------46

हर सिम्त इन्कलाब की होली जलाने के लिये भगतसिंह, चन्द्रशेखर ‘आजाद’ हो जाना पड़ता है। बर्बर और अत्याचारी वर्ग की यातनाओं को सहना पड़ता है। त्याग-तपस्या और बलिदान के इम्तिहान से गुजरना पड़ता है। लेकिन हिन्दी ग़ज़ल के ऐसे वीरों को क्या कहेंगे जो मासूक की बिन्दास अदाओं पर रीझते हुए पूरी की पूरी कायनात को सुर्ख अलावों की तरह दहकाने का छ्दम प्रयोग कर रहे हैं-

मेरे यारो! मेरी किस्मत का मिजाज मत पूछो,

वो हैं मासूक की बिन्दास अदाओं की तरह,

हर सिम्त इन्कलाब की होली जलानी है मुझे,

कायनात दहक उठेगा रे सुर्ख अलावों की तरह।

[सागर मीरजापुरी, ग़ज़ल से ग़ज़ल तक, पृ. 121]

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------46

हिन्दी ग़ज़ल विशेषांकों की परम्परा को ‘सौगात’ के सम्पादक-श्याम अंकुर ने भी आगे बढ़ाया है। सौगात-अप्रैल-2009 के रूप में ग़ज़ल विशेषांक हमारे सामने आया है। इस अंक के माध्यम से डॉ. प्रभा दीक्षित आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल में जनवादी तेवर की तलाश करती हैं और कहती हैं-‘‘तबाही की भूमिका आज़ाद भारत में प्रारम्भ से ही बनना शुरु हो गयी थी। अच्छा कवि या शायर मात्रा कल्पना-लोक का ही वासी नहीं होता, उसके अपने सामाजिक सरोकार होते हैं, जिनके द्वारा उसे साहित्य-सृजन की प्रेरणा प्राप्त होती है।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------46

डॉ. प्रभा दीक्षित के अनुसार --1955 में एक फैक्ट्री में काम करने वाले जनकवि श्रमिक ने आमजन की आवाज में चीखते हुए कहा- 'ग़ज़ल कोठे से उतर कर आगयी फुटपाथ में, पाँव में घुँघरू नहीं/ पत्थर लिये है हाथ में।'

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------46

जनकवि श्रमिक के उपरोक्त शे’र में जो बात कही है, उसमें ग़ज़ल को कोठे पर बैठने वाली बताया गया है। इस कोठे पर बैठने वाली के अब पाँव में घुँघरू नहीं है। वह फुटपाथ पर नहीं, फुटपाथ में है और हाथ में पत्थर लिये है। कोठे पर बैठने वाली के साथ ऐसा क्या हुआ जो इस दशा में आ गयी है? क्या कोठे की संचालिका ने उसे किसी बात पर कोठे से बाहर धकेल दिया है या उसकी देह के ग्राहक ने उसे ठग लिया है! कोठे वाली हाथ में पत्थर क्यों लिए है? फुटपाथ पर आकर हाथ में पत्थर थामे यह कोठे वाली क्या अब कोठे वाली अर्थात् ग़ज़ल नहीं पुकारी जाएगी? वह क्या कहलायेंगे? इस सवाल पर हर हिन्दी ग़ज़लकार चुप क्यों है?

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------46

रोशनी की बात करने वालों के मन में इस बात को लेकर अंधेरा घुप क्यों है? ग़ज़ल के जनवादी तेवरों की महिमा का बखान करने वाले हिन्दी ग़ज़लकारों की सच्चाई यही है कि वे ग़ज़ल को जिस कोठे से उठाने या हटाने का जनवादी दम्भ भरते हैं, उसे उसी कोठे पर बिठाकर उसके अधरों का रसपान भी करते हैं।

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------46

इस तथ्य के सत्य को पुष्ट करना हो तो डॉ प्रभा दीक्षित की ही ‘सौगात’ के इसी अंक में प्रकाशित ग़ज़ल को पृ. 17 पर देखा जा सकता है, जहाँ समन्दर नदी के बाल सहला रहा है। मोहब्बत का मिजाज समझाने के लिए किसी का ख्वाब आँखों में आ रहा है-

'खुशनुमा मंजर था मौसम झूमकर गाने लगा,

जब समंदर खुद नदी के बाल सहलाने लगा।

हमने काफी देर से समझा मोहब्बत का मिजाज,

जब किसी का ख्वाब मेरी आँख में आने लगा।'

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------46

अस्तु! इस सबके बावजूद-‘मैं तुझमें मिलने आयी मंदिर जाने के बहाने’ को चरितार्थ करती आज की हिन्दीग़ज़ल के कथ्य में यह तो नहीं कहा जा सकता कि मर्म को स्पर्श करने वाली जीवंत बिम्बात्मकता, नूतन प्रयोगधर्मिता, अनूठी अर्थवत्ता, मौलिक प्रतीकात्मकता, सहजता सरलता, या तरलता का अभाव है,

-रमेशराज

+|| हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य का सत्य ||------46

कथ्य के विरोधभास, विषयवस्तु के गड्डमड्ड चयन, अन्तविरोधों के उन्नयन ने ग़ज़ल को न तो प्रणय, अभिसार, प्रेमालाप का शुद्ध साधन रहने दिया है, और न ये सामाजिक परिवर्तन की अग्निलय बन पायी है। आत्मालाप, व्यक्तिवाद और सामाजिक क्रान्ति के बीच त्रिशंकु की तरह लटकी हिन्दी ग़ज़ल फिलहाल तो उस शिखण्डी के समान है जो युद्ध के मैदान में अर्जुन के साथ डटा है, तालियाँ बजा रहा है, शोषण, अत्याचार, अनीति की रीति के विरुद्ध लड़े जा रहे महाभारत का आनंद अँगुलियाँ चटकाते हुए ले रहा है।

-रमेशराज

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+ रमेशराज, 15 / 109, ईसानगर , अलीगढ – 202001

2 blogger-facebook:

  1. एक लंबा तार्किक लेख है, ग़ज़ल के चंद विधान फिर भी कथ्य की हत्या कर देते हैं, ग़ज़ल में चंद से अधिक मुझे कथ्य लुभाता है। ग़ज़ल की फ्रेम ही काफी है उसके निर्वाह के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  2. इसीलिए तो ग़ज़ल उस्ताद होते हैं।

    उत्तर देंहटाएं

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