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हास्य-व्यंग्य / छोटे घड़ियाल,बड़े घड़ियाल और मेंढक / महेश सिंह

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लाइब्रेरी में पढ़ते-पढ़ते अचानक चाय पीने का मूड हो गया. इसलिए सेठिया टाइप के एक मित्र से चाय पीने के लिए उसको फोन किया, उसने बताया कि हॉस्टल...

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लाइब्रेरी में पढ़ते-पढ़ते अचानक चाय पीने का मूड हो गया. इसलिए सेठिया टाइप के एक मित्र से चाय पीने के लिए उसको फोन किया, उसने बताया कि हॉस्टल से यहाँ तक लैंड करने में उसे कम से कम पंद्रह मिनट लगेंगे. इसलिए उसका इन्तजार करने हेतु लाइब्रेरी के बाहर आकर एक पुराने पेड़ (जिसको सुसज्जित करने के लिए उसकी तने को घेरते हुए, ईंट पत्थर और सीमेंट का संसर्ग कराकर चबूतरा बनाया गया था) पर आकर बैठ गया. चबूतरे में अच्छी खासी रकम रकम फूंकी गयी थी. जरीदार टाईल्स भी लगे हुए थे. मैं सोचने लगा- ‘जरूर इसके उद्घाटन समारोह में किसी मंत्री टाइप मोटे व्यक्ति को बुलाया गया होगा. और बड़ी पार्टी का आयोजन भी हुआ होगा. रात में आर्केस्टा की धूम-धड़ाक वाली धुन भी बजी होगी. बाकी तरल पदार्थ तो आजकल आम बात है. शायद वह भी हुआ होगा’. पेड़ में दिलचस्पी जगी तो ऊंट जैसे जुगाली करते हुए ऊपर देखने लगा. दरअसल मैं यहाँ बैठने से पहले रजनीगंधा का पैकेट फाड़कर मुंह में डाला था. इसलिए मेरा जुगाली करना स्वाभाविक था.

खैर! पेड़ काफी पुराना होने के बावजूद, हराभरा लग रहा था. किसी ऐसे प्रोफ़ेसर की तरह, जो सुबह-सुबह उठने से पहले अपने बालों और मूछों को कलर करता हो और शृंगार रस की कविता लिखने में महारथ रखता हो. पेड़ का मैं कुछ और मूल्यांकन करता या यूनिवर्सिटी के कुछ और नमूनों की उपमा देता या उन नमूनों से पेड़ की तुलना करता, उससे पहले ही मेरे एक सीनियर शोधार्थी परम श्रद्धेय पंडित जुगुल किशोर जी मेरे सामने अवतरित हुए- “हें..हें..हें विनोद जी आप यहाँ कैसे ?”

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          “अरे सर ! कुछ नहीं बस पढ़ते-पढ़ते ज्ञान का भंडार इतना बढ़ गया कि उठाये नहीं उठ रहा था. इसलिए तो आकर यहाँ आराम करने लगा, सोचा दिमाग को थोड़ा बहुत रेस्ट तो देना ही चाहिए”.

          “हाँ-हाँ...! क्यों नहीं...आराम दीजिये...आराम दीजिये.  आजकल तो आप लोग भी पढ़ने-लिखने में रुचि ले रहे हैं...एक समय वह था जब आपलोगों के दादा-परदादा की पढ़ने-लिखने में बिल्कुल ही रुचि नहीं जगती थी, और हमारे दादा-परदादा को  दिमाग खपाना पड़ता था, बेचारों पर कितना वर्क-लोड था. और एक समय आज है. यहाँ-वहां, जहाँ-तहां आप ही आप लोग भरे पड़े हैं. हें...हें...हे ...है न विनोद जी?”. किशोर जी बड़ा मीठा बोलते है. इतना मीठा कि किसी के फेफड़े में जहर लगा हुआ खंजर भी उतार दें तो वह मुस्करा कर पहले तो उनसे गले मिलेगा, फिर मरेगा. किशोर जी बड़े ही प्रतिभाशाली शोधार्थी हैं. प्रतिभा तो उनमें पहरुआ से कूट-कूट कर भरी हुई है. वे इतने प्रतिभाशाली है कि पूछिये मत. विभाग के सभी दलित और आदिवासी छात्रों को कितना फेलोशिप मिलता है, किस महीने कितना मिला, इत्यादि पाई-पाई का हिसाब रखते हैं. अगर इससे भी उनका मन नहीं भरता तो उस फेलोशिप के हिसाब-किताब के रसीद का प्रिंट आउट लेते हैं और उन सभी छात्रों के कमरों में रात को दरवाजे के नीचे से सरका देते हैं.       

उनकी कुटिल मुस्कान पर मैं फ़िदा हो गया और उन्हीं की शैली में बोला- “नहीं-नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं है...अभी भी बड़े-बड़े घड़ियाल समंदर में अपना आधिपत्य जमाये हुए हैं”.

उनके चेहरे का भाव देखा तो ऐसा लगा जैसे अन्दर से बिलबिला उठे हैं. लेकिन गजब का धैर्य है उनमें. बड़े ही सहज होकर बोले- “सिंह साहब, अब वैसी बात रही नहीं. दरअसल आजकल छोटे घड़ियाल ही गंदगी मचाये हुए है. वे अभी भी तालाब में ही रहकर फालतू के विमर्शों में उलझे हुए है. वे तालाब की गंदगी से कभी बाहर निकल ही नहीं सकते. औकात ही क्या हैं उनकी ? उनका बस चले तो खाली खेतों में सुबह-सुबह ही मुंह मारने निकल पड़ें.”

इस बार अन्दर से बिलबिला तो मैं भी गया लेकिन किशोर जी को ही फालो करना वहां पर मेरी मज़बूरी थी. आवेश में आ जाता, तो वे अपनी योजना में सफल हो जाते. इसलिए अपने आपको सामान्य बनाए रखने के लिए रजनीगंधा को थूकने एक  किनारे की तरफ चला गया. जल्दी से थूकने और किशोर जी की बातों में उलझे होने के कारण गलती से एक ऐसी जगह पर थूका जहाँ किसी सुन्दर दुधारू जानवर का गोबर था. थूकते ही ऐसा लगा जैसे किसी वाहियात परंपरा पर थूक दिया हूँ.

थूककर वापस लौटा तो किशोर जी ऐसे मुस्करा रहे थे जैसे कह रहे हों कि-‘आप लोगों के थूकने से कुछ नहीं होने वाला क्योंकि इस परंपरा को बनाने वाले तो हमीं लोग है, चाट-पोंछकर फिर से चमका देंगे, आखिर रोजी रोटी भी कोई चीज होती है कि नहीं’.

वे अभी भी मेरे जवाब के इन्तजार में थे और मैं कुछ सहज हो गया था, इसलिए बड़ी शालीनता से बोला- “देखिये सर, आपका कहना काफी हद तक सही है लेकिन इसी के साथ यह भी सही है कि सदियों से घी-मलीदा खाते आ रहे पुराने और बड़े घड़ियालों ने कभी नहीं सोचा कि, जब छोटे घड़ियाल भी हमारी ही प्रजाति के हैं, अतः उन्हें भी बराबर का मौका मिलना चाहिए. जबकि यह समंदर अब लोकतान्त्रिक है, तो कानूनन अब जाकर छोटे घड़ियालों को भी कुछ हद तक बराबर का मौका मिला है. फिर भी इस कानून के डर से बड़े घड़ियाल छल-कपट करने से कही-कही ही चूक रहे है. ऐसी स्थिति में छोटे घड़ियाल भी अपनी  प्रतिभा के बल पर समन्दर में अपना पेंडुलम हिला रहे हों, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. ऐसे में बड़े घड़ियालों की सत्ता का चरमराना और उस पर उनका अपना छाती पीटना तो स्वाभाविक ही है”.

वहां हम लोगों की सांस्कारिक वार्ता देखकर दो-चार नर-मुंड और आ गए. मैं थोड़ा और उत्साहित हो गया, इसलिए उन नर-मुंडों का इस बात के लिए समर्थन जुटाने हेतु प्रधानसेवक की अंदाज में बोल पड़ा- “भाइयों-बहनों अब आप ही निर्णय करिए कि यह स्वाभाविक है कि नहीं..? उन नरमुंडों को इसका तनिक भी आभास नहीं था कि, मैं इस तरह से उनका अपने लिए समर्थन चाहूँगा. पहले तो वे अचकचा गए लेकिन जल्द ही बिना कुछ सोचे समझे ही मेरी समर्थन में उनके मुंड ऊपर-नीचे हिले. मैं थोड़ा और उत्साहित हुआ और किशोर जी की तरफ मुखातिब हुआ - “और हाँ ! रही बात विमर्शों की तो यह आज के बड़े घड़ियालों की वजह से ही हो रहा है. उनके रग-रग में इतनी चापलूसी और तिकड़म घुसा हुआ है कि अधिकतर बड़े घड़ियाल उसके बल पर कानून को भी ताक पर रख दे रहे हैं. और तो और, जब इससे भी उनका काम नहीं बनता तो वे पजामा उतारने में भी तनिक संकोच नहीं करते. अब ऐसे में सर, आप ही बताइए कि छोटे घड़ियाल विमर्श न करे तो क्या करें”?   

    किशोर जी बड़े ही मंझे हुए खिलाड़ी हैं. उन्हें अच्छी तरह पता है कि किसी मुद्दे पर कमजोर पड़ने पर गुलाटियां मारते हुए किस तरह से दूसरे मुद्दे पर केन्द्रित हुआ जाय. गुलाटियां और रंग बदलने में वे इतने माहिर हैं कि बंदर और गिरगिट भी लजा जायं. उनकी इसी कुशलता के कारण कैम्पस के कुछ छात्रों के बीच में वे गिरगिटानन्द के नाम से भी जाने जाते हैं. अपनी इसी अदाकारी का प्रदर्शन करते हुए कहने लगे- “आजकल मेंढकों का आतंक कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है. ये मेंढक इतने चालाक हैं कि  पूछिये मत... कितनी आसानी से वे छोटे घड़ियालों और बड़े घड़ियालों के बीच मतभेद पैदा करके आराम से मलाई चाट रहे हैं” उनकी बात सुनकर आसपास जो दो-चार नरमुंड इकट्ठा हुए थे खिलखिला कर ऐसे हँसे जैसे महाप्राण ध्वनियाँ दोनों मुख्य छिद्रों से निकल रही हों. 

उनकी यह बात और नरमुंडों की खिलखिलाहट सुनकर मेरे अंतड़ियों में कुछ गड़गड़ाहट सी हुई और फेफड़े ने तेजी से पम्प मारा इसलिए मेरे हाथ और घुटने कांपने लगे. अपनी यथा स्थिति को सम्हालते हुए मैं किसी तरह सहज हुआ और शालीनता का नाटक करते हुए बोल पड़ा-“किशोर सर शायद आप गलत फरमा रहे है. मलाई चाटने वाले मेंढकों का यह आतंक आज नहीं बढ़ा बल्कि परम्परा से चला आ रहा है. इतिहास गवाह है कि किस तरह इन मेंढकों ने वीर बाजों को यह मंत्र देते हुए आपस में लड़वाया कि-“जाकी कन्या सुन्दर देखी ता पर जाय धरी तरवार”. इस तरह उनके आपस में लड़ने के कारण ही विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा वीर बाजों को गुलामी का मुंह देखना पड़ा. फिर जब आक्रान्ताओं का शासन हुआ, मेंढक तब भी मलाई चाटते रहे. मेंढक तब भी उसी मात्रा में थे और आज भी उसी मात्रा में हैं. विश्वास न हो तो बड़ी-बड़ी कुर्सियों का लिस्ट उठाकर देख लीजिये.

मैं अभी कुछ आगे की सुनाता उससे पहले ही अपनी चिरपरिचित कुटिल मुस्कान के साथ आकर हमसे गले मिले-  “हें...हें...हें ...विनोद जी लगता है आजकल आपका शोधकार्य बढ़िया चल रहा है.....अच्छा तो मैं चलता हूँ”.

“अरे, आइये-आइये सर! इतनी भी क्या जल्दी है, आप जैसे महान लोगों से ही तो इस देश की महानता में चार-चाँद लगता है”- इतनी जल्दी किशोर जी मैदान छोड़ देंगे मुझे तनिक भी अंदाजा नहीं था. मैं आश्चर्यचकित था कि-‘ऐसा कैसे हो सकता है’?

इतनी जल्दी मैदान छोड़कर जाने का कारण जानने के लिए मैं ज्योंही आंखें फाड़कर उनकी तरफ देखा, जिस दिशा में वे जा रहे थे उसी दिशा में थोड़ी दूर सड़क पर उनकी मादा मित्र मेरी तरफ हाथ हिलाते हुए मुस्करा रही थी. मैं भी हाथ हिलाते हुए यह सोचने लगा कि- ‘हे अबला नारी, किशोर जी का धर्म क्यों नाश रही हो, शास्त्रों में लिखा है कि विद्यार्थी को विद्यार्जन के समय तक ब्रह्मचारी बना रहना अनिवार्य है.’ 

अभी मैं सोच ही रहा था कि आर्थिक रूप से मजबूत मेरे सेठिया मित्र का लैंडिंग हुआ. नरमुंड फिर से अपने-अपने पठन-पाठन के कार्य में व्यस्त होने के लिए इधर-उधर छितरा गए. किशोर जी अपनी मादा मित्र की कमर में हाथ डालकर मेरी आँखों से ओझल हो गए. मैं भी सेठिया मित्र की स्वचालित दो पहिया वाहन पर सवार होकर चाय पीने के लिए निकाल पड़ा. लेकिन अब भी मेरे दिमाग छोटे घड़ियाल, बड़े घड़ियाल और मेंढक आपस में कुकुर झौं-झौं कर रहे थे.

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संपर्क : शोधार्थी (जूनियर रिसर्च फेलो), हिंदी विभाग, पांडिचेरी यूनिवर्सिटी पांडिचेरी-605014, gguhindi30@gmail.com मोब.7598643258    

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रचनाकार: हास्य-व्यंग्य / छोटे घड़ियाल,बड़े घड़ियाल और मेंढक / महेश सिंह
हास्य-व्यंग्य / छोटे घड़ियाल,बड़े घड़ियाल और मेंढक / महेश सिंह
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