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विवेक सक्सेना की कविताएँ



बेटी


तुलसी की चैपाई बेटी

गालिब की रूबाई बेटी

मीरा के भजनों सी पावन

मधुर-मधुर शहनाई बेटी


है घर में जब आती बेटी

घर को स्वर्ग बनाती बेटी

हर बिखरे रिश्ते नाते को

चुन-चुन खूब सजाती बेटी


ईद दशहरा या दीवाली

बिन बेटी के सब कुछ खाली

जिसमें अक्षत संस्कृति के

बेटी है पूजा की थाली


बेटी से भी प्यार करो

नहीं कोख में वार करो

सब धर्मों का सार यही है-

बेटी का सत्कार करो।।


-डाॅ. विवेक सक्सेना





परिवर्तन


परिवर्तन तू रोज सुनाता

हमको कैसा गाना रे

सब कुछ छूट रहा है हमसे

जो जाना पहचाना रे


बैठे बैठे याद करें तो

कितना अंतर आया है

जिसके बिन जीना था मुश्किल

उसको ही बिसराया है

रिश्तों की सब गर्माहट अब

शीतलता में बदली है

मन के नील गगन पर छायी

स्वारथ वाली बदली है

नजर झुकाकर सुनते हैं हम

वक्त मारता ताना रे...।




दीपक-सूरज


एक तरफ सूरज की जगमग

एक तरफ दीपक की रौनक

तो क्या दीपक डर जायेगा

आत्म समर्पण कर जायेगा

नहीं नहीं यह नहीं लड़ाई

दोनों ने यह सोच न पाई

दोनों ही करते है काम

एक सुनाता हमें प्रभाती

दूजा लाता सुरमयी शाम

खुद को जला जलाकर जग को

जो रोशन कर जाते हैं

उनके आगे दुनिया के सब

मस्तक झुक जाते हैं।



कुल्हाड़ी और कुदाली


बहुत बेचैनी के कारण

जब नहीं गया रहा

तो कुल्हाड़ी ने कुदाली से कहा-

री कुदाली

तू किस घमंड में रहती है

अपने आपको श्रेष्ठ कहती है

अरे मेरी काया तुझसे ज्यादा मजबूत है

बड़े-बड़े पेड़ों को गिरा देती हूँ

ये मेरी ताकत का सबूत है

तुझमें क्या है जो तू

मन ही मन खुश रहती हो

और मुझे सम्मान के

दो लफ्ज भी नहीं कहती हो


कुदाली बोली-

यही तो जिंदगी का मंतर है

मुझमें और तुझमें

यही तो अंतर है

तुम पेड़ के तने पर चलकर

बड़ी बेदर्दी से उन्हें

काट देती हो

वसुधा के बेटों को

माँ से बांट देती हो

और मैं किसान के हाथ में

शोभा पाती हूँ

खेत की मिट्टी को खोदकर

उसमें जीवन का धन उपजाती हूँ

चारों तरफ

हरियाली का संदेश देती हूँ

और दुनिया की सारी

बलाओं को अपने सिर लेती हूँ

मैं सृजन की साधिका हूँ

और तुम विध्वंस की समर्थक

इसलिए में सार्थक

और तुम निरर्थक

अरे! जिस दिन तुम काटने की बजाय

उपजाने का काम करोगी

उस दिन सारे कष्ट भूलकर

तुम भी खुश रहोगी।



बेटियाँ


समझ न पाया क्यों इंसान

बेटियाँ ईश्वर का वरदान

यही लक्ष्मी रूप धारकर

घर में वैभव भरतीं

माँ दुर्गा का रूप संवारे

हर संकट को हरतीं

चेहरे-चेहरे खुशियाँ बांटें

बांटे ये मुस्कान...।


बेटी, बहिन व पत्नी बनकर

जो रिश्तों को सजातीं

गोद लिटाकर बचपन को जो

माँ का फर्ज निभातीं

जिनके कारण रोशन होते

रिश्तों के दिनमान...।


बेटी ही तो घर आंगन को

मर्यादा सिखलाती है

बेटी ही तो शुभ मंगल के

द्वारे चैक सजाती है

बेटी ही देती आयी है

रिश्तों को उत्थान...।

उसको भी तो दुनिया में

आने का अधिकार मिले

मात-पिता संग हर रिश्ते का

उसको नेह दुलार मिले

सब धर्मों की यही विनय है-

कोख में मत लो उसकी जान...।

बेटियाँ ईश्वर का वरदान।।



जमीर


आधुनिकता की

बेढंगी तरक्की में खो गये

इंसान थे

अब आदमी हो गये

हमने अंबार लगा लिया धन का

पर अब पता नहीं है

अपने ही मन का

खुद से ही

नजरें मिलाने में

शरमा रहे हैं

अब बताओ

हम कहां जा रहे हैं


इसके बाद भी

कोई है

जो अकेले जो में कहता है

नींद तुझे रात भर नहीं आती

और जमीर हमेशा सोया रहता है।



डाॅ. विवेक सक्सेना


जन्म- 27 अक्टूबर 1979

पिता- सुप्रसिद्ध कवि श्री गुरू सक्सेना

शिक्षा- एम.ए., पी-एच.डी.

प्रकाशन- 1. अपनी-अपनी अनुभूति

2. मस्त-मस्त चुटकुले

3. तपती धूप में पीपल की छांव

हास्य-व्यंग्य कवि, कवि सम्मेलन संयोजक, मंच संचालक के रूप में कार्य।


आकाशवाणी, दूरदर्शन से काव्य पाठ।


संपर्क-साहित्य सदन, स्टेशन गंज, नरसिंहपुर (म.प्र.) 487001    

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परम आदरणीय डॉ विवेक सक्सेना जी की कविता दिल को छू जाती है उनकी कविता में समाज को एक सन्देश होता है वो इसी तरह लिखते रहे और समाज को जागरूक रखे इन्ही अपेक्षा के साथ उन्हें बधाई और शुभकामना प्रेषित है

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