बाल कहानी / बगुले और मछली की दोस्ती / राजेश मेहरा

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हम सब जानते है की बगुले और मछली की हमेशा से दुश्मनी रही है और बगुला हमेशा मछली को तालाब में चुपचाप खड़े होकर चालाकी से खा जाता है लेकिन बहुत समय पहले ऐसा नहीं था उनमें भी दोस्ती थी । ये किस्सा इस प्रकार है । ताजपुर जंगल में एक तालाब था। उस तालाब में बहुत सी मछलियाँ थी। उन मछलियों की एक मुखिया थी सब उसे सम्मान से मछली रानी कहते थे । मछली रानी भी सारी मछलियों का सम्मान करती थी और उनका हमेशा ही नेतृत्व करती थी। सब मछलियाँ उसे अपनी रानी मानती थी और उसकी हर आज्ञा का पालन करती थी। समय अच्छा बीत रहा था। एक दिन मछली रानी तालाब के किनारे भोजन एकत्रित कर रही थी।

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उसी समय एक बगुला किनारे आकर गिरा । लगता था जैसे वह घायल हो। गिरते ही वह बेहोश हो गया। रानी मछली ने बेहोश बगुले को देखा तो उसने अपने मुंह में पानी लेकर उस पर फेंका। पानी के छींटों से बगुला थोड़ा होश में आया लेकिन घायल होने की वजह से वह अपनी जगह से हिल नहीं पाया। रानी मछली उसके पास जाने से डर रही थी एक तो वो पानी के बाहर ज्यादा नहीं रह सकती थी दूसरा उसे डर था की कहीं बगुला होश में आने पर उसे नुकसान न पहुँचाए। मछली रानी ने अपनी साथियों को आवाज दी। मछलियां इकट्ठी हो गई। मछली रानी ने सबको बगुले को खींचकर तालाब के किनारे के और पास लाने को कहा। सबने खींचकर उसे तालाब के किनारे के पास कर दिया।

अब मछली रानी ने तालाब की खर पतवार से दवाई बनाई और बगुले के घाव पर लगा दी। बगुला अब भी बेहोश था। मछली रानी ने देखा की किसी शिकारी ने अपने तीर से उसे घायल किया था। अब मछली रानी खुद दिन रात उस बगुले की देख भाल करती थी। उसको वह समय पर दवाई देती और उसके घाव को भी समय समय पर साफ़ करके उसमें दवाई लगाती। मछली रानी की मेहनत रंग लाई और बगुला ठीक हो गया। मछली रानी ने उसे अब अपने तालाब में ही रहने की इजाजत दे दी। बगुला भी अब सब मछलियों के साथ उस तालाब में आराम से रहने लगा। उसने मछली रानी को नया जीवन देने के लिए धन्यवाद दिया। उसने मछली रानी को उसके अहसान को कभी ना कभी चुकाने का वादा किया।

समय बीतता गया। मछली रानी और बगुले में गहरी दोस्ती हो गई। बगुला तालाब में रहकर सब मछलियों की शिकारियों और अन्य मांसाहारी जानवरों से उनको खतरे की सूचना देकर रक्षा करता था। मछलियाँ खाने को न मिलने के कारण कुछ जानवर अब बगुले से जलने लगे थे और उन्हें बगुले और मछली रानी की दोस्ती चुभने लगी। उन्हीं में एक था कालू कौवा क्योंकि जब भी वह मछलियों को खाने जाता तो बगुला मछलियों को सचेत कर देता और कौवे को भूखा रहना पड़ता था।

कालू कौवे ने एक दिन दूर दूसरे जंगल से कुछ मछलियाँ मारकर ताजपुर जंगल के तालाब के पास डाल दी और जोर जोर से रोना शुरू कर दिया और कहने लगा- अरे सब देखो किसी ने तालाब की मछलियों को मार दिया है।" इतना सुन सब जानवर इकट्ठा हो गये।

मछली रानी ने भी ये सब देखा तो उसे भी बड़ा दुःख हुआ। लेकिन ये सब कौन कर सकता था उसे समझ नहीं आया क्योंकि उनके तालाब की रक्षा तो बगुला करता था। कौवे ने मछली को सोचते देख जोर से कहना शुरू कर दिया मुझे तो ये काम बगुले का लगता है क्योंकि इसके रहते कोई मछलियों पर नजर भी नहीं डाल सकता। बगुले ने कहा-ये झूठ है, लेकिन कौवे के बाकी साथियों ने भी जोर देकर बगुले को ही दोषी कहना शुरू कर दिया। अब मछली रानी को भी कौवों की बात पर यकीन होने लगा की ये हरकत बगुले की ही है। उसने बगुले को तुरंत तालाब से बाहर जाने को कहा। बगुले की बहुत सफाई देने पर भी मछली रानी नहीं मानी और उसे तालाब से बाहर कर दिया। बगुला बड़ा दुखी हुआ क्योंकि वो निर्दोष था। अब कौवे की मौज थी वो बड़ी चालाकी से रोज मछलियाँ खाता और मछली रानी सोचती ये सब बगुला कर रहा है।

एक दिन एक शिकारी तालाब से मछलियाँ पकड़ने आया तो बगुले ने शोर मचाकर मछलियों को सचेत किया लेकिन वे सब इसे बगुले की चाल समझ रही थी। वो सचेत नहीं हुई तो बगुला शिकारी से उन्हें बचाने के लिये उससे भिड़ गया। शिकारी ने गुस्से में उसे अपने चाकू से मार दिया। मरते वक्त उसने अपने साथियों से कहा की वो मछली रानी को बताएं की उसने मछलियों को नहीं मारा ।बगुले के साथियों ने वैसा ही किया लेकिन बगुले के साथियों के बताने पर भी मछली रानी को बगुले के ऊपर विश्वास नहीं हुआ।

बगुले के बलिदान को देख उसके साथी दुखी हुए। अब उन्होंने सोचा जब उनके साथी पर मछली खाने का झूठा इल्जाम है तो क्यों ना सचमुच अब मछली खाना शुरू कर दिया जाए। उसी दिन से बगुले शरीफ भगत बनकर तालाबों से मछलियां खाने लगे।

 

राजेश मेहरा
नई दिल्ली
rajeshkumar5970@rediffmail.com

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