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पटकथा लेखक के गुण डॉ. विजय शिंदे

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कहानी का सृजक अपनी प्रतिभा के बलबूते पर कहानी की रचना करता है। उसका यह लेखन अपने अंतर की प्रेरणा का स्वरूप होता है। लेखक जो लिखता है उसका व्यावसायिक लाभ कमाने का उद्देश्य कम होता है, अर्थात् उसका लेखन करने का उद्देश्य स्वांतः सुखाय अधिक होता है। लेकिन यहीं कहानियां फिल्मों के भीतर पटकथा का स्वरूप धारण कर जब परदे तक का सफर तय करना शुरू करती है तब हर जगह पर उसके साथ व्यावसायिकता जुड़ जाती है। अर्थात् फिल्मों में पटकथा लिखना भी व्यावसायिक मांग की तहत आता है। पटकथा लेखक के हाथों में कहानी सौंपी जाती है और उसे कहा जाता है कि फिल्म के लिए इसकी पटकथा तैयार करें। बहुत जगहों पर ऐसे पाया जाता है कि मूल कहानी का लेखक और पटकथा लेखक दोनों एक ही है। मूल लेखक ही कहानी को पटकथा के स्वरूप में ढालता है। व्यावसायिक धरातल पर उस लेखक के लिए लेखक और पटकथा लेखक दोनों का मानधन भी दिया जाता है। फिल्मों के अनुकूल पटकथा लिखना एक कला है। आज-कल हमारे आस-पास फिल्मों के अलावा ऐसे कई मनोरंजन के साधन, टी. वी. चॅनल्स और अन्य क्षेत्र है वहां पर पटकथा लेखन की आवश्यकता पड़ती है। प्रतिभावान और इस क्षेत्र में रुचि रखनेवाले लोगों के लिए पटकथा लेखन करना आय के स्रोत की उपलब्धि करवाता है।

पटकथा लेखन अभ्यास, मेहनत और स्वाध्याय के साथ-साथ एक व्यावसायिक लेखन है। जाहिर है कि लेखन की इस विधा के लिए स्वाध्याय के साथ-साथ लेखन के व्यवसायिक गुणों का होना जरूरी है। पटकथा लेखन के लिए आवश्यक गुणों को निम्न रूप में विश्लेषित किया जा सकता है –

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अ. स्वाध्याय श्रेणी के गुण

1. नैसर्गिक प्रतिभा - स्वाध्याय श्रेणी का यह गुण ‘इन-बिल्ट’ और ‘डिफ़ॉल्ट’ गुण हैं। इसे निसर्गतः प्राप्त प्रतिभा भी कह सकते हैं। प्राप्त प्रतिभा और रुचि को जब मौका मिल जाता है तब वह इस क्षेत्र में आगे बढ़ता है। कहानियां पढ़ने और इसे चलचित्रों जैसा अनुभव करने की तथा लिखने की रुचि ही उसकी मूल नैसर्गिक प्रतिभा को तराशती है। सफल पटकथा लेखक बनने के लिए नई-नई कहानियां पढ़ने और सुनने का केवल शौक नहीं बल्कि एक जुनून होना जरूरी है।

2. प्रेक्षक और विश्लेषक - पटकथा लेखक केवल कहानियां पढ़ने और सुनने के जुनूनी नहीं होते हैं, बल्कि इससे दो कदम आगे वे कहानियां देखने में यकीन रखते हैं। इसलिए समाज से कटकर नहीं, समाज से जुड़कर सामाजिक गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हैं। कहने का तात्पर्य है, एक पटकथा लेखक बनने के लिए घटनाओं और परिघटनाओं का अच्छा प्रेक्षक यानी ऑब्जर्वर और विश्लेषक होना आवश्यक है।

3. किस्सागो वृत्ति - केवल कहानियां देखने से क्या होता है? सबसे जरूरी है कहानियां कहना, किस्सागो होना। पटकथा लेखक द्वारा कहीं और कथन की गई सफल कहानी दर्शकों को सिनेमाघरों में खिंच लाती है। एक सफल किस्सागो होना एक सफल पटकथा लेखक होने का एक महत्त्वपूर्ण गुण है।

आ. व्यावसायिक श्रेणी के गुण

1. भाषा पर असाधारण पकड़ - जिस भाषा में पटकथा लिखी जानी है, उस भाषा पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए। इससे भावनाओं को सहजता से व्यक्त किया जा सकता है। असहज भाषा में लिखी गई पटकथा को कोई पढ़ने के लिए तैयार नहीं होता है। यह ध्यान रहे कि फ़िल्म-निर्माण से जुड़े अधिकांश लोग भाषा के विद्वान नहीं होते हैं। वे आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई पटकथा को ज्यादा पसंद करते हैं।

2. उच्च कल्पना शक्ति - उच्च कल्पनाशक्ति पटकथा लेखन की दूसरी सबसे बड़ी जरूरत है। जिनकी कल्पनाओं के घोड़े जितनी तेज दौड़ते हैं, वे उतनी ही अच्छी पटकथा लिख सकते हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि भाषाई रूप से समृद्ध होने पर एक पटकथा लेखक अपनी कल्पना को स्पष्टता से अभिव्यक्त कर सकता और सादगी से कह सकता है।

3. दृश्य-श्रव्य बोध - पटकथा पाठक द्वारा पढ़ी नहीं जाती है बल्कि दर्शक द्वारा देखी और सुनी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो पटकथा एक काग़जी और कच्चा दस्तावेज है, जिसका रूपांतरण फ़िल्म या धारावाहिक में होता है। इसलिए एक सफल पटकथा लेखक बनने के लिए जरूरी है कि दृश्य-श्रव्य बोध (ऑड़ियो-विजुअल सेंस) काफी विकसित हो। (ई-संदर्भ, ब्लॉग – कथा पटकथा)

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. कथा-पटकथा – मन्नू भंड़ारी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004, द्वितीय संस्करण 2014.

2. पटकथा लेखन एक परिचय – मनोहर श्याम जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2000, आवृत्ति 2008.

3. पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका – असगर वजाहत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, छात्र संस्करण 2015.

4. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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