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शब्द संधान / एक और एक ग्यारह / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

बांस निर्मित लोक-कलाकृति

एक और एक जोड़कर दो ही बनते हैं, ग्यारह नहीं। पर एक के बगल में एक रख दिया जाए तो ग्यारह हो जाता है। लेकिन यह जो भाषाई मुहावरा, एक और एक ग्यारह, है कुछ और ही बात कहता है। यह इस बात की ओर संकेत करता है की ‘एकता’ में बड़ी ताकत है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था, ‘एकला’ चलो रे, पर स्वयं ‘एक’ कम ही ‘अकेला’ रह पाता है। अनुमान के अनुसार कभी ‘दो-एक’ कभी ‘पांच-एक’ तो कभी ‘कुछ-एक’ साथ हो लेते हैं। एक चना भाड़ नहीं भूँजता। हाँ कई लोग अपनी सहमति दिखाकर ‘एक ज़बान’ हो सकते हैं। समृद्धि आती है तो ‘एक से इक्कीस’ बनने में देर नहीं लगती। सामान्यत: भाई भाई स्वभाव से एक चने की दो दाल की तरह ही तो होते हैं। ‘एक न एक’ एक को नकारता नहीं दो में से एक विकल्प बताता है- एक यह या एक वह। आप कितनी ही कोशिश भले कर लें लेकिन कभी कभी ‘एक नहीं चलती’ और आप ठगे से रह जाते हैं।

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‘एक’ से मुहावरे ही नहीं, तमाम ऐसे शब्द भी बने हैं जिनका अर्थ एक की इकाई को लांघ जाता है। उदाहरण के लिए ‘एकत्र’, या एकत्रित होना, एकाकी रह जाना नहीं है बल्कि इकट्ठा हो जाना है। लेकिन ‘एकल’ अकेला और अद्वितीय है, ‘एकांक’ और ‘एकांग’ क्रमश: एक अंक और एक अंग वाला ही है। ‘एकांत में भी अकेले का ही भाव है, लेकिन ‘एका’ में मेल-मिलाप है।

पहले अंक या इकाई को जहां हिन्दी और संस्कृत में ‘एक’ कहा गया है, वहीं इसे अरबी भाषा में ‘यक’ कहते हैं, क्या यह संभव है कि हिन्दी का यही ‘एक’ अरब पहुंचते पहुंचते ‘यक’ हो गया हो ? लगता तो ऐसा ही है। लेकिन यही ‘यक’ जब भारत लौट कर आया तो ‘एक और यक मिलकर’, जैसा की मुहावरा है, ‘ग्यारह’ हो गए। ‘यक’ हिन्दी में पूरी तरह रच-बस गया और हिन्दुस्तानी ज़बान की समृद्धि में वह अपना योगदान दिए बगैर नहीं रहा। ‘एक-तरफा फैसला’ कहें, या, ‘यक-तरफा फैसला’ ; ‘एक-तरफा राय’ कहें ,या, ‘यक-तरफा राय’ ; ‘एक- तल्ला मकान’ कहें, या, ‘यक-तल्ला मकान’ ; ‘एक चश्म या एक-चश्मी’ कहें ,या, ‘यक-चश्म, यक-चश्मी’ कहें, हिन्दुस्तानी ज़बान ने कभी कोई दुराव नहीं किया। ‘एक ज़बां’, ‘एक–ज़बानी’, ‘एक-जां’, ‘एक-तरफ’, ‘एक रुखी’ जैसे शब्दों में ‘एक’ की जगह अगर ‘यक’ भी लग गया तो हिन्दी ने उसका स्वागत ही किया। हिन्दी में जो ‘इकहरा’ है, एक परत का है, वह ‘यक-तही’, भी बिना किसी रोक-टोक के कहलाया। यक-फीसदी कहें या एक फीसदी – बात एक ही रही। ‘एक मुश्त’, ‘एक रंग’, मूल रूप से ‘यक-मुश्त’ और ‘यक-रंग’ हैं और हिन्दी में भी अधिकतर इन्हें ‘यक-मुश्त’ और ‘यक-रंग’ ही रहने दिया गया है। हिन्दी और हिन्दुस्तानी ज़बान में ऐसे अनेकानेक शब्द गिनाए जा सकते हैं जिनमें आप ‘एक’ या ‘यक’, कुछ भी लगाएं मान्य है। अकस्मात् या ‘एकाएक’ के लिए हम ‘यकायक’ धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं।

किसी ज़माने में, (और शायद आज भी,) हिन्दी माध्यम से पढाए जाने वाले प्राइमरी स्कूलों में पहाड़े रटवाए जाते थे। दो यकुम दो, दो दूनी चार, इत्यादि। दो यकुम दो में यह ‘यकुम’ कम से कम हिन्दी का शब्द तो नहीं ही है। (इसका हिन्दीकरण करके इसे ‘एक्कम’ भी कहा गया है)। पर ‘यकुम’ शब्द वस्तुत: ‘यक’ से बना है। महीने की पहली तारीख के लिए यह फारसी का शब्द है, जिसे लगता है, हिन्दी में पहाड़े की पहली सीढ़ी के भी अपना लिया गया।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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