सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

शब्द संधान / शंख नाद / डा. सुरेन्द्र वर्मा

शब्द संघात शंख नाद

डा. सुरेन्द्र वर्मा

भारतीय संस्कृति में शंख को बहुत पवित्र और शुभ माना गया है। किसी भी मंगल कार्य के पूर्व, पूजा करने या तर्पण करते समय, ‘शंख फूंक’ कर ‘शंख-ध्वनि’ की जाती है। लेकिन मजेदार बात यह है कि युद्ध की घोषणा भी ‘शंख-नाद’ से ही होती है। ‘शंख-नाद’, शब्द, युद्ध की घोषणा का ही द्योतक बन गया है। किसी ज़माने में युद्ध से पहले शंख-नाद ज़रूर किया जाता रहा होगा। मुहावरे के अनुसार सफलता का डंका बजाना और सफलता पर आनंद मनाना भी ‘शंख बजाना’ ही कहा गया है। अब तो शंख नाद भी केवल एक मुहावरा भर रह गया है। हाँ, शुभ कार्य के आरम्भ में शंख-ध्वनि आज भी, वास्तव में की जाती है।

शंख बजाया जाता है। फूंक कर बजाया जाता है, जैसे कि बांसुरी फूंक कर बजाई जाती है। लेकिन बांसुरी को एक वाद्य माना गया है जिससे संगीत पैदा होता है। शंख कोई सांगीतिक वाद्य नहीं है। वस्तुत: शंख तो समुद्र में पैदा होने वाला, घोंघे की तरह का, एक कीड़ा है जिसका खोल बेहद सख्त और सफ़ेद होता है। इसे ‘कंबु’ भी कहा गया है। शंख-शुक्तिका ‘सीप’ को कहते हैं। यह भी शंख की तरह सफ़ेद और कड़ी होती है। सीप में से प्राय: मोती प्राप्त हो जाता है। शंख में भी अक्सर मोती मिल जाता है किन्तु सीप के मोती की अपेक्षा शंख का मोती काफी बड़ा होता है। शंख से निकले मोती को ‘शंखज’ (शंख से उत्पन्न) कहा गया है।

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हिन्दू मिथक के अनुसार ‘शंखासुर’ एक राक्षस का नाम है। ‘शंखचूड़’ भी इसी दैत्य का ही नाम है जो विष्णु द्वारा मारा गया था। लेकिन रोचक बात यह है कि शंख से जुड़ा केवल राक्षस का ही नाम नहीं है, विष्णु को भी ‘शंखधर’,’शंखपाणी’,’शंखभृत’ आदि, नाम दिए गए हैं। ( विष्णु सचमुच भृतभूत (अत्यंत शक्तिशाली) ही थे जिन्होंने शंखासुर को अपने हाथों (पाणि) में लेकर ‘धर’ दबाया था और उसे भृत बना दिया था !)

भारतीय चिकित्सा शास्त्र में भी ‘शंख” की अच्छी खासी घुसपैठ है।’ ‘शंख-भस्म’ और शंख-द्राव’ औषधियाँ हैं। पेट के रोगों के लिए ‘शंख-वटी’ प्रयोग में लाई जाती है। इत्यादि। संखिया को “शंख-विष” कहते हैं।

गणित में दस अरब के बाद की राशि (संख्या) ‘शंख’ और ‘दस-शंख’ हैं। यह इतनी बड़ी राशि है कि शंख को ‘कुबेर (सर्वाधिक धनवान व्यक्ति) की निधि’ कहा गया है। ज़ाहिर है कि शंख राशि का समुद्र में पाए जाने वाले शंख से कोई लेना-देना नहीं है।

पता नहीं क्यों मनुष्य के मस्तक या ललाट को भी ‘शंख’ कहा गया है। सिरदर्द या मस्तक की पीड़ा को ‘शंख-वात’ कहते हैं। ‘शंखचरी’ या ‘शंखचर्ची’ ललाट पर चन्दन का टीका है।

परम्परागत रूप से स्त्रियों के चार वर्ग किए गए हैं,- उनमें चित्रिणी, पद्मिनी, हस्तिनी के अतिरिक्त एक वर्ग “शंखिनी” स्त्रियों का भी है; ‘शंखिनी’ एक अप्सरा का नाम भी है। नपुंसक व्यक्ति को ‘शंड’ कहा जाता है। और तो और, हिन्दू मिथक के अनुसार आठ नागराजों में एक नागराज शंख भी हैं। इसी प्रकार ब्रह्मा के पुत्रों (देहज) में शंख भी उनका एक पुत्र है।

 

-- डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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