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शब्द संधान / प से पतंग / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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पतंग के कई अर्थ हैं। कनकौवा तो पतंग है ही, चिड़िया, शलभ, खेलने की गेंद, आग से निकली चिन्गारी भी पतंग कहलाती है। क्या आप बता सकते हैं की इनमें वह कौन सी बात है जो इन्हें पतंग बनाती है ? उत्तर है, ये सभी किसी न किसी रूप में उड़ने वाली चीजें हैं। पतंग उडाई जाती है, चिड़िया उड़ती है, शलभ, या कहें, पतंगा, भी चिराग के इर्द गिर्द उड़ता रहता है, आग से चिंगारियां उड़ती हैं। वस्तुत: संस्कृत में उड़ने का भाव दर्शानेवाली मूल क्रिया “पत” है। पतंग में ‘पत’ है, पतंगा (शलभ) में ‘पत’ है। चिड़िया शब्द में ‘पत’ भले न हो पर वह उड़ती है, अत: ‘पतंग’ कहलाती है। टप्पा लगाने से खेलने की गेंद कुछ देर के लिए हवा में विचरती (उड़ती) है। आग से तो चिंगारियां उड़ती ही हैं। ये भी आग की पतंगें हैं।

पत से ही पत्र बना है। पत्र का अर्थ है, पाती या पत्ती। चिड़िया के पंख को भी पत्र कहते हैं। दरअसल देवनागरी के ‘प’ वर्ण का मतलब ही पत्ता या/और वायु से होता है। ज़ाहिर है इन दोनों के मेल से ही उड़ने की प्रक्रिया पूरी होती है। चिड़िया के पास पंख हैं तो वह हवा में उड़ने लगती है। वायु के लिए ‘प’ से आरम्भ होने वाला शब्द, “पवन” है।

पतंग है तो पतंगबाज़ भी हैं और पतंगबाजी भी है। पतंगबाज़ अपनी अपनी पतंगें हवा में ‘बढाते’ हैं और अपनी पतंग की डोरी से रगड़ कर, दूसरे की पतंग की डोरी ‘काटते’ हैं। पतंग-बढ़ाना और पतंग-काटना पतंगबाजी का हुनर है, जिसे सीखना पड़ता है।

घनानंद कहते हैं, ‘गोरे तन पहिरि पतंगी सारी, झमक झमक गावै गारी”। कहने की आवश्यकता नहीं, यहाँ ‘पतंगी’ का अर्थ रंग-बिरंगी से है। पतंग हवा में लहराती है। और पतंगी साड़ी भी पहन कर लहराई न जाए, क्या ऐसा संभव है?

‘पत’ पत्ते को कहते हैं। लेकिन पत शब्द लाज और प्रतिष्ठा के लिए भी इस्तेमाल होता है। “मोरी पत राखो भगवान”। पत रखना लाज या प्रतिष्ठा की रक्षा करना है। पत उतारना प्रतिष्ठा को भंग करना है। स्वयं अपनी प्रतिष्ठा को नाश करने वाला इंसान ‘पतखोवन’ कहलाता है। हिन्दी भाषा में ‘पत’ का समातगत रूप भी देखा जा सकता है। पत्तों के झड़ने के मौसम को पतझर या पतझड़ कहते हैं। पतझड़ में पत्ते पेड़ों से गिरकर हवा में उड़ने लगते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ‘पत’ में उड़ने का भाव भी है और गिरने का भाव भी है।

संस्कृत में गिरते हुए या नीचे आते हुए को ‘पतत’ कहते है। ‘पतन’ ऊपर से नीचे आना है। गिरना है, च्युत होना है। पतनशील, पतानोमुख, शब्द, व्यक्ति के पतन की ओर उसका स्वभाव और प्रवृत्त को दर्शाते हैं। वह कहावत है न, कुछ भी कर लीजिए पर पतनाला(रा) तो यहीं गिरेगा। इसमे केवल धमकी ही नहीं है। एक तथ्यात्मक बात भी कही गई है – नाले का पानी तो नीचे की तरफ ही बहेगा।

झंडे को ‘पताका’ भी कहते हैं। पताका हवा में लहराती है। ख़ास मौकों पर नीचे उतार भी ली जाती है। किसी की पताका उड़ना उसकी ख्याति होना है और उसकी पताका गिरना उसकी पराजय या हार है।

डा. रामविलास शर्मा के अनुसार द्रविण और फारसी भाषाओं में ‘त’ के स्थान पर ‘र’ का उच्चारण होता है। ‘त’ के स्थान पर ‘र’ फारसी और उर्दू में भी आ गया और इससे कई शब्द निर्मित हुए। पक्षी के लिए ‘परिंदा’ और पंख के लिए ‘पर’ बना। परवाना, परवेज़, परवाज़ आदि शब्द भी इसी के उदाहरण हैं।

-सुरेन्द्र वर्मा ( ९६२१२२२७७८ )

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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