रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

शब्द संधान / मान श्रीमान / डॉ. सुरेंद्र वर्मा

image

‘मान’ एक ऐसा शब्द है. श्रीमान, जिसके विभिन्न भाषाई उपयोगों का सही सही ‘अनुमान’ लगा पाना यदि असंभव नहीं, तो कठिन तो ज़रूर है।

हिन्दी में मान का सामान्य अर्थ प्रतिष्ठा, आदर, ख्याति या ‘सम्मान’ से है। दूसरों की ही नहीं, अपनी प्रतिष्ठा, ‘आत्मसम्मान’, ‘स्वाभिमान’ भी मान ही है। इसीलिए मान कभी कभी ‘अभिमान’ में भी सहज ही परिणित हो जाता है।

कुछ लोगों का मान बहुत जल्दी खंडित भी हो जाता है। और इसलिए वे रूठ जाते हैं। कभी कभी क्रोध में भी आ जाते हैं। स्त्रियों का जब मान खंडित होता है और वे क्रोधित हो जाती हैं तो जैसा कि परम्परागत रूप से कहा गया है, वे कोप-भवन में चली जाती हैं। कोप भवन को “मान-गृह” की संज्ञा भी दी गई है। और तो और, मान के अनुसार नायिकाओं का वर्गीकरण तक कर दिया गया है। वह नायिका जिसका मान बहुत जल्द ही खंडित हो जाता है अधीरा-नायिका कही गई है। जो नायिका जल्द ही नहीं रूठती, वह ‘धीरा’ है। मध्यम श्रेणी की नायिका ‘धीराधीरा’ कही गई है।

मान शब्द ‘मान दंड’ के रूप में भी प्रयुक्त होता है। इस तरह मान एक ‘पैमाना” है जिससे नाप-तोल की जाती है। मान ‘प्रमाण’ है। इसे ‘मानक’ भी कहा गया है। हम एक मानक को स्वीकार कर वस्तुओं का “मानकीकरण” करते हैं।

किसी वस्तु को ‘मानता देना’ उसके मूल्य को केवल स्वीकार करना ही नहीं उस पर विश्वास भी है। धार्मिक मानताएं या मान्यताएं इसी श्रेणी में आती हैं। अनेक लोगों की अनेक चीजों पर ‘मानता’ देखी जा सकती है। मान का एक अर्थ नाप या अनुपात से भी है। मान-चित्र (सामान्यत: किसी देश या विश्व का) वह चित्र है जिसमें चित्रित वस्तु के नाप और अनुपात का ध्यान रखा जाता है।

मान से न जाने कितने शब्द ‘दीप्तिमान’ हुए हैं। ‘मान-गुमान’. ‘श्रीमान’, ‘श्रीमती’ ‘पलायमान’, जैसे शब्दों में मान ही पैवस्त है। आत्म-सम्मान, स्वाभिमान, अभिमान, आदि, सब इसी प्रकार के पद हैं। ‘मानज’ वह है जो मान से उत्पन्न हो। ‘मानद’ मानवर्धक है। कई लोगों को मानद-उपाधियाँ मिली हुई हैं जो उनके मान की वृद्धि करती हैं। लेकिन क्या ‘मानस’ ‘मानव’ ‘मानुष’ आदि, में निहित मान भी यही ‘मान’ है जिसका अर्थ प्रतिष्ठा या सम्मान से है ? नहीं ऐसा नहीं है।

मानस, मानव आदि पद ‘मान’ से नहीं ‘मन’ से बने हैं। इन सबमें मन निहित है न कि ‘मान’। मन मनन करने की शक्ति है। संकल्प-विकल्प करने वाली वृत्ति है। और ‘मानव’ शब्द में (और अर्थ में भी) यही वृत्ति प्रतिष्ठित है। ‘मानिक’ एक प्रसिद्ध रत्न (‘माणिक्य’) है। और इसका भी मन या मान से कोई सम्बन्ध नहीं है।

एक शब्द है ‘मानसून’। यह अंग्रेज़ी का शब्द है जिसे हिन्दी ने भी पूरी तरह से अपना लिया है। यह शब्द, जैसा कि हम जानते ही हैं भारतीय महा-सागर में बहने वाली वह हवा है जो वर्षा का कारण बनती है। मानसून में मान, सून के साथ अलग से जुडा नहीं है। मान- सून अपने आप में एक पूरा शब्द है।

--

डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

विषय:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget