सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

शब्द-सन्धान / व्यंग्य का कारोबार / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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हिन्दी साहित्य में आजकल व्यंग्य का कारोबार तेज़ी से चल रहा है। लगभग हर निबंध, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि, में व्यंग्य के छींटे देखे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, आज तो व्यंग्य को हिन्दी साहित्य की एक विधा के रूप में भी स्वीकृति मिल गई है।

लेकिन इस समय मेरा मंतव्य शब्द, ‘व्यंग्य’ के विभिन्न सन्धानों, अर्थों और उसके अन्य मिलते-जुलते शब्दों से ‘एलाइंस’, मेल और मित्रता, की खोज करना है। संस्कृत भाषा में जो भी व्यंजनावृत्ति द्वारा बोधित या संकेतित हो, वही व्यंग्य है। जहां गूढार्थ है, संकेतितार्थ है, वहां व्यंग्य है। इस प्रकार ‘व्यंग्य’ और ‘व्यंजना’ का एक प्रकार से चोली-दामन का एक व्यापक सम्बन्ध है। लेकिन आज के नव- लेखन में व्यंग्य उन स्थितियों पर जिन्हें परम्पागत ‘कलात्मक’ रूप से साहित्य-विश्लेषण तथा निरूपण की परिधि में नहीं लाया जा सकता, विडम्बित कर स्पष्ट करना हो गया है। विडम्बित करना, नक़ल उतार कर चिढाना है। “रिडीक्यूल” करना है। स्थितियां आज इतनी विसंगत हो गईं हैं कि उनपर कटाक्ष करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता। व्यंग्य इस तरह आज तंज़ कसना, कटाक्ष करना, चिढाना, उपहास करना, हंसी उड़ाना, बनकर रह गया है। यह यदि प्रत्यक्षत: न कर, संकेत द्वारा, “व्यंजनात्मक” रूप से किया जाए तो सोने में सुहागा है। ज़ाहिर है, व्यंग्य ने अभी व्यंजना का दामन छोड़ा नहीं है। व्यंजनावृत्ति व्यंग्यपूर्ण भाषा-शैली ही है।

व्यंग्य की मित्रता जहां एक और ‘व्यंजना’ से है, वहीं दूसरी और वह ‘विडम्बना’ से भी जुडा हुआ है। जो उपहास का विषय है, वह विडम्बना है। विडंबनाओं की नक़ल उतारकर, उनकी “पैरोडी” बना कर, हम उनका उपहास करते हैं। सभी विसंगत, अंतर्विरोधी स्थितियां, ‘विडंबनाएं’ कही जा सकती हैं।

कटाक्ष करना, चिढाना, उपहास करना, हंसी उड़ाना – ये सभी वयंग्य के ही रूप हैं। इनमें थोड़ा थोड़ा अर्थ का अंतर भले ही हो, इनमें पारिवारिक साम्यता है। उर्दू का एक शब्द है – तंज़। हिन्दी में अधिक्तर इसे, ‘ज़’ पर नुख्ता हटा कर ‘तंज’ लिखा जाता है। तंज़ का अर्थ ‘कटाक्ष’ के बहुत निकट है। ताना मारना तंज़ कसना है व्यंग्यकार को ‘तंजनिगार’ कहा गया है। जो व्यंग्य पूर्ण हो वह तंजिय: है। हिन्दी ने तंज को तो अपनी भाषा में आत्मसात कर ही लिया है, तंजनिगार और तंजिया भी उसके लिए गेगाने नहीं रहे हैं|। वयंग्य के लिए आजकल हिन्दी में अंग्रेज़ी के आयरनी, सर्काज्म, सैटायर, और विट ( irony, sarcasm, satire, wit) जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए जाने लगे हैं। इनके अर्थ में भी थोड़ा थोड़ा अंतर अवश्य है किन्तु एक पारिवारिक साम्यता है।

प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी ‘व्यंग्य’ को ‘व्यंग’ कहना अधिक पसंद करते थे। उच्चारण में उन्हें यह सरल लगता था। संस्कृत में जो शरीर-हीन है, विकलांग है, लंगडा है, वह “व्यंग” है। व्यंगिता विकलांगता है। विवाह के लिए जब लड़की देखने जाते हैं तो मराठी में कहा जाता है, ‘लड़की अव्यंग’ है। अर्थात, लड़की में कोई शारीरिक दोष नहीं है। मराठी भाषा में ताना या ‘आइरनी’ को भी ‘व्यंग’ ही कहा जाता है। शरद जोशी पर स्पष्ट ही मराठी प्रभाव था जो वे हिन्दी में भी व्यंग्य को ‘व्यंग’ कहा करते थे।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८) १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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