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कहानी / इश्कबाज / सुमन त्यागी ‘आकाँक्षी’

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रेहान,रेहान खान कॉलेज का मोस्ट पॉपुलर (कई बार फेल होने के कारण) डैशिंग,चार्मिंग, बिंदास और कूल बंदा। एक अजीब सी मस्ती हमेशा उस पर छाई रहती ...

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रेहान,रेहान खान कॉलेज का मोस्ट पॉपुलर (कई बार फेल होने के कारण) डैशिंग,चार्मिंग, बिंदास और कूल बंदा। एक अजीब सी मस्ती हमेशा उस पर छाई रहती है। हमेशा हँसना, मुस्कुराना,शरारतें करना और गैंग के साथ क्लास बंक कर मटरगस्ती करना ही उसका शगल।नई जनरेशन को पूरी तरह रिप्रेजेंट करता है रेहान।

एक दिन रेहान और उसकी गैंग क्लास बंक कर कॉलेज कैम्पस में डेरा जमाए थे।तभी हंसी की आवाज ने सबका ध्यान खींचा। निगाहें हँसने वाली की तरफ मुड़ गई। ये अविका थी, बिलकुल रेहान की तरह अल्हड़ ,मस्त,कूल और बिंदास। "ये लड़की कौन है",रेहान ने अपने गूगल दोस्त से पूछा। "अविका,फर्स्ट ईयर,न्यू एडमीशन,अपने ही शहर से,ट्राय मत मारना,बिलकुल भाव नहीं देती है ,काफी खतरनाक है, फिर उसके भाई भी है पूरे के पूरे साँड़, एक ही बार में काम तमाम कर दें,"गूगल ने रिप्लाय किया। "वाह मेरे गूगल सब पहले से ही रेडी।अब तो इससे मिलना ही पड़ेगा।इसकी पसंद नापसन्द,डिश ,कलर,बेस्ट फ्रेंड,अंकल,आंटी, पड़ोसी, पैट ,आई मीन पूरी कुंडली चाहिए मुझे,"रेहान ने गूगल के सिर पर धौल जमाते हुए कहा। अगले दिन जैसे ही अविका ने कॉलेज में एंट्री मारी रेहान उसके सामने,कलाई पकड़ थोड़ा सा टशन दिखाते हुए बोला,"हाय ब्यूटीफुल व्हाट्सएप्प"। अविका च्यूइंगगम का बबल उसके मुंह पर फोड़ आगे बढ़ गई,जिसे वह काफी देर से बनाने की कोशिश कर रही थी। रेहान चेहरे से च्यूइंगगम साफ करते हुए अपना सा फेस लिए खड़ा रह गया। "मैंने कहा था ट्राय मत मार ,अब भुगत",गूगल ने चेहरे से च्यूइंगगम हटाने में रेहान की हेल्प करते हुए कहा। "बड़े-बड़े कॉलेजों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं, गूगल"रेहान ने एक धौल जमाते हुए फ़िल्मी स्टाइल में कहा। रेहान ने अभी तक हार नहीं मानी थी,वह डेली हाय ब्यूटीफुल ,व्हाट्सएप्प कहे बिना नहीं मानता और अविका कभी दोनों पैरों के बीच में घुटने से तो कभी पेट में पंच से जबाब दे ही जाती।हाँ पर उसने अभी तक मुँह से जबाब नहीं दिया था। रेहान दर्द में आधा झुका मुस्कुराता रह जाता लेकिन फिर भी दोनों में से किसी का रूटीन नहीं बदला ।न रेहान ने पूछना छोड़ा और न अविका ने जबाब देना। फिर एक दिन "हाय ब्यूटीफुल ,व्हाट्सएप्प",रेहान के इतना कहने के बाद अविका उसे कई दिनों तक बिल्कुल नहीं दिखी ।

उस दिन अविका के भाई भी कॉलेज आये हुए थे।रेहान का अविका का हाथ पकड़ कर उससे इतना कहने के बाद उसकी इतनी पिटाई हुई कि कई दिनों बाद जब उसके चेहरे की स्वेलिंग कम हुई तो आंखें खुली,तब पता चला कि हाथ पैरों में कई जगह प्लास्टर लगा है। फाइनली आज उसे अविका नजर आ ही गई।"हाय हैंडसम, व्हाट्सएप्प,"अविका ने शरारत भरे लहजे में कहा। "और सब ठीक -ठाक मियाँ"। "जी बेगम सब ठीक -ठाक,"रेहान ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया। इतना सुनते ही रेहान के लिए लाए फूल उसके सीने पर जोर से फेंक और उसके प्लास्टर बंधे पैर को बेड पर धड़ाम से पटक अविका चली गई ।पर रेहान अब भी मुस्कुरा रहा है।यही तो अविका को सबसे ज्यादा चिढ़ाता है। दोनों में इसी बात का टशन है कि कौन पहले बंद करे। लेकिन दोनों में से कोई भी झुकने के लिए रेडी नहीं है।

उधर रेहान के दोस्त को ये समझ नहीं आ रहा है कि रेहान अविका के भाइयों की F.R.I क्यों नहीं करा रहा है। उसके कुछ करने पर ही अविका के भाइयों को सबक सिखाया जा सकता है। रेहान है कि " बड़े -बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं," के पीछे पड़ा है। पता नहीं उसने DDLJ इतनी क्यों देखी है। "अरे यार अब रिश्तेदारी में किसी को तो एडजस्ट करना ही पड़ेगा । साले हैं मेरे,बेगम के भाई हैं, थोड़ा एडजस्टमेंट तो चलता है। वैसे भी ग़ांधी के देश के वासी हैं, अहिंसा परमोधर्म,"रेहान ने बेड पर पड़े पड़े ही एक्टिंग करते हुए कहा।

इस सबके बाद भी अविका और रेहान का टशन जारी है। अविका रोजाना हॉस्पिटल आती है, रेहान के लिए फ्लावर लिए और उसके टूटे हाथ -पैरों को थोड़ा और दुखाने। लेकिन रेहान भी गुरु है।अपनी धुन का पक्का ।"और बेगम व्हाट्सएप्प"उसका नया स्लोगन,जिसे कहे बिना वह नहीं मानता और उसके टूटे हाथ-पैरों को पटके बिना अविका। दोनों ही जिद्दी न उसका मुस्कुराना बंद हुआ और न ही अविका का फ्लावर ला उसके सीने पर जोर पटकना।

ऐसे ही कई दिन बीत गए । एक दिन अविका रेहान से मिलने आई।पर उसके चेहरे पर न हंसी है और न ही शरारत । न उसने फूल रेहान के सीने पर फेंके न ही उसके प्लास्टर चढ़े हाथ -पैरों को इधर- उधर पटका । बस फूल रखकर चली गई। रेहान ने आवाज लगाई,"सब ठीक तो है बेगम"। पर अविका बिना जबाब दिए ही चली गई।

रेहान ने गूगल को बुलाया। "जल्दी कर डॉक्टर बुला,प्लास्टर कटवा,कॉलेज जाना है, कुछ गड़बड़ है ,बेगम एकदम चुपचाप,तू सोच मैटर कितना बड़ा होगा,"रेहान कहते कहते बेड से उतर गया।

अविका आज कुछ ज्यादा ही खुश है। पता नहीं क्यों आज ये ईडियट इतना बुरा नहीं लग रहा ।पता नहीं क्यों मन कुछ गाने को हो रहा है। पता नहीं क्यों पर माहौल थोड़ा सा बदला बदला लग रहा है। " कुछ तो हुआ है ,कुछ हो गया है........."

रेहान को हॉस्पिटल में लगभग एक महीना होने को था। इसलिए अविका को पता नहीं क्या सूझा कि जागते ही सीधे हॉस्पिटल चली गई। रात के ही कपड़ों में।घर पर बस"अभी आती हूँ "बोल कर। "यार रेहान मुझे एक बात बता।तुझे ठीक हुए 10 दिन होने को आये लेकिन तू है कि हॉस्पिटल में डेरा जमाए बैठा है। सब बात से बेखबर,अपनी गैंग से अलग, अकेला सा,आखिर क्या बात है भाई जो तू इस हॉस्पिटल को छोड़ना नहीं चाह रहा है। किसी नर्स से तो सेटिंग नहीं हो गई है तेरी," गूगल ने जानना चाहा। "अरे वाह आज गूगल को भी जबाब चाहिए, गूगल फैल, हे भगवान ये क्या हुआ ?अब दुनियाँ का क्या होगा ? हम जैसों का क्या होगा " ? रेहान ने मजाक करते हुए कहा। "पता नहीं यार क्या है? क्यों है? बस है। उसका आना मुझे अच्छा लगता है। कम से कम इसी बहाने उस से दो बातें तो हो जाती है । ये नोंक-झोंक, उसका पैर पटकते हुए जाना,पेट पर पंच ,सब अच्छा लगता है। कभी कभी तो लगता है उसके लिए 10 दिन क्या पूरी जिंदगी हॉस्पिटल में गुजार दूँ" । " यू आर इन लव माय फ्रेंड, यू आर इन लव,"गूगल ने कहा। "कोई लव शव नहीं है वो तो हॉस्पिटल में नर्स अच्छी हैं", रेहान ने हँसते हुए कहा। उन दोनों की बात सुन अविका बिना रेहान से मिले ही वापस आ गई।

रेहान हॉस्पिटल से कॉलेज पंहुचा तो अविका उसे पहले जैसी ही मिली। " हाय हैंडसम व्हाट्सएप्प,"और रेहान के बिना पूछे ही जबाब दिया ,"ज्यादा शॉक्ड होने की जरुरत नहीं है। जब तुम 10 दिन एक्टिंग कर सकते हो तो क्या मैं 10 मिनट भी नहीं। आखिर बात तो बराबरी की है"। रेहान सरप्राइज्ड। "तुम्हारा फेस पढ़ना जानती हूँ। अब ज्यादा सरप्राइज होने की जरुरत नहीं है। वरना बहुत कुछ पढ़ लूँगी,"अविका ने शरारत से कहा। इस वाकये के बाद दोनों की दोस्ती हो गई। पर नोंक-झोंक में कही कोई कमी नहीं आई। न रेहान का मुंह चलाना बंद हुआ न अविका का हाथ पैर ।

"गूगल चल यार , लेट हो जायेंगे। आखिर अविका की शादी है,"रेहान ने 'अविका वेड्स विवेक' का कार्ड देख रहे गूगल से कहा।

"अविका जल्दी कर,रेहान आ गया", लवी ने आकर अविका से कहा।

दोनों के बीच न आंशू ,न गिले -शिकवे, न भाग जाने के आईडिया, न समाज से लड़ने की बेचैनी। बस एक ख़ामोशी ,सच्चे प्यार की भाषा, जो सब बोल गई। स्पर्श ने जिसे और गहराई दे दी। देर तक दोनों एक दूसरे को बाँहों में भरे खड़े रहे। दिल कुछ इस तरह से धड़कने लगे मानो धड़कनें एकाकार हो इश्क की गवाही दे रही हों। फिर अविका चली आई"तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगी,नहीं जी पाऊँगी"बस इतना सा कहकर। कमरे तक आते -आते आँखों के सब्र का बांध टूट गया। आँसुओं की बाढ़ में पुरानी यादें दिल के किनारों पर ठोकर देने लगी..............कैसे दिन थे वे जब वह रेहान के बिना रह नहीं पाती थी। बस दोनों एक दूसरे के साथ हमेशा कैंपस में धमा -चौकड़ी और मटरगस्ती करते रहते थे। कॉलेज के बंटी-बबली थे दोनों। हाँ बस चोरी नहीं करते थे उनकी तरह। अविका के दिन की शुरूआत रेहान के फोन से और रात उसके गुड़ नाइट मेसेज से होती।कोई भी दिन ऐसा नहीं होता जब दोनों न मिल पाएं। डेली मिलने के बाद भी फ़ोन पर घंटों बात होती । रेहान नाम का सूरज अविका के घर में 24 घंटे उदीयमान रहता। अविका अगर एक दिन भी रेहान से न मिल पाए तो पूरे दिन चिड़चिड़ी बनी रहती । एक बार रेहान उसे बिना बताये शहर से बाहर चला गया ,वो भी पूरे दो दिन के लिए। न कोई फोन ,न s.m.s, और तो और फोन भी नॉट रिचेबल। हद थी यार। अविका की सांसें तो जैसे रुक सी गई। न किसी से कुछ कहते बने न सुनते। दो दिन तक जान हलक में अटकी रही। रेहान के वापस आने पर इतना लड़ी थी रेहान से कि बड़ी मिन्नतों से मना पाया था बेचारा। पूरे कॉलेज के सामने घुटनों पर बैठ कान पकड़ के सॉरी बोला था बेचारे ने।(ये सोचते ही अविका के आंसुओं से भीगे चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आ गई) अविका ने उसे खड़े होने का इशारा किया और एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर रशीद कर रोते हुए उसके गले लग गई। उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ रेहान से प्यार का। "पिछले दो दिनों से मेरा दिल बैठा जा रहा था। क्या हालत थी मेरी तुम्हे पता भी है। तुम लड़के न कभी नहीं समझते । बता के नहीं जा सकते थे। एसटीडी से कॉल कर लेते। एक s.m.s  भी नहीं "। रेहान उसे चुप करने की कोशिश लगातार सॉरी बोले जा रहा था ।उस दिन दोनों ने जाना कि उनके बीच में जो वह दोस्ती से बहुत ज्यादा था। वह केवल   'आई लव यू 'से भी बहुत आगे तक था। ये शायद इश्क था जो हर 3 महीने में बदलने वाले बी. एफ. और जी.एफ. के प्यार से अलग था। ये घुटनों पर बैठ 'आई लव यू' बोलने वाला नहीं बल्कि बिना बोले सब समझ जाने वाला प्यार था। ये 'बंटी-बबली' का लव नहीं ,ये तो 'राम-लीला'और 'बाजीराव-मस्तानी' का इश्क था।

बंटी -बबली का लव एक दम कूल और बिंदास । पर अविका और रेहान का इश्क परिवार और समाज के बंधनों में बंधा हुआ है बिलकुल वैसे ही जैसे 'राम -लीला' और 'बाजीराव-मस्तानी' का बंधा हुआ था

"ये वही लड़का था न",अविका के भाई ने गुस्से से पूछा ।" साले की हिम्मत तो देखो , भरे कैफे में प्रपोज़ कर रहा था। पहली पिटाई तो याद ही नहीं रही। खैर अबकी बार ऐसी की है कि जिंदगी भर नहीं भूलेगा "। भैया अब भी गुस्सा में थे। "पापा वह रेहान है। बहुत अच्छा लड़का है। मेरी ही कॉलेज में पढ़ता है। बहुत चाहता है मुझे। आपको एक बार उससे मिलना चाहिए। प्लीज एक मौका तो दो",अविका ने रोते हुए कहा। " तू तो कुछ बोल ही मत, शादी के लिए झट से रेडी हो गई थी। एक मुसलमान से शादी, मुसलमान की तरफदारी, शर्म नहीं आती तुझे। इस घर में रहते हुए तूने मुसलमान से दोस्ती भी कैसे की",भैया ने कहा।  "मुसलमान है, तो? इंसान नहीं है क्या ?खून का रंग लाल नहीं है क्या? पापा प्लीज एक बार उससे मिलो तो सही । बहुत खुश रखेगा मुझे । बहुत प्यार करता है मुझसे और मैं भी खुद से भी ज्यादा", अविका ने अपने पापा के हाथ को पकड़कर रिक़्वेस्ट करते हुए कहा। अविका के पापा ने कुछ नहीं कहा बस अपना हाथ अविका के हाथों में से छुड़ा लिया। " आप सभी कान खोल कर सुन लो बहुत प्यार करती हूँ उससे । शादी करुँगी तो बस उसी से और एक बात और भइया अपने भाड़े के टट्टुओं से कह देना अगली बार रेहान से हाथ भी लगाया तो हाथ तोड़ के रख दूँगी । पति है मेरा, होने वाला," अविका गुस्से में कहती हुई हॉस्पिटल चली गई। बाकी सब वही खड़े रह गए। अविका के पापा जो सब कुछ सुन रहे थे , उनके चेहरे पर तनाव साफ था । साथ ही हिंदी फिल्मों के विलेन की तरह एक हलकी सी भयानक मुस्कान भी। कुछ दिनों में रेहान हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो गया। सब कुछ पहले जैसा ही लग रहा था। घर पर भी सब शांत ही था । पर शायद किसी बड़े तूफान से पहले की शांति । फिर एक दिन शांत पानी में कंकड़ फेंक ही दिया। " कल तैयार रहना, विवेक और उसकी फैमिली तुम्हें देखने आ रही है। विवेक अच्छा लड़का है। अच्छा खासा कमाता है। रेपुटेटेड फैमिली से है। तुम्हें खुश रखेगा। रही बात रेहान की तो वह प्यार नहीं अट्रैक्शन है जो कुछ दिनों में अपने आप ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए रेहान को भूल विवेक पर फोकस करो। वैसे भी मुझे कोई नाटक नहीं चाहिए", अविका के पापा ने समझाते हुए सख्त लहजे में कहा। अविका इसका मतलब जानती थी लेकिन फिर भी" पापा आप जानते हैं मैं रेहान से प्यार करती हूँ सिर्फ और सिर्फ रेहान से ,तो फिर शादी विवेक से कैसे"। " बहुत सुन ली तुम्हारी, बकवास । हमारे घर की लड़की और एक मुसलमान से शादी ? हिंदुओं में औरतों ने बेटे पैदा करना बंद नहीं कर दिया है, अभी बाँझ नहीं हुई है हमारे धर्म की औरतें। और तुम पर जो इश्क का भूत सवार है, दो दिन भी नहीं लगेंगे इसे उतरने में । जब जिंदगी की सच्चाई से सामना होगा तब किसी का इश्क काम नहीं आएगा । और अगर लवमैरिज करके इतिहास में नाम लिखवाने की इतनी ही इच्छा है तो किसी अपने धर्म के लड़के से करो ,"अविका के पापा ने गुस्से में कहा। " प्यार कोई पिज़्ज़ा नहीं है कि k.f.c. का नहीं मिला तो दूसरा ले लो,"अविका ने उतने ही गुस्से में जबाब दिया । अविका के पापा का गुस्सा सातवें आसमान को छू गया। उनके एक तमाचे से अविका पलंग पर जा गिरी। "बहुत लाडली हो इसीलिए इतनी हिम्मत कर सकी हो............क्या तुम्हें रेहान जिन्दा अच्छा नहीं लग रहा है,"  बस इतना कह अविका के पापा बाहर चले गए। और पीछे रह गई अविका अपनी सिसकियों के साथ। वह इतनी कमजोर नहीं थी लेकिन वह जानती थी रेहान के लिए अपने प्यार को। वह जानती थी पापा और उनकी अप्रोच को। वह जानती थी उनकी पावर को। वह जानती थी उनके सिद्धान्त और उसूलों को। वह जानती थी उसूलों से बाहर जाने वालों के हश्र को। वह जानती थी उसूलों को बनाये रखने के पागलपन को।

विवेक और अविका की सगाई हो गई और अगले महीने शादी। इन सब घटनाओं ने अविका को एक जिन्दा लाश बना दिया । एक हंसती खिलखिलाती, बिंदास लड़की बिल्कुल चुप, गुमसुम। न कोई इच्छा, न आशा । कॉलेज तो कब का छोड़ दिया। जो 24 घंटे एफ बी,ट्विटर,व्हाट्सएप्प पर ऑनलाइन रहती आज उसका वहाँ अकॉउंट तक नहीं । न कोई कॉल लेना न किसी मैसेज का जबाब देना । एक बार तो सोचा सुसाइड कर ले पर फिर रेहान की सोच इरादा बदल लिया । कुछ खास डिसीजन ले लवी के साथ कॉलेज पहुँच गई अपने पहले अवतार में । वहाँ भी रेहान को इग्नोर करती रही। कुछ देर तो रेहान झेलता रहा लेकिन आख़िरकार वह फट पड़ा। "आखिर ऐसी क्या बात हो गई जो इतने दिन से नाराज हो,व्हाट्सएप्प,एफबी,ट्विटर, जी मेल सभी जगह से गायब। न कॉल अटेंड कर रही हो ,न मैसेज का रिप्लाय कर रही हो । यहाँ तक गूगल से तो बात कर सकती हो पर मुझसे नहीं, आखिर ऐसा क्या हो गया है," रेहान गुस्से में अविका के कन्धों को जोर से हिलाते हुए बोला । अविका ने खुद को रेहान की गिरफ्त से बाहर निकाला और उस से मुंह फेर खड़ी हो पहले से रटी बातें कहने लगी," देखो रेहान हम दोनों काफी दिनों से साथ थे पर मुझे कुछ दिनों से रिलाइज हुआ कि मैं तुम्हारे साथ खुश नहीं हूँ । हम दोनों कभी भी लाइफपार्टनर नहीं हो सकते । तुम में बचपना भरा पड़ा है और मुझे मेच्योर लड़के पसंद हैं। कुछ दिन पहले मेरी मुलाकात विवेक से हुई और पहली ही नजर में उसे दिल दे बैठी । अब तो उसके बिना एक एक पल मुश्किल लगता है । वैसे इंतजार लंबा नहीं है अगले ही महीने शादी है हमारी । तुम आओगे तो मुझे अच्छा लगेगा", । रेहान की तरफ देखे बिना ही अविका वहाँ से चली गई। नहीं देख सकती थी रेहान को टूटते हुए। कितना मुश्किल था ये सब उसके लिए। काश वह कह पाती कि उसके बिना एक एक पल मुश्किल है। काश इस इंतजार का भी कभी एन्ड होता। पता नहीं इन सच्चे प्रेमियों के बीच में क्या होता है । आँखों से देखी और कानों से सुनी बात पर भी यकीन नहीं करते । ऐसा ही था अविका और रेहान के बीच , रेहान का दिल अविका की किसी भी बात को सच मानने के लिए तैयार ही नहीं था। आखिर उसने सच्चाई पता कर ही ली और हजारों खतरे लेते हुए पहुँच गया अविका के कमरे में। "मैं सब जानता हूँ अविका, तुम्हें और झूठ बोलने की जरुरत नहीं है। हम कहीं दूर चले जायेंगे, बहुत दूर । नहीं रहना ऐसे समाज में जहाँ प्यार को ही न समझ सके कोई ,"रेहान ने अविका का हाथ पकडे हुए कहा। इस छुअन में कुछ ऐसा था कि अविका और नाटक न कर सकी और रोते हुए रेहान के गले लग गई । काफी देर रोने के बाद जब वह नार्मल हुई तो उसने पूरी बात रेहान को कह सुनाई। "काश ऐसा हो सकता रेहान। काश हम भाग सकते। पापा की मुस्लिमों से नफरत मेरे लिए प्यार से कई गुना ज्यादा है। हम दुनियाँ के किसी भी कोने में क्यों न छुप जायें वह हमें खोज ही लेंगे। वो हमें नहीं छोड़ेंगे। इसलिए हमारा अलग रहना ही बेहतर है। अलग रह कर अपने प्यार को तो जिन्दा रख पाएंगे"। इतना कह कर अविका सिसकियाँ लेने लगी क्योंकि वह जानती थी लास्ट की लाइन के पीछे का दर्द और झूठ। दोनों काफी देर तक सिर से सिर लगाये एक दूसरे को तसल्ली देते रहे । लेकिन आँखों से आंसू बहना बंद ही नहीं हुए। "अगर अल्लाह को यही मंजूर है तो यही सही । तुम्हारी शादी में शामिल होने जरूर आऊंगा," रेहान इतना कहकर चला गया ।

"अविका,अविका .... ओपन द डोर,"लवी कमरे के गेट को थपथपाए जा रही है।लवी की आवाज सुन अविका प्रेजेंट में लौट आई। उसने आँशु पोंछ गेट खोल दिया । लवी की साँस भूली हुई है। "अविका तुझे नीचे चलना चाहिए," और अविका का आंसर जाने बिना ही उसे हाथ पकड़ नीचे खींच ले गई । यह रेहान था,जो पापा को कन्वेंस करने की कोशिश कर रहा था। अविका दौड़ती हुई रेहान के पास पहुँच गई। "रेहान तुम पागल हो गए हो क्या ? यहाँ क्या कर रहे हो ?जाओ यहाँ से जल्दी, गो........,"एकदम घबराई और बदहवास जोर से चिल्लाई। अविका के पापा और उसके भाइयों को यह नागवार गुजरा । सभी रेहान की तरफ लपके। अविका बिजली सी फुर्ती से रेहान के आगे अपनी कनपटी पर रिवॉल्वर रखे खड़ी हो चिल्लाई," अगर किसी ने एक कदम भी आगे बढ़ाया तो मैं खुद को यही ख़त्म कर लूँगी , रुक जाओ सभी । रेहान तुम जाओ यहाँ से । किसी अच्छी सी सेफ जगह पर चले जाना । हमारा साथ यही तक था "।रेहान ने भी अपने कपड़ों में छिपी रिवॉल्वर निकाल ली। "नहीं अविका , मैं नहीं जा सकता । तुम्हारे बिना जीने की तो मैं सोच भी नहीं सकता। सोचा था तुम्हारी बिदाई के बाद खुद को ख़त्म कर लूँगा । पर अब तो पहले ही आर -पार की कंडीशन बन गई है"। " पापा ,शायद आप इस प्यार को समझ पाते। शायद उसूलों के लिए आपका जूनून कम हो पाता। शायद खून के लाल रंग को आप समझ पाते। सोचा था रेहान के जाने के बाद सब ख़त्म करूँ ,पर अब तो सब बिगड़ गया,"अविका बोली। दोनों जानते थे यहाँ से बचकर जाना नामुमकिन है। ऑनर किलिंग यहाँ भी तय है। दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया। "आप लोगों के हाथों मरने से अच्छा है एक दूसरे के हाथों ही मर जायें",दोनों चिल्लाये। "हमारी एक एक साँस पर एक दूसरे का हक़ है सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे का"। फिर दो गोलियाँ चली , एक दूसरे के लिए और सब ख़त्म। दोनों की लाशें अब भी एक दूसरे का हाथ थामे हैं मानो जिद्द कर रही हों अपने इश्क को मुकम्मल करने की ।

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कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,659,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,703,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,186,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: कहानी / इश्कबाज / सुमन त्यागी ‘आकाँक्षी’
कहानी / इश्कबाज / सुमन त्यागी ‘आकाँक्षी’
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