मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

अमरपाल सिंह ‘ आयुष्कर ’ की कविताएँ


अमरपाल सिंह ‘ आयुष्कर ’


1-बतासे
 
कहाँ गए बतासे .... ?
चासनी उतार गए तरासे 
कहाँ गए बतासे..... ?
गुस्साई गर्मी मे पानी डुबाके
कितना स्वाद बिछाते
कहाँ गए बतासे ....?
अभी - अभी पता चला है, बतासे कम बनते हैं अब
बनते भी हैं तो सस्ते हो गए हैं अब ....
रिश्तों की मिठास की तरह
सुना है ! अब सस्ती चीजें खाने से शरमाते हैं लोग .....
इसीलिए तो बतासे लेकर आने वाले मेहमानों से, कतराते हैं लोग ....|


   2 - रिश्ते 

इस तरह भी हम रिश्तों को जी लेतें हैं
एक दो  मिस्स्ड काल , या मेसेज
फेसबुक पर तस्वीरों को लाइक कर देतें हैं ....
पुराने एलबम से चिपकी नम तस्वीरें निकाल बाहर
पलों को जबरन लौटाने की कोशिश
और फिर खट्टी- मीठी यादों को देख
तस्वीरों से ही  बतिया लेतें हैं ..
इस तरह भी हम रिश्तों को जी लेतें हैं
बहुत दिनों बाद मिले , कहो कैसे हो ?
हो गए हो मोटे थोड़े - से
काम तो नहीं , कोई जरूरी
समय हो तो अगर !
कोई उनीदी - सी शाम बैठे -बिठाये
दो कप चाय और थोड़ी चटर – पटर
एक पल में भी
सदियों  की मिठास भर लेते हैं
इस  तरह भी हम रिश्तों को जी लेते हैं
जिक्र चलता जब भी  कहीं रिश्तों का
नम आँखों से मुस्कुरा , खूबसूरत रिश्तों को मन में उतार
 हम भी  
कहकहों मे  शामिल हो लेते .......................
इस  तरह भी हम रिश्तों को जी लेते हैं |


3-  आँसू ने जन्म लिया होगा

तप-तप के मन के आंगन ने , चटकी दरार का रूप लिया
सावन का बदल फेरे मुंह ,  चुपके से निकल दिया होगा
गहरी दरार फिर भरने को , आँसू ने जन्म लिया होगा
दो बोल तिक्त मीठे पाकर , सहमा होगा उछला होगा
फिर उमड़ घुमड़ उन बातों ने , बादल का रूप लिया होगा
तपते होंठों पर बूंदों ने , हिमकन - सा काम किया होगा
मन की ......
कोई अपना टूटा सपना , तो कभी पराये दर्द लिए
मन का आंगन पूरा –पूरा , मिट्टी से लीप दिया होगा
गहरी दरार फिर भरने को , आँसू ने जन्म लिया होगा

उलझी –सुलझी रेखाओं के , भ्रम से सहमा जब मन होगा
स्नेह भरा दीपक बनकर , रातों का साथ दिया होगा .


4-  रे मन तू

रे मन तू सबकी लिख जाना !
धूप झोपड़ी / छांव महल की
शब्द रहट  के / गीत चहकते
रे मन तू सबकी लिख जाना !

चिथड़ा आंचल / रेशम , मलमल
भीत दरकती / ईंट के जंगल
रे मन तू सबकी लिख जाना !
मौत की चीखें / गीत जन्म के
विदा के आंसू / चैन  मिलन के
रे मन तू सबकी लिख जाना !
रूखे टुकड़े  / मखनी दाल
बहता पानी  / सूखे ताल
रे मन तू सबकी लिख जाना !
चन्दन तुलसी / भजन प्रभू का
मस्त कबीरे  की साखी – सा
रे मन तू सबकी लिख जाना !



5- अजन्मा कर्ज़दार

जान  गयी हूँ माँ !
मरना नियति है मेरी
और मुझे मारना , तुम्हारी मजबूरी
पर मैं नहीं चाहूंगी
मेरी हत्या तुम्हे अभिशप्त करे
ये भी नहीं चाहती माँ
होना पड़े तुम्हे लगातार चौथी बार
पदाक्रांत
बेटी हूँ , जानती हूँ ,
नहीं हूँ तुम्हारे प्रत्यर्थ
पर हूँ आज इतनी समर्थ
तीन माह के जीवनदान के बदले
चुका सकती हूँ ममत्व का क़र्ज़
अपने नन्हे कोमल हांथों - से
करके अपना आत्मोसर्ग !



6- मृदुल याचना


मैं भी आना चाहती हूँ संसार में
पीना चाहती हूँ , ममत्व की बूँद
पाना चाहती हूँ - पिता का दुलार , भैया का प्यार
कुछ पल की साँसें ,  कुछ पल का आगार
क्या मुझे दोगी माँ ?
देखना चाहती हूँ अखिल ब्रम्हांड में ,  पूजनीया नारी की गरिमा
कुछ पल के लिए आँखे , कुछ पल का आभार
क्या मुझे दोगी माँ ?
खेलना चाहती हूँ , जीवन संघर्ष की  द्यूतक्रीड़ा
जीतना , हारना , बनना , बिखरना
कुछ पल के लिए पाँव , और कुछ पल का अधिकार
क्या मुझे दोगी माँ ?
पढना चाहती हूँ  , मानव मन का रहस्य
कुटिलता , कलुषता , द्वेष , पाप
प्रेम , दया , ममता , पुन्य का पाठ
कुछ पल की जुबान , कुछ पल का आराम
क्या मुझे दोगी माँ ?
बनना चाहती हूँ सीता , सती , शक्ति और कल्पना ,
छूना चाहती हूँ धरा और आकाश
एक घर , एक प्यार , एक संसार ,
कुछ पल का अवसर और सम्मान
क्या मुझे दोगी माँ ?


7- इंतज़ार
जब मेरा इंतज़ार करते - करते ,
तुम्हारी आँखे चमक उठें तो - समझ लेना तुम्हारे प्रेम का अस्तित्व है
जब आँखे थक जाएँ तो - प्रेम का पड़ाव समझ ठहर जाना
जब भी इंतज़ार करते – करते भर आयें तो - प्रतीक्षा का चरणामृत मान पी लेना
और जब पथरा कर बंद होने लगें तो -
इसे अपने अटल प्रेम का , निश्छल सत्य मान मुस्कुरा देना |


8- भूख
भूख ऐसी आँख है जो
ना शहर , ना गाँव
ना धूप , ना छाँव
ना पहाड़ , ना खाई
ना पीर , ना सांई
कुछ नही देखती

ना छोटा , ना बड़ा
ना खोटा  , ना खरा
ना यौवन , ना जरा
ना दिन , ना रात
ना धरम , ना जात
ना ऊंच , ना नीच
ना तनहा , ना बीच
महसूस ही नही करती

ना बाप , ना भाई
ना बहन , ना माई
ना अपनी , ना परायी
ना मातम , ना शहनाई
पहचानती ही नहीं ,
देखती है , सोचती है , महसूसती है , पहचानती है
सिर्फ गहराई  अपने अहसास की
और नापती है इंसानियत का कद
कितना उठा , कितना गिरा
धरती का कलेजा चीरकर , उसके बोने और रोटी बनने तक !


9- आस्थाकलश

भावना का  आस्थाकलश जब टूटता है
विश्वास का जल मैला हो जाता है
प्रेम का दीपक बुझ जाता है
मोह  का अश्रु रीत जाता है
एकत्व  का यव बिखर जाता है
शुभता का अक्षत गल जाता है
अपनत्व का पल्लव सूख जाता है
पवित्रता का गोमल पंकिल हो जाता है
परन्तु
कहीं कोई शोर नही ,कोई अपशकुन नही ,कोई आवाज़ नही
शायद अंतर्मन का कलश टूट जाने पर
आत्मा  हो जाती  - एकदम मौन
जो अप्रत्याशित सत्य को स्वीकार नही पाती |


10 –दीदी

आज चौथी बार तिरस्कृत होकर लौटी
दीदी की तस्वीर
बाबूजी के जूते ,  अम्मा  की सांसें
भैया के सपने , छुटकी के खिलौने
और मेरी ख़ुशी , एक बार फिर
दीदी के हाथों की लकीरों  - सा कट गए
बाबूजी की जेब का हल्कापन
सभी दिलों को भारी कर गया
दीदी का घरोंदा
हल्केपन के भार से दब गया
पर ,
दीदी फिर घरोंदे बनायेगी
विश्वास की नीव डालेगी
आशा के दीपक जलायेगी
एक गुड़िया सजायेगी , प्यार करेगी , बियाहेगी
पर ,
दीदी की भीगी आँखे , ढलती साँसे और सूनी माँग देख
क्या गुड़िया ससुराल जायेगी ?



11- इंतज़ार
बाज़ार गयी बेटी
माँ की साँसें बाप की इज्ज़त
गठिया ले गयी फटे दुपट्टे के कोने में
कभी  भी फट सकता है दुपट्टे का कोना
बाज़ार की बिरानी में
डर है कहीं खुल ना जाये दुपट्टे की गाँठ ! शायद
इसीलिए सहमी है ,दरवाज़े पर टिकी  माँ की  साँसें
और बाप की आँख ..........................


12– सबूत

एक रात बाहर गुज़ार लौटी लड़की
अग्निपरीक्षा हेतु चक्षुकुण्ड ले दौड़ी
सारे मुहल्ले की आँखें
गुजरी रात का सच भी
ना  बचा सका उसे
कैसे बताये सुनसान रास्ते पर बिगड़ी बस में !
कितनी देर देती रही अग्निपरीक्षा
अवध हो या लंका
हर हाल में देना पड़ता है
भरमाई आँखों को सबूत अपने होने का |



13-कितने सवालों का हल…..


कितने सवालों का हल ,माँग रही जिन्दगी
पास और फ़ेल की तख्ती, टांग रही ज़िन्दगी
उजली हँसी के सहमे प्याले
मन की दहलीजों पर ताले
रिश्तों के ठंडे अलाव से
भीगी –भीगी आंच उठा के
कोहरे की सिमटी चादर ले
काँप रही जिन्दगी
कितने सवालों का हल , माँग रही जिन्दगी
पास और फ़ेल की तख्ती, टांग रही ज़िन्दगी

मनबीती किस ठौर रोप के
किन आँखों को भला टोक दे
सतरंगी सपनों के धागे
तुतले पल उलझा कर भागे
साँसों की रफ़्तार को कैसे
नाप रही ज़िन्दगी

कितने सवालों का हल ,माँग रही जिन्दगी
पास और फ़ेल की तख्ती, टांग रही ज़िन्दगी

देख उमीदों का ज्वार बड़ा है
किस अवसर की ताक़ पड़ा है
आकाशगंगा तेरे हँसी की
छूने को हर हाथ अड़ा है
हरपल को मोती सरीखा
टांक रही ज़िन्दगी
कितने सवालों का हल ,माँग रही जिन्दगी
पास और फ़ेल की तख्ती, टांग रही ज़िन्दगी


15 -संसार में उसको आने दो ..........

संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो
हर दौर गुजरकर देखेगी
खुद फ़ौलादी बन जाएगी
संस्कृति सरिता -सी बन पावन
दो कुल मान बढ़ाएगी
आधी दुनिया की खुशबू भी
अपने आँगन में छाने दो
संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो

तुम वसुंधरा दे दो मन की
खुद का आकाश बनाएगी
इतिहास रचा देगी पल –पल
बस थोड़ा प्यार जो पाएगी
हर बोझ को हल्का कर देगी
उसको मल्हार - सा गाने दो
संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो


उसका आना उत्सव होगा
जीवन – बगिया मुस्काएगी
मन की घनघोर निराशा को
उसकी हर किलक भगाएगी
चंदामामा की प्याली में
उसे पुए पूर के खाने दो
संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो

जाग्रत देवी के मंदिर- सा
हर कोना , घर का कर देगी
श्रध्दा के पावन भाव लिए
कुछ तर्क इड़ा - से ले लेगी
अब तोड़ रूढ़ियों के ताले
बढ़ खोल सभी दरवाजे दो

संसार में उसको आने दो
हक़ उसे भी अपना पाने दो |



16 - बेटियां मेरे गाँव की .....

बेटियां मेरे गाँव की.....
किताबों से कर लेतीं बतकही
घास के गट्ठरों में खोज लेंतीं
अपनीं शक्ति का विस्तार
मेहँदी के पत्तों को पीस सिल-बट्टे पर
चख लेंतीं जीवन का भाव
सोहर ,कजरी तो कभी बिआहू ,ठुमरी की तानों में
खोज लेतीं आत्मा का उद्गम
भरी दोपहरी में , आहट होतीं छाँव की
बेटियाँ , मेरे गाँव की..........................

द्वार के दीप से ,चूल्हे की आंच तक
रोशनी की आस जगातीं
पकाती रोटियाँ, कपड़े सुखातीं ,
उपले थाप मुस्कुरातीं
जनम ,मरण ,कथा ,ब्याह
हो आतीं सबके द्वार ,
बढ़ा आतीं रंगत मेहँदी, महावर से
विदा होती दुल्हनों के पाँव की
बेटियाँ मेरे गाँव की ...........................

किसके घर हुए ,दो द्वार
इस साल पीले होंगे , कितने हाथ
रोग -दोख ,हाट - बाज़ार
सूंघ आतीं ,क्या उगा चैत ,फागुन , क्वार
थोड़ा दुःख निचोड़ ,मन हलकातीं ,
समेटते हुए घर के सारे काज
रखती हैं खबर, हर ठांव की
बेटियाँ मेरे गाँव की ................................
जानतीं - विदा हो जायेंगी एक दिन
नैहर रह लेगा तब भी , उनके बिन
धीरे –धीरे भूल जातें हैं सारे ,
रीत है इस गाँव के बयार की
फिर भी बार - बार बखानतीं
झूठ – सूठ बड़ाई जंवार की
पैदल भी चली आती हैं
बाँधने दूर से ,डोरी प्यार की
भीग जातीं ,सावन के दूब –सी
जब मायके से आता बुलावा
भतीजे के मुंडन , भतीजी की शादी ,
गाँव के ज्योनार, तीज ,त्यौहार की
भुला सारी नीम - सी बातें
कितनी रातें बिना ,सोये गुजारतीं
ससुराल के दुखों को निथारतीं
मायके की राह , लम्बे डगों नापतीं
चौरस्ता ,खेत –खलिहान ,ताकतीं
बाबा ,काकी ,अम्मा, बाबू की बटोर आशीष
पनिहायी आँखों , सुख-दुःख बांटतीं
कालीमाई थान पर घूमती हुई फेरे
सारे गाँव की कुसल - खेम मांगतीं
भोली , तुतली दीवारों के बीच नाचतीं
समोती अपलक उन्हें ,बार –बार पुचकारतीं
चमक जातीं, छलकी आँखे
फलता- फूलता देख बाबुल का संसार
दो मुट्ठी अक्षत ,गुड़ ,हल्दी, कुएं की दूब से
भर आँचल अपना , चारों ओर पसारतीं
बारी –बारी पूरा गाँव अंकवारती
दुआएं उनकी ,पतवार हैं नाव की
बेटियाँ मेरे गाँव की .....................\


17- बेटियाँ

पूरा घर एक पैरों नाप आती ......
बाबा की फटकार
भाई की दुत्कार
अम्मा की पुकार पर बार –बार
भागती
बातें सब की , गाँठ बांधती जाती
पूरा घर एक पैरों नाप आती ......
सारे किस्से बाँध आँगन के
साथ ले जाती
दो मुट्ठी चावल में सारा संसार पाती
विदा होते बाबुल की देहरी से
अपनी कहाँ रह जाती
लौटते पाँव
बचपन के ठांव
हर कदम रखने से पहले
काँप जाती ........... क्योंकि
अब पूरा घर एक नजरों से नाप आती .
-
परिचय

जन्म :    1  मार्च
ग्राम- खेमीपुर, अशोकपुर , नवाबगंज जिला गोंडा , उत्तर - प्रदेश           
दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान ,कादम्बनी,वागर्थ ,बया ,इरावती प्रतिलिपि डॉट कॉम , सिताबदियारा ,पुरवाई ,हमरंग आदि में  रचनाएँ प्रकाशित 
2001  में  बालकन जी बारी संस्था  द्वारा राष्ट्रीय  युवा कवि पुरस्कार  
2003   में  बालकन जी बारी -युवा प्रतिभा सम्मान 
 आकाशवाणी इलाहाबाद  से कविता , कहानी  प्रसारित
‘ परिनिर्णय ’  कविता शलभ  संस्था इलाहाबाद  द्वारा चयनित
मोबाईल न. 8826957462 mail- singh.amarpal101@gmail.com

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