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यक्ष के प्रश्न ओर उनके उत्तर / यशवन्त कोठारी

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एक बार एक ब्राह्मण वन में विचरण कर रहे पांडवों के पास आया और कहने लगा-''हे क्षत्रिय वीरों ! मेरे पास दो लकड़ियाँ थीं, जिन्हें एक मृग उठाकर ले गया है, और इस कारण मेरे यज्ञ का काम रुक गया है । अतः कृपया मुझ ब्राह्मण पर दया करके उस मृग से मेरी लकड़ियाँ वापस ला दें ।''

शरणागत ब्राह्मण के वचन सुनकर पाँचों पांडव अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर के साथ उस मृग की तलाश में निकल पड़े । काफी देर तक इधर-उधर भटकने के बाद भी वे मृग को नहीं ढूँढ पाए । वे दौड़ते-दौड़ते थक गए और एक वृक्ष के नीचे जंगल में विश्राम करने लगे । रास्ता भी अनजान था, वे रास्ता भटक गए ।

पाँचों पांडवों का प्यास के मारे बुरा हाल था । तब युधिष्ठिर ने सबसे छोटे भाई नकुल से कहा, '' तुम जाकर किसी जलाशय की खोज करो । स्वयं भी जलपान कर अपनी प्यास बुझाना और हम लोगों के लिए भी किसी पात्र में जल भर लाना ।''

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नकुल ने बड़े भाई की आज्ञा का पालन किया और एक दिशा में जल की खोज हेतु निकल पड़ा । चलते-चलते उसे एक जलाशय दिखाई पड़ा जिसका पानी स्वच्छ था । जल देखकर वह प्यास बुझाने हेतु आगे बढ़ा । वह पानी पीना ही चाहता था कि आकाशवाणी हुई-''नकुल ! तुम पानी पीना चाहते हो, लेकिन रुको । सबसे पहले तुम्हें मेरे प्रश्नों का उत्तर देना होगा । यदि बिना उत्तर दिए तुमने जल पिया तो तुम्हारी तत्काल मृत्यु हो जाएगी ।'' नकुल ने आकाशवाणी की ओर ध्यान नहीं दिया और जल पीने की कोशिश की, परिणामस्वरूप उसकी तत्काल मृत्यु हो गई ।

जब काफी समय तक नकुल नहीं लौटा तो युधिष्ठिर ने सहदेव को नकुल की खोज में भेजा । सहदेव भी उसी जलाशय के पास पहुँचा और जल पीने का प्रयास करने लगा । वही आकाशवाणी हुई; सहदेव ने आकाशवाणी पर कोई ध्यान नहीं दिया और वह भी जल पीने के प्रयास में मृत्यु को प्राप्त हुआ ।

जब सहदेव भी वापस नहीं लौटा तो धर्मराज युधिष्ठिर ने धनुर्विद्या में प्रवीण अर्जुन को भेजा । अर्जुन भी सहदेव की गति को प्राप्त हुआ । इसी प्रकार भीम भी उसी जलाशय पर आकर जल पीने के प्रयास में मृत्यु को प्राप्त हुआ ।

तब धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत व्याकुल होकर अपने प्राणप्रिय भाइयों की खोज में निकल पड़े । जलाशय के पास आने पर युधिष्ठिर ने सुना-''वत्स युधिष्ठिर ! तुम्हारे भाइयों ने मेरे प्रश्नों के उत्तर देने से पूर्व ही पानी पीना चाहा था, और इसी कारण उनकी मृत्यु हुई है। यदि तुम भी मेरे प्रश्नों के उत्तर देने के पूर्व पानी पियोगे तो तुम्हारी भी मृत्यु हो जाएगी ।''

यह सुनकर युधिष्ठिर ने कहा-''यदि प्रश्नकर्ता मेरे सामने हो तो मैं उत्तर देने को तैयार हूँ ।'' तब धर्मराज जो पहले मृग तथा ब्राह्मण बने थे, अब एक विशाल यक्ष के रूप में उपस्थित हुए और युधिष्ठिर से प्रश्न पूछने लगे । युधिष्ठिर ने शांतिपूर्वक प्रश्नों का उत्तर दिया ।

प्रश्न - सर्वोत्तम धन क्या है ?

उत्तर - शास्त्रीय ज्ञान (विद्या) ही सर्वश्रेष्ठ धन है ।

प्रश्न - दया किसे कहते हैं ?

उत्तर - सभी के सुख की इच्छा ही दया है ।

प्रश्न - किसके साथ की गई मित्रता व्यर्थ नहीं होती ?

उत्तर - सत्पुरुषों के साथ की गई मित्रता नष्ट नहीं होती ।

प्रश्न - दुर्जेय शत्रु कौन है ?

उत्तर - क्रोध दुर्जेय शत्रु है ।

प्रश्न - पृथ्वी से भारी क्या है ?

उत्तर - माता का गौरव पृथ्वी से भारी है ।

प्रश्न - जीवित कौन है ?

उत्तर - जो यशस्वी है ।

यक्ष अपने प्रश्नों के समुचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए और कहने लगे, '' अब तुम जल पीकर संतुष्ट हो जाओ । इसके अलावा मैं तुम्हारे किसी एक भाई को जिंदा कर दूँगा । बोलो, किसे जीवित करूँ ?''

युधिष्ठिर ने नकुल का नाम लिया तो यक्ष ने पूछा-''महापराक्रमी भीम और धनुर्धारी अर्जुन के बजाय तुमने नकुल का नाम क्यों लिया ?''

तब युधिष्ठिर ने कहा-'' मेरी दो माताओं में से माँ कुंती का एक पुत्र मैं जीवित हूँ, और माँ माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहना चाहिए, अतः आप कृपा करके नकुल को जिंदा कर दें । ''

इस उत्तर से यक्ष बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी भाइयों को जीवनदान दिया।

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यशवन्त कोठारी

86,लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर 302002 फोन .9414461207

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