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शब्द संधान / देश राग / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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शास्त्रीय संगीत की राग-रागनियों में एक राग ‘देश-राग भी है। लेकिन हम यहाँ किसी राग की बात नहीं कर रहे हैं। हम तो केवल शब्द, ‘देश’ की चर्चा करेंगे। फिलहाल यही हमारा देश-राग है।

‘देश’ एक बहुआयामी शब्द है। कम से कम तीन अर्थों में इसका प्रयोग किया जाता है। सर्व प्रथम इसका अर्थ ‘दिक्’ से है। यों तो दिक् दिशा को भी कहे हैं किन्तु अपने पारिभाषिक अर्थ में यह सर्वत्र व्याप्त वह अवकाश है जिसमें दिखाई देने वाली सारी वस्तुएं व्यवस्थित हैं। हम वस्तुओं को दूर या पास, यहाँ या वहाँ, सिर्फ इसलिए कह सकते हैं कि वे दिक् में व्यवस्थित हैं। दिक् वस्तुओं को स्थान प्रदान करता है। दिक् न होता तो वस्तुएं कहाँ रह पातीं? अंग्रेज़ी में इसी दिक् को space (स्पेस) कहा गया है।

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देश का दूसरा अर्थ सामान्य रूप से किसी क्षेत्र या स्थान से है। लेकिन जब हम किसी ऐसे विशेष क्षेत्र या ऐसे किसी आबाद भू-खंड की बात करते हैं जिसमें लोग एक शासन पद्धति के अंतर्गत रहते हों, वह भी ‘देश’ ही कहलाता है। ‘मुल्क’ के इस अर्थ में ‘देश’ शब्द का सर्वाधिक प्रयोग होता है। अगर यह देश स्वशासित है तो यही ‘राष्ट्र’ कहलाने लगता है। सिर्फ एक मुल्क के अर्थ में ही नहीं राष्ट्र के अर्थ में भी शब्द ‘देश’ ही प्रयुक्त होता है। ज़ाहिर है, यदि देश है तो ‘स्वदेश’ भी है और ‘परदेस’(श) भी है। अपना देश स्वदेश है और दूसरों का देश परदेश या विदेश है। दूसरे देशों के लोग भी विदेशी (देशज, ‘बिदेसिया’) कहे जाते हैं। अपने देश से सभी को प्रेम होता है, इसी को ‘देश-भक्ति” कहते हैं। जो अपने देश में रह कर भी देश के प्रति वफादार नहीं होता वह ‘देश-द्रोही’ कहलाता है। देश का शासक ‘देशाधिपति’ या ‘देशाधीश’ कहलाता है। अपने देश के लोगों को प्रेम करने वाला ‘देश बंधु’ कहा जाता है और देश को नेतृत्व प्रदान करने वाला ‘देश-मुख’ होता है। भारत में कई लोगों के नाम तक ‘देश-बंधु’ और ‘देशमुख’ मिल जावेंगे। साहित्य में देश की गौरव-गाथाओं का खूब वर्णन किया जाता है। सिनेमा और उसके गीतों तक में देश-प्रेम को अभिव्यक्त किया गया है। देश प्रेम के अनेक गीत गाए गए हैं और वे खूब प्रचलित भी हुए हैं। “मेरे देश की धरती सोना उगले”, “ये देश हसीन जवानों का” इत्यादि।

देश को लेकर हिन्दी में कई मुहावरे भी हैं। ‘देश–ब-देश फिरना’ एक देश से दूसरे देश की यात्रा करते रहना है। ‘देश–विदेश घूमना’ कभी अपने देश की तो कभी पराए-देशों (विदेशों) में सैर करना है। ‘देश निष्कासन’ होना या करना दंड स्वरूप ‘देश निकाला’ है। ‘देशाटन’ पर्यटन है।

संगीत की कई राग-रागिनी देश शब्द से जुडी हुई हैं। ‘देश-राग’ तो है ही, ‘देशाख राग’ और ‘देशाखी’ एक रागिनी भी है जो बसंत के दिनों में दोपहर के समय गाया / गाई जाती है। सांगीतिक रागों में देश शब्द कैसे जुड़ गया, कहा नहीं जा सकता क्योंकि इनमें नाम के अतिरिक्त देश संबंधी कोई भी सन्दर्भ नहीं है।

किसी भी शब्द में ‘उप’ उपसर्ग गौणता का द्योतक होता है किन्तु ‘उपदेश’ का अर्थ किसी पराजित देश या श्रेष्ठता में किसी दूसरे दर्जे के गौण (जो प्रमुख न हो) देश से नहीं है। ‘उपदेश’ का एक अलग ही अर्थ है। इसका मतलब शिक्षा या हिदायत देने से है। यह एक बड़ी रोचक बात है कि “देशना” का अर्थ भी उपदेश या शिक्षा या निर्देश देने से ही है। आप उपदेशना कहें या देशना, बात एक ही है। इसी प्रकार आप देशक कहें या उपदेशक -अर्थ शिक्षक या मार्ग दर्शक से ही है। उपदेशित वह है जिसे उपदेश दिया गया हो उसे देशित भी कहा गया है। एक दिलचस्प बात यह भी है कि तर्जनी उंगली को ‘देशनी’ कहा गया है। शायद इसलिए कि हम निर्देशित, किसी वस्तु की ओर इशारा, उसी से करते हैं। ‘निर्देश’ में भी तो ‘देश’ उपस्थित है !

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---डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद – २११००१

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