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''इक्कीसवीं सदी के आदिवासी हिंदी उपन्यास'' / डॉ. गोरख प्रभाकर काकडे

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इक्कीसवीं सदी समाज, राजनीति, साहित्यादि की दृष्टि से निश्चित ही महत्वपूर्ण रहेगी। इस सदी के आरंभ में ही 'चेतना' ने समता, स्वातंत्र्य की पुरजोर मांग करना शुरू किया है। अब तक समाज-संस्कृति आदि की दृष्टि से हाशिये पर रहे जनसमुदाय प्रवाह में आने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। फिर वह दलित हो या आदिवासी और इनका पाथेय बना है साहित्य।

आदिवासी साहित्य पर जब हम विचार करते हैं तो निश्चित रूप से आदिवासी जनजातियों में जगा 'आत्मभान' हमारा ध्यान खींचता है। आज भारतीय स्तर पर आदिवासी साहित्य की चर्चा शुरू है। अनेक भारतीय भाषाओं में आदिवासियों की जीवन समस्या, जीवन संघर्ष और शोषण को लेकर साहित्य लिखना आरंभ हुआ है। यह साहित्य आदिवासियों की 'जल-जमीन-जंगल' से खदेड़ने की त्रासदी को डंके की चोट पर व्यक्त कर रहा है। आदिवासी साहित्य स्पष्ट कर रहा है कि हम यहाँ के मूल निवासी हैं और आज हमें ही निर्वासित किया जा रहा है।

आदिवासी साहित्य पर बात करने से पहले 'आदिवासी' इस संकल्पना को समझना आवश्यक हो जाता है। आदिवासी शब्द से स्पष्ट बोध होता है कि, जो पहले से यहाँ रह रहे हो, आदिवासी (आदि+वासी) रहे हो। इन्हें संविधान की पंचम् अनुसूची में 'जनजातियाँ' इस शब्द से परिभाषित किया है। साथ ही इन्हें वनवासी, आत्विका, गिरिजन, वन्यजाति या आदिमजाति भी कहा जाता है। इस संकल्पना पर प्रकाश डालनेवाली जेकब्स तथा स्टर्न की परिभाषा याद आती है । वे कहते हैं, ''एक ऐसा ग्रामीण समुदाय या ग्रामीण समुदायों का ऐसा समूह जिसकी समान भूमि हो, समान भाषा हो, समान सांस्कृतिक विरासत हो और जिस समुदाय के व्यक्तियों का जीवन आर्थिक दृष्टि से एक-दूसरे के साथ ओत-प्रोत हो, जनजाति कहलाता है।''१

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भारत में अनेक जनजातियाँ हैं, जिन्हें सात विभागों में बाटा जाता है - उत्तर, पूर्वोत्तर, पूर्वी, मध्य, पश्चिम, दक्षिण और द्विपीय क्षेत्र। आदिवासियों का अपना धर्म है, वे प्रकृति पूजक हैं। उनमें से कुछ लोगों ने हिंदू, ईसाई, बौद्ध एवं इस्लाम धर्म भी अपनाया है। भारत में प्रमुख रूप से भील, गोंड, संथाल, मीजी, असुर, न्यीशी, हो, गालो, मोमपा, तागीन, खामती, मेमबा, नाक्टे, कंजर, कबूतरा, आपातानी, मुंडा, सांसी, नट , मदारी, सँपेरे, दरवेशी, पासी, बोरी, समोड, कोल, पादाम, मिन्योंग, देववर्मा, रियाँग, नोवतिया, उचई, चाकमा, डोंबारी, कोली, पारधी, मीणा, आन्गे, गरसिया, सहरिया, लेपचा, थारू, उराँव, भवघूरा, बोंडा आदि जनजातियाँ आदिवास करती हैं, जिन्हें आदिवासी कहा जाता है। ऐसे अनेक आदिवासियों को केंद्र में रखकर भारतीय स्तर पर अनेक भाषाओं में साहित्य लिखा जा रहा है। जिसमें महाश्वेता देवी, बाबा भांड, भुजंग मेश्राम, विमल मिश्र, टे. शी. नेगी, सुरेश मिश्र, डॉ. विजय चौरसियाँ, सतीनाथ भादुडी, तिप्पेस्वामी, यू. आर. अनंतमूर्ति आदि साहित्यकार अपनी-अपनी ओर से योगदान दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में राष्ट्रभाषा कैसे पीछे रह सकती है।

हिंदी में आदिवासियों पर अनेक विधाओं में साहित्य सृजन का आरंभ हुआ है, भले ही वह अभी सशक्त न हो । साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में कथा साहित्य में लेखन का औसत कुछ जादा है और उसमें भी उपन्यास विधा सशक्त दिखाई देती है।

हिंदी आदिवासी उपन्यासों का जब अध्ययन करते हैं तो स्पष्ट होता है कि उपन्यासकारों ने उन पहलुओं को उजागर किया है, जिनपर अबतक किसी ने प्रकाश नहीं डाला था। हिंदी उपन्यासकार स्पष्ट करते हैं कि, आदिवासी यहाँ के मूल निवासी होकर भी उन्हें उपेक्षितों का जीवन जीना पड़ रहा है। उन्हें यहाँ की समाज व्यवस्था ने हाशिये पर रखकर आज भी आदिम रूप में जंगलों में रहने के लिए बाध्य किया है। उनतक मूलभूत सुविधाओं को भी पहुँचने नहीं दिया। यह जनजातियाँ आज भी वरुण, सिंगबोंगा जैसे देवताओं के चक्रव्यूह में फँसी गिरी-कंदाहरों में पीढी-दर-पीढी जीवन जी रही हैं। उन्हें औद्योगीकरण के नाम पर जल-जमीन-जंगलों से निर्वासित किया जा रहा है। ऐसी अनेक समस्याओं को हिंदी उपन्यासकारों ने उकेरा है और इन्हें हाशिये से निकालकर हम भी मानव हैं, हमें भी उतना ही हक है जितना यहाँ के गावों में, नगरों में रह रहे मानवों को है का संदेश आदिवासियों एवं अभिजात जातियों, धर्मों के लोगों को दिया है। मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं, ''कभी-कभी सडकों, गलियों में घूमते या अखबारों की अपराध-सुर्खियों में दिखाई देनेवाले कंजर, साँसी, नट, मदारी, सँपेरे, पारदी, हाबूडे, बनजारे, बावरिया, कबूतरे न जाने कितनी जनजातियाँ हैं जो सभ्य समाज के हाशिये पर डेरा लगाए सदियों गुजार देती हैं -हमारा उनसे चौकना संबंध सिर्फ काम चलाऊ ही बना रहता है। उनके लिए हम हैं 'कज्जा' और 'दिकू' यानी सभ्य सम्भ्रांत 'परदेसी' उनका इस्तमाल करनेवाले शोषक, उनके अपराधों से डरते हुए मगर अपराधी बनाये रखने के आग्रही ।''२ उपन्यासकार केवल आदिवासियों की जीवन समस्याओं, शोषण को ही नहीं उनके सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को, उत्सव, पर्व-त्यौहार, अंधविश्वास, आवास-निवास, रूढ़ि, परंपरा, आचार-विचार , संसाधन आदि को भी हमारे सामने रखते हैं।

इक्कीसवीं सदी में लिखे गये, आदिवासी हिंदी उपन्यासों पर चर्चा करने से पहले बीसवीं सदीं में लिखे आदिवासी जीवन केंद्रित हिंदी उपन्यासों पर दृष्टिक्षेप करना असंगत न होगा। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मुख्यतः आदिवासियों को हिंदी उपन्यासों में मुख्य रूप से स्थान मिला है। जिसमें इन उपन्यासों के नाम लिये जा सकते हैं। रथ के पहिए (देवेन्द्र सत्यार्थी - १९५२), कब तक पुकारूँ (रांगेय राघव-१९५८), सूरज किरण की छाँव (राजेन्द्र अवस्थी-१९५८), जंगल के फूल (राजेन्द्र अवस्थी-१९६९), जंगल के आस-पास (राकेश वत्स-१९८५), शैलूष (शिवप्रसाद सिंह-१९८६), धार (संजीव-१९९०), गगन घटा घहरानी (मनमोहन पाठक-१९९१), पाँव तले की दूब (संजीव-१९९५), जहाँ बास फूलते हैं (श्री प्रकाश मिश्र-१९९७), अल्मा-कबूतरी (मैत्रेयी पुष्पा-२०००), जंगल जहाँ शुरू होता है (संजीव-२०००), सावधान! नीचे आग है (संजीव-२०००) आदि ।

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लिखें इन उपन्यासों में करनटो, नटो, संथाल, उराँव, कबूतरा, मुंडा, गोंड, मिजो आदि जनजातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन के साथ-साथ उनपर हो रहे अन्याय-अत्याचार, शोषण, पिछड़ेपन को भी उपन्यासकारों ने अभिव्यक्त किया है, '' महाजनी और सामंती दखलंदाजी की मिसालें 'सावधान! नीचे आग है' तक पसरी हुई हैं। इसी तरह 'पाँव तले की दूब' में जनजातीय समाज की नवीनतम आकांक्षाओं और संघर्षों को वैज्ञानिक आलोड़नों के साथ उत्कर्षित किया गया है।''३ बीसवीं सदी के ये उपन्यासकार स्वतंत्रता के बाद सामंतवादी, अर्ध-सामंतवादी, पूँजीवादी व्यवस्था में फसें आदिवासियों की त्रासदी को प्रामाणिकता के साथ उजागर कर रहे हैं।

बीसवीं सदी के इन उपन्यासों की इस परंपरा को आगे बढानेवाले और आदिवासी शोषण के विरूद्ध आवाज बुलंद करनेवाले उपन्यास इक्कीसवीं सदी में लिखे गये हैं लिखे जा रहे हैं। इक्कीसवीं सदी के यह उपन्यास ग्लोबल गाँव के देवताओं, दिकू और कज्जाओं (उद्योजक , व्यापारी, पुलिस प्रशासक, राजनेता, पूँजीवादी) के शोषण को बडी संवेदनशीलता के साथ उजागर करते हैं । जो इस प्रकार हैं- आदिभूमि (प्रतिभा राय-२००२), काला पादरी (तेजिन्दर २००२), पठार पर कोहरा (राकेशकुमार सिंह-२००३), रेत (भगवानदास मोरवाल-२००८), धूणी तपे तीर (हरिराम मीणा - २००८), ग्लोबल गाँव के देवता (रणेन्द्र-२००९), अरण्य में सूरज (श्रीमती अजित गुप्ता-२००९), मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ (महुआ माजी - २०१२) आदि ।

प्रतिभा राय का 'आदिभूमि' यह उपन्यास उडीसा के आदिवासी 'बोंडा' जनजाति पर लिखा गया है। यह उपन्यास बोंडा के जीवन-व्यवहार, हिंसा, प्रतिहिंसा, प्रतिरोध, सरलता, लोकरूढि, लोकविश्वास, स्त्री-पुरूष संबंध, स्त्री शोषण आदि को सशक्त रूप में उजागर करता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इनके शोषण का सिलसिला जारी होने के सत्य को प्रतिभा राय उजागर करती हैं।

इस उपन्यास में सरकारी योजनाओं (इंदिरा आवास योजना, साक्षरता आदि) की धोखाधडी झूठ-फरेब, भ्रष्टाचार, स्त्रियों का यौन शोषण आदि को अभिव्यक्त किया है। उपन्यास में शिक्षा के प्रति आदिवासियों की रूचि बढ़े इसलिए मास्टर सीतानाथ के माध्यम से उपन्यासकार अपनी बात रखती हैं। आदिवासी इलाकों में समाज सुधार करना आसान नहीं है, क्योंकि कई लोगों के स्वार्थ वहाँ पर अटके हुए होते हैं । उनमें प्रशासक बी. डी. ओ., पुलिस, राजनेता, एम. एल. ए. जैसों का समावेश होने की बात उपन्यासकार करती हैं। उपन्यास का सीतानाथ, ''अपनी निष्ठा के बल पर इस जंगली झुंड को 'आदमी' बनाने पर तुला हुआ है।''४ किंतु अवसरवादी उनका तबादला दूसरी जगह कर देते हैं । इस प्रकार आदिवासी जीवन समस्याओं के साथ-साथ प्रकृति की सम्पन्नता को भी उपन्यासकार प्रतिभा राय उजागर करती हैं ।

तेजिन्दर का 'काला पादरी' मध्यप्रदेश की 'उराँव' जनजाति की समस्याओं को व्यक्त करनेवाला उपन्यास है। उपन्यासकार आदिवासियों का उपनिवेशिक व्यवस्था में फंसे होने का वास्तव सामने रखता है। साथ ही आदिवासी भूख, अभाव, दारिद्र्य, शोषण आदि से परेशान होकर ईसाई, हिन्दू, बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के ऐतिहासिक वास्तव की ओर भी संकेत करता है। आदिवासियों के भूख, अभाव और दारिद्र्य को व्यक्त करता हुआ वह लिखता है, ''साहब रात में बच्चा मर गया। उसकी माँ ने कई दिनों से कुछ खाया नहीं था। उसको गोद में लेकर उसकी माँ भी मर गयी। उसने भी कई दिनों से कुछ खाया नहीं था।''५ उपन्यास में भूख मिटाने के लिए जहरीली वनस्पतियाँ, बुटियाँ और बिल्लियों का मांस खाने का वास्तव सामने रखा, ''वास्तव में 'काला पादरी' उपन्यास में भारत के सर्वाधिक उत्पीड़ित व उपेक्षित आदिवासियों की जीवन स्थितियों के अनेक पहलुओं को लेखक ने समाजशास्त्रीय दृष्टि, किन्तु साथ ही लेखकीय संवेदना से इस ढंग से चित्रित किया है कि भारतीय समाज की जटिलता भी उभरकर सामने आती है और साथ ही आदिवासियों के जीवन की पीडा का मार्मिक अंकन भी लेखक की कलम से होता चलता है।''६ उपन्यास में ईसाई मतों के प्रचार-प्रसार की ओर भी ध्यान खींचा है।

'पठार पर कोहरा' झारखंड के 'मुंडा' आदिवासियों की करुण कथा है। राकेशकुमार सिंह ने आजादी के बाद भी आदिवासियों के जीवन समस्याओं का कोहरा न हटने की बात उपन्यास में की है। उपन्यास में साहू, बाबू और बंदूकधारी संस्कृति की पोल खोल दी है, जो अंग्रेजों के झारखंड छोड़ने पर शोषण का काम रहे हैं। उपन्यास की शुरूआत ही इस प्रकार हुई है,

''जंगल यहाँ से शुरू होता है

बहुत जहरीला होता है कौमनिष्ट दिकू....!''

'दीकू...यानी वह व्यक्ति जो जन्मना जंगल का वासी न हो

जो जंगल के बाहर का हो। गैर-आदिवासी हो। 'दीकू'...

यानी वह जो दिक्कत का कारण बने। दिक्कते पैदा करे।''...

बाघ, भालू, गीध, कौए और सियार से भी ज्यादा खतरनाक होता है दिकू । और उसमें भी

कौमनिष्ठ ।''७ उपन्यास में सरकारी योजनाओं के भ्रष्टाचार का भंडा-फोड़ किया है। राजीव गांधी की सरकारी योजनाओं के बारे में दस प्रतिशतवाली बात को उपन्यासकार आदिवासियों की योजनाओं में हो रहे भ्रष्टाचार के रूप में इस प्रकार व्यक्त करता है, ''आजादी के बाद आदिवासियों की कल्याण की सैंकड़ों योजनाएँ बनी हैं पर उनके क्रियान्वयन का क्या हुआ? आबंटित राशि का दस प्रतिशत भी देश के आदिवासियों तक नहीं पहुँच रहा है। कई योजनाएँ कागज पर चलती रहती हैं। कई योजनाएँ तो फाईलों की कब्र में ही दफन हो गयी... यदि अफसरशाही और राजनीति का यही तालमेल कायम रहा तो पता नहीं कितने समय तक आदिवासी समाज इसी तरह अपढ़, असंस्कृत, भूखा, नंगा, शोषित, उपेक्षित और लोकतंत्र के ज्ञान एवं वि-ज्ञान से कटा रहेगा।''८

प्रस्तुत उपन्यास में परेशानियों से घिरी एक लड़की की जद्दोजेहद भी है, नारी मुक्ति की आकांक्षा भी है और मुंडा जनजाति के शोषण, उत्पीड़न, अभाव, अन्याय-अत्याचार की वास्तविकताएँ भी हैं। यह उपन्यास केवल शोषण की बात ही नहीं करता तो शोषण के विरोध में आवाज भी उठाता है।

भगवानदास मोरवाल का 'रेत' उपन्यास हरियाना के 'कंजर' जनजाति के सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं को प्रस्तुत करता है। 'कंजर' अर्थात् काननचर याने जंगल में घूमनेवाले। यह कंजर अपने आप को 'माना गुरू' और 'माँ नलिन्या' की सन्तान मानता है।

प्रस्तुत उपन्यास एक ओर आदिवासी विमर्श की कृति है, तो दूसरी ओर आदिवासी स्त्री विमर्श की भी कृति है । सामान्य तौर पर कंजरों को (जरायमपेशा) चोरी करनेवाली जनजाति समझा जाता है। अंग्रेज सरकार ने इन पर कई बंधन डाल दिये थे जिसे उपन्यासकार ने थानेदार केसर सिंह के माध्यम से कहलवाया है। केसर सिंह कबीले के मुखिया से कहता है, ''यही की बिना इजाजत या इत्तिला दिए कोई कंजर गाँव छोड़कर नहीं जा सकता ...और जाता है तो मुखिया को इसकी जानकारी होनी चाहिए, जिसकी इत्तिला मुखिया को थाने में देनी होती है।''९ इनकी महिलाओं को भी थाने जाकर हाजरी देनी पड़ती है। घर के पुरूष जेल में या बाहर होने के कारण इन्हें मजबूरी वश वेश्या-व्यवसाय करना पड़ता है। इन्हीं बातों को उपन्यासकार ने बडी स्पष्टता से उपन्यास में रखा है।

उपन्यास में कंजरों के पुलिसों, अफसरों, प्रशासकों द्वारा हो रहे शोषण को व्यक्त किया है । साथ ही यह उपन्यास यौन सुचिताओं की सभी सीमाएँ तोड़ देता है ।

हरिराम मीना का 'धूणी तपे तीर' १७ नवम्बर, १९१३ के दिन घटित मानगढ (राजस्थान) की घटना पर आधारित है । इस घटना की ओर इतिहासकारों ने अनदेखा किया था । इस उपन्यास के माध्यम हरिराम मीना ने 'भीलो'-'मीनो' के ऐतिहासिक योगदान को उजागर करने की कोशिश की है । उपन्यास के केंद्र में हैं गोविंद गुरू का ऐतिहासिक योगदान । उपन्यास में उपन्यासकार ने स्पष्ट करने की कोशिश की है कि, कैसे गोंविद गुरू ने मीणों को संगठित किया, उनमें कैसी जागृति भर दी, उन्हें बलिदान के लिए कैसे तैयार किया । यही इस उपन्यास की कथावस्तु है ।

इस उपन्यास पर प्रकाश डालते हुए स्वयं उपन्यासकार लिखते हैं, ''देश का पहला 'जालियांवाला काण्ड' अमृतसर (१९१९) से छः वर्ष पूर्व दक्षिणी राजस्थान के बासंवाडा जिला के मानगढ़ पर्वत पर घटित हो चुका था जिसमें जालियांवाला से चार गुणा शहादत हुई थी ।''१० इतिहास से उपेक्षित घटना को न्याय दिलाने की उपन्यासकार की कोशिश निश्चित रूप से स्तुत्य है ।

रणेन्द्र का उपन्यास 'ग्लोबल गाँव के देवता' झारखंड के 'असुर' जनजातियों के शोषण, विस्थापन को उजागर करता है । आज वैश्वीकरण के इस युग में एक ओर हम विकास कर रहे हैं तो दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों का अमर्याद उपयोग करके प्रकृति को दूषित कर रहे हैं । वहाँ के आदिवासिओं, वनवासियों को उनके जंगलों से खदेड़ रहे हैं । इसी अमानवीय बातों को रणेन्द्र ने इस उपन्यास में अभिव्यक्त किया है ।

उपन्यास में असुर याने राक्षस, बड़े-बड़े दातों, सिंगोवाला कोई जीव इस संकल्पना को भी तोड़ा है । उपन्यास में वैश्वीकरण, औद्योगीकरण के कारण आदिवासी आदिवासियों पर हो रहे अन्याय-अत्याचार को भी व्यक्त किया है। उपन्यासकार लिखते हैं, ''आकाशचारी देवताओं को जब अपने आकाशमार्ग से या सेटेलाईट की आँखों से छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखंड आदि राज्यों की खानिज सम्पदा, जंगल और अन्य संसाधन दिखते हैं तो उन्हें लगता है कि राष्ट्र-राज्य तो वे ही हैं, तो हक तो उनका ही हुआ । सो इन खनिजों पर, जंगलों में, घूमते हुए लँगोट पहने असुर-बिरिजिया, उराँव-मुंडा आदिवासी, दलित-सदान दिखते हैं तो उन्हें बहुत कोफन होती है । वे इन कीड़े-मकोड़ों से जल्द निजात पाना चाहते हैं ।''११

उपन्यास में ग्लोबल गाँव के देवताओं में उद्योगपति (टाटा, वेदांग), पूँजीपति, पुलिस, व्यावसायिक, राजनेता, ठेकेदार आदि आकाशचारियों का समावेश है । जो आदिवासियों का इस वैश्वीकरण के युग में शोषण कर रहे हैं । उपन्यास में शोषण के साथ-साथ आदिवासी संस्कृति के बारे में भी जानकारी मिलती है । उनमें व्याप्त अंधविश्वास, विवाह पद्धति, स्त्री-पुरूष संबंध, पौराणिक मिथक, प्रकृति पूजा आदि अंग स्पष्ट रूप से उपन्यास में व्यक्त हुए हैं।

श्रीमती अजित गुप्ता का 'अरण्य में सूरज' राजस्थान की 'भील' जनजाति की जीवन वास्तविकता को स्पष्ट करता है । उपन्यासकार भीलों के परंपरागत जीवन को उनकी रूढ़ियों, मिथकों, अंधविश्वासों, दंतकथाओं के माध्यम से पाठकों के सामने रखती हैं । उपन्यास में शिक्षा को आदिवासियों के जीवन सुधार के एक पर्याय के रूप में रखा गया है । वैश्वीकरण, बाजारवाद का यह युग भी भीलों की मानसिकता आसानी से न बदल सकने की बात उपन्यासकार करती है । इस उपन्यास में बाल-विवाह, बेरोजगारी एड्स जैसी बीमारी, अंधविश्वास, दारिद्र्य, शोषण, व्यसनाधिनता, विस्थापन, अशिक्षा जैसी समस्याओं को अभिव्यक्त किया है ।

महुआ माजी का 'मरंगगोडा नीलकंठ हुआ' झारखंड के 'हो' आदिवासी जनजाति को केन्द्र में रखकर लिखा गया उपन्यास है । इस उपन्यास में मुख्यतः अणु-परमाणु, नाभिकीय उर्जा के आदिवासी जीवन पर हो रहे दुष्परिणामों की ओर ध्यान खींचा है । रणेन्द्र ने इस कृति को वैज्ञानिक संस्थानों के गहन झूठ के खिलाफ हिंदी में लिखी पहली कृति माना है । ''जादूगोड़ा (उपन्यास में मरंगगोड़ा) हावडा मुम्बई रेल लाइन पर टाटा नगर (जमशेदपुर) रेलवे स्टेशन से २४ किलोमीटर की दूरी पर है । १९६७ ई. से यूरेनियम कॉरपोरेशेन ऑफ इंडिया लिमिटेड यहाँ की खदानों से यूरेनियम का खनन करवा रहा है जिसका शोधन भी जादूगोड़ा में ही होता है । प्रतिवर्ष तीन लाख टन रेडियोधर्मी कचरे की डम्पिंग भी इसी इलाके में होती है । खदान से निकलनेवाला कचरा इससे दस गुणा ज्यादा यानी तीस लाख टन प्रतिवर्ष होता है ।''१२ ऐसी अनेक गहन समस्याओं पर यह उपन्यास विचार-विमर्श करने के लिए प्रेरित करता है ।

आज विकास की अंधी होड़ में हम प्राकृतिक प्रदूषण तो कर ही रहे हैं साथ ही आदिवासियों के जीवन का विचार न करते हुए अणु-परमाणु एवं विकिरणयुक्त कचरे को आदिवासी इलाकों में ले जाकर डम्पिंग कर रहे हैं । जो आदिवासियों की पीढ़ियों को बरबाद कर रहा है । महुआ माजी ने अपने इस उपन्यास के माध्यम से इस समस्या के विरोध में आवाज उठाई है ।

हिंदी आदिवासी साहित्य पर जब विचार करते हैं तो हमें विशेष रूप से इक्कीसवीं सदी के आदिवासी उपन्यास आकर्षित करते हैं । इसकी खास वजह है कि यह उपन्यास केवल आदिवासियों के सांस्कृतिक, प्राकृतिक जीवन को व्यक्त नहीं करते तो वैश्वीकरण, बाजारीकरण के युग में आदिवासियों के सामने आ रही नवनवीन समस्याओं को सामने रखते हैं और उनसे कैसे निपटा जा सकता है का सुझाव भी देते हैं ।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इक्कीसवीं सदी के आदिवासी हिंदी उपन्यास 'हो', 'उराँव', 'मुंडा', 'असुर', 'भील', 'बोंडा', 'कंजर' आदि जनजातियों को केंद्र में रखकर लिखे गये हैं, जो राजस्थान, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखंड, हरियाना इन राज्यों में स्थित हैं । मुख्यतः यह उपन्यास एक ओर हमारी जगमगाती सम्पन्नता, औद्योगिक विकास, नागरीकरण, वैज्ञानिक सफलता आदि को व्यक्त करते हैं तो दूसरी ओर आदिवासी जनजातियों की विपन्नता, विस्थापन, दारिद्र्य, शोषण, बीमारियाँ, अन्याय-अत्याचार, विषमता, पराधीनता, अभाव, भूख, अमानवीय जीवन, धर्मांतरण, प्राकृतिक ऱ्हास आदि को व्यक्त करते हैं । साथ ही इन समस्याओं से उभरकर निकलने के लिए संघर्ष करते आदिवासियों की जद्दोजेहद को भी व्यक्त करते हैं ।

संदर्भ संकेत :

१) उद्धृत - डॉ. लक्ष्मणप्रसाद सिन्हा - भारतीय आदिवासियों की सांस्कृतिक प्रकृति-पूजा और पर्व-त्यौहार, पृ. ८८

२) मैत्रेयी पुष्पा - अल्मा-कबूतरी, पृ. मलपृष्ठ

३) विद्याभूषण - बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में, पृ. ६८

४) कृष्णचंद्र गुप्त - 'बोंडा जाति का औपन्यासिक समाजशास्त्र', हंस - फरवरी, २००२, पृ. ८८

५) तेजिन्दर - काला पादरी, पृ. २१

६) प्रो. चमनलाल - दलित साहित्य : एक मूल्यांकन, पृ. १६६

७) राकेशकुमार सिंह - पठार पर कोहरा, पृ. ०१

८) वही, पृ. १३७

९) भगवानदास मोरवाल - रेत, पृ. ५१

१०) हरिराम मीणा - धूणी तपे तीर के बारे में भूमिका

११) रणेन्द्र - ग्लोबल गाँव के देवता,

१२) रणेन्द्र - 'ईमाँ मुझे खैंचे है तो रोके मुझे कुफ्र', नया -ज्ञानोदय - जून - २०१२, पृ. १०१

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हिंदी विभाग,

सरस्वती भुवन कला एवं

वाणिज्य महाविद्यालय, औरंगाबाद

मो. ७५८८९३४४७४

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