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पटकथा कैसे लिखें? / डॉ. विजय शिंदे

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पटकथा लेखन एक चरणबद्ध प्रक्रिया है। इसके कुछ मौलिक सिद्धांत हैं, जिसे जानना जरूरी है। कहानी या कथा किसी की भी हो सकती है। एक पटकथाकार केवल उस कहानी या कथा को एक निश्चित उद्देश्य यानी फिल्मों के निर्माण के लिए लिखता है, जो पटकथा (Screenplay) कहलाती है। और दूसरी ओर एक कथाकार स्वयं पटकथाकार भी हो सकता है यानी कहानी भी उसकी और पटकथा भी उसी की। सवाल है कि पटकथा लेखन के सिद्धांत क्या हैं? यह कैसे लिखें? क्या लिखें और क्या न लिखें? एक फ़िल्मी कथानक का बीजारोपण कैसे होता है, इसका प्रारूप कैसा होता है? इसे निम्नानुसार समझाया जा सकता हैं।

1. प्रस्थान बिंदु (प्रिमाईस)

एक कथा का पटकथा के रूप में रूपांतर और लेखन के लिए सबसे शुरूआती चरण है कि कहानी को तीन प्वायंट पर कसें। ये तीन प्वायंट है - प्रस्तावना, संघर्ष और समाधान। अनेक विद्वान इन तीन बिंदुओं को कहानी की समस्या, नायक-प्रतिनायक का संघर्ष और कहानी का उपसंहार कहते हैं। अंग्रेजी में इन्हें 1. प्रपोजिशन (Proposition), एक्सपोजिशन (Exposition) या कनफ्लिक्ट (Conflict), 2. स्ट्रगल (Struggle) या प्रोटागोनिस्ट्स (नायक) एंड़ एन्टागोनिस्ट्स (प्रतिनायक या विलेन) एक्शंस (Protagonist’s and Antagonist’s Actions) और 3. रिजॉल्यूशन (Resolutions) कहते हैं। प्रस्तावना, संघर्ष और समाधान को पटकथा का त्रिक-बिंदु (Three Points of Screenplay) या पटकथा का प्रस्थान-बिंदु (Starting Point of Screenplay) भी कहते हैं। आइए इसे समझने के लिए एक वर्कआउट करते हैं। इसे ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (DDLJ) फिल्म के संदर्भ में समझने की कोशिश करते हैं कि इस फ़िल्म की प्रस्तावना, संघर्ष और समाधान क्या हैं? आपमें से बहुत लोगों ने यह फ़िल्म जरूर देखी होगी, जिन्होंने नहीं देखा हो, प्लीज देख लें, ताकि पटकथा-लेखन की इस बुनियादी विषयवस्तु को भली-भांति समझ सकें।

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अ. प्रस्तावना - लंदन में रहनेवाले एक भारतीय आप्रवासी बलदेव सिंह की इंट्रोवर्ट और आज्ञाकारी बेटी सिमरन और एक एक्सट्रोवर्ट मॉड़र्न लड़के राज को यूरोप की एक टूर के दौरान एक-दूसरे से प्यार हो जाता है।

आ. संघर्ष - भारतीय रीति-रिवाजों को दिल से माननेवाले बलदेव सिंह को यूरोपीय रहन-सहन से चिढ़ होती है, लिहाजा वे सिमरन की शादी अपने दोस्त के बेटे से करवाने के लिए भारत चले आते हैं, तो दूसरी ओर राज अपने पिता की सलाह मानकर अपने प्यार सिमरन को पाने उनके पीछे भारत आ जाता है।

इ. समाधान - राज और सिमरन का प्यार देखकर सिमरन की मां उन्हें भाग जाने के लिए कहती है, लेकिन राज कहता है कि वह बाबूजी के दिल में अपनी जगह बनाकर उनकी मर्जी से ही सिमरन को दुल्हन बनाएगा और आख़िरकार राज और सिमरन की दीवानगी देखकर बलदेव सिंह को उनके प्रेम को स्वीकार करना पड़ता है।

2. पटकथा लेखन का OBE या OBC सूत्र

पटकथा के कथानक को समस्या, संघर्ष और समाधान में बांटने की एक सर्वमान्य लेखन-परंपरा है। इन तीन बिंदुओं के रूप में कथानक को प्रस्तुत करने का चलन सर्वथा नया नहीं है। स्कूली शिक्षा में हमें सिखलाया जाता है कि अपने प्रत्येक आलेख को तीन भागों यानी शुरुआत (Opening), मध्य भाग (Body) और अंत (Ending) में बांटे। आलेख-लेखन का यह सूत्र OBE (Opening-Body-Ending) या OBC (Opening-Body-Conclusion) के रूप में जाना जाता है। ओपनिंगवाले हिस्से में जहां प्रस्तावना या विषयवस्तु का परिचय होता है, बॉड़ीवाले भाग में विषय-वस्तु का वर्णन होता है, तो वहीं एंड़िंगवाले पार्ट में विषय-वस्तु का निष्कर्ष या आलेख का उपसंहार होता है। कमोबेश पटकथा लेखन भी इसी अवधारणा पर नियोजित होती है।

सदियों से और आज भी स्कूल में आलेख लिखने का यह प्रारूप जरूर सिखलाया जाता है। रोचक यह है कि इस रीति का पालन नहीं करने पर परीक्षक नंबर काट लेते हैं। अगर किसी आलेख के लिए 10 नंबर निश्चित है और किसी छात्र ने OBE के ढर्रे का पालन नहीं किया है, तो उसके 2-3 नंबर तो शर्तिया काट लिए जाते हैं। सवाल है फिल्मी दुनिया में OBE के इस बहस से क्या मतलब है? मतलब है, बड़ा गहरा मतलब है। क्या यहां भी नंबर कटता है। जी, बिलकुल कटता है और 2-3 नंबर नहीं, पूरे-का-पूरा नंबर कट जाता है और आपकी पटकथा को कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जता है।

3. प्रिमाईस के गुण

पटकथा लेखन के प्रस्थान बिंदु यानी किसी कथानक को समस्या, संघर्ष और समाधान के रूप में प्रस्तुत करने की अवधारणा को फिल्मी लेखन की भाषा में ‘प्रेमाईस’ या ‘प्रिमाईस’ (Premise) कहते हैं। विद्वानों के अनुसार जैसे किसी कहानी को लिखने से पहले उसका ‘प्लॉट’ (Plot) लिखा जाता है, ठीक उसी तरह किसी पटकथा को लिखने से पहले उसका प्रिमाईस लिखना अनिवार्य है। संक्षेप में कहें, तो पटकथा का आधार, उसकी जमीन है - ‘प्रिमाईस’। सवाल यह उठता है कि एक कथानक को समस्या, संघर्ष और समाधान के रूप में क्यों बांटे यानी प्रिमाईस के रूप में क्यों लिखे? इनके कारणों पर अगर नजर डालेंगे तो प्रिमाईस के गुण पता चलते हैं।

अ. मूल विषय और दार्शनिक पृष्ठभूमि - पटकथा के कथानक को समस्या, संघर्ष और समाधान में बांटना इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह कथानक को उसकी मूल विषय और दार्शनिक पृष्टभूमि से जोड़े रखता है। कथा और पटकथा के विस्तार के समय भटकाव की गुंजाइश लगभग नहीं के बराबर होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह कथानक को दिशा और उसका आधार देता है, लिहाजा पटकथा कहीं से लचर नहीं होती है। कमजोर और लचर पटकथा यह आज के अधिकांश फिल्मों की एक सबसे बड़ी समस्या है। एक सुपर-डुपर हिट फिल्म में दो मिनट की कमजोर और लचर पटकथा भी अक्षम्य है।

आ. अंतर्संबंध - कहानी को समस्या, संघर्ष और समाधान के रूप में बांटना इसलिए जरूरी है कि कथानक के साथ-साथ उपकथा, समांतर कथा, अवांतर कथा, घटनाओं और प्रतिघटनाओं का सीधा संबंध इन्हीं तीन बिंदुओं से होता है। एक कथानक का सारा ताना-बाना इन्हीं तीन बिंदुओं के इर्दगिर्द घूमता है। जैसे ही यह ताना-बाना इस त्रिक-बिंदु से दूर होता है, पटकथा बिखरने लगती है।

इ. पटकथा की टॅगलाईन - प्रिमाईस कथानक के थीम (What), सब्जेक्ट (Who, Why, Where) और (When) और क्लाइमेक्स (Now what & How) को परिभाषा देता है। यह पटकथा के टॅगलाईन जैसा होता है, जिसे पढ़ने मात्र से ही आगे के कथानक को जानने की बेचैनी और उत्सुकता बढ़ जाती है।

ई. नाटकीयता - एक अच्छा प्रिमाईस न केवल अच्छे कथानक और बेहतर पटकथा को आधार देता है, बल्कि यह कथा-पटकथा में पर्याप्त नाटकीयता भी लाता है।

उ. दो मिनट की फिल्म (Two Minute Movie) - हॉलीवुड़, बॉलीवुड़, टॉलीवुड़ या और भी जितने फिल्म निर्माण क्षेत्र हैं, वहां के प्रबुद्ध फिल्ममेकर्स (प्रोड्यूसर्स, डायरेक्टर्स आदि) के बीच थ्री प्वायंट्स ऑफ स्क्रीनप्ले यानी पटकथा का त्रिक-बिंदु ही प्रचलित है। फिल्म निर्माण की भाषा (शब्दावली) में, ये फिल्ममेकर्स ‘समस्या, संघर्ष और समाधान’ या ‘प्रिमाइस’ (Premise) को ‘टू मिनट मूवी’ (Two-minute Movie) के रूप में ज्यादा जानते हैं। (ई-संदर्भ, ब्लॉग – कथा पटकथा)

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. पटकथा लेखन एक परिचय – मनोहर श्याम जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2000, आवृत्ति 2008.

2. पटकथा कैसे लिखें – राजेंद्र पांड़े, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2006, आवृत्ति 2015.

3. पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका – असगर वजाहत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, छात्र संस्करण 2015.

4. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.

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डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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रवि जी पटकथा लेखन को लेकर कुछ सवाल ई-मेल पर आए थे इसलिए इसके सविस्तर उत्तर यहां पर दे रहा हूं।
पटकथा लेखन में आपकी (यह संबोधन जिन्होंने सवाल पूछे उन सबके लिए है।)रुचि है पढकर खुशी हुई। आपके लिए यहां मैंने हिंदी किताबों के नाम और पते दिए हैं जो सीधे पटकथा लेखन का मार्गदर्शन करते हैं। आपके लिए इनका उपयोग हो सकता है। मराठी भाषा में भी किताबें है पर मैंने मेरे लेखन के दौरान किसी मराठी किताब को देखा नहीं है। अर्थात् आप अगर मराठी के बडे प्रकाशकों की सूची देखेंगे तो हो सकता है सिनेमा या पटकथा लेखन को लेकर कुछ किताबें मिलेगी। अंग्रेजी में सिनेमा के विविध अंगों पर भरपूर लेखन हुआ है। इंटरनेट पर कोशिश करेंगे तो अंग्रेजी भाषा में भरपूर सामग्री मिलेगी। मैंने यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विद्यापीठ, नाशिक के लिए सिनेमा हेतु दो किताबों का लेखन किया है वह जल्द ही उपलब्ध होगी। वह दो किताबें हैं ‘सिनेमा परिचय’ और ‘सिनेमा पटकथा से परदे तक’। हालांकि इन किताबों का लेखन मुक्त विद्यापीठ के लिए किया है परंतु उसमें पाठ्यक्रम की अपेक्षा बहुत अधिक, विस्तृत और परिपूर्ण जानकारी देने की मेरी कोशिश रही है।
पटकथा लेखन रुचि, कौशल, ज्ञान और अनुभव का मिलाजुला परिपाक है। आप मराठी भाषा में अगर पटकथा लिखना चाहते हैं तो शंकर पाटिल, वि. स. खांडेकर, आचार्य अत्रे, व्यंकटेश माडगुळकर, राजन गवस जैसे साहित्यकारों की रचनाओं पर बनी फिल्में और उनकी पटकथाओं का अध्ययन करें। फिल्में भरपूर देखनी पडेगी और इसका अध्ययन करना पडेगा कि कोई कहानी फिल्मी पटकथा कैसी बनती है?
उदा. ‘बनगरवाडी’ – यह व्यंकटेश माडगुळकर के उपन्यास (कादंबरी) पर बनी फिल्म है, अतः इसकी मूल किताब और फिल्मी पटकथा को देखें, पढे और सूक्ष्मताओं को परखें। वैसे ही ‘पांगिरा’ (विश्वास पाटिल), ‘जोगवा’ (राजन गवस), ‘बारोमासा’ (सदानंद देशमुख), ‘72 मैल एक प्रवास’ (अशोक व्हटकर), नटरंग (आनंद यादव) जैसी फिल्मों और उनकी पटकथाओं का अध्ययन करना पडेगा।
सैद्धांतिक पढाई अपने ज्ञान में वृद्धि करती है परंतु अनुभवात्मक पढाई परिपक्व बनाती है। आप अगर इसमें सही मायने में उतरना चाहते हैं तो पूना के फिल्म इन्सीट्युट (FTTI पूना) में दिल्ली के नॅशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD दिल्ली) में किसी भी फैक्लटी में पदवी पाने के बाद पदव्युत्तर पढाई या डिप्लोमा कर सकते हैं। यह दो संस्थान आपको पढाने में और परिपूर्ण बनाने में सक्षम है। इन संस्थानों की वेबसाईट पर जाकर कोर्सो को लेकर जानकारी पा सकते हैं। नागराज मंजुळे जैसे निर्देशक-पटकथा लेखक पूना के इसी संस्थान में पढे हैं। संपूर्ण भारत में यहीं तो संस्थान जो आपकी इच्छा को सही मार्ग पर ले जा सकते हैं।

1. कथा-पटकथा – मन्नू भंड़ारी, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2004, द्वितीय संस्करण 2014.
वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली,
फोन (011) 23273167, ई-मेल vaniprakashan@gmail.com
2. कथा पटकथा संवाद – हूबनाथ, अनभै प्रकाशन, मुंबई, 2011.
अनभै प्रकाशन, फ्लैट नं. 7, फ्लॉट नं. 177, शिवनेरी बिल्डिंग, शबरी हॉटेल के पास,
सायन माटुंगा रोड, सायन (पू.), मुंबई – 400022.
फोन (022) 24040049, ई-मेल anbhai@gmail.com
3. पटकथा लेखन एक परिचय – मनोहर श्याम जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,
प्रथम संस्करण 2000, आवृत्ति 2008.
राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली – 110002
फोन (011) 23266498, 23274463, 23288769, ई-मेल info@rajkamalprakashan.com
4. पटकथा कैसे लिखें – राजेंद्र पांड़े, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2006, आवृत्ति 2015.
वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली,
फोन (011) 23273167, ई-मेल vaniprakashan@gmail.com
5. पटकथा लेखन फीचर फिल्म – उमेश राठौर, तक्षशीला प्रकाशन, नई दिल्ली,
प्रथम संस्करण 2001, द्वितीय संस्करण 2005.
तक्षशीला प्रकाशन, 98-ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002.
फोन (011) 23258802
6. पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका – असगर वजाहत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, छात्र संस्करण 2015.
राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली – 110002
फोन (011) 23266498, 23274463, 23288769, ई-मेल info@rajkamalprakashan.com
7. पटकथा सौंदर्य और सृजन – डॉ. चंद्रदेव यादव, डॉ. मनोज कुमार, अनंग प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015.
अनंग प्रकाशन, बी - 107/1, गली मंदिर वाली, समीप रबड फैक्ट्री, उत्तरी घोंडा, नई दिल्ली – 110053.
फोन 09350563707, ई-मेल anangprakashan@gmail.com

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