शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

व्यंग्य-राग / गधों की राजनीति / डा. सुरेन्द्र वर्मा

यह तो सरासर ग़लत है। कृपया गधों के साथ राजनीति न करें। गधा एक बहुत ही उपयोगी जीव है। उसकी उपयोगिता को देखकर मेहरबानी करके गधों में फूट न डालें। फूट डालो और राज करो यह मन्त्र केवल हमारी, इंसानों की, दुनिया में कारगर हो सकता है। गधों में नहीं। आप गधों में फूट डाल ही नहीं सकते। गुजरात के गधों और उत्तरप्रदेश के गधों के बीच भी नहीं। उनमें बड़ी एकता है। गधे किसी भी प्रदेश के हों उनमें कोई अंतर पड़ ही नहीं सकता। है ही नहीं। सब गधे ही हैं। खालिस, निखालिस, गधे ही हैं। गधे हर जगह होते हैं। काबुल तक में सिर्फ घोड़े नहीं होते। गधे वहां भी होते हैं। एक जैसे।

इस बात को ध्यान में रखना बड़ा ज़रूरी हैं कि गधे सिर्फ ‘गधे’ ही नहीं होते। उनके सच्चे-सीधे स्वभाव को मूर्खता बताना सिर्फ आदमी की मूर्खता का द्योतक है। वक्त पड़ने पर वे दुलत्ती भी मार सकते हैं।

इंसानों के साथ रहते हुए भी गधों की मानसिकता में कभी कोई अंतर नहीं आया, भले ही इंसानों ने गधों से बहुत कुछ क्यों न सीख लिया हो। दुलत्ती मारना आखिर आदमी ने गधों से ही तो सीखा है। जब आदमी सामनेवाले का सामना नहीं कर पाता, दुलत्ती झाड़ता है। चुनाव-काले दुलत्तियों का जलवा देखने लायक होता है पक्षी ज़रा सा चहचहाया नहीं, कि विपक्षी ने दे मारी दुलत्ती ! इस प्रकार दुलत्तियों का एक सिलसिला चल निकलता है। दुलत्ती दर दुलत्ती। खेल चालू हो जाता है।

मरहूम कृष्ण चंदर एक मशहूर लेखक रहे हैं। हम उनके साहित्य को बड़े अदब से पढ़ते हैं। वे गधों से इतने मुतअस्सिर हुए कि उन्होंने एक गधे की आत्मकथा ही लिख डाली। व्यंग्यकार शरद जोशी भी पीछे रहने वाले नहीं थे। उन्होंने एक अदद नाटक, ‘एक था गधा’, लिख मारा। गधा सिर्फ गधा नहीं होता। अच्छे अच्छे साहित्यकारों के लिए वह प्रेरणा का स्रोत रहा है। आज भी न जाने कितने व्यंग्यकार गधों पर छोटे-मोटे आलेख लिखकर गधों की उपयोगिता के गुण गा रहे हैं। जय हो।

हर क्षेत्र के लोगों ने गधों की सेवा ली है। लेकिन आदमी बड़ा अहसान-फरामोश है। अगर धोबी के पास एक अदद गधा न हो तो उसका काम नहीं चल सकता। फिर भी गधा बेचारा धोबी का गधा ही कहलाता है – घर का न घाट का। जब कि असलियत यह है कि घर और घाट, दोनों ही जगहों का भार गधा ही उठाए है।

गधा आर्थिक क्षेत्र में भी ‘सार्थक’ प्रमाणित हुआ है। खबर आई थी कि किस तरह गधों ने एक दीवाला- पिटी-नगरपालिका की इज्ज़त बचाई। कर्मचारियों को उनका वेतन देने के लिए गधों का मेला लगाकर पैसे कमाए गए जिससे कर्मचारियों को कई माह बाद उनका वेतन मिल पाया।

गधे दलबदल नहीं करते। इस दलदल में वे कभी नहीं पड़े। दलबदल सिर्फ आदमी करते हैं। एक बार की बात है, एक कोई विधायक दलबदल करने के लिए उतावला था। लेकिन उसके समर्थक नहीं चाहते थे की वह ऐसा करे। समर्थकों ने उसका घेराव किया|। उसके विरुद्ध नारे लगाए। नेता फिर भी न माना। दलबदल के लिए अड़ा रहा। तब एक गधे की सेवाएं ली गईं। विधायक को धमकी दी गई कि यदि वह दलबदल करेंगें तो इस गधे पर उनका जुलूस निकाला जाएगा। गधे का रुतबा देखिए। धमकी कारगर हुई। विधायक ने दल बदलने की बजाय अपना इरादा बदल दिया।

गधे बेशक राजनीति में भी कारगर हुए हैं। लेकिन कृपया गधों पर राजनीति न करें। उनमें फूट डालने की कोशिश न करें। गधा चाहे गुजरात का हो या उत्तरप्रदेश का, सब गधे ही होते हैं।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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