गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

व्यंग्य / अपना अपना पेड़ / हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

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स्वर्ग में गहन चिंतन मनन का दौर भगवान की सभा में। विषय था - पृथ्वी में पर्यावरण की समस्या। मनुष्यों को प्रेरित करने के अनेक उपायों की समीक्षा में यह निष्कर्ष निकला कि , कोई भी मनुष्य बिना किसी स्वार्थ या प्रलोभन के पेड़ नहीं लगाएगा। भगवान ने भी प्रलोभन का पांसा फेंका। उन्होंने घोषणा की – मैं समस्त पृथ्वीवासी को मुफ्त में जमीन देता हूं। जो मनुष्य इसमें बहुत सारे पेड़ लगाएगा और उसे सुरक्षित रखेगा , उसे पुष्पक विमान में बिठाकर परिवार सहित स्वर्ग की सैर मुफ्त में करायी जायेगी।

निर्धारित समय बीत जाने के पश्चात , ईश्वर ने धरती पर लगाये जा रहे पेंड़ों को देखने की योजना बनाई। नीचे उतरते ही , बहुत खुश मनुज से मुलाकात हो गई। बातों ही बातों में उसने भगवान को अपने द्वारा लगाये गए पेड़ के बारे में बताया। भगवान को खुशी हुई। उन्होंने उस मनुज के द्वारा लगाये गए जंगल को देखने की इच्छा जाहिर की। वह व्यक्ति भगवान को अपने साथ ले गया। विशाल सभा का आयोजन , घंटों भाषण , फिर खाना पीना .......। शाम घिर आई , रात बीत चली। भगवान को पेड़ नहीं दिखा। रात जागते कटी , सुबह के इंतजार में। सुबह भगवान ने फिर पेड़ जंगल देखने की इच्छा जताई। मेजबान ने कहा – अरे मैंने कल तो दिखाया था अपना जंगल , आप नहीं देख पाये क्या ? चलिए , सफर की थकावट में आपको नींद आ गई होगी , आज फिर दिखाता हूं। दूसरे जगह में पिछले दिन से भी बड़ी सभा , पांव रखने को जगह नहीं , सिर्फ आदमी का रेलम पेल। मंच पर बैठे भगवान को दूर दूर तक पेड़ का नामों निशां नजर नहीं आया। धीरे से पूछा – आपके वो पेड़ कहां हैं ? मनुज ने इशारा किया , यही तो मेरे पेड़ हैं। भगवान समझे नहीं , तब उसने बताया कि भगवान जी , हमने आदमी का पेड़ लगाया है .......। भगवान को काटो तो खून नहीं , सुकुरदुम हो गए। मैंने तुम्हारी इच्छा मुताबिक जमीन दी , तुमने उसका दुरुपयोग कर , आदमी का जंगल लगा दिया। भगवान जी , इस जंगल को लगाने से लेकर , सजाने , संवारने , बढ़ाने और संरक्षण देने , मैंने आपके किसी भी दी हुई वस्तु का इस्तेमाल नहीं किया है , आप चाहें तो स्वयं ध्यान कर देख सकते हैं। ईश्वर ने ध्यान लगाकर देखा , सचमुच में , भाषण के खेत में , आश्वासन के खाद , लालच के पानी और मौकापरस्ती के धूप में उपजा था यह जंगल। बीच बीच में राहत के कीटनाशक के छिड़काव से कीड़े पड़ने से बचा लिया गया था पेड़ों को। भगवान ने पूछा – ये पेड़ फल फूल क्या देते होंगे , जिससे तुम्हें सुख और समृद्धि मिल जाती है। उस मनुज ने बताया कि इस पेड़ में पांच साल में एक बार , वोट नाम का फूल लगता है , उसकी महक से ही लोग बौरा जाते हैं , यह फूल समय के साथ कुर्सी फल में बदल जाता है। इस फल का स्वाद स्वर्ग के सुख की कामना को भुला देता है। एक बार आप भी चखेंगे तो शायद , इसी जगह को अपना मुकाम बना लेंगे। भगवान , हम यहीं ठीक हैं , आप किसी और स्वर्ग जाने की इच्छा रखने वाले ढूंढ लीजिए। फिर तुमने मेरी जमीन का क्या किया ? उसी जमीन को विदेशियों को बेंचकर ही तो मैंने इतना बड़ा जंगल खड़ा किया है। सिर पकड़ लिया भगवान ने।

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आपने भी पेड़ लगाया है , लगता है। चलिए , आपको आपके परिवार सहित स्वर्ग की यात्रा का आनंद दिलवाता हूं। बस एक बार मुझे अपने लगाए पेड़ दिखा दीजिए। सर , मुझे आपके स्वर्ग से अधिक आनंद देने वाले जगह मिल गए हैं , आप किसी और को ले जाइए। तो क्या आपने पेड़ नहीं लगाए ? लगाए हैं , पर किसी को दिखाने के लिए नहीं। पर आप तो ठहरे भगवान , आप अपनी दिव्य दृष्टि से देख सकते हैं मेरे लगाए पेड़ों को। ध्यान लगाया ईश्वर ने – पैसे का पेड़ लगाया था इन्होंने। भगवान सोच में पड़ गए , कि ये पेड़ उगा कैसे ? उस मनुज को पूछा। उसने बताया कि हमारे साहब खानदान में , हम अपने पेड़ आपकी दी जमीन पर नहीं लगाते , हमारे पेड़ स्विस बैंक में लहलहाते दिख जायेंगे। कागज के खेत में , भ्रस्टाचार के खाद डालने से दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ता है यह पेड़। सिंचाई के लिए जनता का खून ले लेते हैं। हेराफेरी का धूप इन्हे उर्जा प्रदान करता है और कीड़ा लग भी गया तो झूठ का कीटनाशक हमेशा तैयार रहता है। पर मेरी जमीन का क्या हुआ ? आपकी जमीन गिरवी रखकर ही तो इतना कर पाते हैं भगवान , आप भी न ......।

एक मनुज को गड्ढा खोदते देखा तो बड़े खुश हुए भगवान। उन्हें लगा , जरूर पेड़ लगाने के लिए ही , यह मनुज गड्ढे खोद रहा है। नजदीक जाकर जानने की इच्छा जागृत हुई। उसने बताया , आपके दिये पौधे के लिए , मैं यह गड्ढा नहीं खोद रहा हूं। मैं अपने पेड़ लगाने के लिए यह उद्यम कर रहा हूं। भगवान को उत्सुकता हुई , आप यहां क्या लगाओगे ? मैं अपना पेड़ लगाऊंगा। तो मेरा पेड़ कहां हैं ? आपका पेड़ ......... , अरे उसे तो राजनीति के ढोर डांगर ने कब का चर दिया है। आपके दिए जमीन , अब सरकारी हो चला है , उसमें वह ताकत नहीं कि , किसी पेड़ को धारण कर , उसे खड़ा कर सके। वैसे भी तामझाम के जमीन पर , प्रचार के खाद और स्वारथ के सिंचाई में वो दम कहां ....... कैसे पेड़ खड़ा हो ? अवसरवादिता के कीटनाशक , कीड़े को नहीं बल्कि पेड़ को नुकसान पहुंचाते हैं। भले ही , भाषा , क्षेत्र , जाति और धर्म का गड्ढा आज तक नहीं पट सका , परंतु आपके दिए पेड़ के लिए खोदे गड्ढे , दूसरे ही दिन , सपाट हो जाते हैं। जी हां , इसलिए मैंने जमीन का डायवर्सन करा कर , अपने पेड़ लगाना शुरू कर दिया। तुम क्या लगाते हो , जरा मुझे भी दिखाओ , बहुत दिनों से मैंने हरियाली नहीं देखी धरती पर ? हम जिस जगह अपना पेड़ लगाते हैं भगवान , वह जगह शहर बन जाता है। क्या .......? हां भगवान , और सुख समरिद्धि इतनी मिलती है कि आपके स्वर्ग को हम भूल चुके हैं। जरा दिखाओ तो मुझे भी ....। कांक्रीट के विशाल जंगल में ऊंची ऊंची इमारतें , कोलतार की पसरी सड़कें , फेक्टरियों के बड़ी बड़ी चिमनियों से आग उगलते धुएं ........। इस पेड़ को देखकर भगवान के पास अपना सिर धुन लेने के अलावा और कुछ नहीं बचा।

पेड़ तो आपने बहुत सारे दिए थे भगवान , जमीन भी दिया था आपने। पर सरकार ने कानून बनाकर हमारी जमीन अधिग्रहित कर ली , आपके दिए पौधे लगाएं कैसे ? फिर भी स्वर्ग जाने की लालसा में मैंने भी पेड़ लगाने , उसे बढ़ाने और सुरक्षित रखने का संकल्प लिया , पर उसी पेड़ को काटना पड़ जाता है भगवान , जब वह बड़ा हो जाता है। मतलब तुम ही हो जो , पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहे हो। भगवान , मैंने आपके दिए पौधे को न लगाया , न काटा है , पर्यावरण की बदहाली के लिए मैं कैसे जिम्मेदार हूं। तुम्हीं ने कहा न अभी कि , पेड़ काटता हूं मैं। तुम्हें स्वर्ग नहीं , नरक दिखाऊंगा जीते जी .....। पर क्या मैं जान सकता हूं कि ऐसी क्या मजबूरी होती है कि जिस पेड़ को लगाते हो , जतन करते हो , फिर काट देते हो ? भगवान , मैं गरीबी के खेत में , मेहनत के खाद और पसीने की सिंचाई से पेड़ लगाता हूं , पर इस पेड़ को कलह और स्वार्थ के कीड़े , सरकारी विकास के पैसे की तरह चुंहंक देते हैं। साम्प्रदायिकता के खरपतवार को जाने कितनी बार उखाड़ चुका हूं , पर यह उग ही आता है , और मेरे पेंड़ों को नुकसान पहुंचाते ही रहता है। त्याग और तपस्या की कितनी बार दवाईंया डाल , निश्चिंत होने का प्रयास करता हूं , परंतु मंहंगाई के धूप से कुछ नहीं बच पाता। इन सबके बावजूद भी यदि मेरा पेड़ खड़ा भी हो जाता है तो , इस पेड़ का गला घोंटने पर मैं स्वयं मजबूर होता हूं। इसकी बोटी बोटी करता हूं , तब अपने बच्चे को शिक्षा दिला पाता हूं , इसी के टुकड़े से मेरे घर के चूल्हे में आग सिपचती है , मेरी रसोई से धुंआ निकलता है , इसी के टुकड़े से मेरी बूढ़ी बीमार मां को समय पर दवाई नसीब होती है , इसी का टुकड़ा पत्नी की लाज बनता है। भगवान शायद आप समझ गए होंगे कि , यह क्या पेड़ होगा। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है , मेरा सिर चकरा रहा है , मुझे स्पष्ट बताओ , वह कौन सा पेड़ है ? भगवान यह मेरे अरमान का पेड़ है। न जाने कितनी बार , अपने अरमानों के जंगल रोप चुका हूं , उसे बड़ा कर चुका हूं , पर जब तक अपने ही हाथों इसका सफाया नहीं करता , तब तक सुख तो दूर की बात , दो जून की रोटी के लिए दर दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर रहना पड़ता है। आपके दिए न जमीन बचा सका , न पौधे का इस्तेमाल कर पेड़ बना सका। आप चाहें तो इस नर्क से निकाल मुझे अपने नर्क में जगह जरूर दिलवायेंगे , ताकि मुझे वहां अपने ही हाथों लगाए गए पेड़ की हत्या न करना पड़े।

भगवान सोंच में पड़े हैं कि अपने अपने पेड़ लगाकर , ऐसा मुकाम हासिल कर लिए हैं कि , स्वर्ग का लालच नहीं रह गया किसी को .........?

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा .

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