शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

प्रेम दिवस - वेलेंटाइन डे विशेष : प्रेम एक शाश्वत सत्य / कामिनी कामायनी

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ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि के साथ ही प्रगट हुई ,प्रेम की मधुशाला। प्रेम ,प्यार ,इश्क मोहब्बत ,चाहे जिस सम्बोधन से इसे संबोधित किया जाय ,इसकी मधुरता में,इसके आकर्षण में ,इसकी छवि में ,इसके स्पंदन में  अद्यतन कोई न्यूनता नहीं आयी  ,कोई विकार उत्पन्न नहीं हुआ।

मानव जीवन के अनेक संवेगों ,दया ,क्षमा , राग –द्वेष ,घृणा ,करुणा ,स्नेह आदि में प्रेम सबसे महान है ,सबसे कोमल,सबसे प्रबल  और सबसे सूक्ष्म। यह पत्थर को भी पिघला देता है और बिना किसी रसायन के ,बिना किसी लेप के मानवीय दुनिया को जोड़ने की भी अजस्त्र ताकत रखता है।

यह सर्वविदित है कि सृष्टि में प्रेम कथा की शुरुआत स्त्री पुरुष से हुई। लोग इसे आदम और हव्वा का नाम देते हैं। मगर सच्चाई तो यही है कि प्रत्येक स्त्री पुरुष में आदम और हव्वा सन्निहित है।

इतिहास में झाँकें , वैसे तो भारतीय साहित्य में ऋग्वेद से ही अनेक सुंदर प्रेमाख्यान उपलब्ध होने लगते हैं। किन्तु इनकी अखंड परंपरा का सूत्रपात ‘ महाभारत काल से होता है। इसका मूल कारण शायद यह हो सकता है कि महाभारत काल से पूर्व  समाज में हम स्वच्छंद प्रणय भावना का उदय और विकास देखते हैं।  महाभारत में वर्णित विभिन्न प्रसंगों से स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि उस काल में प्रेम व प्रणय के संबंध में जाति ,कुल मर्यादा आदि का बंधन कमजोर पड़ गया था। आर्य अनार्य का विभेद भी क्षीण हो गया था। शारीरिक सौन्दर्य का प्रभुत्व बढ़ गया था। राजकुमार भीम का राक्षसी हिडिंबा से परिणय ,अर्जुन का नागकन्या चित्रांगदा से आदि आदि इस विषय के अनेक उदाहरण हैं।

हरिवंश पुराण में भी अनेक प्रेमाख्यान प्राप्त होते हैं जो पूर्ववर्ती परंपरा को पल्लवित पुष्पित करते हुए आगे बढ़ते हैं। कृष्ण रुक्मणी, पद्युम्न प्रभावती ,उषा अनिरुद्ध आदि कथाएँ विशेष रूप से परिलक्षित है।

बौद्ध कालीन युग में ,जबकि भारत का व्यापारिक संबंध दूर दूर के देशों से स्थापित हो गया था तथा भारतीय पर्यटक एवं धर्म प्रचारक विभिन्न द्वीपों और महाद्वीपों की यात्रा का जोखिमपूर्ण आनंद उठाने लगे थे। इससे भारतीय प्रेमाख्यान रचयिताओं की कल्पना को नूतन प्रेरणा एवं नया क्षेत्र प्राप्त हुआ। यात्रारत उन युवा राजकुमारों ,सेठ पुत्रों व पर्यटकों से जो यव ,मलय ,जावा श्याम ,स्वर्ण आदि द्वीपों की यात्रा से लौटते समय अपने साथ नए कथांश,अप्रतिम सुंदरियाँ ,धन और रोमांचकारी अनुभव जन्य गाथा लेकर देश की भूमि पर पग रखते ,इससे तत्कालिन कवियों ,लेखकों की काल्पनिक जगत के द्वार विस्तृत रूप से खुल जाते।‘ वृहतकथा’ की अधिकांश मौलिक और नूतन कथाओं का जन्म का कारण भले ही कुछ और रहा हो ,उनपर इस वातावरण का आंशिक प्रभाव अवश्य यहीं से देखा जा सकता है। हालांकि प्राकृत भाषा में रचित यह मूल ग्रंथ अब अनुपलब्ध हो गया है। इसी प्रकार वृहत कथा मंजरी और कथा सरितसागर पर भी इसका प्रभाव अधिकाधिक परिलक्षित होता है।

प्राचीन काल के अनेक बौद्ध ,प्राकृत ,पाली भाषाओं में प्रेम कथाओं का वर्णन किया गया था। संस्कृत साहित्य में प्रेम कथाओं का भरमार है। शूद्रक लिखित “मृ च्छ कटिकम’ में चारुदत्त और वसंत सेना के अमर प्रेम को वर्णित किया गया है।

मुसलमानों के लंबे आक्रमण और शासन काल में सूफियों के प्रेम का प्रभाव भी जनमानस में काफी पड़ा था।

कालांतर में अनेक प्रेम कथाओं का जन्म हुआ ,और वे समय के साथ तिरोहित भी होते गए। मगर कुछ प्रेम कथाएँ भौगोलिक सीमाओं को द्रुत वेग से चीरती हुई दिग्दिगंत तक अपने मनोहारी ,रोमांचकारी भावनाओं के साथ गुंजायमान होती रही ,और कुछ प्रेम कथाएँ तो मानवीय भावनाओं ,सांसारिक बंधनों को तोड़ती हुई चरमोत्कर्ष पर चढ़कर ,सजती सँवरती ,कालजयी बनती रही। ऐसी कुछ ज्ञात ईतिहास से प्रेमी युगल का उदाहरण दें तो ,प्रथम नाम रहेगा ,लैला मजनूँ का।

ये एक ऐसे मानवीय प्रेम के मूर्त स्वरूप हैं ,जिन्हें अपनी प्रेयसी का सानिध्य नहीं नसीब हुआ। मजनूँ का नाम वास्तव में कैश था ,अरब के नज़्द नामक प्रांत का वाशिंदा था ,जो लैला नामक एक अरब युवती पर दिलोजान से भीषण आसक्त हो चला था। उसकी आसक्ति का आलम यह था कि एक रोज़ कैस के पिता इसे लैला के पिता के पास इस ख़याल से ले गए ,कि आपसी रंजिश भुला कर ,और इसकी हालत पर तरस खाकर वे दोनों का निकाह करवा दें। कैस जैसा सजीला और रूपवान युवक को कौन पिता अपनी कन्या नहीं सौंपना चाहता। कुछ सोचकर लैला का पिता अपनी अनुमति देना ही चाह रहा था कि भाग्य या दुर्भाग्य वश ,उसी क्षण लैला का कुत्ता वहाँ आ निकला। यह लैला का कुत्ता है ,यह जानकार वह उससे लिपट कर उसे बे इंतहा प्यार करने लगा। कैस के इस भावावेश उन्माद को समझ कर लैला के पिता ने उसे अपने घर से बुरी तरह अपमानित कर निकाल दिया था।

लाचार बेबस हो कर वह जंगलों में भटकते भटकते सूख कर कांटा हो गया और इतना अशक्त हो गया कि हवा के झोंके से उड़कर एक पेड़ से जा टकराया।  जब उसे ढूंढते ढूंढते ,पुकारते पुकारते ,लैला वहाँ उस जंगल में पहुंची ,तब वह उसकी आवाज तो सुन सकता था ,मगर प्रत्युत्तर के लिए उसकी शक्ति जवाब दे चुकी थी।

इसी तरह ज़ुलेखा और युसुफ की प्रेम कथा का वर्णन है। युसुफ हजरत याक़ूब के पुत्र और मुसलमानों के एक पैगंबर थे। मुसलमानी धर्म के अनुसार संसार का तीन चौथाई सौन्दर्य खुदा ने इसको दिया था। मिस्त्र के बादशाह की रूपवती मलका ज़ुलेखा इनपर आशक्त हो गई थी।

शिरीन फरहाद – फरहाद एक चीनी शिल्पकार था जो ईरान की रूप लावण्यमयी शीरीन को अपना दिल दे बैठा। शीरी भी फरहाद को दिल जान से चाहती थी। उधर ईरान का बादशाह खुसरो भी शीरी का दीवाना था। वह शीरीन को बलात अपने महल में ले गया।,जब मन से शीरीन उसकी नहीं हुई ,तो उसने उसकी मौत की झूठी खबर फैला दी। इससे अति आहत होकर अपने द्वारा खोदे गए नहर में फरहाद डूब कर खत्म हो गया। इसके अतिरिक्त और भी अनेक उदाहरण हैं।

प्रेम की ये अजीबो गरीब दास्ताने अरब आक्रमणकारियों द्वारा ही लिखित वा दंतकथाओं के रूप में भारत आई थीं। ईश्क मिज़ाजी और ईश्क हक़ीक़ी की बात भी सूफियों द्वारा ही विस्तारित हुई थी .अर्थात इश्क की तीव्रता में तड़का लगाने का काम भी सूफीवादी विचार धारा में हुआ लगता है।

सूफी काव्यों का प्रभाव हिन्दी में किस वातायन से आया ,इसकी परीक्षा करते हुए पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र का मानना है कि सूफियों के यहाँ प्रेम का आलंबन निराकार ईश्वर था। इसलिए उस प्रेम को प्रदीप्त करने का कोई सुस्पष्ट आधार इन कवियों को प्राप्त नहीं था। अतएव वे आलंबन को अदृश्य पा कर अथवा उसे आकार देने का कोई आधार न पाकर ,प्रेम भाव की महत्ता और उसकी तीव्रता का प्रतिपादन करने लगे थे। इसी तीव्रता को काव्य में लाने के लिए इन कवियों ने आहों से बनने वाले बादलों की कल्पना की,विरह में हृदय के फटने और सूर्य के अधिक उत्तप्त हो जाने का मजमून बांधा एवं यह कहने लगे कि प्रेम मार्ग पर वही चल सकता है जो शीश की दक्षिणा देने योग्य हो ,जो मस्तक को काट कर उस पर अपना पाँव धर सके [ रामधारी सिंह दिनकर ,संस्कृति के चार अध्याय }।

प्रेमोपाख्यान परंपरा का हिन्दी में प्रवर्तन एवं विकास आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार मृगावती{1501} के रचयिता कुतबन को इस परंपरा का प्रथम कवि माना है ,जबकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ईश्वरदास की सत्यवती कथा {1500} को इस परंपरा की प्रथम कृति के रूप में उल्लेख किया है। डा0 रामकुमार वर्मा ने मुल्ला दाऊद के चिंदायन {1379}से इस परंपरा का प्रवर्तन माना है। मगर इन सभी विद्वानों का ध्यान इन सबसे प्राचीन ‘प्रेमाख्यान ‘ हंसावली की ओर नहीं गया जिसकी रचना असाइत द्वारा 1370 ईसवी में हुई थी। इससे पूर्व का कोई अन्य प्रेमाख्यान काव्य हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। {हिन्दी साहित्य का इतिहास – संपादक डा0 नगेंद्र मयूर पेपर बैक्स}

हंसावली में अनेक कथाएँ अंतर्गुंफ़ित हैं ,जिनमें से प्रमुख कथा का संबंध पाटन की राजकुमारी हंसावली से है।

चांदायन- यह प्रेमाख्यान –परंपरा का दूसरा काव्य है जिसकी रचना मुल्ला दाऊद ने किया। इसमें नायक लोर [लोरिक ] एवं नायिका चंदा का उन्मुक्त प्रणय ,प्रथम दर्शन में ही प्रेमात्पत्ति,विभिन्न व्यक्तियों द्वारा उनके प्रेम में बाधा  ,नायक का योगी होकर घर से निकलना,नाग द्वारा नायिका को डसना आदि है। इसकी भाषा अवधि है।

सत्यवती कथा के रचयिता ईश्वर दास सगुणोपासक भक्त थे। कथानक का संबंध राजकुमारी सत्यवती एवं राजकुमार ऋतुपर्ण के प्रथम दृष्टि जन्य प्रेम का निरूपण अत्यंत भावात्मक शैली में हुआ है।

मृगावती में नायक राजकुमार तथा नायिका मृगावती के प्रथम दृष्टि जन्य प्रेम का निरूपण अत्यंत भावात्मक शैली में हुआ है। कुतुबन ने यह कहानी चौपाई ,दोहे के क्रम में लिखी जिसमें चन्द्रनगर के राजा गणपतिदेव के राजकुमार और कंचनपुर के राजा रूपमुरारी की कन्या मृगावतीकी प्रेम कथा है। इस कथा में कवि ने प्रेम मार्ग के त्याग और कष्ट का निरूपण करके साधक के भगवत प्रेम का स्वरूप दिखाया है।

माधवानल काम कंदला [1527]के रचयिता गणपति ने नायक माधव एवं नृत्य विशारद काम कंदला के प्रेम का निरूपण अत्यंत रोमांचक शैली में किया है। यह राजस्थानी भाषा में लिखी गई है।

पद्मावत मलिक मुहम्मद जायसी की इस कड़ी में प्रौढ़तम काव्य माना जाता है। इसमें चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहल की राजकुमारी पद्मावती के प्रेम ,विवाह एवं विवाहोपरांत जीवन का चित्रण मार्मिक रूप से हुआ है।

मधु मालती ,मंझन कृत मधुमालती [1545] में नायक नायिका के प्रथम दर्शन जन्य प्रेम के साथ पूर्व जन्म के प्रणय संस्कारों की भी महत्ता दिखाई गई है।

कल्लोल कवि कृत ‘ढोला मारू रा दूहा’ राजस्थानी रजवाड़ों की एक अत्यंत लोकप्रिय  कहानी है। इस काव्य में नरवर देश के राजा ढोला {दूल्हा } और पूंगल देश की राजकुमारी मारवनी के विवाहोत्तर प्रेम और विरह का निरूपण किया गया है।

इसके अलावा नल दमयंती ,सोनी महिवाल ,,हीर रांझा,रोमियो जूलियट आदि आदि महान आशिक को आज भी लोगों द्वारा याद किया जाता है।

यह विषय इतना उर्वर है कि इसपर कितने महाकाव्य ,महाग्रंथ लिखे जा चुके हैं ,फिर भी यह नित नवीन कलेवर धारण किए हुए है।

आज के युग में संत वेलेंटाईन शाश्वत प्रेम के प्रतीक के रूप में उजागर हो उठे हैं।

साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है। प्रायः प्रत्येक युग में प्रेम की कुछ ऐसी मिसालें कायम हो जाती है जिसे जमाना दीवानों की तरह याद करने लगता है। यह भी सत्य है कि प्यार करने का जुनून से भरा एक उम्र होता है। वही उम्र प्रेम को रामायण ,कुरान ,बाईबिल आदि की तरह पढ़ना और उसकी इबादत करना सिखाता है।

कामिनी कामायनी।

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