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रागिनी गर्ग की कविताएँ

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1.नारी शक्ति है....पुराणों में पढ़ते आये हैं ..
नारी शक्ति है....
बुजुर्गों से सुनते आये हैं... नारी शक्ति है....
शक्ति है तभी देती है जन्म...
सींचती है अपने दूध से.. ..
रग रग में भरती है लहू...
फिर भी अबला और बेचारी है...
एक छोटी सी शक की चिंगारी.... [ads-post]कर देती इसके दामन को तार तार.....
इस शक के आगे अहिल्या ; सीता भी हारी है.......
बहन बनकर ;माँ ;बनकर;बेटी
बनकर बीबी बनकर सब फर्ज निभाती है....
अपना जीवन अपने रिश्तों को सम्भालने में निकालती है.... तभी तो जीवनदेने वाले ने अपना अक्स उतारा है.....
पूजा करने के योग्य है....
फिर भी एक लड़की बोझ नजर आती है... ...
कोख में मौत की मजबूरी...
उसकी लाचारी है....
अब वक्त ने बदल ली है करवट... ऩ तो वो अबला है ना ही बेचारी है....
आसमान से करती है बातें.....
उसने अंतरिक्ष में जगह बना ली है.....
जिसने उसके सतीत्व पर बुरी नज़र डाली है उसने अपनी बरबादी लिखवा ली है....
दो घरों की लाज है...
दो कुलों को तारती है...
नारी से ही नर है... नारी से सृष्टि सारी है....नारी शक्ति है... शक्ति ही नारी है.........
यह बात समझ में आयेगी... पर तब आयेगी जब जीवनदायी नारी खत…

नवरात्र में नारी शक्ति की पूजा / रमेशराज

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क्वार सुदी प्रतिपदा से नवमी तक पवित्र मन के साथ अत्यंत संयम से नवरात्र में रखे जाने वाले व्रत में माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। प्रतिपदा के दिन प्रातः ही स्नानादि के उपरांत ‘दुर्गासप्तशती’ का पाठ नियमित रूप से हर दिन किया जाता है। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर 9 दिन तक ‘रामचरित मानस’ का पाठ करते है। नवरात्र के दिनों में अनेक स्थानों पर रामलीला और श्रीकृष्णलीला का भी भव्य आयोजन होता है। माँ दुर्गा के मन्दिरों की भव्य सजावट की जाती है। इन मन्दिरों और लीला स्थलों पर भक्तजनों की भारी भीड़ रहती है। क्वार सुदी अष्टमी को दुर्गाष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। इन दिन मंदिरों में भगवती दुर्गा को उबले हुए चने, हलुवा, पूड़ी, खीर आदि से भोग लगाकर प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस दिन महाशक्ति को प्रसन्न करने के लिये हवन आदि भी किया जाता है। जहाँ इस शक्ति की अधिक मान्यता है वहाँ यह त्यौहार एक उत्सव का रूप धारण कर लेता है। इस दिन कन्या लाँगुराओं को भोजन कराया जाता है। शक्ति की ज्योति की जय-जयकार की जाती है। माँ दुर्गा नारी की महाशक्ति की प्रतीक हैं। देवताओं पर जब-जब भी भीषण संकट आया, …

रोटियों से भी लड़ी गयी आज़ादी की जंग / रमेशराज

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कुछ कांग्रेस के पिट्टू इतिहासकार आज भी जोर-शोर से यह प्रचार करते हैं कि बिना खड्ग और बिना तलवार के स्वतंत्रता संग्राम में कूदने वाले कथित अहिंसा के पुजारियों के ‘आत्मसंयम, आत्मबल और स्वपीड़ा’ से भयभीत होकर आताताई और बर्बर अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हुए। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असली तस्वीर नहीं है। अगर आजादी सावरमती के संत के ‘ब्रहमचर्य के प्रयोगों’ के बूते आयी तो कांग्रेस उस काल के 1942 के जन आंदोलन को भारतीय जनमानस के सम्मुख क्यों नहीं लाती, जिसमें भले ही गांधी जी ने अहिंसात्मक आंदोलन किये जाने पर जोर दिया था, किंतु सरकारी दमन से विक्षिप्त और क्रुद्ध होकर कथित अहिंसा को नकारते हुए जनता ने अंग्रेजों के सरकारी 250 रेलवे स्टेशनों को नष्ट कर दिया। 600 डाकघरों को आग के हवाले किया। 3500 टेलीफोन और टेलीग्राम के तारों को काट दिया। 70 थानों को जलाकर राख किया। 85 सकारी भवनों को धूल-धूसरित कर डाला। 9 अगस्त 1942 से लेकर 31 दिसम्बर 1942 तक बौखलायी सरकार ने 940 स्वतंत्रता सेनानियों को गोलियों से भूनकर सदा के लिये संसार से विदा कर दिया। पुलिस और सेना की गोलियों की बौछार के बीच 1630 …

बालकथा / बन्दर और शीशा / शशांक मिश्र भारती

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सरयू रामगंगा के संगम के ऊपर एक बहुत बड़ा और घना जंगल था। जहां अनेक प्रकार के जानवर रहते थे। आस-पास छोटी -मोटी बस्तियां थीं। कभी-कभी गीदड़, खरगोश, हिरन जैसे जानवर गांवों के आस- पास भी दिख जाते थे। सामान्यतः गरमियों में जानवरों को पानी पीने के लिए नदियों की ओर आना पड़ता था। उत्पाती बन्दरों का तो कहना ही क्या ?जब भी अवसर देखा गांव पर धावा बोल दिया इस पेड़ से उस पेड़, फल-फूलों, पत्तों को नोचते- खाते और जंगल की ओर वापस चले जाते। कई बार इनके छोटे- छोटे बच्चे गांव वालों के कपड़े टांगने के लिए बंधे तारों पर पूरा सरकस दिखाते। डिशों को नचा- हिला सिने प्रेमियों का मजा खराब करते। कपड़े व अन्य सामान भी उठा ले जाते। एक बार किसी बन्दर के हाथ एक शीशा लग गया। उसने सोचा इसे ले चलता हूं। उसने गांव- घरों में लोगों को उसके सामने खड़ा देखा था। जब उसने भी ऐसा किया तो उसे अपनी तस्वीर दिखाई दी। सोचा यह तो बड़ी अच्छी वस्तु है साथ रखनी चाहिए। इसके बाद वह अपनी सूरत बार- बार देखता हुआ वापस जंगल की ओर जाने लगा। तभी पीछे से दूसरे बन्दर ने झपट्टा मरकर शीशा छीन लिया और भाग खड़ा हुआ। इस छीना झपटी में वह शीशा कहां गिर गया पता …

हनुमान मुक्त की हास्य-व्यंग्य कथाएँ

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अनैतिक कामआज कल शहरों में मैं देखता हूँ कि लोग फ्लेटों में रहते हैं। कोई पांचवी मंजिल पर तो कोई दसवीं पर। सिर्फ फ्लेट आपका है, छत आपकी नहीं। यदि छत पर घूमने का मानस बनाओ तो छत पर पहुंचने में ही नानी सपने याद आ जाएं। लिफ्ट से आप वहां पहुंच भी जाओ तो छत पर घूमने की जगह ही नहीं। बिल्कुल सटी हुई, आसपास रखी पानी की टंकियां। नीचे देख लो तो वही हार्ट अटेक हो जाए। नरेन्द्र कोहली ने अपने व्यंग्य सार्थकता में लिखा है कि एक दिन किसी फ्लेट में एक ब्रेसियर उडकर नीचे आ पड़ी थी और चौकीदार अपनी ईमानदारी में उसे ले जाकर प्रत्येक फ्लेट में जाजाकर पूछता फिर रहा था, ‘मेम साहब! यह बनियान आपकी है?’ मेम साहब ब्रेसियर को देखती और चेहरे पर झूठमूठ क्रोधित होने का नाटक कर चौकीदार को घूरती और दरवाजा उसके मुंह पर बंद कर देती। फटाक! बदतमीज चौकीदार! ब्रेसियर को हाथ में लिए महिलाओं से कोई ऐसे सवाल करता है? थोड़ी देर में सारी महिलाएं बालकनियों पर खड़ी होकर चौकीदार को देख रही होती कि कौन ब्रेसियर को स्वीकार करता है। जब चौकीदार नीचे मिसेज सिंह के पास पहुंचता है तो वे झपट कर ब्रेसियर छीन लेती हैं और दरवाजा बंद कर देती…

राम नरेश 'उज्ज्वल' की 45 बाल कविताएँ

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1-माँ के आँचल जैसी धूपसूरज की किरणें हैं फैली, बिखर गई फूलों की थैली, गरम-नरम यों हाथ फेरती, माँ के आँचल जैसी है धूप। . सबको अपने पास बुलाती, जाड़े में है हमें लुभाती, प्यार भरी मुस्कान निराली, सब पर छाती मीठी धूप। . नन्हें बच्चों की है साथी, नहीं किसी से बैर दिखाती, एक साथ है सब पर पड़ती, सुन्दर बड़ी सुनहली धूप। . जाड़े में सबको सुख देती, सर्दी मिनटों में हर लेती, इसी तरह सबके आँगन में, हरदम रहे थिरकती धूप। . 2-सब ताने सो रहे रजाईसर्दी फिर से आई भाई, निकले कम्बल और रजाई। कपड़े पर कपड़े हैं पहने, फिर भी सब पर ठण्डक छाई।। . पूरी रात रहे सिसियाते, सुबह-सबेरे नहीं नहाते। आग जला कर बैठ तापते, ठिठुर-ठिठुर कर समय बिताते।। . आठ बजे तक अब है सोना, मुन्नी-मुन्ना का ये कहना। आज नहीं है पढ़ने जाना, हमको बस लेटे ही रहना।। . ऐसी ठण्डक अबकी आई, सब पर अपनी धाक जमाई। नहीं किसी को काम सूझता, सब ताने सो रहे रजाई।। . 3- खुशी भरे दीवाली के दिन. दीवाली में हँसते-गाते रहते हरदम बच्चे। जेब भरी हो या खाली हो मस्त राम हैं सच्चे।। . दस दिन पहले दीवाली , उनके सपनों में आती। मजेदार रसगुल्ले खाते, सबके मन को भाती।। . स…

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