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20 मार्च गौरैया दिवस पर विशेष... गौरैया की बनी रहे फुदकन / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

20 मार्च गौरैया दिवस पर विशेष...

गौरैया की बनी रहे फुदकन

० एक थी गौरैया...न कहना पड़े

घर आंगन में फुदकने और चहकने वाली छोटी प्यारी से चिड़िया अब घर आंगन तो दूर बाग बगीचों में भी दिखाई नहीं पड़ रही है। इन चिड़ियों को हम गौरैया के नाम से जानते है। घर के अंदर बनाये जाने वाले इनके घोसलों को हम सौभाग्यवर्धक मानते रहे हैं, किंतु हम घोसलों का न होना उक्त प्यारे पक्षी के विलुप्ति पर होने की कहानी बयां करते माने जा सकते है। हमने पिछले कुछ वर्षों में गौरैया की कम होती संख्या पर चिंतन होते देखा है। यही कारण है कि प्रतिवर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाने लगा है। वैश्विक स्तर पर जहां गौरैया के लिए चिंतन गोष्ठियां हो रही है, वहीं हमारे देश में दिल्ली सरकार ने गौरैया को राज्य पक्षी घोषित कर संरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया है। वास्तव में हमारी अत्याधुनिक जीवनशैली और ऊंचे महलों में रहने की इच्छा के चलते ही बहुमंजिली ने गौरैया के ठिकानों को समाप्त कर दिया है। पुराने घरों के कवेलू वाली छतों के नीचे गौरैया अपना घोसला आसानी से बांस के सहारे बना लिया करती थी। कीट पतंगों को अपना भोजन बनाने वाली गौरैया को घास के बीच काफी स्वादिष्ट लगते है, जो शहर में नहीं मिल पा रहे है। यही कारण है कि अपने भोजन और घोसलों की तलाश में गौरैया हमारे घरों सहित शहरों को छोड़ रही है, और हमारे लिये गौरैया का साथ बड़ी चुनौती के रूप में दिख रहा है। मोबाईल टॉवर की तरंगे गौरैया के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध हो रही है।

गौरैया को पाने करने होंगे इंतजार

अपने बीच गौरैया के चहल कदमी को पुनः पाने के लिए अब हमें कुछ संकल्प लेने होंगे। गौरैया के लिए संकट की इस घड़ी में उसे अपने घर आंगन में बुलाने के लिए हमें मिल जुलकर कार्य करने की जरूरत है। हमें सोचना होगा कि आखिर इस छोटी से पक्षी गौरैया को ऐसा क्या हुआ कि उसने हमारा साथ छोड़ने का मन बना लिया, या हमने ही अपनी जीवनशैली में ऐसा परिवर्तन कर डाला जो गौरैया को नागवार गुजरा। जी हां! वही गौरैया जो हर घर आंगन की रौनक हुआ करती थी। अब चंद घरों की मेहमान बन कर रह गयी है। एक वह समय भी था कि जब सुबह की अंगड़ाई हम इन्हीं पक्षियों की चीं-चीं के बीच लिया करते थे। इतना ही नहीं सूरज ढलते ही हमारे बीच पुनः इनकी फौज मंडराने लगती थी। अब उसी आवाज को सुनने हमारे कान तरस रहे है। हमे अपने घरों में इनके अस्तित्व को बनाये रखने कुछ स्थान रिक्त रखना होगा, ताकि वे अपने घोसला बिना किसी भय के बना सके। अपने घरों की छतों पर अब पहले की तरह महिलाएं न तो गेंहू को धोकर सुखाती है और न ही धान कुटती है। इस तरह के काम से उन्हें भोजन की प्राप्ति हो जाया करती थी। घरों में टाईल्स और संगमरमर को उपयोग होने से उन्हें रहने के लायक वातावरण भी नहीं मिल पा रहा है। इसी तरह खेतों में कीट नाशकों का बहुतायत में प्रयोग कीट पतंगों को मार जाता है, जो वास्तव में गौरैया का भोजन बना करते थे।

कहीं इतिहास न बन जाये गौरैया

बीते एक से डेढ़ दशक में गौरैया की संख्या में भारी कमी देखी गयी है। पक्षी वैज्ञानिकों की माने तो गौरैया की जनसंख्या में 60 से 80 प्रतिशत की कमी आयी है। समय रहते इनके संरक्षण के प्रयास न किये गये और उचित वातावरण न दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब गौरैया इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जायेगी। यह कहने में भी संकोच नहीं कि हमारी अगली पीढ़ी इसे देख भी नहीं पाएगी और हम उन्हें चित्र दिखाकर कहानी सुनाते पाये जायेंगे कि-एक थी चिड़िया...उसका नाम था गौरैया... और न जाने क्या-क्या...। ऐसी ही भयावह स्थिति के चलते ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स ने हमारे देश सहित विश्व के विभिन्न भागों में पहुंचकर किये गये अनुसंधान के आधार पर गौरैया को रेड लिस्ट में डाल दिया है। आंध्र विश्व विद्यालय द्वारा कराये गये एक सर्वे के अनुसार गौरैया की आबादी में 60 प्रतिशत की कमी आयी है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मो. ई. दिलावर का कहना है कि गौरैया के विषय में जागरूकता पैदा करना जरूरी है। उनकी चिंता इस बात को लेकर देखी जा रही है कि घरों में गौरैया के घोसलों को ठीक ढंग से बनाये जाने से पूर्व ही उजाड़ दिया जाता है। बच्चे इनके नाजुक पैरों पर धागा बांधकर छोड़ देते है, जिससे कई बार पेड़ की टहनियों में अटक जाने से गौरैया की मौत हो जाती है। गौरैया के इतिहास को बरकरार रखने के लिए हमें अपने घरों में ऐसे स्थान उपलब्ध कराने होंगे, जहां गौरैया आसानी से अपना आशियाना बना सके। अन्यथा हमें यह कहते देर नहीं लगेगी कि एक थी गौरैया... अर्थात वह पन्नों और कहानियों में सिमट कर रह जायेगी।

साहित्यकारों ने भी भावनाओं में पिरोया

हमारे घर आंगन में चहकने वाली छोटी एवं प्यारी सी गौरैया चिड़िया हमारे बच्चों को ही नहीं लुभाती वरन यह साहित्यकारों के लेखनशैली का माध्यम भी रही है। हमारे साहित्यकारों ने लोकगीतों में इसी प्यारी चिड़िया को फुदकती देखकर आत्मीयता का अहसास किया है। गौरैया की विभिन्न क्रियाओं को कवियों और साहित्यकारों ने अपने-अपने ढंग से चित्रित करने का प्रयास किया है। प्रसिद्ध कवि घाघ-भड्डरी की कहावतों में गौरैया के धुल स्नान को प्रकृति और मौसम से जोड़कर कुछ इस तरह कलमबद्ध किया गया है-

कलसा पानी गरम है, चिड़िया नहावै धूल।

चींटी लै अंडा चढ़ै, तौ बरसा भरपूर।।

कवि भड्डरी कहते है कि गौरैया जब धुल में स्नान करें तो यह मानना चाहिए कि बहुत तेज बारिश होने वाली है। कवि मंगल सिंह सुमन ने भी-मेरे मटमैले आंगन में फुदक रही प्यारी गौरैया...जैसी रचना में गौरैया के महत्व को संवारा है। आंचलिक भावों के कवि कैलाश गौतम के फाल्गुनी दोहे-बड़की भौजी जैसी कविताएं खूब पसंद की जाती है। उनकी ऐसी ही एक कविता भाभी की चिट्टी में कुछ ऐसा कहा गया है-

सिर दुखता है, जी करता चूल्हे की माटी खाने को।

गौरैया घोसला बनाने लगी ओसारे देवर जी।

गौरैया को बचाने की मुहीम सिर्फ जुबानी ही न हो बल्कि जमीनी भी है। हम सिर्फ चर्चा ही न करें, बल्कि उस पर अमल भी करें। आधुनिक होते हमारे रिहायशी आशियानों में कुछ जगह इनके लिए भी दें।

प्रस्तुतकर्ता

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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