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प्राची - जनवरी 2017 : सौभरि से योगीराज तक / विवेक प्रियदर्शी

आलेख

सौभरि से योगीराज तक

विवेक प्रियदर्शी

राधाकृष्ण द्वारा लिखित ‘रूपान्तर’ पौराणिक कथानक पर लिखा गया एक विलक्षण उपन्यास है. यह मूल रूप से सौभरि ऋषि की गाथा है, जिसमें विपरीत रंग भरने के लिए, राजा

मान्धाता की कहानी भी डाली गई है. प्रारंभ में राजा मान्धाता और सौभरि दो विपरीत ध्रुवों की भाँति प्रतीत होते हैं. एक ओर अपनी मदान्ध सेना के बलबूते सम्पूर्ण विश्व को जीत लेने वाले महाराजाधिराज हैं, जो अथाह सांसारिक ऐश्वर्य से भरे-पूरे हैं, तो दूसरी ओर अपनी कठोर तपस्या के बल पर ‘काल’ को जीतने वाले योगीराज हैं, जो अनेक सिद्धियों से लदे-फदे हैं. तलवार के दम पर समस्त ब्रह्मांड को जीतने की लालसा रखने वाले मान्धाता की क्रूरता की कहानियाँ, गेन्द की भाँति सैनिकों के पैर से टकराते उनके शत्रुओं के कटे मस्तक और बहती हुई लोहू की धार बतलाती थी, तो कठोरत्तम तपस्या के दम पर ‘परम तत्व’ या ‘आत्म तत्व’ की प्राप्ति में भिड़े सौभरि की निष्ठुरता का साक्ष्य उनका अपना शरीर ही दे रहा था. मान्धाता और सौभरि दोनों ही संकल्पित होकर लक्ष्य प्राप्ति के प्रयास में व्यग्र हो रहे थे. भले ही उनके मार्ग और साधन भिन्न थे, परन्तु दोनों का साध्य एक ही था ‘पाना’. अतः स्वर्ण के ढेर पर बैठे मान्धाता जिस अतृप्तता से पीड़ित थे, हुबहू वही स्थिति सिद्धियों के टीले पर विराजमान सौभरि की भी थी. यह विस्मयकारी है कि दोनों के मार्ग अलग थे, साधन और औजार अलग थे, यहाँ तक कि दोनों की रणभूमि भी अलग थी, फिर भी दोनों की मानसिक स्थिति एक ही धरातल पर जा पहुँचती है.

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उधर मान्धाता अपनी पत्नी से कह रहे हैं, ‘‘इन्दुमती, मैं शान्ति चाहता हूँ.’’ इधर सौभरि अपने कुटीर का द्वार बन्द कर पद्मासन में बैठकर धीरे से कहते हैं, ‘‘परमात्मा मुझे शान्ति दो.’’ अलग-अलग घाटों पर भी एक ही प्यास, या यूँ कहा जाए कि अलग-अलग युद्धों में भी एक समान जख्म. और यहीं पर दोनों की कातरता या दीनता भी झलकती है. उधर इन्दुमती विचारती है, ‘‘सारे संसार को जीतने वाला मान्धाता, अपने आप से कितना परास्त है.’’ वहीं सौभरि ने स्वयं ही महसूस किया, ‘‘अपने आप को जीतना कितना कठिन है.’’ पृथक रणक्षेत्रों में भी एक ही तल पर खड़े थे दोनों योद्धा.

जिस तरह जॉर्ज बर्नाड शॉ ने ‘आर्म्स एण्ड द मैन’ के माध्यम से युद्ध, सैन्य जीवन और बहादुरी से सम्बन्धित रूमानी कल्पनाओं (छवियों) को ध्वस्त किया है, ‘‘युद्ध कोई रूमानी आकर्षण वाली चीज नहीं है, बल्कि यह एक बदसूरत और दुखी करने वाला कार्य है. सिपाहीगिरी यश देने वाला कोई शानदार कर्म नहीं है, बल्कि यह कायरों की भाँति लड़ने वाली चीज रह गई है.’’ इसी प्रकार से राधाकृष्ण ने भी शासकों और ऋषियों के सम्बन्ध में प्रचलित धारणाओं पर जोरदार प्रहार किया है. मान्यताओं और यथार्थ के बीच जितना बड़ा फासला हो सकता है, इसे बहुत ही खुबसूरती से उन्होंने दिखलाया है.

‘नश्वरों में सर्वाधिक सुखी’ समझा जाने वाला मान्धाता, अन्दर से कितना उद्विग्न और पीड़ित था, यह तो वह ही अनुभूत कर रहा था. उसी प्रकार तप के मार्ग पर निर्दयता से अपने शरीर को गलाने वाले योगीराज, कामदेव की पगध्वनि मात्र से ही किस प्रकार आतंकित और त्रस्त हो गए थे, यह तो उनका अंतर्मन ही समझ रहा था. उनके जीवन भर की जमा पूँजी, ‘काम’ की हल्की सी सिहरन मात्र से ही, लुट जा रही थी. उनकी तपस्या का पहाड़, ‘काम’ की स्फुलिंग के सामने, भूसे के ढेर की भाँति खाक न हो जाए, इस आशंका से वे त्राहि-त्राहि कर रहे थे. उनकी मानसिक व्यथा का भी अत्यंत सजीव चित्रण लेखक ने किया है.

इसके बाद सौभरि की जीवन गाथा आगे बढ़ती है. गीता में कृष्ण ने कहा है, ‘‘जो अज्ञानी व्यक्ति हैं, वे तपस्या के नाम पर अपने शरीर को भी यान्त्रणा देते हैं और शरीर में स्थितमुझ परमात्मा को भी कष्ट देते हैं।’’ अपने एकांगी दृष्टिकोण के वशीभूत सौभरि उस समय शरीर को उपेक्ष्य समझकर, उसे भीषण कष्ट दिए जा रहे थे. उस समय उनके मन में ‘स्वीकार्य’ और ‘त्याज्य’ के बीच विभाजनकारी लकीर थी, जिसके कारण उन्हें शरीर में स्थित परमात्मा का आभास नहीं हो पा रहा था. उनकी स्थिति कबीर की पंक्तियों-

‘‘कस्तुरी कुंडली बसै, मृग ढूंढे वन माहि।

ऐसे घटि-घटि राम हैं, दुनिया देखे नाहि।।’’

की भाँति थी. अज्ञानता के उस दौर में ऋषिवर, मणिकूट ऋषि की पाल्या ‘भद्रा’ से भी अधिक मूढ़ दिखाई पड़ते हैं. अपने नेत्रों से ही संसार देखनेवाली भद्रा ने, सौभरि के शिष्य नाभाग से कहा था, ‘‘अगर ब्रह्म सत्य है, तो सब सत्य है, और अगर सब मिथ्या है, तो ब्रह्म भी मिथ्या है।’’

धौम्य ऋषि का आगमन सौभरि ऋषि के जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना है. धौम्य ने शरीर और संसार के प्रति सौभरि के दृष्टिकोण को नकारते हुए अध्यात्म का सही अर्थ बतलाया. उन्होंने सौभरि के मन में फैले अंधियारे को दूर करने के लिए ज्ञान का दीप जलाया, ‘‘सृष्टि में कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं. प्रत्येक वस्तु में उसी प्रभु का आभास मिलता है. भगवान की दृष्टि में कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं. किसी भी वस्तु में परमतत्व को देखा जा सकता है, उससे घृणा नहीं की जा सकती.’’

धौम्य का यह कथन बरबस ही गीता की याद दिलाता है, जिसमें कृष्ण कहते हैं, ‘‘सभी जीवों में ब्रह्म का अंश है. जिस ज्ञान से व्यक्ति, प्राणियों के अलग-अलग रूपों में, एक अखंड अविनाशी ब्रह्म को समाया हुआ देखता है, वह सात्विक ज्ञान है.’’ परन्तु सौभरि थे कि मानकर भी नहीं माने.

आखिरकार सरोवर के भीतर उन्हें तप करते देखकर मछलियों ने जब उनकी सोच और कृत्य का उपहास किया, ‘‘यह ऋषि हमारी तरह आनंद में मग्न क्यों नहीं है? क्या शरीर इसलिए है कि वह निश्चेतन बना दिया जाए? यह विचित्र व्यक्ति वह काम करना ही नहीं चाहता, जो काम भगवान इससे लेना चाहते हैं.’’ तब जैसे गर्म लोहे पर निर्णायक चोट पड़ी. उन्होंने निश्चय किया कि अब वे गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर परमात्मा की विविध लीलाओं को देखेंगे. परन्तु गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के उनके निर्णय का स्वागत किसी ने भी नहीं किया. उनके शिष्य नाभाग तक की नींद उड़ गई और वह विचारने लगा, ‘‘यह वैराग्य, प्रभु के प्रति यह भक्ति, योग की यह

साधना, क्या यह सब झूठ ही हैं? क्या कन्या से परिणय ही चरम सत्य है? गृहस्थाश्रम में जाने का उन्माद ही क्या योग की अंतिम परिणति है?’’

सही मायनों में अब आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर चुके सौभरि ऋषि इन बातों का उत्तर यूँ देते हैं, ‘‘ज्ञान और अज्ञान में तनिक सा ही अन्तर होता है। तुम कदाचित सोचते हो कि मैं प्रभु से विमुख हो रहा हूँ और मैं आशा करता हूँ कि गृहस्थ जीवन में ही मैं प्रभु का सच्चा प्रकाश देख पाऊँगा. तुम समझते हो कि मैं अपनी तपस्या से च्युत हो रहा हूँ, पर मैं देखता हूँ कि मेरी तपस्या अपनी पूर्णता को पहुँच चुकी है. मैं तो मुक्ति का मार्ग समझकर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहता हूँ.’’

ऋषि के इस निर्णय पर राजकुमार मुचकुन्द की, अपने पिता मान्धाता को समझाने के क्रम में कही गई बातें भी काफी गहरी अर्थवत्ता रखती हैं, ‘‘कौन तपस्या से च्युत है और कौन तपस्या के मार्ग पर है, इसका निर्णय बाह्य आचरण को देखकर नहीं किया जा सकता. इसकी कसौटी हमारे पास नहीं है.’’

इतनी गंभीर बातों का राधाकृष्ण ने इतने खुबसूरत तरीके से वर्णन किया है कि पाठक कथा के प्रवाह में बहता ही चला जाता है. पौराणिक कथानक के लिए उपयुक्त शब्दावली का चयन करते हुए भी उन्होंने इतने सहज और सरल वाक्यों की रचना की है कि एक बार इस उपन्यास को पढ़ना शुरू करने के उपरान्त पाठक समापन पर पहुँच कर ही रुकता है.

सौभरि के चरित्र को लेकर तथा सौरभि के कथन के लिए राधाकृष्ण ने जिन वाक्यों को रचा है, वे तो किसी मंत्र की भाँति गहरे और बारम्बार दुहराने योग्य हैं, ‘‘वह परमतत्व निर्गुण होकर भी सगुण है और गोपन ही उसकी प्रकटता है. जो प्रकट है, उसमें वह गोपन हो जाता है.

पहले केवल मैं था, उस ‘तुम’ के बिना ‘अपूर्ण’. जब ‘तुम’ को मैंने सब कुछ सौंपा, तो ‘तुम’ ही ‘मैं’ बन गया. ईश्वर ने जगत बनाया, सीमाएँ नहीं बनाईं. अब ‘बूँद’ को महासागर में मिल ही जाना होगा. सच्चा ऐश्वर्य तो लोभ के परित्याग में है. संशय के साथ जो कुछ सीखा और समझा जाता है, वह मन को पूर्ण सन्तोष नहीं दे पाता. जीवन तो वही है, जहाँ कोई भी अभाव न हो. जीवन में अपना और पराए का भेद नहीं. वही अपना है और वही सबका है. नाम अलग है, रूप दूसरा है, पर है वही एकदम वही.

जीवन के अतिरिक्त यहाँ और है ही क्या? जीवन के इस क्षेत्र में मृत्यु कहाँ? नए से नूतन होते हुए फिर उसका रूपान्तर हो जाता है. सर्वत्र आनन्द ही आनन्द बिखरा पड़ा है.

आत्मा शुद्ध-बुद्ध चिरन्तन है. वह तो मुक्त है ही, फिर उसकी मुक्ति क्या? मुक्त को कैसे मुक्त किया जाएगा?’’

यहाँ सौभरि स्वयं अपनी अज्ञानता को भी स्वीकारते हैं, ‘‘पहले मैं भी अज्ञान में लीन था. अपनी तपस्या को उग्र से उग्रतर बनाता हुआ जैसे प्रभु से छूटा जा रहा था. जब बुद्धि से अज्ञान दूर होता है, तब कर्म के फल में आसक्ति भी नहीं होती. जड़ जगत में ही दिव्य छटा को देख लो, फिर तुम्हारे लिए कुछ भी शेष नहीं रह जाता.

मन ही बन्धन है, मन ही मुक्ति है. सत्य वही है, केवल वही. वही एक है, वही अनेक भी है.’’

इन भावों के साथ सौभरि क्षितिज से भी कहीं आगे बढ़ जाते हैं. वे उस अंतरीक्ष में पहुँच जाते हैं, जहाँ न कहीं पूरब है और न कहीं पश्चिम. वहाँ तो दिशाएँं ही लोप हो जाती हैं. उस अंतरिक्ष में न तो कभी सूरज उगता है और न कभी डूबता है.

सम्पर्कः न्यू एरिया,

पहली गली, हजारीबाग (झारखण्ड)

मोः 9431152619, 9835754519

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