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प्राची - जनवरी 2017 : निराला आत्महंता आस्था : दूधनाथ सिंह / राजकिशोर राजन

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निराला आत्महंता आस्था : दूधनाथ सिंह

राजकिशोर राजन

दूधनाथ सिंह की, निराला आत्महन्ता आस्था को कॉलेज के दिनों में पहली बार देखा था और इसके नामकरण ने चौंकाया था. निराला के ऊपर अब तक जो पढ़ा था उमड़ने-घुमड़ने लगा था. फिर किताब पढ़ी तो पता चला कि निराला के साथ आत्महंता आस्था का संयोग क्यों है और आज भी निराला के ऊपर लिखी हुई आलोचनात्मक पुस्तकों में यह असंदिग्ध क्यों बनी हुई है. यह पुस्तक निराला के निष्ठावान अध्येता और उन पर विलक्षण कार्य करने वाले डॉ. रामविलास शर्मा को समर्पित है. दूधनाथ सिंह ने इस पुस्तक की भूमिका में स्पष्ट किया है कि ‘यह पुस्तक मेरे उन्हीं नोट्स का क्रमबद्ध रूपान्तरण है : अपने निजी आनंद की अभिव्यक्ति है और निराला की रचनाओं तक पहुँचने के लिए बनाया गया एक निजी और नया द्वार भी है.’ निराला के ऊपर लिखी आलोचनाओं, जीवनी आदि के संदर्भ में यह पुस्तक एक निजी और नया द्वार के कारण महत्वपूर्ण है. इसके प्रथम संस्करण का प्रकाशन सन् 1972 में हुआ था और अब तक इसके आठ संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं, इसी से इस पुस्तक की लोकप्रियता समझी जा सकती है.

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इस पुस्तक में निराला के साथ अन्य कवियों और लेखकों के संबंध में प्रकारांतर से जो टिप्पणियाँ है वे भी मूल्यवान हैं. उदाहरण स्वरूप महादेवी के संबंध में एक टिप्पणी देखी जा सकती है- ‘उनका विकास एकतान, सीधा, सहज और सर्वत्र समान है. न तो निराला की तरह वहाँ लहरें हैं, न पंत की तरह कई शुरूआतें और न प्रसाद की तरह सजग, निर्मित जीवनदर्शन और विराट् काव्योद्देश्य. लेकिन भावना की गहनतम सचाई के कारण यदि निराला के अंतःसंगीत के निकट इन सभी कवियों में कोई है तो वह महादेवी ही हैं.’’ इस स्थापना के बाद निराला काव्य की तुलना करते हुए दूधनाथ सिंह लिखते हैं कि ‘निराला की हर रचना एक संपूर्ण स्वतंत्र जीवन-दृष्टि है. वे अपने समकालीन इन तीनों कवियों की अपेक्षा अधिक आत्मस्थ, निजत्वपूर्ण और गतिशील कवि हैं- यद्यपि उनका काव्य अर्थ- प्रसार से एक सनातन मौन की ओर ले जाता है।’ (पृ. 26-27) निराला की रचना प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए दूधनाथ सिंह की स्थापनाएं विचारणीय हैं. कहीं-कहीं असहमति हो सकती है परन्तु मेरा मानना है अधिकांश स्थापनाएं निराला को समझने की दृष्टि से विचारणीय हैं. ‘अन्तसंगीत’ के अंतर्गत वे लिखते हैं कि ‘निराला की रचनात्मकता का श्रेष्ठतम प्रतिफलन अपने निजत्व की समीपतम पहचान की अभिव्यक्ति में हुआ है. अपने जीवन विम्ब और काव्य विम्ब को एकमेक कर देने के कारण ही उनके काव्य में वह गहराई आ सकी है, जो धीरे-धीरे पर्त-दर-पर्त खुलती है. इस रूप में निराला हमारे निजी क्षणों के निजी (प्राइवेट) कवि बन जाते हैं.

इस पुस्तक को 7 अध्यायों (सही अध्ययन दृष्टिः स्थापना, अन्तःसंगीत, लंबी कथात्मक कविताएं, राष्ट्रय उद्बोधन, काव्य-अभिजात्य से मुक्ति का प्रयास, ऋतु प्रार्थनाएं, प्रपत्ति भाव) में बाँटा गया है. इस पुस्तक के जरिए निराला के काव्य सत्य को जाना जा सकता है तो काव्येत्तर सत्य को भी. दरअसल, किसी एक सत्य से किसी भी साहित्यकार का मूल्यांकन एकांगी ही हो सकता है. रचना के सच तक भलीभाँति पहुँचने के लिए रचनाकार के जीवन को भी जानना जरूरी है क्योंकि रचना तो उसी का प्रतिफलन है. इस पुस्तक में निराला के दोनों सत्यों से हमारा साक्षात्कार होता है. औपचारिकता की हदों को तोड़ती हुई इस पुस्तक के माध्यम से निराला क्यों दूसरे छायावादी कवियों से विरोधी दिशा के कवि हैं? क्यों उनको बने-बनाये काव्य-सिद्धांतों में ‘फिट-इन’ नहीं किया जा सकता? क्यों उनकी रचनात्मकता का अध्ययन करने के लिए कालक्रम का आधार बेमानी ठहरता है? और ऐसे ही बहुत सारे अन्य प्रश्नों का समाधान प्राप्त हो सकता है.

सम्पर्कः 59, एल.आई.सी. कॉलोनी,

कंकड़बाग, पटना-20

मो.-7250042924

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