सोमवार, 6 मार्च 2017

प्राची - जनवरी 2017 : कहानी / मां-बेटी / राधाकृष्ण

धरोहर कहानी

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जीवन परिचय

हिन्दी कथा-साहित्य को संख्या से ही नहीं, वरन् शैली, स्वरूप और वस्तु की दृष्टि से भी राधाकृष्ण ने एक नई और महत्वपूर्ण दिशा का संकेत कराया है. प्रेमचंद जैसे कथा-सम्राट ने राधाकृष्ण के संबंध में कहा था- ‘हिन्दी के उत्कृष्ठ कथा-शिल्पियों की संख्या काट-छांटकर पांच भी कर दी जाए तो उनमें एक नाम राधाकृष्ण का होगा. प्रेमचंद ने सात कथाकारों के परिचय कराने संबंधी कहानी संग्रह ‘सप्त सरोज का प्रकाशन करवाया था. उन सात कथाकारों में राधाकृष्ण भी एक थे.

प्रेमचंद-धारा के एक लेखक के रूप में राधाकृष्ण की पहचान प्रेमचंद के जीवनकाल में ही बन चुकी थी. प्रेमचंद के निधन के बाद राधाकृष्ण ने ‘हंस’ पत्रिका का भार उनके उत्तराधिकारी के रूप में सम्हाली थी.

वह ‘राधाकृष्ण’ और ‘घोस बोस बनर्जी चटर्जी’ दो नामों से लिखा करते थे. घोष बोस बनर्जी चटर्जी नाम से हास्य-व्यंग्य और राधाकृष्ण नाम से गंभीर एवं अन्य विद्यागत रचनाएं. उन्होंने 1929-30 के वर्ष में हास्य लेखक जी.पी. श्रीवास्तव की परम्परा में परिवर्तन करते हुए उसे सामाजिक सरोकार से जोड़ने संबंधी महत्वपूर्ण कार्य किया था और उसमें प्रेमचंदीय प्रतिबद्धता प्रदान की थी. आज भी उसी परंपरा को निभाया जा रहा है. इस प्रकार राधाकृष्ण परवर्ती हास्य-व्यंग्यकारों के पुरोधा भी बन जाते हैं. राधाकृष्ण का व्यंग्य उपन्यास ‘सनसनाते सपने’ को आधुनिक हिंदी साहित्य का पहला व्यंग्य उपन्यास होने का गौरव प्राप्त है.

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राधाकृष्ण का रचना-कर्म 1929 से 79 तक विस्तृत है. इनकी प्रारंभिक कहानियां 1927-28 के वर्ष में हस्तलिखित पत्रिका ‘विवेचन’ और ‘वाटिका’ में प्रकाशित होती रही थीं. इसी समय राधाकृष्ण की कहानियां महावीर, भविष्य, हिंदी गल्पमाला, जन्मभूमि आदि प्रसिद्ध पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं और देखते-देखते वह हिंदी के अप्रतिम कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हो गए.

राधाकृष्ण ने महावीर, संदेश, माया, हंस, कहानी, झारखंड, आदिवासी पत्रिकाओं का सम्पादन किया था. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इनकी अधिकांश रचनाएं अब तक संकलित हैं. 18 सितंबर, 1910 को रांची में जन्में राधाकृष्ण का निधन 3 फरवरी, 1979 को हुआ था.

रचना में रचनाकार का व्यक्तित्व भी झलकता है. चूंकि राधाकृष्ण का आरंभिक जीवन कष्टमय बीता था. गरीबी के अभाव को भोगा भी था. इसलिए उनका कथा लेखन का भावपक्ष वंचित-उपेक्षित जीवन के प्रति संवेदना उभारते हुए विसंगतियों की ओर संकेत कराने की रही थी. इस तरह का उनका कथा लेखन समाज की विसंगतियों और जाने-अनजाने उनसे जूझते व्यक्ति की विवशता का दस्तावेज भी बन जाता है. 1932 में प्रकाशित उनकी कहानी मां-बेटी इस संबंध में उल्लेखनीय है.

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कहानी - मां-बेटी - राधाकृष्ण

लेबी की तरह घुमौवेदार बनारस की पेचीली और संकीर्ण गलियों को बहुतों ने देखा होगा. उन्हीं में से एक गली में

माधवी अपनी एक मात्र बालिका के साथ रहती थी. उसके विषय की पुरानी बातों को प्रायः सभी लोग भूल गये थे, शायद

माधवी भी भूलती जाती थी. केवल पड़ोस का मिठुआ इक्केवान जब ताड़ी पी लेता था फिर अफीम की गोली खाकर ऊपर से गांजे का दम लगा लेता था, तो अपने मुहल्ले का सम्पूर्ण अतीत इतिहास उसके जीभ की नोंक पर पहुंच जाता था. मुहल्ले का रामधनी कैसा चारामंडल और किस प्रकार बेईमानी से अपनी सास का रुपया हजम करके मालदार बन गया, पंडित दीनानाथ इतने ज्ञानी गिने जाते हैं उन्हें भी अपनी पतोहू की इज्जत लेते लाज नहीं आई, इत्यादि बातें वह अपनी मित्रमंडली के सामने सगर्व सिर उठाकर कहा करता था. माधवी के विषय में वह कहता था, यह थी किसी भले घर की लड़की. बचपन से

विधवा थी. अपने देवर के साथ नरक में डूब गई. उसी को साथ लेकर भाग आई बनारस में. यहीं आकर रहने लगी. जब तक गहना-पुरिया रहा, दोनों मजा उड़ाये, फिर गहना घटते ही देवर साला भाग गया और तब से माधवी यहीं है. आज उसको भागे बारह-तेरह वर्ष होते हैं, लेकिन वह ऐसा कमीना निकला कि बिचारी की खबर तक न ली. अब कुटौना-पिसौना करके गुजर करती है, अपने पापों को रोती है, इत्यादि.

माधवी की लड़की का नाम था मनोरमा. वह उसके पाप की बेटी थी. माधवी उसे पाप ही के समान छिपाकर रखती थी और पाप से भी छिपा कर रखना चाहती थी, डर था कहीं संसार की दूषित हवा उसे स्पर्श न कर ले. और मनोरमा लड़की क्या था, देवी थी. बात-चीत-रंगरूप में लाखों में एक थी.

सीधी इतनी कि सिर उठाकर बात भी नहीं करती. उससे मां का दुःख देखा नहीं जाता था. दूसरों के मुखों की ओर देखती और फिर अपनी मां को देखती, तो रो देती. सभी के घर में कमाने वाले बाप हैं, भाई हैं, लेकिन यहां कोई नहीं. दिन भर जान लड़ाकर काम करने पर भी रात को भर पेट रोटी नहीं मिलती. मनोरमा के हृदय में एक दर्द उठता था, हाय! यदि वह किसी प्रकार अपनी मां को सुखी कर सकती?

वह प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके तुलसी चबूतरा के निकट ‘हनुमान-चालीसा’ का पाठ किया करती थी और हाथ जोड़कर वेदना भरे कोमल कराठ से, यही कामना करती थी, हे माता तुलसी, हे सूरज-नारायण, मेरी मैया को सुखी करो, दुनिया उसे दुतकारती है लेकिन तुम तो उसे समझती हो, आदमी की आंखें बंद हैं तो तुम देवता होकर अपनी आंखें मत बंद करो. मनोकामना पूरी होने पर मैं तुलसी चबूतरा को पक्के का बनवा दूंगी और कातिक का छठ किया करूंगी.

किंतु आज तक न तो मनोरमा की मनोकामना पूरी हुई और न सूर्य भगवान को छठ का अगरौटा खाने को मिला.

मनोरमा के मुखमंडल पर न जाने कौन सा अलौकिक भाव था और माधवी के हृदय में न जाने कितनी करुणा. मनोरमा को देखते ही उसके अंतर का स्नेह करुण-भाव से हाहाकार करके रो उठता था. हाय! इस अभागिनी का जीवन कितना दारुण, कितना चिपादमय और कितना करुण है? वह मनोरमा से बड़ा स्नेह करती थी. कोई काम नहीं करने देती. मनोरमा अपनी माता को किसी काम में सहायता देने भी जाती तो माधवी उसे रोक कर कहती, रहने दे बेटी, तू जन्म की अभागिन है, तुझे कुछ सुख नहीं दे सकती तो किस मुंह से काम लूं?

आज ‘भैयादूज’ है. मुहल्ले की स्त्रियां बड़े उमंग में थीं. उस दिन स्त्रियां गोबर से यम-देवता की मूर्ति बनाकर उसका सिर कूट-कूटकर अपने माताओं की मंगल कामना करती हैं. मनोरमा का कोई भाई नहीं था. वह उदास बैठी थी, यदि मेरा भी कोई भाई होता तो उसके लिए पूजा करती, प्रसाद खिलाती. सहसा उसने देखा कि मंगला अपने हाथ में एक थाली लेकर उसमें पूजा का सामान सजाये चली जा रही है. उसके हाथ में पूजा का सामान देखकर मनोरमा को आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसके भी कोई भाई नहीं था. मंगला को बुला कर बोली, ‘‘क्यों बहिन, यह पूजा का सामान किसने लिए ले जा रही हो?’’

मनोरमा से अवस्था में मंगला बड़ी थी, किंतु वह भी उसे बहिन ही कहा करती थी. उसने उल्लाख पूर्वक कहा, ‘‘मैं पूजा करूंगी बहन!’’

मनोरमा ने पूछा, ‘‘किसके लिए?’’

मनोरमा के इस सरल प्रश्न को सुनकर मंगला जोर से हंस पड़ी. बोली, ‘‘मेरा कोई अपना भाई नहीं है तो इससे क्या, मौहल्ले वाले तो हैं. गोवर्धन भइया के लिये पूजा करूंगी. जितबाहन भइया के लिये पूजा करूंगी. अपना भाई नहीं होने पर भी ये लोग मुझे अपने भाई से भी बढ़कर मानते हैं. क्या अपने मां के पेट से जन्मा हुआ भाई ही भाई कहलाता है? जिसको भइया कहके प्रसाद खिलाऊंगी वही खायेगा.’’

मनोरमा का मन ललक उठा, मैं भी पूजा करूंगी. उसके कानों में मंगला के शब्द गूंजने लगे, जिसको भइया कहके प्रसाद खिलाऊंगी वही खायेगा. बड़े यत्न से उसने कई आने पैसे जमा कर रक्खे थे, उसी का प्रसाद खरीद लाई और बड़े विस्तारपूर्वक पूजा का आयोजन करने लगी. यमराज महोदय का सिर कूटने के लिये मूसल बड़ा उपयुक्त जान पड़ा, उसे धोकर आंचल से पोंछ रही थी कि माधवी व्यस्त हो कर बोली, ‘‘यह पूजा तू किसके लिये कर रही है बेटी! क्या तेरे भी कोई भाई है? भैयादूज तो वही मानती है जिनके कोई भाई रहते हैं. बेटी, तू बड़ी अभागिन है, तेरे भाई-बाप मामा-नाना कोई नहीं है.’’ कहते-कहते माधवी का कराठ-स्वर सजल हो गया.

मनोरमा ने मंगला से सुनी हुई बात को दुहरा दिया, ‘‘क्या अपनी मां के पेट से जन्मा हुआ भाई ही भाई कहलाता है? जिसको भइया कहके प्रसाद खिलाऊंगी वही खायेगा.’’

माधवी चुपचाप स्तब्ध खड़ी रही, कुछ नहीं बोली. मनोरमा ने फिर कहा, ‘‘मंगला भी तो पूजा कर रही है, उसके भी कोई भाई नहीं है. वह कहती थी, जितबाहन भइया को प्रसाद खिलाऊंगी.’’

माधवी ने पूछा, ‘‘कौन जितबाहन?’’

मनोरमा उत्साहित होकर बोली, ‘‘कल्लू-राम का बेटा जितबाहन और कौन? मंगला बराबर उन लोगों के यहां जाती है.’’

‘‘वे लोग तो दोनों एक जात के हैं इसीलिये मंगला उसे खिलायेगी. वे लोग दुसाध हैं और तेरे जात का यहां कौन है?’’

सहसा मनोरमा गंभीर होकर बोली, ‘‘हां, मां, मैं तो आज तक नहीं जानती कि मैं कौन जात हूं. बतला दे न कि हम लोग कौन जात है?’’

मनोरमा का यह प्रश्न तीर की तरह माधवी के हृदय जा लगा. उसकी आंखों से आंसू वह चली. रोती हुई बोली, ‘‘हम लोग कायस्थ हैं बेटी.’’

‘‘कायस्थ?’’ मनोरमा ने हर्ष से उल्लसित होकर कहा, ‘तब तो हम लोग बड़े अच्छे जात हैं मां?’’

यह कहते हुए मनोरमा ने सिर उठाकर देखा कि उसकी मां रो रही है. मनोरमा स्तब्ध रह गई. हतबुद्धि की तरह माधवी के मुंह की ओर एकटक देखने लगी. उसकी समझ में आता ही नहीं था कि क्या कहे और क्या नहीं कहे. सहसा उसने अपना मुंह भारी बनाकर गंभीर भाव से कहा, ‘‘तो इसमें रोने की कौन सी बात है मां? जाने दे, जब तेरी इच्छा नहीं है तो मैं पूजा नहीं करूंगी.’’

माधवी ने आंखों के आंसू पोछ डाले और अनैसर्गिक उत्साह दिखलाती हुई बोली, न बेटी, तू पूजा कर, भगवान तुझे लाख बरस जियावें, मैं इसके लिए तुझे मना नहीं करती. मुझे अपने अभाग्य की याद आ गई थी इसी लिए रोती थी, लेकिन अब नहीं रोऊंगी, पूजा के दिन रोना अशुभ है. ला, मूसल मुझे दे दो मैं उसे धो डालती हूं और तू दौड़ कर जा, दो पैसे की सुपारी खरीद ला, खीर बनाने के लिये गुड़ भी लेती लाना.

पूजा समाप्त हो गया. दोपहर के समय मनोरमा इस चिंता को लेकर व्यस्त हो उठी कि प्रसाद किसे खिलाऊं? इस महल में कोई कायस्थ नहीं रहता और जो दूसरी जाति के लोग रहते भी हैं उनसे मनोरमा का कोई विशेष सम्पर्क नहीं है. इस समय उसे मंडला को देख कर बड़ी प्रसन्नता हुई. वह उस समय जित बाहन को प्रसाद खिलाने जा रही थी. मनोरमा ने भी कहा, ‘‘चलो बहिन, मैं भी जितबाहन को प्रसाद खिलाऊंगी.’’

जितबाहन के पिता थे तो दुसाध लेकिन अपने को उच्चवर्ग वालों से कम किसी प्रकार नहीं समझते थे. यदि कोई उनका वर्ण पूछता सगर्व उत्तर देते, मैं दुःशासन वंशील क्षत्री हूं. और वह उच्चवर्ग वालों से किसी प्रकार कम थे भी नहीं. आजकल ब्राह्मण लोग रसोइया बनाने में अपना सौभाग्य समझते हैं, इधर कल्लूराम ‘यू.पी. सोप फैक्टरी’ के मैनेजर थे. भला उनके लड़के को एक पतिता की लड़की भैयादूज का प्रसाद खिला सकती है? कुपित स्वर में मनोरमा से पूछा, ‘‘तू किसे प्रसाद खिलाने आई है?’’

मनोरमा ने कहा, ‘‘जितबाहन भइया को. मंगला बहन उन्हें भइया कहती है तो वे मेरे भी भइया हैं.’’

‘‘मान न मान मैं तेरा मेहमान!’’ कल्लूराम ने कहा, ‘‘तेरे जात पात का भी ठिकाना है? न जाने किस उठाईगीरे की लड़की है और आई है जितबाहन को भाई बनाने. यहां से भागती है कि नहीं?’’

मनोरमा ने कहा, ‘‘मां कहती है हम लोग कायस्थ हैं.’’

‘‘जरा अपना मुंह तो देख. कायस्थ तुम लोग जैसे छुछंदर नहीं होते. क्या तमाशा है, एक रंडी की लड़की आई है अपने को कायस्थ कहने!’’

लज्जा से मनोरमा का सर्वांग लाल हो गया. उसकी आंखें झुक गईं. वह चुपचाप थाली लिए हुए वापस लौट गई. घर जाकर छनाक से थाली पटक दिया और फफक-फफक कर रोने लगी.

माधवी उसे देख कर घबरा गई. समझ नहीं सकी कि कारण क्या है. बोली, ‘‘क्या हुआ बेटी, तू रोती क्यों है?’’

‘‘मां, देखो तो मां, वह कलमुंहा कलुआ तुझे रंडी कहता है. हम लोगों को छुछंदर कहता है. हम लोग कायस्थ हैं. कायस्थ हैं न मां?’’

माधवी का मुख विवर्ण हो गया. शरीर का समस्त रक्त सूख गया. वह कुछ नहीं बोल सकी.

मनोरमा रोती हुई बोली, ‘‘इस निपूते का वंश नाश हो जायेगा, मांगने से भीख नहीं मिलेगी. हम लोगों को गरीब जानकर गाली देता है. हे भगवान उसका धन नाश कर दो, हे सूरज नारायण उसे निपूता बना दो, हे काली भैया उसे खप्पर में ले

लो.’’

माधवी ने जल्दी से कहा, ‘‘किसी को गाली नहीं देते हैं बेटी. सब अपने ही भाग्य का दोष न है.’’

उपरोक्त घटना के चार पांच दिन के बाद एक दिन मनोरमा अकस्मात आकर बोली, ‘‘मां, मैं विवाह करूंगी!’’

इस आश्चर्यजनक विचित्र प्रस्ताव को सुन कर माधवी सहसा हंस पड़ी. बोली, ‘‘अरी वाह! तू तो एकदम सहज ही में मुझे छोड़ने के लिये तैयार हो गई. अभी बेटी उमर क्या हुई जो तू विवाह करेगी.’’

मनोरमा ने कहा, ‘‘नहीं भी, विवाह होने पर मैं तुझे नहीं छोड़ूंगी. हम दोनों मां बेटी यहीं रहेंगे. तू गरीब होकर भी मुझे इतना दुलार करती है सो मैं कैसे भूल जाऊंगी.’’

‘‘तब तू विवाह के लिये उतावली क्यों हो गई?’’

‘‘उस दिन शांति कहती थी कि जब कायस्थ के यहां तुम्हारा ब्याह हो जायेगा तब मैं समझूंगी कि तू कायस्थ है, और नहीं तो तू दोगली लड़की है, हरामजादी है. ऐ मां, क्या हमारा विवाह कायस्थ के यहां नहीं होगा.’’

माधवी ढांढ़स देकर बोली, ‘‘होगा बेटी. क्यों नहीं होगा. पहले तू बड़ी भी तो हो जा, कुछ पढ़ लिख तो ले. इस बारह बरस के उम्र में तेरा विवाह कर दूं तो लोग क्या कहेंगे. बचपन में विवाह कर देना सब से बुरी बात है. जब तू बढ़ी हो जायेगी तब तेरा विवाह होगा, तेरा सोना ऐसा वर मेरी राजा बेटी को लिवाने आवेगा और तू भी निर्मोही बन कर मुझे अकेली करके चली जायेगी.’’

मनोरमा ने गंभीर होकर कहा, ‘‘मैं कभी नहीं जाऊंगी, देख लेना.’’

माधवी ने सजल कष्ट से कहा ‘‘अपने पति के साथ जाना ही पड़ता है बेटी!’’

मनोरमा मुंह भारी बना कर बोली, ‘‘तब मैं विवाह नहीं करूंगी.’’

‘‘लेकिन विवाह तो सबों को करना ही पड़ता है.’’

‘‘उंहू, मैं कुंवारी ही रहूंगी.’’

यह उत्तर सुन कर माधवी हंस पड़ी, मनोरमा ने भी हंस दिया. किंतु उसी समय से दोनों के मन में एक बात जम गई. मनोरमा सोचती थी विवाह तो सभी को करना ही पड़ता है और माधवी सोच रही थी, मुझे मनोरमा का विवाह करना पड़ेगा. इस विवाह शब्द के अंदर किस प्रकार के दारुण विच्छेद की संभावना है. यह सोच दोनों को आंखों से भाव बरस पढ़ते थे.

(2)

माधवी और बहुत दिनों तक धीरज नहीं धर सकी. दो वर्ष बीतते न बीतते ही पंडित दीनानाथ को बुला भेजा. वे खड़ाऊं खटर-पटर करते हुए आये. माधवी ने कहा, ‘‘भगवान न जाने कब मिट्टी समेट लें, अब कहीं मनोरमा का ठौर जमा देते तो अच्छा था.’’

पंडित महाराज ने कहा, ‘‘सो तो ठीक है, लेकिन...’’

पंडित जी के इस लेकिन शब्द के अंदर कई भावनायें थीं. माधवी ने कहा, ‘‘लेकिन मुझ गरीबनी के घर कौन विवाह करेगा, आप यही सोच रहे हैं?’’

‘‘हां, और...और... मनोरमा का विवाह शुद्ध कायस्थ घराने में हो भी नहीं सकता. अगर कुछ नगद रहता तो जात वगैरह छिपाकर किसी प्रकार काम चला लिया जाता. मगर यहां जान बूझ कर कौन मक्खी निगलने आयेगा. इसके सिवा दोगला-दोगली लोग अपने ही से वर इत्यादि की खोज करते हैं, ब्राह्मण लोग इस मामले में नहीं पड़ते. तुम लोगों के यहां ब्राह्मण लगन सोध देंगे, मड़वा में विवाह करा देंगे. वर खोजने के लिए अगर हो सके तो कोई दूसरा ब्राह्मण खोज लो, हमसे नहीं होगा.’’

माधवी चुपचाप स्तब्ध और अवाक् बनी खड़ी रही. पंडित जी बिना किसी उत्तर की प्रतीक्षा के वहां से चलते बने. वे जानते थे कि यहां पर उनके लायक किसी प्रकार का आकर्षण नहीं है. बालू के भीतर तेल नहीं रहता.

मनोरमा उस समय स्कूल गई हुई थी. जब स्कूल से लौटी तो उसके हाथ में किताबों का एक छोटा सा बंडल था. उसने आकर माधवी का चरण छूकर प्रणाम किया. माधवी आश्चर्कित होकर बोली, ‘‘अरे! यह क्या कर रही है?’’

‘‘प्रणाम करती हूं मां, आज स्कूल में मुझे पुस्कार मिला है. इस वर्ष की परीक्षा में मैं ही सबसे फर्स्ट हुई थी और आज गीत की प्रतियोगिता में भी फर्स्ट हो गई. शांति, कान्ता, सुभद्रा इत्यादि कोई भी मेरे समान नहीं गा सकी. इन्सपेक्टर साहब बहुत खुश हुए. देखती नहीं है मेरा ईनाम देख, इस किताब का नाम है ‘रंगभूमि, इसका नाम है ‘नीहार.’

माधवी ने कहा, ‘‘और वही भी है?’’

मनोरमा हंसने लगी, ‘‘दुर पगली, यह वही नहीं है, इसे प्रत्येक पन्ने में लाईन खींची हुई है लिखने के लिए. और देख, यह फाउंटेन पेन कहलाता है, इसमें स्याही भर देने से फिर बिना दावात के ही कई दिनों तक लिख सकते हैं. ले, इन सब चीजों को रख दे और मुझे ईनाम पाने की खुशी में खिला. बड़ी भूख लगी है.’’

माधवी की आंखों में आंसू छलछला आये. जिस दिन की आशंका से उसके आशा सूख जाते थे, आज वही हुआ था. घर में अन्न का एक दाना भी नहीं, वह दिन भर से उपास बैठी थी. धीरे से बोली, ‘‘बेटी! आज खाने के लिए नहीं बना है. नायक राम के यहां पिसाई का पैसा बाकी है, लेकिन वे लोग प्रयाग चले गये हैं, आज रात को आवेंगे तो कल तक भोजन नसीब होगा.’’

माधवी रोने लगी. रोते-रोते बोली, ‘‘हाय अब कैसे चलेगा बेटी! सब तो समाप्त हो गया.’’

मनोरमा ने कुछ नहीं कहा, पुरस्कार द्वारा प्राप्त पुस्तकों को हाथ में लिए हुए बाहर निकल गई. थोड़ी देर के बाद लौटी और मां के हाथ में चुपचाप तीन रुपया रख दिया. माधवी चकचका कर बोली, ‘‘यह कहां से ले आई रे?’’

मनोरमा ने कहा ‘‘तू मत रोया कर मां, तुझे रोते देख कर मेरी छाती फटती है.’’

‘‘लेकिन तू यह रुपये कहां से ले आई?’’

‘‘मां, तू भूखे पड़ी रोवेगी तो मैं ईनाम पाये हुए किताबों को लेकर क्या करूंगी. मैंने उसे शांति के हाथ बेच दिया.’’

इसके ठीक एक महीने के बाद एक अनजान आदमी धड़धड़ाता हुआ उस घर में घुस आया और माधवी को सम्बोधन करके कहा, ‘‘अपनी बेटी को संभाल करके रक्खा करो नहीं तो एक दिन यह खुद जेल जायेगी और अपने साथ तुम्हें भी लेती जायेगी. कल स्कूल में मेरी शांति का कंठा चुरा लिया और उसे जाकर एक सुनार के यहां बेच दिया. खैर, मेरा गया उसके लिये ज्यादे परवाह नहीं है, दमड़ी की हांड़ी गई और कुत्ते की जात पहिचानी गई. लेकिन उसे संभाल कर रखो. अगर अब मेरे घर में जायेगी तो उसका पैर तोड़ डालूंगा.’’

माधवी तड़प कर बोली, ‘‘कौन कहता है कि मेरी बेटी चोर है?’’

शांति के पिता ने कहा, ‘‘जिसकी चोरी गई है वह कहेगा और किसे गरज पड़ी है जो कहने आयेगा. अगर मैं चाहता तो उसे थाने में दे देता, लेकिन तुम लोग गरीब हो इसी कारण छोड़ दिया है.’’

माधवी ने कहा, ‘‘बड़े दया दिखाने वाले आये हो, मेरी सुशील बेटी कभी चोरी नहीं कर सकती. माधवी का कराठ आर्द्र हो गया.

उस आदमी ने फिर कहा, ‘‘कमीने की लड़की जब होगी तो लुच्ची होगी, नीम के पेड़ में आम नहीं फलता.’’

माधवी रोने लगी.

उसने कहा, ‘‘रोने-धोने का कोई काम नहीं है. मैं इसके लिए थाना-पुलिस नहीं करूंगा. अपनी बेटी को संभाल कर रखना यही कहे जाता हूं. नहीं तो एक दिन अपने साथ तुम्हें भी जेल लेती जायेगी.’’

शांति के पिता चले गये, माधवी बिसूर-बिसूर कर रोती ही रही. हाय भगवान! तुम कैसा-कैसा दिन दिखलाते हो? बिपद से मार डालना था तो एक बार ही क्यों नहीं प्राण ले लेते तो तड़पा-तड़पा कर मारते हो. यह यंत्र असह्य है भगवान्! अगर मर जाऊं तो समझूंगी कि जी गई.

सांझ को मनोरमा स्कूल से लौटी. अन्य दिनों की अपेक्षा आज उसका मुंह प्रफुल्ल था. मां के हाथ में तीस रुपयों के तीन नोट दे दिये और बोली, ‘‘आज स्कूल जाती बेर इसे सड़क पर पा गई. न जाने किसका था. जरूर हमी लोगों के किस्मत का था तब ही तो मुझे मिल गया. अब इसमें से दस रुपया घर वाले को दे देना, उसका आठ महीने का किराया बाकी है, रोज आकर गाली देता है तो सहा नहीं जाता. दस रुपया तो उसे दे देना और दस रुपयों के चावल-दाल इत्यादि मंगा ले, बाकी पांच रुपया तू अपने पास रखना और पांच रुपया मैं लूंगी. मैं एक खद्दर की साड़ी खरीदूंगी. स्कूल की सब लड़कियां हंसती हैं कि मनोरमा तो विदेशी साड़ी पहनती है.

माधवी ने कुछ नहीं कहा, चुपचाप बैठी रही.

मनोरमा घबड़ा कर बोली, ‘‘मां बोलती क्यों नहीं है, आज तुझे क्या हो गया?’’

माधवी ने फिर भी कुछ नहीं कहा, हाथ के नोट चुपचाप उठाकर फेंक दिये.

अबकी मनोरमा रो पड़ी. रोते-रोते बोली, ‘‘नहीं मां, मैं तुमसे सच बोलूंगी मां, मैंने शांति का कंठा चुरा लिया था. यह उसी के रुपये हैं.’’

माधवी ने एक लंबी सांस लेकर कहा, ‘‘यह बड़ी बुरी बात है बेटी, अब से कभी ऐसा नहीं किया करना.’’

‘‘मां, तो हम लोगों का दिन कैसे चलेगा? क्या हम लोग भूख से छटपटा कर मर जायेंगे मां? अगर किसी की चीज चुरा लाई तो वह चोरी है, और इधर कोई मजदूरी करा के खाने के लिए भी नहीं देता.’’

मनोरमा रोने लगी, माधवी भी रोने लगी.

(3)

तीन वर्ष बीत गये.

इधर कई दिनों से माधवी को बुखार आता था. उस दिन मनोरमा बोली, ‘मां, मैं कई दिनों से देख रही हूं कि मुझे बुखार आता है, फिर तू घर का काम-काज क्यों किया करती है, यह मुझसे नहीं देखा जाता.’’

माधवी ने हंस कर कहा, ‘‘नहीं देखा जाता तो रख दे एक लौंड़ी, मैं आराम से पैर फैला कर पड़ी रहूंगी.’’

‘‘आज से मैं ही घर के सारे धंधे किया करूंगी.’’

‘‘और पढ़ने कौन जायेगा?’’

‘‘तू बुखार में पड़ी मर-मर कर काम करे, और मैं पढ़ने के लिए स्कूल जाऊं, यह मुझसे नहीं होगा. बाल्टी लेकर कहां जा रही है, ला मुझे दे, मैं ही बम्बा से पानी भर लाती हूं.’’

यह कहती हुई मनोरमा ने मां के हाथ से बाल्टी ले लिया और जाने के लिए उद्यत् हो गई.

माधवी जल्दी से बोली, ‘‘छ़ोड़-छोड़, जाने दे मुझे, तू अभी लड़की है, पानी लाने क्या जायेगी.’’

मनोरमा ने कहा, ‘‘16 वर्ष हो गई. क्या अभी भी लड़की ही धरी हूं. अब आज से घर का कोई काम भी तुझे नहीं दूंगी.’’

सचमुच वही हुआ. उस दिन से मनोरमा ने घर का सारा कामकाज अपने ही सिर पर उठा लिया. मां को एक तिनका भी नहीं छूने देती थी. पानी वही लाती थी, भात वही बनाती थी, साथ ही साथ अपना पारिवारिक व्यवसाय सिलाई भी वही करती थी. इधर स्कूल जाना भी नहीं छूटा. प्रतिदिन बिला नागा स्कूल जाती थी. वहां भी सिलाई के एक आध काम ले जाती थी और अवकाश के समय बैठ सीया करती थी. अपनी हमबोलियों से कहा करती, ‘‘बहन, अगर तुम्हारे यहां सिलाई का कोई काम हो तो मुझे ही दिया करना. मैं ठीक समय पर सी कर दे दिया करूंगी. अगर दर्जी से घटिया सिलाई जान पढ़े तो एक पैसा भी नहीं देना.’’

लेकिन बीसवीं शताब्दी की बालिकाओं का झुकाव घर की सूई की ओर नहीं, दर्जी की यहां खड़खड़ाती हुई सिंगर मशीन की ओर है. मनोरमा को अपनी साथियों के कोई कपड़े सीने के लिए नहीं मिलते थे. हां उन लोगों के उद्योग से एक आध इधर-उधर के कपड़े मिल जाते थे.

मनोरमा ने घर का काम उठा कर देखा कि घर का काम-काज हाथ में कर लेना बहुत आसान है मगर घर चलाना बड़ी कठिन बात है. किसी-किसी दिन तो ऐसा होता था कि बिना नमक के दोनों मां-बेटियों को छाछ भात खाना पड़ता था. मनोरमा को उधार देते-देते पड़ोसिने तंग आ गई थीं और अब मांगते भी मनोरमा को लाज लगती थी.

जाड़ों के दिन थे, दोपहर का समय, इतवार का दिन. मनोरमा आंगन में बैठी हुई सिलाई कर रही थी, माधवी भी उसी जगह रामायण पढ़ रही थी.

सहसा मनोरमा ने सिर उठा कर कहा, ‘‘घर चलाना कितना कठिन है यह मैं पहले नहीं जानती थी मां. लड़कपन में जब मैं रोटी लेकर गुड़ के लिये जिद करती थी और तू मिठुआ के यहां गुड़ मांगने के लिये दौड़ी जाती थी, तो उस समय मुझे क्रोध आता था कि दूसरों से मांगने किस लिए जाती है. अब मैं समझती हूं कि कितनी विकलता होती है तब दूसरों के सामने मांगने के लिए मुंह खुलता है. पहले मेरी साड़ी फट जाती थी, जाकिट के चिथड़े-चिथड़े उड़ जाते थे, तब तू कहती थी कि इसी से किसी तरह गुजारा कर ले बेटी, तब मैं मुंह फुला लेती थी. मन में कहती थी, मां कंजूस है, इसके दिल में मेरे लिये दया नहीं है लेकिन आज मुझे मालूम होता है कि एक-एक पैसे का कितना महत्त्व है. जब मेरी दावात की स्याही चुक जाती थी, तो तू कहती थी कि कोयला बूक करके काम चला ले, उस समय मैं सोचती थी कि क्या मां के पास एक अधेला भी नहीं होगा? लेकिन आज मालूम होता है कि कभी-कभी आदमी के पास एक अधेला भी नहीं रहता. पुरानी बातें याद आती हैं तो कलेजा फटने लगता है. सुबह उठते ही उठते मैं चूल्हा लीप देती थी और हाथ मुंह धोकर पढ़ने बैठ जाती थी, उस समय तू अदहन चढ़ा कर न जाने कहां निकल जाती थी. मैं उठकर देखती तो पानी खौल रहा है, तुझ पर झल्लाती थी और इधर-उधर चावल खोजने लगती थी, चावल नहीं मिलता था तो मैं बड़बड़ाने लगती थी कि चावल का बंदोबस्त पहले से ही कर लेना चाहिए था. इसी समय तू रोती हुई लौटती थी और कहती थी, हाय आज तुझे क्या खिलाऊंगी बेटी, आज तो किसी ने उधार भी नहीं दिया. तो मैं कहती थी, आज नहीं खाऊंगी इसके लिये परवाह नहीं है लेकिन तूने अदहन चढ़ाकर इतनी लकड़ी किसलिए बरबाद किया. उस समय मैं नहीं चाहती थी कि तू किस आशा से अदहन चढ़ाती थी, किस विकलता से मांगने निकलती थी और किस निराशा से घर वापस आती थी. एक दिन की याद मुझे अब तक बनी है और शायद अंत समय तक बनी रहेगी. उस दिन मैं नायकराम के यहां लोगों को चाय पीते देख आई थी. मैंने सिर पर आसमान उठा लिया. मैं बैठ कर रो ही रही थी, कि तू चाय बना लाई, दुलार से उठाकर मुझे पिला दिया. पीछे मालूम हो गया कि वहां चाय नहीं था, अमरूद के सूखे पत्तों का चूर था. उस समय मुझे बहुत ज्यादा क्रोध हुआ, क्रोध के मारे दस दिनों तक तुमसे नहीं बोली. लेकिन आज मुझे उस अमरूद के पत्ते का अर्थ मालूम होता है. आज मैं समझती हूं कि वह अमरूद के पत्तों की चाय नहीं थी, तुम्हारे स्नेह का अमृत था.’’

कहते-कहते मनोरमा ने सिर झुका लिया और बड़े मनोयोग पूर्व सोने की कोशिश करने लगी. बड़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा. उस सन्नाटे में पड़ोसी मिठुआ इक्केवान के घोड़े के सूम इधर-उधर रखने की आवाज सुनाई देती थी, और कुछ नहीं. बड़ी देर तक दोनों मां-बेटी चुप रहे. माधवी ने उस सन्नाटे को तोड़ा. एक लंबी सांस लेकर बोली, ‘‘लेकिन अभी भी तो वैसे ही दिन हैं बेटी, कुछ भी तो हेर फेर नहीं हुआ.’’

मनोरमा ने फिर सिर उठाया और आंसू पोंछकर कहने लगी, ‘‘लोग कहते हैं, और मैं पढ़ती भी हूं कि भाग्य का चक्र चला करता है. आज दुख है तो कल सुख अवश्य होगा. लेकिन शायद तत्वज्ञानी लोग यह सिद्धांत निकालते हुए हम सरीखे अभागियों के जीवन को भूल जाते हैं. हम लोगों के जीवन में तो केवल दुख ही दुख हैं, सुख का कहीं नाम भी नहीं. हम लोग तो चेतना शून्य प्राणियों में से हैं जिनके प्राण भविष्य के भय से सदा उड़े रहते हैं. लोग भविष्य की चिंता करते हैं, भूत को याद करते हैं लेकिन हम लोगों को तो भूत की याद आने से ही रुलाई आती है, वर्तमान को देख कर रुलाई आती है. हम लोगों के जीवन में आंसुओं के सिवा कुछ नहीं है. यदि रुदन में ही सुख है, तो भगवान अपना सुख वापस ले लें, मैं ऐसा सुख कहां चाहती.’’

कुछ देर तक फिर सन्नाटा रहा. माधवी का मन रामायण पढ़ने में नहीं लग रहा था. वह ऊंची दृष्टि किये हुए चुपचाप आकाश की ओर देख रही थी. मनोरमा ने सुई में डोरा डालते हुए कहा, ‘‘सभी कहते हैं कि कोई भगवान हैं, वहीं दुख देते हैं और दुख को दूर भी करते हैं. संसार उस लीलामय का क्रीड़ा स्थल है, जीव जंतु उसके खिलौने हैं. भला उन्हें अपने खिलौने को इतना पटकने में क्या आनंद आता है? बचपन में जब मेरी कोई गुड़िया टूट जाती थी तो मैं रो देती थी. क्या ईश्वर में इतनी भी करुणा नहीं है? लोग कहते हैं कि भगवान कर्म का फल देते हैं, लेकिन मैंने कौन सा बुरा कर्म किया है जो मुझे इतना दुख दे रहे हैं? उस दिन हेड मिस्ट्रेस साहिबा कह रही थीं कि भगवान दयालु हैं, उनसे मनुष्य जो कुछ मांगता है वहीं पाता है. लेकिन आठ वर्ष की अवस्था से मैं बराबर सुबह उठ कर तुलसी चबूतरा के निकट भगवान की पूजा करती हूं और उनसे सुख मांगती हूं, मगर आज तक यह भी नहीं जानती कि सुख किसे कहते हैं. लोग कहते हैं, भगवान करुणामय हैं. लोगों को दुखी देखकर उनकी करुणा उमड़ उठती है. लेकिन आज कहां सोये हुए हैं भगवान. उनकी करुणा मेरे घर में बरस क्यों नहीं पड़ती?’’

भगवान की करुणा तो नहीं बरसी, लेकिन मनोरमा की आंखों से आंसू बरस पड़े!

फिर सन्नाटा हो गया. माधवी अभी तक चुपचाप शून्य दृष्टि से आकाश की ओर देख रही थी. सूर्य की मीठी किरणें आंगन के आधे भाग में छाई हुई थीं. मनोरमा ने सिलाई का कपड़ा बांस की डलिया में रख दिया और माधवी से बोली, ‘‘अब सीने में मन नहीं लग रहा है. लो, रामायण मुझे दो, मैं पढ़कर तुझे सुना देती हूं.’’ माधवी के उत्तर की अपेक्षा किये बिना ही उसने रामायण खींच लिया और जल्दी-जल्दी पन्ने उलट कर ऊपर का एड निकाल कर पढ़ने लगीः-

‘‘रहा एक दिन अवधि अधारा,

समुझा मन दुख भयेउ अपारा.’’

(4)

माधवी का स्वास्थ्य पहले ही से ठीक नहीं था. कभी-कभी सिर में दर्द या रात को बुखार हो जाया करता था. लेकिन तो भी मनोरमा के लाख मना करने पर भी, रोज चार बजे तड़के उठ कर स्नान करती थी. चाहे कुछ हो जाय इस नियम को वह तोड़ना नहीं चाहती. इसी नियम के नहीं तोड़ने के कारण उसका शरीर टूट गया. बड़े जोर से बीमार पड़ गई. यह मनोरमा के ऊपर आकस्मिक विपद था. उसका सीना-पिरोना अब छूट गया, दिन-रात मां के समीप चुपचाप बैठी रहती. दवा दारू की चिंता आ पड़ी. किंतु मनोरमा के पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी. फल यह हुआ कि माधवी की दशा खराब होती गई.

एक दिन तो बचने की आशा भी नहीं रही. माधवी को उस दिन खून के कई दस्त हुए. वह चुपचाप आंखें बंद किये हुए पड़ी थी. रह रह कर आंखें खोलती और धीरे से कराह कर कहती, ‘‘हाय! मेरे घर में सैकड़ों की दवा मुफ्त में होती है और मैं बिना वैद्य के मर रही हूं?’’

मनोरमा खड़ी खड़ी आंसू बहा रही थी.

माधवी ने कहा, ‘‘मन्नो, क्या इस मुहल्ले में कोई वैद्य नहीं रहता है?’’

मनोरमा ने चुपचाप सिर हिला दिया.

माधवी कहती गई, ‘‘जा तो बेटी, किसी डॉक्टर या वैद्य को बुला ला, जब मैं अच्छी हो जाऊंगी तो किसी तरह करके उसकी फीस दे दूंगी.’’ मनोरमा बिना कुछ कहे सुने बाहर निकल गई. उस समय वह बहुत घबरा गई थी. दौड़ी हुई अपने एक पड़ोसी से जाकर कहा, ‘‘मेरी मां की दशा बहुत खराब है, जरा चल कर देखो तो.’’

पड़ोसी रामरतन ठाकुर ने हंसकर कहा, ‘‘मुझे दिखलाने से क्या फायदा होगा, किसी डॉक्टर-वैद्य को दिखलाओ तो वह कोई उपाय भी करेगा.’’

मनोरमा ने पूछा, ‘‘डॉक्टर कहां रहते हैं?’’

रामरतन ने मुहल्ले का नाम बता दिया.

मनोरमा उसी ओर चल पड़ी. पहले-पहल जिस डॉक्टर का घर मिला, वहीं पहुंची. वे एक बंगाली डॉक्टर थे. मनोरमा ने अपनी मां की दशा का संक्षिप्त वर्णन करके कहा, ‘‘बाबूजी हम लोग गरीब आदमी हैं, अभी आपकी फीस नहीं दे सकूंगी.’’

डॉक्टर साहब अट्टास कर उठे. कहा, ‘‘जाब तोमरा फीस का जोगाड़ हो जाय तबही हमको देखलाय देना. बिना फीस पाये हाम जाने नहीं सकेगा.’’

मनोरमा डॉक्टर के घर से निकल कर इधर-उधर पगली की तरह घूमने लगी. किधर जा रही है, इसका उसे कुछ भी पता नहीं था. सदैव के अभ्यास के अनुसार वह स्कूल की ओर चली गई. वहीं के मैदान में जाकर बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी. हाय! मेरी मां मरी जा रही है और मेरे पास एक पैसा भी नहीं कि डॉक्टर-वैद्य को दिखलाऊं? बड़ी देर तक रोती रही. एकाएक कुछ याद आ जाने पर उसने आंसू पोंछ लिया और उठकर खड़ी हो गई. एक बार चारों ओर देखा, वहां सन्नाटा छाया हुआ था. मनोरमा ने चुपचाप अपने घरवाला रास्ता लिया.

मनोरमा युवती थी. उसका रूप, यौवन के स्पर्श से कमल-दल के समान खिल पड़ा था. अप्सरा-सी सुंदरी थी. देखने पर एकटक देखते शोहदे उस पर आवाजें कसते थे, कॉलेज के लोग जिगर थामकर देखा करते थे. मगर किसी में साहस नहीं था कि कुछ बोलें. मनोरमा उनकी लालसायुक्त नेत्रों का जवाब घृणायुक्त नेत्रों से देती थी. एक बार कॉलेज के एक लड़के ने मनोरमा को दिखलाकर सड़क पर एक पत्र रख दिया. मनोरमा ने उसे खोलकर पढ़ा, पत्र में नाना प्रकार के संक्षिप्त और विस्तृत संबोधनों के पश्चात् अनावश्यक लंबी भूमिका देकर यह लिखा हुआ था कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं. शेक्सपीयर, बायरन, बिहारी आदि कवियों की सूक्तियों की सम्मिलित खिचड़ी पकाई गई थी. जहां तहां ‘स्मृति-कुंज’ नामक किताब से ज्यों का त्यों उद्धृत कर लिया गया था. कितने वाक्य इतने दुर्बोध और जटिल थे कि मनोरमा बिल्कुल नहीं समझ सकी. किंतु वह जितना समझ सकी उतना ही काफी थी. क्रोध से उसका मुखमंडल रक्त-वर्ण हो गया. आंखों से चिनगारियां निकलने लगीं. मनोरमा ने पत्र को फाड़कर फेंक दिया और उस पर थूक कर कुचलती हुई आगे बढ़ गई. बेचारे प्रेमी जी महाराज का मुंह जरा-सा हो गया. अगर मनोरमा से झिड़की खाने का डर नहीं होता तो जरूर कहता- ‘‘शक्ल दी हूरों परी की, दिल दिया जल्लाद का!’’ लेकिन यह शेर उसी के दिल के अंदर तड़पता रह गया. मनोरमा चली गई.

आज मनोरमा उसी युवक को खोज रही थी. हाय रे! समय की गति!

उस युवक ने देखा- आज मनोरमा मेरी ओर देखती हुई धीरे-धीरे जा रही है. कभी ठिठकती है, कभी रुक जाती है और कभी आगे बढ़ती है. रामलोचन ऐसा प्रसन्न हुआ जैसे अंधे के हाथ बटेर लग गई हो. जल्दी से मनोरमा के निकट जाकर पूछा- ‘‘किसे खोज रही हो?

मनोरमा ने दृढ़ कंठ से कहा, ‘‘तुम्हीं को!’’

यह आशातीत वरदान? रामलोचन फूल कर कुप्पा हो गया. बोला, ‘‘अहोभाग्य! तनिक मेरे क्षुद्र कमरे को अपने चरण-रज से पवित्र कर दो. तुम तो आंखें उठाकर भी नहीं देखती कि कौन मरता है कौन जीता है.’’

मनोरमा कुछ उत्तर नहीं देकर रामलोचन के साथ उसके कमरे में पहुंच गई. दोनों कुर्सी पर बैठे. रामलोचन ने खुशी की उमंग में आकर एक सिगरेट निकाला और सुलगा कर पीने लगा. वह कभी मनोरमा की ओर देखता था, कभी कमरे में टंगे हुए चित्रों की ओर. एक चित्र उस समय का था जब रामलोचन अपना फुटबाल टीम ले जाकर इलाहाबाद में एक कप जीता था. रामलोचन बार-बार उस चित्र की ओर देखता था जिसमें मनोरमा की दृष्टि भी उसी ओर चली जाय और वह भी समझ ले कि रामलोचन दिल्लगी नहीं है, एक फुटबाल टीम का कैप्टेन भी है. सहसा मनोरमा उसकी ओर देखती हुई बोली, ‘‘मैं यहां बैठूंगी नहीं, मेरी मां बीमार हैं, डॉक्टर बुलाने आई थी, क्या तुम मुझे पांच रुपये दे सकते हो?’’

रामलोचन ने कहा, ‘‘अवश्य दे सकता हूं, लेकिन मुफ्त नहीं, उसके लिये तुम्हें भी कुछ देना होगा.’’

यह कहते हुए उसने अपनी दाहिनी आंख को टीप किया. जेब से पांच रुपये निकाल टेबिल परख दिये और कहा, ‘‘बोलो मेरा प्रस्ताव स्वीकार करती हो.’’

उसके ओठों पर एक बेहूदी सी हंसी खेल रही थी.

मनोरमा का कलेजा कांपने लगा. वह लालसायुक्त नेत्रों से रुपयों की ओर देखकर बोली, ‘‘क्या कहते हो!’’

रामलोचन ने कहा, ‘‘बस, इस रुपयों के बदले मुझे केवल एक चुंबन दे दो, मैं और कुछ नहीं चाहता.’’

मनोरमा का चेहरा पीला पड़ गया था. वह कांपती हुई उठ कर खड़ी हो गई और चिल्ला कर बोली, ‘‘ले लो, मैं, कुछ नहीं बोलूंगी.’’

अंतिम शब्द कहते-कहते मनोरमा ने रो दिया.

रामलोचन ने मनोरमा का आलिंगन किया, चुंबन लिया और पांच रुपये दे दिये.

मनोरमा रुपये लेकर चली तो रामलोचन ने कहा, ‘‘यदि आज रात को आओ तो दस रुपये और दूंगा.’’

मनोरमा बोली, ‘‘मैं नहीं कह सकती कि आऊंगी या नहीं. यदि मेरी मां अच्छी हो गई तो नहीं आऊंगी और यदि अभी की अपेक्षा भी हालत बिगड़ गई तो भी नहीं आऊंगी. हां यदि अभी के जैसी रहेगी तो आऊंगी, क्योंकि कल भी डॉक्टर को फीस देनी पड़ेगी.’’

रामलोचन ने मन ही मन कहा, यदि भगवान चाहेंगे तो तुम्हारी मां की दशा ऐसी ही बनी रहेगी.

मनोरमा चली गई. डॉक्टर को साथ लेकर घर पहुंची. माता के गले में दवा की बूंदें उतरने लगीं.... डॉक्टर ने यह भी कहा था, बीमारी सख्त है, अच्छे होने में अभी देर लगेगी.

कहना नहीं होगा कि उस रात को मनोरमा रामलोचन के यहां गई थी और दस रुपयों के नोट आंचल से बांध कर लौटी थी.

एक महीना भी नहीं बीता था कि रामलोचन ने कहा, ‘‘अब तो तुम रोज आने लगी, मैं कोई बड़ा सेठ तो नहीं हूं जो इतने रुपये रोज दे सकूंगा.’’

असल में रामलोचन अब मनोरमा से ऊब गया था. प्रेमी भ्रमर तो रोज नया नया रस चाहता है, एक ही गीत बार-बार सुनने से फीका पड़ जाता है, पढ़ा हुआ उपन्यास फिर पढ़ने में मजा नहीं मिलता.

मनोरमा ने कहा, ‘‘तुम समझते होंगे कि मैं तुमसे प्रेम करती हूं, लेकिन यह बात झूठ है, उतना ही झूठ है जितना कि इस संसार का पिता ईश्वर, गरीबों के लिए सदाचार. मैं तुमसे प्रेम नहीं करती. मैं पैसा चाहती हूं. अभी तक मेरी मां अच्छी नहीं हुईं, यदि मेरी मां अच्छी हो जाती तो तुम मेरा मुंह भी नहीं देखते.’’

‘‘यदि तुम पैसा ही चाहती हो. कहो मैं ऐसा टिप्पस लगा दूंगा कि रोज पांच-दस कमा लोगी.’’

मनोरमा ने कहा, ‘‘कहो’’ लेकिन उसका कलेजा धड़क रहा था.

रामलोचन ने मनोरमा की आंखों से अपनी आंखें मिला कर कहा, ‘‘तुम अड्डे में जाया करो.’’

मनोरमा कांप उठी.

‘‘डरने की कोई बात नहीं है,’’ रामलोचन ने कहा, ‘‘मैं वहां जाकर सब ठीक कर दूंगा. तुम रूपवती हो, तुम्हारा रूप खरीदने के लिए लाखों टूट पड़ेंगे. बहुत से लोग हैं. अभी भी तुम पर जान देते हैं. यहां किसी धनी-मानी से साठ-गांठ लग गयी, तो पौ-बारह समझो. रह जाना उसी के साथ. अड्डे में जाने के लिए किसी चीज की जरूरत भी नहीं है. तुम सुंदरी तो हो. मुंह पर सदा मुस्कुराहट रखा करना, नखरे दिखाना, चंचलता दिखाना, सदा गेंद सी उछलती फिरना. हां, कपड़े कीमती और साफ रखना होगा, थोड़ा फिट-फाट से भी रहना चाहिए, फिर तो तुम्हें देखते ही लोग बिल्कुल बुलबुल बन जायेंगे. अपने प्रेमिकों को उल्लू बना कर जितना ऐंठना चाहो, ऐंठ लेना.’’

मनोरमा एकदम पीली पड़ गई. रामलोचन की गोद में गिर पड़ी और रोती हुई बोली, ‘‘रामलोचन, मेरी रक्षा करो रामलोचन.’’

रामलोचन ने कहा, ‘‘यह नहीं होगा तो एक काम करो, मेरा एक मित्र तुम्हारी सहेली शांति से प्रेम करता है, उसे किसी तरह बहका कर यहां ले आओ, वह तुम्हें सौ रुपये देगा.’’

मनोरमा एकाएक उछल कर खड़ी हो गई और तीव्र स्वर में बोली, ‘‘खबरदार, ऐसी बेहूदी बात मुंह से भी नहीं निकालना.’’

मनोरमा की आंखों से क्रोध की चिनगारियां निकल रही थी.

मनोरमा की यह क्रोध मूर्ति देखकर रामलोचन के देवता कूच कर गये. खुशामद की एक बनावटी हंसी हंस कर बोला, ‘‘तुम तो बिगड़ खड़ी हुई, मैं दिल्लगी कर रहा था. आज तुम्हें दस रुपये की जरूरत है न? लो.’’

रामलोचन ने दस रुपयों का नोट निकाल कर दे दिया.

दूसरे दिन प्रातःकाल स्नान करके तुलसी चबूतरे के निकट पूजा करके मनोरमा कह रही थी, ‘‘हे भगवान! मैं नहीं जानती कि तुम हो, यदि होते तो संसार में इतना अत्याचार इतना अनाचार नहीं फैला होता. लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि भगवान कोई चीज है, तो मानना तो पड़ता है. हे भगवान, यदि तुम अंतर्यामी हो, तो मेरे हृदय की व्यथा जरूर जानते हो. मैं शापिनी हूं, कुलटा हूं, मेरे हृदय में कैसी ज्वाला धधक रही है. यह तुम देखते हो. संसार मुझे तिरस्कार करेगा, किन्तु तुम्हें इसका कोई अधिकार नहीं है, तुम अवश्य ही मुझ पर करुणा करोगे. मैं निर्दोष हूं, यह केवल तुम्हीं जानते हो.’’

कहते-कहते मनोरमा का कंठावरोध हो गया, आंखों से आंसू बहने लगे. बड़ी देर के बाद बड़े कष्ट से वह इतना ही बोल सकी, ‘‘हे परमपिता! मुझे इस पाप-पक्ष से बचा लो.’’

उसी दिन डॉक्टर ने माधवी को देख कर कहा, ‘‘आज तो ‘केस’ बहुत ‘सीरियस’ हो गया. अब बिना सूई दिये काम नहीं चलेगा.’’

इसके बाद यह चाहिये, वह चाहिए कह कर खर्च की एक लंबी सूची देकर चले गये.

मनोरमा ने मन ही मन कहा, यदि भगवान हैं तो वे बार-बार मेरी परीक्षा लेना चाहते हैं और मैं बार-बार अनुत्तीर्ण होती जाती हूं. अभी भी अनुतीर्ण होऊंगी. मुझे भगवान नहीं चाहिए मुझे मां चाहिए. अपनी मां के ऊपर मैं सैकड़ों भगवान को न्यौछावर कर सकती हूं. मैं हजारों लाखों भगवान को छोड़ दूंगी लेकिन अपनी मां को नहीं छोड़ूंगी. मैं भगवान का प्रेम नहीं जानती केवल अपनी माता का स्नेह जानती हूं. यदि लाखों पाप करने से भी मेरी मां बचेगी तो मैं उन पापों को करने से जरा भी नहीं डरूंगी.

उसी रात को मनोरमा अड्डे में पहुंच गई.

माधवी के अस्थिपिंजर शरीर को छोड़कर एक दिन अकस्मात उसे प्राण निकल गये.

मनोरमा के सिर पर वज्र टूट कर गिर पड़ा. वह पगली की तरह अपनी मां के मुंह की ओर देख रही थी. उसकी आंखों में आंसू नहीं थी, समस्त रक्त बिंदु जल रहा था. सूना घर झांव-झांव कर रहा था. मां के कराहने की व्यथामय आवाज न जाने किस सुदूर के अंतरिक्ष में जाकर छिप गई थी.

हाय! अब उसकी मां नहीं बोलेगी. उसके दुःखों को देखकर सान्त्वना नहीं देगी. मनोरमा धीरे-धीरे कह रही थी, ‘‘हाय मेरी मां कहां है?’’

उस समय रात्रि का अवसान हो रहा था. सुबह की सुफेदी नहीं छिटकी थी. चार बजे होंगे.

धीरे-धीरे प्रातःकाल हुआ. मनोरमा अपने पड़ोसियों के यहां जाकर रोती हुई बोली, ‘‘हाय! मेरी मां मर गई है, चलो, तुम लोग चलकर उसके अंतिम दाह-क्रिया का बंदोबस्त कर दो.’’

किंतु कोई तैयार नहीं हुआ. लोगों ने सिर हिलाकर कहा, ‘‘मरने जीने का तो काम ही है, उसे लेकर कहां तक दुःख किया जायेगा, रोओ मत. तुम्हारी मां की लाश को लेकर हम लोग तो घाट पर नहीं जायेंगे. ऐसा ही है तो जाकर डोम बुआ लाओ और जाकर आग दे देना.’’

मनोरमा ने फिर किसी से कुछ नहीं कहा, न रोई, न चिल्लाई, चुपचाप घर में चली गई. घर में पहुंच कर किंवाड़ लगा दिये. एक मजबूत रस्सी चुन लाई. उस समय उसके मुख-मंडल पर एक दृढ़-भाव झलक रहा था. चेहरे पर एक विचित्र शांति थी. मृत्यु में भी वैसी शांति नहीं रहती.

फांसी का फंदा तैयार हो गया. वह अपनी मां के समीप पहुंची. लाश को प्रणाम किया. मृत माधवी के चरणों पर सिर रखकर जितना हो सका, रोई. रोते-रोते उसने कहा, ‘‘जिसने मेरी मां की ऐसी दशा की है उसका नाश हो! उस समाज का नाश हो जो मां के समान रत्न को नहीं पहचान सका!! उस ईश्वर का नाश हो जिसने हम लोगों को केवल दुख ही दिया!!!

मनोरमा ने फांसी का फंदा अपने गले में डाल दिया और झूल गई. थोड़ी देर तक हाथ-पैर फड़फड़ाते रहे, उसके बाद शरीर ऐंठ गया.

उसी दिन सरकारी ठेलागाड़ी पर लदकर दो लाशें जा रही थीं, एक तो माधवी की थी और दूसरी मनोरमा की.

हम नहीं जानते कि समाज का कोई भी व्यक्ति उन लोगों के लिए दुखित था.

(माया : जनवरी, 1932)

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