सोमवार, 6 मार्च 2017

प्राची - जनवरी 2017 : उजाड़ में आवाज के परिन्दे / रेवती रमण

आलेख

उजाड़ में आवाज के परिन्दे

रेवती रमण

मैं उन झाड़ियों के लिए गाती हूं/जिनकी जड़ें मिट्टी में गहरे धंसी हैं/मैं कठिन पठार में लगे/उन पेड़ों के लिए गाती हूं/जो भीतर पृथ्वी के गहरे कुण्ड से/अपने लिए जल खींचती है/मैं उन लोगों के लिए गाती हूं/जो पत्थर तोड़ते हैं...मेरा स्वर उन्हीं का स्वर है.

‘धरती अधखिला फूल है’ एकांत श्रीवास्तव की कविताओं की पांचवीं किताब है. इसमें दो खंड हैं. खंड-एक ‘घास की हरी पत्तियों में’ है. इसमें पैंसठ कविताएं हैं. खंड-दो का शीर्षक है- ‘ग्वालिन महकती है रात में.’ इसमें ही लंबी कविता है- डूब’. शुरू में चार पंक्तियां हैं, बिना शीर्षक के-

सावन में सांवा फूलता है/भादों में कांसी/वह कौन ऋतु होगी जिसमें फूलेगा/अरण्य इस उजाड़ जीवन का.

कवि को सांवा और कांसी के फूलने का समय ज्ञात है. यह ज्ञान उसके अनुभव की बात है. एकांत छत्तीसगढ़ के एक कस्बे से निकलकर कोलकाता महानगर में जीविकोपार्जन कर रहे हैं. वे ‘वॉगर्थ के संपादक हैं, प्रगतिशील हैं. उनकी संपादन कला से भी यह प्रकट है. लेकिन जीवन का अरण्य उजड़ गया है तो किस ऋतु में वह फूलेगा, एकांत को नहीं पता. ‘बंजर भूमि’ के वृत्तांत से कुछ आश्वस्ति होती है. ‘बंजर भूमि में किसान ने हल चलाए, बीज बोए, बारिश हुई तो अंकुर फूटे.’ खानाबदोश आए. उन्होंने मिट्टी के कच्चे घर बनाए, क्यारियों में फूल उगाए. सांझ हुई तो दिया-बाती भी. चूल्हा जलने लगा. तालाब के घाट पर कपड़े पछीटे जाने लगे. बच्चों की भाग-दौड़ शुरू हुई. अरण्य में आवाज के परिंदे उतरे.

एकांत श्रीवास्तव की कविताएं ‘अरण्य में आवाज के परिंदों जैसी हैं. उनकी लड़ाई बंजरता से है. उनकी पहली कृति ‘अन्न हैं मेरे शब्द’ (1994) से संकेत मिल गया था. उनकी ‘रंग’ शीर्षक से सात कविताएं आज भी अविस्मरणीय हैं. ‘पंडुक’ पर भी इनकी एक बड़ी अच्छी कविता है. कम कवि हैं, जो अपने शब्द को अन्न मानेंगे. एकांत की पंक्तियां हैं-

अन्न हैं मेरे शब्द/पृथ्वी की उर्वरता के आदिम साक्ष्य/जन्म लेना चाहते हैं बार-बार/संसार को बचाए रखने की/पहली और आखिरी इच्छा बनकर (अन्न हैं मेरे शब्द, पृ. 102).

ये पंक्तियां बीस बरस पहले की हैं. इस बीच एकांत की कविताओं के कई संग्रह आ गए. इस बात का अहसास कराते हुए कि वे विचार कर सकते हैं, आलोचना भी. कविताओं में भी एकांत कभी आत्मवादी नहीं लगे. किंतु उनका एक जनपदीय आधार स्पष्ट है. हैं तो मूलतः वे संवेदनात्मक ज्ञानधारा के ही कवि पर वे खुद को सरंचना पर हावी नहीं होने देते.

इस संग्रह की अधिसंख्य कविताओं की सरंचना प्रगीतात्मक है. विषय कोई हो, मंतव्य सृजन और सामाजिक ही होता है. कहीं थोड़ी निराशा हो सकती है, थोड़ा अवसाद भी. पर एकांत श्रीवास्तव ‘मिथकथन’ के ही कवि बने रहते हैं. उनकी बहिर्मुखता कभी असह्य नहीं होती.

आलोच्य संग्रह की पहली कविता है- ‘छाप’. इसमें शुरू की पंक्तियां हैं-

मुरुमवाली जमीन पर नंगे पांव/चलता हूं/तो तलुवे लाल हो जाते हैं/धरती अपना रंग छोड़ देती है.

यह छाप छोड़ जाने वाली बात केवल व्यक्ति-वैशिष्टय की चिंता-चेतना नहीं है. संकेत कुछ और है. गहराती सांझ में पेड़ पर उतरने वाले पंछी अपने पंख छोड़ जाते हैं, फूल छोड़ जाता है अपनी महक पवन में- जैसे मछली पानी में छोड़ जाती है अपनी गंध, कवि अपने मानुष होने की सुगंध छोड़ जाना चाहता है. इसमें ‘छोड़ जाना’ अधि अर्थपूर्ण है. कविता लिखकर कवि कहलाना या पुरस्कार प्राप्त करना खास बात नहीं है. कवि चाहता है कि अपनी ही काव्य-रूढ़ि से वह मुक्त हो जाये. एक संग्रह से जो उसकी छवि बनी, दूसरा संग्रह उसे ध्वस्त न भी करे, पर जीवन का एक अगला अध्याय अवश्य हो. इसलिए आत्म-संघर्ष सनातन है. इसमें लोक संवेदना सर्वोपरि है.

एकांत की कविता संप्रति बचा ले जाने की आकांक्षा है. कहीं वे विज्ञान-बोध के साथ भी लक्षित होते हैं. ‘लोहा’ कविता में अंदर और बाहर की आवाजाही है. कवि जंग-विरोधी है, लेकिन जीने के लिए इस संसार में उस जैसे लोगों को कदम-कदम पर लोहा लेना पड़ता है. रोटी के लिए या फिर सम्मान के लिए. पुरखों के बीज को बचा रखने के लिए भी लोहा लेना पड़ता है, पुनः उन्हें उगाने के लिए भी. ‘लोहा लेना’ मुहावरा है तो ‘रास्ता काटना’ भी. एकांत इसे नया अर्थ देते हैं, पारिवारिक संदर्भ में अर्थ सघन बनाते हैं. काम पर जाते समय भाई का रास्ता बहनें काटती हैं और पिताओं की बेटियां तो शुभ-शुभ होता है. यह बिल्ली के रास्ता काटने के अंधविश्वास का विखंडन है.

एकांत के मन में गांव, घर, परिवार और जनपदीय प्रकृति जीवंत है. अब घर है तो उसकी प्राणवत्ता होगी दिया-बाती. एक घर की नीरवता और निस्तब्धता सांझ को कवि को बेचैन कर देती है. ‘घास की पत्तियों में’ ‘सांझ का आकाश’ और ‘धूप में एक पक्षी उड़ता है’ जैसी संक्षिप्तकाय कविताओं में प्रकृति से कवि की संवेदनमैत्री रूपकात्मक है. ‘सांझ का आकाश’ विलक्षण है- ‘गेरू के रंग का/उड़े सारस/हिलीं फुनगियां/धवल कांस-फूलों का गिर गया गुलाल/नाव के पाल-सा/सांझ का आकाश...हिलता हुआ हवा में/दिया-बाती के बेर मंजूर के पंख-सा/

धरती की थकी हुई देह पर फैला हुआ/दुःस्वप्रों के तीर से/बिंधी हुई नींद/राख के रंग का सांझ का आकाश. इसमें ‘गेरू’ और ‘राख के रंग खास हैं’ किंतु ‘मंजूर के पंख-सा’ और भी खास है. ‘मंजूर’ अवधी का शब्द है, जायसी का ‘पावत’ में यह शब्द आता है. राख रंग की सांझ नरेश मेहता की आरंभिक एक कविता में आता है, किंतु वह शहर की सांझ का बिंब है. एकांत की कविता का पृष्ठाधार कस्बाई है. उसमें साधारण,

सीधे जन हैं, जिनकी दिनचर्या और संघर्ष के विविध प्रसंग हैं- जैसा अमूमन मुख्य धारा के कवियों की विशेषता है. लेकिन एकांत अलग से पहचान में आ जाते हैं- इसलिए भी कि उनकी कविताओं के सरोकार प्रकृति से नाभिनालबद्ध हैं. उनमें तीतुर, पड़की, कोयल, सारस, नीलकंठ, बुलबुल, पंडुक जैसे पक्षियों की गतिविधियां हैं तो कांस, कपास, व्यूगोनबेलिया, कदम्ब, कृष्ण चूड़ा, ग्वालिन, ब्रह्मकमल जैसे फूलों के रंग से, गंध से साक्षात् होता है.

एकांत श्रीवास्तव राग के कवि हैं तो संवेदना के विस्तार के बावजूद, विचार विह्वल होने के बावजूद, उनकी काव्य-भाषा बिंगपरक बनी रहती है. यह कवि-प्रकृति है. किंतु उनका बिंब-विधान अब अधिक गत्वर होने लगा है. ‘धूप में एक पक्षी उड़ता है’ तो पक्षी की उड़ान के साथ पक्षी की परछाई भी उड़ती है. और भी-

तट की रेत में पड़ती है परछाईं. तो रेत उड़ती है/समुद्र में पड़ती है तो समुद्र/खेत उड़ते हैं अपने हिलते पौधों के लिए हुए.

रंग और गंध ही नहीं ध्वनि को भी एक नया रूप देने की कोशिश में एकांत का कवि-कद बड़ा हुआ है. ‘समुद्र’ उनकी दृष्टि में ‘इस पृथ्वी का वाद्य है/हवाएं जिसे पीट-पीटकर बजाती हैं/आकाश इसे बहुत दूर से सुनता है/और तारे बहुत नीचे उतर आते हैं-’ (पृ. 40).

इस संग्रह में एक ‘आकाश’ कविता भी है- ‘जो हृदय में है. आत्मा में/दो सांसों के बीच/वही तो आकाश.’ इसमें एक नई बात कही गई है-

आकाश धरती की संदूक है/कभी खत्म न होने वाला धन है.

इसलिए कि ‘तारे बुझ जाते हैं आकाश नहीं बुझता/सूर्य डूब जाता है आकाश नहीं डूबता.’ एकांत आत्म समृद्धि के लिए प्रचुर स्वाध्याय के दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं. वे जातीय चिंतन और कविता की जड़ों तक पहुंचना चाहते हैं, अपने समय की विसंगतियों से जूझने के लिए. उनका यथार्थवादी होना कोई खबर नहीं है. इस संग्रह में अच्छी संख्या में ऐसी कविताएं हैं जिनका गहरा संबंध समकालीन मनुष्य के संताप से है. उनमें अवसाद का रंग गाढ़ा है, सहानुभूति सच्ची है. तथापि, उनका आत्म-रूप ‘बुलबुल’ है, जो कहती है-

मैं उन झाड़ियों के लिए गाती हूं/जिनकी जड़ें मिट्टी में गहरे धंसी हैं/मैं कठिन पठार में लगे/उन पेड़ों के लिए गाती हूं/जो भीतर पृथ्वी के गहरे कुण्ड से/अपने लिए जल खींचती है/मैं उन लोगों के लिए गाती हूं/जो पत्थर तोड़ते हैं...मेरा स्वर उन्हीं का स्वर है. (पृ. 71-72)

जाहिर है, आज का कवि स्वाभिमान की दर्पस्फीत अभिव्यक्ति कुंभनदास की शैली में नहीं कर सकता, करेगा तो विश्वसनीय नहीं करेगा. इसीलिए ‘बुलबुल’ के व्याज से बोलने का एक अर्थ है. एकांत में थोड़ी निहंगता भी है. विचारधारा कोई हो, इस निहंगता के अभाव में कवि की ललकार आत्मरति जैसी ही लगती है. एकांत की ‘दिल का गाना’ प्रभावशाली है-

विष बुझे तीरों से सूखे गए पेड़/सूख गए पेड़ तो उड़ गए पंछी/उड़ गए पंछी तो रुठ गई धरती/रुठ गई धरती तो पड़ गया दुकाल/तुम लाए दस मन सोना/मैं लाया पंडुक-सा दिल. (पृ. 83)

यह है एकांत श्रीवास्तव के कवि-कर्म की स्वकीयता. किंतु इस संग्रह में उनकी स्मृति-निर्भरता भी उजागर हुई है-

याद आई अपनी नदी/दूसरी नदी पार करते हुए/एक दूसरे ग्रह में मरते हुए/अपनी पृथ्वी याद आई. (पृ. 87)

एकांत की कविता में जो चीजें और दृश्य गोचर प्रत्यक्षीकरण का विषय रही हैं जिनकी संवेदना सहचरी रही है, वे अब पीछे छूटती जाती हैं. महानगरीय जीवन की यातना भी कम त्रासद नहीं है, फिर भी एकांत की कविता का जीवन द्रव्य उनकी जन्म भूमि ही है. वे एक परिवार के आत्मीय मनुष्य हैं, संबंधों के प्रति ईमानदार. इस संग्रह में ‘भाई’, ‘बहन’, ‘बिटिया के लिए लोहरी’, और ‘पिता की समाधि’ जैसी आत्मीय कविताएं अलग से ध्यानाकर्षण करती हैं. कुछ ‘एक्सरे’ आदि के चिकित्सकीय प्रसंग भी मार्मिक हैं. ‘इस प्यार’ पर दो कविताएं हैं. ‘पितरपख और ‘आंवला नवमी पर भी’. ‘गुजरात...नौ कविताएं’ संप्रदायवाद से मुठभेड़ की मनीषा हैं. ‘हीरा’, बेल्डर’ और ‘ग्रांड ट्रंक रोड’ पर अच्छी कविताएं हैं. कुछ स्त्री-विमर्श की कविताएं भी हैं. लेकिन जो कविता सर्वाधिक खींचती है, वह है ‘सोनझर’. यह सोना झारनेवालों की आस्था और संघर्ष की कविता है. यह एक जानकारी भी है. कवि हमें ‘सोनझर’ के लोक में ले जाता है- जहां ‘गंदे नाले या संकरी नाली के भीतर/गंदगी और बदबू की परवाह किये बिना/सोनझर जाति के लोग रेत और मिट्टी से सोना झारते रहते हैं.’ सोंदुल नदी न जाने किन पहाड़ों से निकलती है. उसके जल में सोने के कण पाये जाते हैं-

जेठ की सूखी हुई सोंदुल की रेत ढारते हैं सोनझर/बहुत धीरज और जीवटता के साथ/जहां कहीं भी दिखती है सोने की चमक/सोनझर पहुंचते हैं उस तक/अपने अंधेरों को पार करते हुए/सोनझर गंदी नाली या बदबू की परवाह नहीं करते/वे बैठे रहते हैं इत्मीनान से अपना झरिया लिये सर्राफा बाजार में/सुनार की दुकानों के पास.

वे सोना झारते हैं लेकिन कभी-कभी ही दिखती है उनकी जिंदगी में सोने की चमक. सोना उन्हें कंचनमृग की तरह भरमाता है/भटकाता है अपने पीछे.

इनकी बहनें नकली कर्णफूल पहनकर मुस्कुराती हैं और पीतल के गहने पहनकर रोती हुई विदा होती है इनकी बेटियां.

‘सोनझर’ उन श्रमजीवियों के प्रतीक हैं जिनके खून और पसीने विलाप करती हैं.

एकांत के इस संग्रह की अंतिम कविता है- ‘डूब’. एक लंबी काव्य-कथा, अवसादग्रस्त, भूमंडलीकरण का क्रूर परिदृश्य. इसका हर वाक्य संवेदनसिक्त है. विश्व बैंक के ऋण से देश में तमाम तरह के निर्माण-कार्य हो रहे हैं. उससे उऋण नहीं हो पायेंगी कई-कई पीढ़ियां. सड़कें खूब ऊंची और चौड़ी हो रही है और गांव गढ्ढों में तब्दील हो रहे हैं. नदियों से बंधा संदेश. ‘किंतु नदी को उठाया उसने तलवार की तरह और काट डाला हमारे दिलों को/पानी की तलवार से बांट दिया देश.’ गंगोत्री के जल-सा निष्कलुष भारत के आदिवासी का मन दहशत में है. सत्ताधारी अमेरिकी पूंजी के दलाल हैं. उसकी पुलिस भूखी-नंगी जनता का दमन करती है. विकास के नाम पर विनाश के खेल में गांव डूब के शिकार हो गये हैं. कविता जनपक्ष में लड़ रही है सत्ता के उन्माद से. कवि अपने गांव, जनपद, बस्ती, जंगल, पहाड़ और नदियों को बचाने के लिए जूझ रहा है. उसका नेतृत्व मेधा पाटकर कर रही है. मेधा पाटकर केवल एक स्त्री नहीं है. वह दावानल में परिणत चिनगारी है. वह तनी हुई प्रत्यंचा है, धनुष की आदिवासियों के हाथ में. इसमें एक अलग तरह की आलोचना-भंगिमा है. बीच-बीच में स्वर उद्धोधनात्मक भी हुआ है. ‘डूब’ के फैलाव में मार्मिकता है. छूटा हुआ घर, कोठा, पसार/डूब रहा है बिके हुए बैल की आंख में/मशीनों की घरघराहट में बांसुरी की तान/बाजार में शोर में आदमी की आवाज/ट्रेन की धड़धड़ाहट में पंडुक में आवाज.

डूब के विस्तार में ग्वालिन और मोंगरे की गंध भी है-

कट गए हैं धान/सीत में रात भर भींगी है नरई/खाली खेतों में उतरते हैं खंजन/कितना पारदर्शी है जल नदी का कातिक में.

कहना न होगा कि सबकुछ के बावजूद, एकांत लोकराग और रंग के अप्रतिम कवि हैं. उनकी समझ में-

प्यार इस पृथ्वी का वसंत है/क्योंकि कदंब के फूलने से वसंद नहीं आता/धरती को चाहने से आता है/कोयल के गाने से आम नहीं मौरते/प्रेम की इच्छा से मौरते हैं/यह भी कि

पछुआ से, पुरवा से पालना नहीं डोलता/मां की लोरी से डोलता है. (पृ. 132)

एकांत की सृजन-प्रक्रिया में यह समझ सक्रिय है कि बढ़ई और कुम्हार रचनाकार हैं. इसलिए कि ‘लकीरें खींच देने से नहीं बनते रास्ते/वे हमारे पांव हैं जो उन्हें बनाते हैं.’ कवि-व्यक्तित्व अधिक दृढ़ हुआ है- अभिव्यक्ति में लोच की जगह तनाव बढ़ गया है. यथा-

हम रास्तों पर नहीं चलते/हमारे पांवों से जन्म लेते हैं रास्ते.

सभ्यता तो हाथों की उपलब्धि है. किंतु काम करने वाले हाथों को संप्रति सभ्यता-वृत्त से बाहर कर दिया गया है. श्रमिकों के लिए जगह इतनी कम बची है कि पांव सिंकोड़ कर बैठना भी मुश्किल है. जिनके घर मिट्टी के हैं, बिना खिड़कियों के. एक ही दरवाजा जिसमें झुककर जाना होता है. पांव छोटे सही पर चल पड़े हैं. लंबी यात्रा पर. कवि लिखता है-

छोटे पंख सारा आकाश नाप लेते हैं/छोटे वाक्य महाकाव्य से महक उठते हैं/छोटी चिड़िया गा-गा कर वसंत ले आती हैं. एकांत अब सूक्ति भी लिख रहे हैं-

‘बड़ी इच्छा का मोती पलता है/छोटे जीवन के सीप में.’

‘डूब’ का कवि मणिबोली, हरसूद, टिहरी आदि का विषाद लिखता है पर यह उसका एक पक्ष है. दूसरा पक्ष प्रतिरोधक है. सत्ता के उन्माद के बरअक्स सर्वसाधारण की लड़ाई अधिक काव्यात्मक है-

तप रहा है समय का लोहा/पज रहे हैं भट्ठी में औजार/कि विष में बुझे हैं हमारे भी तीर!

एकांत सताये हुए लोगों के साथ हैं. उनका विश्वास है कि सताये हुए आदमी की ललकार से/हिल जाते हैं तीनों लोक.

संक्षेप में, एकांत श्रीवास्तव की कविताओं का यह संग्रह उनके अन्य संग्रहों से अलग है. कविता के लिए अकाल वेला में कविता की कारगर उपस्थिति का अहसास होता है इसे पढ़कर.

सम्पर्कः अध्यक्ष (हिन्दी विभाग)

बी. आर. अम्बेडकर बिहार यूनिवर्सिटी, मुजफ्फरपुर (बिहार)

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