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प्राची - जनवरी 2017 : कथाकार राधाकृष्ण के संबंध में भारत यायावर एवं पंकज मित्र की बातचीत

बातचीत

राधाकृष्ण उपेक्षित साहित्यकार नहीं, साहित्य के शिखर व्यक्तित्व हैं -भारत यायावर

(कथाकार राधाकृष्ण के संबंध में भारत यायावर एवं पंकज मित्र की बातचीत)

राधाकृष्ण एक समर्पित कथाशिल्पी, हिन्दी की किशोरावस्था में कथा साहित्य को प्रौढ़ता प्रदान करने वाले बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व, पर जैसा हिन्दी में होता है कि हम अपने पुरखों के प्रति वैसा राग नहीं रखते जैसा दूसरी भाषाओं में पाया जाता है तो राधाकृष्ण भी भुला दिये जाने का दंश झेल रहे हैं. रेणु के खोजीराम भारत यायावर अब राधाकृष्ण के रचना संसार के मोती खोज लाने के अभियान में लगे हैं और पिछले दिनों इसी सिलसिले में रांची में थे. प्रस्तुत है कथाकार पंकज मित्र के साथ उनकी बातचीतः-

पंकज मित्र : राधाकृष्ण के रचनाकाल का फैलाव कहाँ से कहाँ तक जाता है?

भारत यायावर : राधाकृष्ण ने आत्मकथा लिखीे है और अपनी पहली कहानी का जिक्र किया है जो हिन्दी गल्पमाला में ‘सिन्हा साहब’ के नाम से छपी थी. अपनी स्मृति से उन्होंने अप्रैल 1929 बताया है. मैंने उस कहानी की खोज शुरू की और नागरी प्रचारिणी सभा कीे हिन्दी गल्पमाला की पुरानी फाइलों में ढूँढ़ा तो उसमें पाया कि मार्च 1929 के अंक में यह मौजूद थी. सिन्हा साहब एक पदाधिकारी हैं और एक परिवार में उनका आना-जाना है. उस परिवार की एक अल्पवयसी लड़की उन पर आसक्त हो जाती है. वे नहीं चाहते हैं कि इस तरह की जटिलता जीवन में पैदा हो क्योंकि उम्र में काफी फासला है. तबादला कराते हैं, फिर लौटते हैं. इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे चेखव याद आते रहे. इतनी मंजी हुई और परिपक्व कहानी थी. जबकि यह उनकी पहली कहानी थी. हमलोग जानते हैं 18 सितम्बर 1910 में राधाकृष्ण का जन्म हुआ था और मात्र 19 साल की उम्र में ऐसी परिपक्व रचना देखकर आश्चर्य होता है. प्रेमचंद ने जब उनकी कहानी पढ़ी, 1930 में उन्हें एक पत्र लिखा और अपने यहां बुलाया. उनकी प्रतिभा को पहचाना. राधाकृष्ण ने एक संस्मरण में लिखा है कि उसी दौरान जब एक दिन प्रेमचंद छत पर बैठे हुए थे तो उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की थी कि हिन्दी में कथाए उपन्यास, नाटक, एकांकी आदि विधायें स्थापित हो रही हैं और खूब लिखी जा रही हैं पर आत्मकथा, जीवनीए संस्मरण आदि नहीं आ रहे हैं. हंस पत्रिका मार्च 1930 से प्रकाशित होना शुरू हुई और प्रेमचंद ने उन्हें खूब छापा. साल के 12 अंकों में 4-5 कहानियाँ तो उनकी रहती ही थीं.

पंकज मित्र : संभवतः उनकी प्रतिभा को पहचानकर ही प्रेमचंद उन्हें हिन्दी के पांच महत्वपूर्ण कथा लेखकों में शुमार करते थे. कौन लोग लिख रहे थे उस दौरान?

भारत यायावर : कौशिक जी थे, सुदर्शन थेए दरअसल प्रेमचंद के बाद जो महत्वपूर्ण कथाकार थे उसमें जैनेन्द्र, अज्ञेय, राधाकृष्ण, भुवनेश्वर, उर्दू के सुहैल अजीमाबादी इन सभी से प्रेमचंद का बड़ा स्नेह था और आशा से देखते थे इन्हें और ये सभी प्रतिभाशाली थे पर राधाकृष्ण से उन्हें विशेष स्नेह था.

पंकज मित्र : अच्छा, जब कहानियां पढ़ते हैं राधाकृष्ण की तो हिन्दी के निर्माण का दौर था वह और इस बात को

ध्यान में रखकर बात करे तो राधाकृष्ण अपने समय से बहुत आगे के कथाकार लगते हैं- मानव मन का अद्भुत चित्रण, सामाजिक स्थितियाँ का वेधक और बेधड़क वर्णन, व्यंगात्मक लहजा जो बड़ा ही लोकप्रिय हुआ था. हमलोगों ने भी जब बचपन में उनकी प्रो. भीम भंटा राव, वरदान का फेर जैसी कहानियाँ पढ़ी थीं तो बड़ा आनंद आया था जिसके धारदार व्यंग को हमलोगों ने बहुत बाद में अनुभूत किया. तो राधाकृष्ण व्यंगधर्मी रचनायें कब से और कैसे लिखने लगे?

भारत यायावर : राधाकृष्ण में ये प्रवृत्ति थी और ये जो रचनायें हैं उनके गहरे अकलेपन और अवसाद से उपजी हैं. उनका जो जीवन था बड़ा संघर्षपूर्ण और अकेला था. वे थे, उनकी माँ थी, उपेक्षा थी, जीवन संघर्ष था- इनके बीच जिंदा रहने की कोशिश थी दरअसल यह हास्य व्यंग रचनाएँ. 1935 के आसपास इस तरह की चीजें लिखने लगे थे बल्कि प्रेमचंद ने ही कहा था उन्हें कि बहुत मार्मिक और गंभीर कहानियाँ लिख रहे हो जो तुम्हारे मिजाज से मेल नहीं खाता है. तो राधाकृष्ण ने एक छद्म नाम रखा. घोष-बोस-बनर्जी-चटर्जी और हास्य.व्यंग रचनायें लिखनी शुरू कर दीं. लेकिन उनके दृष्टिकोण में एक वैशिष्ट्य. वैसे चरित्रों को जिन्हें लोग चरित्रहीन, गलीज, उपेक्षित समझते थे उनके प्रति भी उनकी गहरी सहानुभूति थी. एक कहानी है- माँ-बेटी- 1942 में माया पत्रिका में प्रकाशित हुई थी. जब मैं और राधाकृष्ण के पुत्र सुधीरलाल राधाकृष्ण की अल्पज्ञात रचनाओं की तलाश कर रहे थे उसी दौरान इलाहाबाद में यह रचना मिली थी. जब हमने यह कहानी पढ़ी तो हम

स्तब्ध रह गए बिल्कुल. इतना गहरा अवसाद जैसे एक शोक गाथा. माँ और उसकी अवैध संतान जो बेटी है उनके प्रति कितना निर्मम, कितना क्रूर है, समाज का नजरियाए इसे व्यक्त करती है यह कहानी. ‘कफन’ पढ़ते हुए भी इतना गहरा क्षोभ और अवसाद पैदा नहीं होता जितना माँ-बेटी पढ़ते हुए लगा हमें. एक और कहानी का जिक्र करूँगा- कलकत्ते से प्रकाशित होने वाले विश्वमित्र में छपी थी- ‘बुढ़िया गुलाबी’- सबसे झगड़ा करती है, दुनिया से नाराज रहती है. एक संभ्रांत परिवार की एक लड़की के साथ जब धर्षण होता है और उसे उपेक्षित कर परिवार भी निकाल देता है, छोड़ देता है बिल्कुल अकेला, तब वही नाराज बुढ़िया गुलाबी उसके एवं उसके शिशु का पालन करती है. तो आप देखेंगे कि बिल्कुल एक नयी दृष्टिभंगी के साथ राधाकृष्ण आये थे।

पंकज मित्र : अच्छा, देखिये जिस विपुल मात्रा में

राधाकृष्ण ने लिखा है तकरीबन हर विद्या में- कहानी, नाटक, एकांकी नाटक, रेडियो नाटक, यहां तक कि पत्रकार रूप भी उनका बड़ा महत्वपूर्ण है. रांची से निकलने वाली आदिवासी पत्रिका का लंबे समय तक संपादन किया और उनकी जनजातीय समुदाय के प्रति सहृदयता देखिये कि बहुत सारे आदिवासी रचनाकारों को उन्होंने बड़े ही प्रेम से छापाए जबकि उस वक्त विमर्श जैसी कोई बात भी नहीं थी, तो ये जो विविधता है उनके लेखन की- विद्यागत, रूपगत, कथागत यह देखकर बड़ा ही सुखद आश्चर्य होता है.

भारत यायावर : बिल्कुल! राधाकृष्ण ने दुहराया नहीं कभी खुद को. विद्याओं में तो लिखा ही और विद्याओं में भी नए-नए प्रयोग किये. अब उदाहरण के लिए उनके उपन्यासों को देखिये- विषयवस्तु, संरचना सब अलग है- ‘रूपांतर’ एक पौराणिक आख्यान है. ‘फुटपाथ’ एकदम यथार्थवादी, तो ‘सनसनाते सपने’ हास्य व्यंग का उपन्यास है. पत्रकार रूप का जो आपने जिक्र कियाए एक महत्वपूर्ण पहलू है उनका. कम उम्र से ही पत्रकारिता करने लगे थे- पटना में ‘आदर्श’ ‘महावीर’ पत्रिकाओं में काम करते थे, ‘माया’ में काम किया. प्रेमचंद के ‘हंस’ में भी सहयोग किया. ‘योगी’, ‘हुंकार’ आदि में कॉलम लिखे और आदिवासी जीवन पर लेखन की बात है तो इसके तो वह प्रारंभिक रचनाकारों में थे.

पंकज मित्र : दरअसल ऐसा लगता है कि उपेक्षित-वंचित समुदाय है उनके प्रति बहुत गहरी करुणा से उनका लेखन संचालित है और उनका जो व्यक्तिगत जीवन संघर्ष था इसके साथ इन वंचित समुदायों के जीवन संघर्ष के साथ एकात्म हो जाता है कहीं न कहीं. कई लोग ऐसा मानते हैं कि राधाकृष्ण का वैसा मूल्यांकन नहीं हो पाया है. वैसे तो सभी लेखकों के बारे में ऐसा कहते हैं लोग.

भारत यायावर : नहीं, देखिये राधाकृष्ण जब लिख रहे थे तो बहुत चर्चित थे. राष्ट्रीय स्तर पर पहचान थी. राँची में उनका अभिनंदन हुआ था. सभी लेखकों ने उस समय उनकी रचनाओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ लिखी थी, पर राँची में वे रह गए और तब राँची में वैसा साहित्यिक परिवेश नहीं था. उनके देहांत के बाद रचनायें ढंग से संकलित नहीं हो पायी थीं. तो मैं और राधाकृष्ण के पुत्र सुधीरलाल उनकी रचनाओं को संकलित.संग्रहित करने के प्रयत्न में लगे हैं; ताकि लोग उन्हें उपेक्षित साहित्यकार के रूप में नहीं बल्कि एक लीजेंडरी साहित्यिक व्यक्तित्व, शिखर व्यक्तित्व के रूप में स्मरण करें.

पंकज मित्र : नयी पीढ़ी के लिए भी यह अति आवश्यक कार्य आप कर रहे हैं. उनके साहित्यिक अवदान को याद करने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है.

(अगले पृष्ठ पर राधाकृष्ण की महत्त्वपूर्ण कहानी ‘‘मां-बेटी’’)

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