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गुड़ी पड़वा-नवसंवत्‍सर-नववर्ष-वर्ष प्रतिपदा / मानसश्री डॉ.नरेन्‍द्रकुमार मेहता

गुड़ी पड़वा या नववर्ष क्‍या है?

चैत्र मास की शुक्‍ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या नववर्ष का आरम्‍भ माना गया है। ‘गुड़ी’ का अर्थ होता है विजय पताका । ऐसा माना गया है कि शालिवाहन नामक कुम्‍हार के पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों का निर्माण किया और उनकी एक सेना बनाकर उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक दिये। उसमें सेना की सहायता से शक्‍तिषाली शत्रुओं को पराजित किया। इसी विजय के उपलक्ष्‍य में प्रतीक रूप में ‘‘षालिवाहन शक’ का प्रारम्‍भ हुआ। पूरे महाराष्‍ट्र में बड़े ही उत्‍साह से गुड़ी पड़वा के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। कष्‍मीरी हिन्‍दुओं द्वारा नववर्ष के रूप में एक महत्‍वपूर्ण उत्‍सव की तरह इसे मनाया जाता है।

इसे हिन्‍दू नव संवत्‍सर या नव संवत्‌ भी कहते हैं। ऐसी मान्‍यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्‍टि की रचना प्रारम्‍भ की थी। इसी दिन से विक्रम संवत्‌ के नये साल का आरम्‍भ भी होता है। सिंधी नववर्ष चेटीचंड उत्‍सव से शुरू होता है जो चैत्र शुक्‍ल द्वितीया को मनाया जाता है। सिंधी मान्‍यताओं के अनुसार इस शुभ दिन भगवान्‌ झूलेलाल का जन्‍म हुआ था जो वरूण देव के अवतार हैं।

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आज भी हमारे देष में प्रकृति, षिक्षा तथा राजकीय कोष आदि के चालन-संचालन में मार्च अप्रेल के रूप में चैत्र शुक्‍ल प्रतिपदा को ही देखते हैं। यह समय दो ऋृतुओं का संधिकाल माना जाता है। इसमें रात्रि छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति एक नया रूप धारण कर लेती है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति नव पल्‍लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जावान हो रही हो। मानव, पशु-पक्षी यहाँ तक की जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद एवं आलस्‍य का परित्‍याग कर सचेतन हो जाती है। इसी समय बर्फ पिघलने लग जाती है। आमों पर बौर लगना प्रारम्‍भ हो जाता है। प्रकृति की हरितिमा नवजीवन के संचार का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ सी जाती है। इसी दिन प्रतिपदा के दिन आज से 2074 वर्ष पूर्व उज्‍जयिनी नरेष महाराज विक्रमादित्‍य ने विदेषी आक्रांत शकों से भारत भूमि की रक्षा की और इसी दिन से कालगणना प्रारम्‍भ की गई। उपकृत राष्‍ट्र ने भी उन्‍हीं महाराज के नाम से विक्रमीसंवत्‌ का नामकरण किया। महाराज विक्रमादित्‍य ने आज से 2074 वर्ष पूर्व राष्‍ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्‍ति का जड़ से उन्‍मूलन कर देश से पराजित कर भगा दिया और उनके मूल स्‍थान अरब में विजय की पताका फहरा दी। साथ ही साथ यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कम्‍बोज देशों पर अपनी विजय ध्‍वजा फहरा दी। इन्‍हीं विजय की स्‍मृति स्‍वरूप वर्ष प्रतिपदा संवत्‍सर के रूप में मनाई जाती रही और आज भी बड़े उत्‍साह एवं ऐतिहासिक धरोहर की स्‍मृति के रूप में मनाई जा रही है। इनके राज्‍य में कोई चोर या भिखारी नहीं था। विक्रमादित्‍य ने विजय के बाद जब राज्‍यारोहण हुआ तब उन्‍होंने प्रजा के तमाम ऋणों को माफ कर दिया तथा नये भारतीय कैलेण्‍डर को जारी किया, जिसे विक्रम संवत्‌ नाम दिया।

सबसे प्राचीन काल गणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन विक्रमी संवत्‌ के रूप में इस शुभ एवं शौर्य दिवस को अभिषिक्‍त किया गया है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्‍तम भगवान्‌ श्रीरामचन्‍द्रजी के राज्‍याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया गया। यह दिन वास्‍तव में असत्‍य पर सत्‍य की विजय को याद करने का दिवस है। इसी दिन महाराज युधिष्‍ठिर का राज्‍याभिषेक हुआ था। इसी शुभ दिन महर्षि दयानन्‍द ने आर्यसमाज की स्‍थापना की थी। यह दिवस राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के संस्‍थापक श्री केशव बलिराम हेडगेवार के जन्‍मदिवस के रूप में मनाया जाता है। पूरे भारत में इसी दिन से चैत्र नवरात्र की शुरूआत मानी जाती है।

हम कैसे मनायें नव वर्ष-नव संवत्‍सर
नव वर्ष की पूर्व संध्‍या पर दीपदान करना चाहिये। घरों में शाम को 7 बजे लगभग घण्‍टा-घडियाल व शंख बजाकर मंगल ध्‍वनि से नव वर्ष का स्‍वागत करें। इष्‍ट मित्रों को एसएमएस, इमेल एवं दूरभाष से नये वर्ष की शुभकामना भेजना प्रारम्‍भ कर देना चाहिये। नव वर्ष के दिन प्रातःकाल से पूर्व उठकर मंगलाचरण कर सूर्य को प्रणाम करें। हवन कर वातावरण शुद्ध करें। नये संकल्‍प करें। नवरात्रि के नो दिन साधना के शुरू हो जाते हैं तथा नवरात्र घट स्‍थापना की जाती है। नव वर्ष का स्‍वागत करने के लिए अपने घर-द्वार को आम के पत्‍तों से अशोक पत्र से द्वार पर बन्‍दनवार लगाना चाहिये। नवीन वस्‍त्राभूषण धारण करना चाहिये। इसी दिन प्रातःकाल स्‍नान कर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्‍प और जल ले कर ‘ओम भूर्भुवः स्‍वः संवत्‍सर-अधिपति आवाहयामि पूजयामि च’ मंत्र से नव संवत्‍सर की पूजा करनी चाहिये एवं नव वर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्माजी से प्रार्थना करनी चाहिये। हे भगवन्‌! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष मंगलमय एवं कल्‍याणकारी हो। इस संवत्‍सर के मध्‍य में आने वाले सभी अनिष्‍ट और विघ्‍न शांत हो जाये।

नव संवत्‍सर के दिन नीम के कोमल पत्‍तों और ऋतु काल के पुष्‍पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवाइन मिलाकर खाने से रक्‍त विकार आदि शारीरिक रोग होने की संभावना नहीं रहती है तथा वर्षभर हम स्‍वस्‍थ रह सकते हैं। इतना न कर सके तो कम-से-कम चार-पाँच नीम की कोमल पत्‍त्‍यिाँ ही सेवन कर ले तो पर्याप्‍त रहता है। इससे चर्मरोग नहीं होते हैं। महाराष्‍ट्र में तथा मालवा में पूरनपोली या मीठी रोटी बनाने की प्रथा है। महाराष्‍ट्रियन समाज में गुड़ी सजाकर भी बाहर लगाते हैं। यह गुड़ी नव वर्ष की पताका का ही स्‍वरूप है।

सच तो यह है कि विक्रम संवत्‌ ही हमें अपनी संस्‍कृति की याद दिलाता है और कम से कम इस बात की अनुभूति तो होती है कि भारतीय संस्‍कृति से जुड़े सारे समुदाय इसे एक साथ बिना प्रचार प्रसार और नाटकीयता से परे हो कर मनाते हैं। हम सब भारतवासियों का कर्त्तव्‍य है कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक और भारतीय कैलेण्‍डर विक्रम संवत्‌ के अनुसार इस दिन का स्‍वागत करें। पराधीनता एवं गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हमें एक ऐसा रंग चढ़ाया कि हम अपने नव वर्ष को भूल कर-विस्‍मृत कर उनके रंग में रंग गये। उन्‍हीं की तरह एक जनवरी को नव वर्ष अधिकांश लोग मनाते आ रहे हैं। लेकिन अब देशवासी को अपनी भारतीयता के गौरव को याद कर नव वर्ष विक्रमी संवत्‌ मनाना चाहिये जो आगामी 29 मार्च को है।

आप सभी को नव वर्ष की अनेक-अनेक शुभकामनाएँ यह वर्ष भारतीयों के लिये ही नहीं अपितु सम्‍पूर्ण विश्‍व के लिये भी सुख, शांति एवं मंगलमय हो।


मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता
मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति Sr. MIG-103, व्यास नगर,
ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)पिनकोड- 456010
Ph.:0734-2510708,Mob:9424560115 Email:drnarendrakmehta@gmail.com


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