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प्रभा मुजुमदार की ताज़ा कविताएँ - शब्द

जतिन भट्ट की कलाकृति

शब्द

मेरे लिये शब्द एक औजार है.
भीतर की टूट फूट/
उधेड़बुन अव्यवस्था और
अस्वस्थता की शल्यक्रिया के लिये.
शब्द एक आईना,
यदा कदा
अपने स्वत्व से साक्षात्कार के लिये.
मेरे लिये शब्द संगीत है.
जिन्दगी के सारे राग
और सुरों को समेटे हुए.
दोपहर की धूप में
भोर की चहचहाट है
रात की कालिख में
नक्षत्रों की टिमटिमाहट.
मेरे लिये शब्द एक ढाल है,
चाही-अनचाही लड़ाइयों में
अपनी सुरक्षा के लिये.
मेरे लिये शब्द आँसू है,
यंत्रणा और विषाद की
अभिव्यक्ति के लिये.
हताशा की भंवरों से
लड़ने का सम्बल है.
शब्द एक रस्सी की तरह,
मन के अन्धे गहरे कुएं में
दफन पड़ी यादों को
खंगालने के लिये.
शब्द एक प्रतिध्वनि है,
वीरान/ अकेली/ निर्वासित नगरी में
हमसफर की तरह
साथ चलने के लिये

शब्द 2

शब्द अब
शब्दकोशों से बाहर निकल कर,
तलाशने लगे है
अपने अर्थ और सन्दर्भ,
उपयोगिता/ विस्तार
और व्याकरण के नियम.
वे रोकना चाहते है,
किसी भुलावे और छलावे की तहत
अपने गलत प्रयोग.
अर्थ/ मीमांसा और विवेचनाएं.
संकीर्ण स्वार्थों के लिये
अपनी तोड़-मरोड़.
वे नहीं चाहते अब
किसी कु-पात्र के कानों में
संगीत बन गूँजना.
कठपुतली की तरह नाचना
किसी कुशल मदारी के
हाथों में बन्धी डोर से.
ड्राइंग रूम में मढ़ कर रखे गये
प्रशस्ति पत्रों से बाहर निकलना चाहते है.
उन्हें नहीं करना है
किसी के चरणों में
फूल बन कर समर्पण.
शब्द चाहते है शक्ति.
दर्पण बन कर
समय और समाज का प्रतिबिम्ब,
सुबह की किरण
अन्धेरे, धुन्ध और दुविधा को
मिटा देने के लिये.

शब्द 3

शब्द अब
बिकने लगे है मंडियों में
उत्पाद बन कर.
और बिचौलियों के समूह
आ खड़े होते है
उनके दाम आंकने के लिये,
अपने अपने लेबल
और अपनी पैकिंग के साथ.
स्तुति और प्रशस्तियों के
खुशामद और गिड़गिड़ाहट के
दम्भ और दावों के.
शब्दों के वार शब्दों की ढाल
शब्दों की आग में
शब्दों का घी.
सब कुछ
बाजारू तरीके से आयोजित हो जाता है.
रैलियां और धरनें
लूट और घेराव
भजन कीर्तन और फैशन शो
सांस्कृतिक और साहित्यिक जमावड़े भी.
हंसी और आँसू,
व्यंग और क्रोध,
प्रेम और अनुराग के शब्द,
निर्देशित होकर
सही वक्त/
सही सांचे में,
फिट किये जाने के बाद
क्या भौंकना ही
मौलिक रह जायेगा

शब्द 4

चुप चुप धीमे से रुकते,
झिझकते
मत बुदबुदाओ.
डर और सन्नाटे में
संगीत बन मत गुनगुनाओ.
शब्दों तुम बन जाओ
हथौड़ों की गूंज.
ठक ठक कर हिलाते रहो
जंग लगे बन्द दरवाजों की चूल.
बजो तो तुम नगाड़ों की तरह,
कि न कर पाये कोई
बहरेपन का स्वांग.
शब्दों तुम बरसों,
बारिश की फुहार बन कर.
अरसे से बंजर पड़ी
धरती पर,
अरमान बन लहलहाओ.
ठस और ठोस
संकीर्ण और सतही,
मन की जड़ता को
तुम पंख दो शब्दों.
आकाश की तरलता में
उड़ते रहें स्वप्न .
विस्तारती रहे सोच.
धूमकेतुओं की तरह
पड़ताल करती रहे नक्षत्रों की.
शब्दों
तुम कागज पर उकेरी गई
बेमतलब रेखाएं नहीं.
गढ़ो नई परिभाषाओं को.

शब्द

मैंने नहीं थामे
कभी किसी के झंडे
बैनर और पोस्टर.
न बनी जुलूस का हिस्सा
और न नारे ही लगाये
हाय हाय या जय हो
किसी के कहने पर.
आखिर क्यों मिलता
किसी का मंच कभी मुझे.
नहीं की किसी देवता की भक्ति
सुबह शाम आरती/ धूपबत्ती.
प्रसाद चढ़ा कर
हाथ जोड़ना/ सिर झुकाना
कौन कहता मुझे तथास्तु,
वांछित फल पाने का वरदान.
नहीं झुकाया अपना सिर,
न फैलाया हाथ.
न अभावों का रोना
दीन हीन हो कर याचना/ गिड़गिड़ाना.
कोई भी दाता,
याचक की ताक में
अपने पुण्य कर्मों के लिये
क्यों नवाजता मुझे.
मेरे शब्द बिकाऊ नहीं है
न चारण न दरबारी
स्वर और राग अपने ही,
अपने ही अर्थ और व्याख्याएं.
तालियों की गूंज
और वाहवाही नहीं,
इनाम और सम्मान भी नहीं.
अपने ही लिखे पन्ने बन सके परचम
और तैरते जायें शब्द हवा में
दूर तक
उड़ते जायें.

प्रभा मुजुमदार

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आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 13 मार्च 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

बहुत सुन्दर। होली की शुभकामनाएं ।

सुंदर कविता ।

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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