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हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता / डॉ. चन्द्रकुमार जैन

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जिस देश में इतिहास लेखन के प्रति विशेष उत्साह दिखाई पड़ता है, समझा जाना चाहिए कि उस देश में इतिहास के नव-निर्माण की ऐतिहासिक चेतना विद्यमान ...

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जिस देश में इतिहास लेखन के प्रति विशेष उत्साह दिखाई पड़ता है, समझा जाना चाहिए कि उस देश में इतिहास के नव-निर्माण की ऐतिहासिक चेतना विद्यमान है। हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के संदर्भ में भी यह बात उतनी ही सच है। हिन्दी के विद्वानों एवं साहित्यकारों ने अपने इस ऐतिहासिक दायित्व का पूरी ईमानदारी से निर्वाह किया है और वे आज भी साहित्य का नया इतिहास लिखने की दिशा में प्रयत्नशील हैं। यद्यपि डॉ.बच्चन सिंह ने अपनी कृति ''हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास'' में स्वीकार किया है कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास को छोड़कर कोई दूसरा इतिहास नहीं लिखा जा सकता तथापि यह उल्लेख्य है कि स्वतंत्रता के पश्चात साहित्य इतिहास लेखन के प्रति नई चेतना जागृत हुई है। फलत: भारतीय एवं विशेषत: हिन्दी साहित्य का इतिहास लेखन किस प्रकार किया जाये इस पर भी बहस जारी रही। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के पश्चात हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में उन्हीं विचार बिन्दुओं की आवृत्ति हुई है जिनका उल्लेख स्थूल या सूक्ष्म रूप में उन इतिहासों में हुआ था, फिर भी यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है कि हिन्दी के नवीन इतिहास दर्शन और हिन्दी साहित्य के ऐतिहासिक आख्यान को लेकर विद्वानों ने कोई शिथिलता नहीं बरती। साहित्य का इतिहास लेखन कई दृष्टियों से सम्पन्न हुआ है जिसमें हिन्दी में रचे जा रहे साहित्य के अंतरंग तत्वों को उद्धाटित किया गया है।

हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की समस्याओं पर विचार करने से पूर्व उस समृध्द परंपरा पर दृष्टिपात कर लेना समीचीन होगा जिसके आधार पर ही पुनर्लेखन पर पुनर्विचार संभव है। साहित्य का इतिहास लिखने की परंपरा का सूत्रपात तब हुआ था जब जीवन के विविध क्षेत्रों में इतिहास निर्माण की ललक स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का इतिहास इस बात का साक्षी है कि अपने युग के राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर ही उन्होंने हिन्दी साहित्य के वैभव से पाठकों का परिचय कराया। शुक्ल जी ने तत्कालीन रचनात्मक साहित्य की ऐतिहासिक क्रांति व नवीन सृजनात्मक प्रवृत्तियों को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि उनका प्रयास सही अर्थों में इतिहास बना।

हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन को यदि आरंभिक, मध्य व आधुनिक काल में विभाजित कर विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। उसे शब्दबध्द करने का प्रश् अधिक महत्वपूर्ण था। आरंभिक काल में मात्र कवियों के सूची संग्रह को इतिहास रूप में प्रस्तुत कर दिया गया। भक्तमाल आदि ग्रंथों में यदि भक्त कवियों का विवरण दिया भी गया तो धार्मिक दृष्टिकोण तथा श्रध्दातिरेक की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त उसकी और कुछ उपलब्धि नहीं रही।

19वीं सदी में ही हिन्दी भाषा और साहित्य दोनों के विकास की रूप रेखा स्पष्ट करने के प्रयास होने लगे। प्रारंभ में निबंधों में भाषा और साहित्य का मूल्यांकन किया गया जिसे एक अर्थ में साहित्य के इतिहास की प्रस्तुति के रूप में भी स्वीकार किया गया। डॉ. रूपचंद पारीक, गार्सा-द-तासी के ग्रंथ को हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास मानते हैं। उन्होंने लिखा है-''हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास लेखक गार्सा-द-तासी हैं, इसमें संदेह नहीं है। परंतु डॉ. किशोरीलाल गुप्त का मंतव्य है- ''तासी ने अपने ग्रंथ को हिन्दुई और हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास'' कहा है, पर यह इतिहास नहीं हैं, क्योंकि इसमें न तो कवियों का विवरण काल क्रमानुसार दिया गया है, न काल विभाग किया गया है और अब काल विभाग ही नहीं है तो प्रवृत्ति निरूपण की आशा ही कैसे की जा सकती है। वैसे तासी और सरोज को हिन्दी साहित्य का प्रथम और द्वितीय इतिहास मानने वालों की संख्या अल्प नहीं है परंतु डॉ. गुप्त का विचार है कि ग्रियर्सन का ''द माडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान'' हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने इसके विपरीत अनुसंधानात्मक प्रवृत्ति की दृष्टि से तासी के प्रयास को अधिक महत्वपूर्ण निरूपित किया है।

प्रथम इतिहास लेखन के प्रश् को यहां अधिक विस्तार न देते हुए यह लिखना ही उपयुक्त होगा कि पाश्चात्य और प्राच्य विद्वानों ने हिन्दी के इतिहास लेखन के आरंभिक काल में प्रशंसनीय भूमिका निभाई है। शिवसिंह सरोज साहित्य इतिहास लेखन के अनन्य सूत्र हैं। हिन्दी के वे पहले विद्वान हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य की परंपरा के सातत्य पर समदृष्टि डाली है। अनन्तर मिश्र बंधुओं ने साहित्यिक इतिहास तथा राजनीतिक परिस्थितियों के पारस्परिक संबंधों का दर्शन कराया। डॉ. सुमन राजे के शब्दों में-''काल विभाजन की दृष्टि से भी विश्वबंधु विनोद प्रगति की दिशा में बढ़ता दिखाई देता है।''

आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित इतिहास लिख एक नये युग का समारंभ किया। उन्होंने लोकमंगल व लोक धर्म की कसौटी पर कवियों और कवि-कर्म की परख की और लोक चेतना की दृष्टि से उनके साहित्यिक अवदान की समीक्षा की। यहीं से काल विभाजन और साहित्य इतिहास के नामकरण की सुदृढ़ परंपरा का आरंभ हुआ। इस युग में डॉ. श्याम सुन्दर दास, रमाशंकर शुक्ल 'रसाल', सूर्यकांत शास्त्री, अयोध्या सिंह उपाध्याय, डॉ. रामकुमार वर्मा, राजनाथ शर्मा प्रभृति विद्वानों ने हिन्दी साहित्य के इतिहास विषयक ग्रंथों का प्रणयन कर स्तुत्य योगदान दिया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने शुक्ल युग के इतिहास लेखन के अभावों का गहराई से अध्ययन किया और हिन्दी साहित्य की भूमिका (1940 ई.), हिन्दी साहित्य का आदिकाल (1952 ई.) और हिन्दी साहित्य; उद्भव और विकास (1955 ई.) आदि ग्रंथ लिखकर उस अभाव की पूर्ति की। काल विभाजन में उन्होंने कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया। शैली की समग्रता उनकी अलग विशेषता है।

वर्तमान युग में आचार्य द्विवेदी के अतिरिक्त साहित्येतिहास लेखन में अन्य प्रयास भी हुए परंतु इस दिशा में विकास को अपेक्षित गति नहीं मिल पाई। वैसे डॉ. गणपति चंद्र गुप्त, डॉ. रामखेलावन पांडेय के अतिरिक्त डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय, डॉ. कृष्णलाल, भोलानाथ तथा डॉ. शिवकुमार की कृतियों के अतिरिक्त काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी द्वारा प्रकाशित हिन्दी साहित्य का इतिहास एवं डॉ नगेन्द्र के संपादन में प्रकाशित हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक युग की उल्लेखनीय उपलब्धियां हैं। हरमहेन्द्र सिंह बेदी ने भी हिन्दी साहित्येतिहास दर्शन की भूमिका लिखकर साहित्य के इतिहास और उसके प्रति दार्शनिक दृष्टि को नये ढंग से रेखांकित किया है। आरंभिक काल से लेकर आधुनिक व आज की भाषा में आधुनिकोत्तर काल तक साहित्य इतिहास लेखकों के नाम तो शताधिक गिनाये जा सकते हैं परंतु इस आलेख का मूल प्रश् आज भी जीवंत है कि साहित्येतिहास के पुनर्लेखन की समस्याएं क्या हैं?

ज्ञातव्य है कि साहित्य का इतिहास लिखते समय राष्ट्र के जन-जीवन में उदित होने वाली विचार धाराओं और आंदोलनों का विस्तृत विवेचन अपेक्षित होता है, क्योंकि बिना उनको समझे साहित्य के तत्कालीन रूपों और उनके विकास को समझना असंभव है। कोई भी विचार धारा अकस्मात उदित नहीं होती, उसके बीज सम-सामयिक समाज-व्यवस्था में ही छिपे रहते हैं, अत: कहना न होगा कि सम-सामयिक समाज के विस्तृत परिदृश्य की समझ जिस इतिहासकार में अधिक होगी, उसका साहित्येतिहास भी उतना व्यापक और प्रामाणिक होगा। वह भ्रांत धारणाओं से उतना ही मुक्त रहेगा तथा साहित्य के विकास के विभिन्न चरणों के विशेषण व अंकन में उसकी बुध्दि सारग्राहिणी भी होगी। कहा जा सकता है कि साहित्येतिहास के पुनर्लेखन की पहली समस्या है, इतिहास विषयक सम्यक जानकारी का अभाव और इस दिशा में इतिहासकार का उपेक्षा भाव !

आज कितने ऐसे इतिहास लेखक या समीक्षक हैं जिन्होंने पुराने व नये इतिहासकारों को सही ढंग से पढ़ा है? विवेचन के दौरान मात्र सामग्री - संचयन के स्थान पर अपने मत को प्रमाणों व तर्कों से परिपुष्ट किया है? सच तो यह है कि इतिहास लिखने और ऐतिहासिक सोच का धनी होने में बड़ा अंतर है। किसी भी भाषा का साहित्येतिहास उस भाषा के संपूर्ण साहित्य के मूल्यांकन का सार होता है। अत: साहित्येतिहास-लेखन से पहले पूरे साहित्य का मनोयोग पूर्वक अध्ययन अपेक्षित होता है। परंतु, यह कार्य समय-साध्य व श्रम साध्य होने के कारण, साहित्येतहासकार आलोचनात्मक ग्रंथों के आधार पर उच्च स्तरीय कृतियों का चयन करता है, किन्तु उनमें भी आलोचकों की पक्षपात पूर्ण दृष्टि को न समझने अथवा उन्हें सवर्ांगपूर्ण मान लेने के कारण पुनर्लेखन का कार्य मात्र पुनरावृत्ति बनकर रह जाता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि इतिहास लेखक साहित्य की विकास-यात्रा के प्रत्येक चरण की गहन पड़ताल करें और उनमें पूर्वाग्रहों, संकीर्णताओं तथा स्वार्थबध्द किंवा भीरू स्थापनाओं का अनावरण करें। अत: मेरी दृष्टि में साहित्य इतिहास के पुनर्लेखन से पूर्व यह पुनर्विचार कर लेने में कोई बुराई नहीं है कि 'इतिहास' के नाम पर 'अतिहास' का नया अध्याय तो प्रारंभ नहीं किया जा रहा है, वरना ऐसा क्यों हैं कि आज भी शुक्ल जी, द्विवेदी जी जैसे समर्थ साहित्येतिहास लेखकों जैसा इतिहास बोध व उनके जैसी इतिहास-दृष्टि दुर्लभ नहीं तो खोज का विषय तो है ही।

प्रस्तुत संदर्भ में डॉ. नामवर सिंह का कथन द्रष्टव्य है-''यदि हिन्दी का आज जीवन्त साहित्य है तो निश्चय ही उसके सामान्तर जीवंत साहित्य-बोध भी है-चाहे इस साहित्य-बोध से युक्त शिक्षित समुदाय जितना छोटा हो और प्रबुध्द समुदाय के बीच आज का साहित्य ही नहीं, बल्कि अतीत में उन साहित्यकारों की कृतियां भी जीवित हैं, जिन्हें वह आज भी प्रासंगिक समझता है। कहना न होगा कि आज साहित्यिक प्रतिमान संरक्षक यही समुदाय है, जिसमें परंपरा-बोध जीवित है, जिसमें अतीत की जीवन्त स्मृति के साथ ही परिवर्तनशील वर्तमान के प्रति सतत जागरूकता भी है। संश्ािष्ट सम-सामयिक-बोध को परिभाषित और संगठित करना ही साहित्य का प्रतिमान भी है और साहित्य का इतिहास भी। इससे भिन्न प्रतिमान के नाम पर जो सिध्दांत पेश किए जाते हैं वे निर्जीव रूढ़ि होते हैं और इससे भिन्न जो इतिहास लिखा जाता है, वह सूची पत्र है।'' कहा जा सकता है कि इसी परंपरा-बोध एवं सम-सामयिक-बोध में संगठन की जीवंतता का अभाव, साहित्येतिहास लेखन व लेखक दोनों के समक्ष बड़ी चुनौती है।

मात्र पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग, वर्तुल शब्दावली, कपोल कल्पित बातों और अनिश्चित अर्थ वाले शब्दों के प्रयोग से न तो कोई बड़ा आलोचक हो सकता है और न ही साहित्य का मूर्धन्य इतिहास लेखक। वह आत्म-मुग्धता से ग्रस्त होकर स्वयं को चाहे इतिहासकार घोषित कर दे अथवा विवेचनात्मक या आलोचनात्मक इतिहासकार होने का मिथ्या दंभ भरे किन्तु इससे साहित्य इतिहास के पुनर्लेखन की समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता।

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक परप्रेक्ष्य का ध्यान रखते हुए जो इतिहास लिखा जायेगा उसमें सम-सामयिक-बोध के साथ-ही-साथ साहित्य व साहित्यिक सोच का सहज अंतर्भाव होगा, उसे विवेचनात्मक अराजकता, एकांगी दृष्टिकोण से दूर रखा जा सकेगा और पुनर्लेखन के नाम पर पुनर्मूल्यांकन के एकांकी व आग्रही प्रयासों से इतिहास को एक हद तक मुक्त रखा जा सकेगा। यहां यह स्पष्ट कर देना भी अपरिहार्य है कि इतिहास लेखक के लिए परंपरा-बोध जरूरी है, परंतु परंपरा के नाम पर मात्र सूचना-धार्मिता निभाना इतिहास बोध सम्पन्न हो जाने का प्रणाण पत्र नहीं है।

अतीत में की गई व्याख्याओं व अनुसंधानों का सर्वोत्तम ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि उससे नवीन सम-सामयिक दृष्टि मिल सके, नया इतिहास रचा जा सके। इसके विपरीत सिर्फ कल की सामग्रियों, तथ्यों, तिथियों एवं विवरणों को यथावत् प्रस्तुत करके उसमें कुछ नया जोड़ देने से कोई साहित्येतिहास लेखक नहीं हो जाता। दरअसल साहित्येतिहास लेखक, इतिहास निर्माता भी होता है। यह कार्य वही कर सकता है जो कल और आज दोनों में गहरी दिलचस्पी तो रखता है किन्तु, बीते हुए कल को अपने इतिहास में 'अति' से बचाकर रखता है तथा आने वाले 'कल' के अंकन को दृष्टिपथ में रखकर 'आज' का इतिहास लिखता है। इस अर्थ में वह स्वयं एक समर्थ आलोचक भी होता है।

साहित्येतिहास के लेखक के समक्ष सामान्यत: काल व युग, काल-विभाजन, काल-नामकरण, इतिहास लेखन का केन्द्र, स्थानानुपात, रचयिता के व्यक्तित्व वर्णन का परिसीमन तथा समीक्षा के मानदंड, स्वरूप आदि की समस्याएं प्रस्तुत होती हैं। इन समस्याओं में से काल-विभाजन व नामकरण जैसे बिन्दुओं पर अनेक शोध हुए हैं और शुक्ल जी के बाद यद्यपि उनके काल-विभाजन तथा दृष्टिकोण को पर्याप्त आदर दिया गया तथापि बदलते युग व परिवेश के संदर्भ में नामकरण व काल-चिंता की एक परंपरा ही चल पड़ी। फिर भी, साहित्येतिहास में ये दो समस्याएं आज के संदर्भ में अत्यंत चिंतनीय नहीं हैं। आज सब तरफ मनुष्य की अस्मिता और उसके भविष्य का प्रश् मुंह बाये खड़ा है। फलत: साहित्य और समीक्षा से लेकर इतिहास लेखन तक, काल से भी परे मनुष्य के अस्तित्व और मानवीय मूल्यों के संरक्षण पर सर्वाधिक जोर दिया जा रहा है। यही कारण है कि इतिहास लेखक की दृष्टि अपने समय के साथ अधिक न्यास करने पर केन्द्रित है। शिव कुमार शर्मा के शब्दों में शब्दों में-''काल-विभाजन सभ्य मानव के इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण प्रयत्न है।''

साहित्यक के इतिहास में काल क्रमानुसार, साहित्य कृति के आधार पर या युग इतिहास को ध्यान में रखकर काल विभाजन की परंपरा रही है। परंतु ध्यान दिया जाना चाहिए की जनता की जिन प्रवृत्तियों के अनुसार हमारे साहित्यिक स्वरूप में जो परिवर्तन आये हैं, जिन-जिन प्रभावों की प्ररेणा से भिन्न-भिन्न शाखाएं फूटती रही हैं, उन सबके सम्यक निरूपण और उनकी दृष्टि से किये हुए सुसंगत काल-विभाजन के बिना साहित्य का सच्चा अध्ययन संभव नहीं है।अत: साहित्य के इतिहास लेखन में काल से लेकर युग बोध तक, परंपरा बोध से लेकर इतिहास बोध तक, सामाजिक चेतना से लेकर साहित्यिक वैशिष्टय तक, समान प्रकृति से लेकर अनन्य प्रवृत्ति तक वर्गीकृत अध्ययन कर साहित्य का इतिहासकार यदि संपूर्ण साहित्य का समवेत अनुशीलन करे तो तय समझिये कि उससे साहित्य व इतिहास तथा प्रकारान्तर में मनुष्य व मानवता का भला ही होगा।

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प्रवक्ता, हिंदी विभाग, शासकीय दिग्विजय

स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगांव

छत्तीसगढ़, मो. 93010-54300

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गुणशेखर,1,ग़ज़लें,482,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,82,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,211,लघुकथा,791,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,16,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,302,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1864,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,616,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,668,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,49,साहित्यिक गतिविधियाँ,179,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता / डॉ. चन्द्रकुमार जैन
हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता / डॉ. चन्द्रकुमार जैन
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रचनाकार
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