शब्द संधान / वन महोत्सव / डा. सुरेन्द्र वर्मा

रवीन्द्र व्यास की कलाकृति

वर्षा ऋतु में स्कूलों, कालेजों और कार्यालयों में वृक्षारोपण के कार्यक्रम किए जाते हैं। इन्हीं को ‘वनमहोत्सव’ कहते हैं। क्या विडम्बना है कि वन-महोत्सव वनों में नहीं होते न ही वनों की रक्षा के लिए किए जाते हैं। ये तो आबादी वाले क्षेत्रों में हरियाली लाने के उद्देश्य से होते हैं। वन- जंगल या अरण्य को कहते हैं। लेकिन क्योंकि हमारे आबादी वाले क्षेत्र, जैसे नगर और महानगर, कांक्रीट के जंगल ही बन गए हैं, वहां पेड़ पौधों की सख्त ज़रुरत है। अत: वहां वृक्षारोपण को वन-महोत्सव के बहाने बढ़ावा दिया जाता है। इस वन-महोत्सव का वनों से कोई लेना-देना नहीं होता। वृक्षों की अंधाधुन्द कटाई से ‘वन-क्षेत्र’ तो दिन ब दिन कम ही हो गए हैं।

[ads-post]

एक ज़माना था जब ‘वन-मानुष’ ही “वन-वास” नहीं करते थे, आदिवासी भी वनों में रहते थे और ‘वनवासी’ कहलाते थे। इनकी जीविका ‘वन-वृत्ति’ पर, वनों से प्राप्त फल-फूलों और पशुओं पर, निर्भर है। इन्हीं से वे अपनी आजीविका चलाते हैं। वे ‘वन-जीवी’ हैं। आज भी ऐसे तमाम वन-वासी हैं जिनकी संस्कृति आदिकालीन ‘अरण्य-संस्कृति’ है। उन्हें संस्कृति की मुख्य धारा में लाने के लिए आज काफी प्रयत्न किए जा रहे हैं।

हिन्दू शास्त्रों में चार आश्रमों का विधान किया गया है। उनमें से एक “वानप्रस्थ-आश्रम’ भी है। जीवन के चार विभागों में से यह तीसरा है। इस आश्रम में प्रविष्ट व्यक्ति भी ‘वानप्रस्थ’ ही कहलाता है। ‘वानप्रस्य’ वानप्रस्थ की अवस्था है। संन्यास ग्रहण तो ‘वन-गमन’ है ही। संन्यास आश्रम में गृहस्थ जीवन पूरी तरह छूट जाता है।

कुछ घुमक्कड़ लोग ‘वनाटन’ के शौकीन होते हैं। वे वन-ऐश्वर्य देखते है और अविभूत हो जाते हैं। उन्हें ‘वनचर’, वन में भ्रमण करनेवाला, कहा जा सकता है। वनवासी भले ही न हों वे ‘वन-चारी’ या ‘वनेचर’ हैं।

सभी तो नहीं लेकिन अनेक ‘वनस्पतियाँ’’ ‘वन-जात’ होती हैं। ‘वन-तुलसी’, वन में उत्पन्न होने के कारण ‘वन-जा’ कहलाती है। हमें अनेक औषधियां भी वनों से ही प्राप्त होती हैं, वे “वनौषधि” हैं। लक्षमण के इलाज के लिए हनूमान जी को औषधि लेने वन ही जाना पडा था। वन ने हमारी भाषा को खूब समृद्ध किया है। संस्कृत में अनेक जानवरों के नाम वन से आरम्भ होते हैं। संस्कृत में “वनर” वनमानुस है तो खरहे को ‘वनाखु कहा गया है। ‘वनाज’ जंगली बकरा है तो ‘वनहिर’ जंगली सूअर है।

‘वनस्थल’ मनुष्य के लिए अत्यंत उपयोगी क्षेत्र है। आज जैसा कि हम जानते है “वनस्थली” नाम का एक महिलाओं के लिए उत्तम शिक्षाकेंद्र है।

‘वनवृक्षों’ की डालियों के परस्पर घर्षण से गर्मी के दिनों में वनों में अक्सर आग लग जाती है। इसे दावानल तो कहते ही हैं, यह ‘वनाग्नि’ (वन+अग्नि) और ‘वनदाह’ भी कहलाती है। संस्कृत में इसे ‘वनोप्पलव’ कहा गया है। शासन में वनों की रक्षा के लिए पूरा एक महकमा है। इसमें ‘वनरक्षक’ (क्न्ज़र्वेटर आफ फौरेस्ट) तथा ‘वनपाल’,(रेंजर) जैसे पद हैं जो वनों की देखभाल और समृद्धि के लिए काम करते हैं।

वनों का हमारी संस्कृति में एक अन्धेरा पक्ष भी है। वन को जंगल कहा गया है और वनों में रहने वालों को जंगली समझा गया है } जंगली का अर्थ यहाँ असभ्य और बर्बर से लगाया गया है। किसी भी मनुष्य को जो असभ्य और बर्बर है, उसे आसानी से “जंगली” कह दिया जाता है। लेकिन, ज़ाहिर है वन हमें जंगली नहीं बनाता, हमारी वृतियां ही हमें जंगली बनाती हैं। असली वनमहोत्सव तो तभी होगा जब हम अपनी अधम- वृत्तियों पर काबू रखना सीख जाएं।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

-----------

-----------

0 टिप्पणी "शब्द संधान / वन महोत्सव / डा. सुरेन्द्र वर्मा"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.