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होली विशेष आयोजन - धरती सहित आकाश को रंग दो ! / अनिल कुमार पारा

अक्सर हम जब भी किसी पर्व के आने की आहट सुन लेते हैं तो हमारे मन में जो उल्लास होता है वह दिखाई तो नहीं देता पर एहसास मन-ही-मन होने लगता है। हम घर पर हैं तो भी उस पर्व की तैयारी में जुट जाते है। और यदि हम अपने घर पर नहीं हैं अन्यत्र निवास कर रहे तो भी पर्व के पहले घर पहुंचने के लिए आतुर हो जाते हैं। खासकर होली के त्यौहार में हम कोसों मील दूर से अपने घर की चौखट पर दस्तक दे ही देते हैं। क्यों कि ये होली मिलने और मिलाने का पर्व है। अपने ही नहीं पराये लोगों से भी प्रेम की नींव रखने का पर्व है। जिसकी जिसमें बनने वाली इमारत की साक्षी बसंत ऋतु होगी। होली हमारे दिल से जुड़ी वह परंपरा है जो हमें फुदक-फुदक कर रंगों के रंग में रंग देती है। रंगों में सराबोर कर देती है।

पर्व तो आते हैं और चले जाते हैं पर उनका नामों निशा अगले वर्ष तक वह पर्व आने तक नहीं रहता। पर होली बसंत की वह फुहार है जो रंग, अबीर, के बहाने हमारे दिल में तो स्थित हो स्थिर रहती ही है होली तो हमारे हर अंग-अंग में बस जाती है। जिसके रंगों को हम कई दिनों तक छुटाते रहते हैं। बसंत की बयार की धुन जब कानों में सुनाई देने लगती है तो रंगीली दुनिया का एहसास भी स्पर्श होने लगता है। होली का यह पर्व नवबसंत का आरंभ तो है ही ये आरंभ है उस प्रीत का जो राधा और कृष्ण, के नाम से जानी जाती है, मीरा और मोहन के नाम से पहचानी जाती है, गोपियाँ और कृष्ण के मोह से जानी जाती है। ये आरंभ है रंजिशों को भुलाकर एक प्रेमग्रंथ लिखने का, ये आरंभ है प्रेम की रत रंगनियों के संगम का, ये आरंभ है सालों से चले आ रहे द्वंद्व को मिटाने का, और एक रंग में मिल जाने का, रंग गुलाल और राग रंग का यह लोकप्रिय पर्व बसंत का संदेशवाहक भी है।

राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर उनको उत्कर्ष तक पहुंचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर पहुंच चुकी होती है। इस पर्व के समय बसंत की बयार से खेतों में सरसों खिल उठी है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा की परतें धरती से आसमान तक मानों एक हो गईं हों। पेड़-पौधे पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो रहे हैं। इसी बसंत को देखकर खेतों में गेहूं की बालियाँ अब इठलाने लगी हैं।

बच्चे-बूढ़े और जवान सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर और पीछे छोड़कर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूबने के लिया तैयार हो चुके हैं। हर तरफ रंगों की फुहार फूट पड़ती है। घरों में बने मेवा और मिष्ठान्न की मिठास से भी ज्यादा इस पर्व में प्रेम और अपनेपन की मिठास पहुंच चुकी है। इस पर्व को बसंत ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे बसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है। कवियों और साहित्यकारों के लेखनी के रगों में बसंत ऋतु और बसन्तोत्सव प्रिय विषय तो रहते ही हैं बसंत की छाया कवियों और साहित्यकारों को मानों एक मंच दे रही हो।

सुर और ताल के ठहाके जोगीरा गाने के लिए तैयार हो चुके हैं। टोलियों और मंडलियों के बीच रंग गुलाल की होली तो बसंत का ही आगमन है। ऋतुओं में ऋतु तो बसंत ही है। इसी ऋतु से जुड़ी मेल-मिलाप, राग-रंग की होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुईं हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है भक्त प्रहलाद की मानी जाती है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था जो अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र भक्त प्रहलाद ईश्वर भक्त था प्रहलाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका भक्त प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठे आग में बैठने पर होलिका तो जल गई पर भक्त प्रहलाद बच गया।

ईश्वर भक्त प्रहलाद की याद में प्राचीन काल से होली जलाई जाने लगी । प्रतीक रूप में यह भी माना जाता है कि प्रहलाद का अर्थ आनन्द होता है वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रहलाद (आनंद अक्षुण्ण रहता है। प्रहलाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढूंढ़ी राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है लोग तैयार हैं होली में रंग लगाकर नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेष धारण करने, उत्सुक हैं उस आनंद के लिए जो प्रेम और राग से जुड़ा है। तैयार है शिव की बारात जैसा दृश्य बनाने के लिए, तैयार हैं प्रेम और भक्ति की उस कथा के लिए जो पौराणिक काल से ही लोगों के बीच बसी हुई है। श्री कृष्ण की गोपियों की टोली तैयार हैं रासलीला और रगों की लीला करने के लिए।

यह बसंत की होली सुख समृद्धि के लिए मनाने के लिए हम तैयार हैं। यही ऋतु साक्षी है नववर्ष के आगमन की, साक्षी है प्रेम और उत्पीड़न की, हम तैयार हैं गेहूँ की बालियाँ और चने के होले को भी भूनकर खाने के लिए हम तैयार हैं होलिका दहन कर समाज की समस्त बुराइयों को होली में जलाकर राख कर देने के लिए, हम तैयार हैं देर रात तक रंगों के साथ रतजगा करने के लिए, गीत गाने के लिए-बजाने के लिए, जगह-जगह टोलियाँ तैयार हैं रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर नाचने गाने के लिए, तैयार है हमारे बच्चे पिचकारियों में प्रेम और अपनेपन का रंग भरकर एक दूसरे पर उड़ेलने के लिए, जिसमें सारा समाज एक रंग में रंगकर एक-सा दिखाई देता हो। हम तैयार हैं ब्रज की लठमार होली के लिए हम तैयार है पारंपरिक और क्षेत्रीय गीतों के साथ नचने और नचाने के लिए।

ये पर्व है रंगों की बसंत के मिजाज को परखने का, ये पर्व है धरती पर नाचकर आकाश को रंगने का, ये पर्व गीतों का और संगीतों का, ये पर्व है द्वंद्व को भूलने और भुलाने का, ये पर्व है फाग की टकराहटों के साथ एक रंग में मिल जाने का, वैर भावना को भुलाकर रंगीन हो जाने का, ये पर्व है समाज और धर्म का जिसमें जातिभेद, वर्णभेद का कहीं नामोनिशान नहीं है। ये पर्व है प्रकृति के मनोरथ को चमकाने का, ये पर्व है रंगों के शृंगार का, ये पर्व है रंगों में सराबोर हो जाने का, ये पर्व है धार्मिक निष्ठा और मनोरंजन का, समाज की सारी बुराइयों को दूर करने का, तो आओ हम उस होली को जलाएं जो बुराइयों से भरी हुई है। हम उस होली को मनाएं जो ईश्वर की भक्ति से सजी हुई है। जिसमें बुराइयों का अंत होकर रंग गुलाल और अबीर की महक धरती सहित आकाश को प्रेम और अपनेपन के रंगों में रंग दें।

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अनिल कुमार पारा,

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