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शब्द संधान / हम भी मुंह में जबान रखते हैं / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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हम सबके बोलने और खाने के लिए एक अदद मुंह होता है। और इस मुंह में एक जबान भी होती है, जिसकी सहायता के बिना न तो हम बोल सकते हैं न ही खाने का स्वाद ले सकते हैं। आप ही नहीं, “हम भी मुंह में जबान रखते हैं”, अतः: जरूरी है कि आप (और हम भी) अपनी जबान और ‘मुंह पर काबू रखें’, वरना किसी के ‘मुंह खुलने में’ देर नहीं लगती। कोई भी ‘मुंह चलाना’ शुरू कर सकता है और जबान-दराजी पर उतर सकता है|

अपनी भाषा में हम मुंह के साथ न जाने कितनी तरह से पेश आते हैं। हम किसी भी सुन्दर मुखड़े को देखते हैं और देखते रह जाते हैं। बुज़ुर्ग और असमर्थ लोग कभी कभी अपनी बेचारगी के चलते छोटी छोटी बातों के लिए दूसरों का ‘मुंह देखते हैं’; इस तरह ‘मुंह ताकना’ बेशक अच्छा तो नहीं लगता लेकिन उनकी मजबूरी है। कुछ ‘मुंह-लगे’ लोग इतने ‘मुंह-फट’ होते हैं कि ‘मुंह-जोरी’ करने से भी बाज़ नहीं आते। वे ‘मुंह देखे की बात’ करते हैं। ‘मुंह के मीठे’ इन लोगों से आप बहस नहीं कर सकते अन्यथा वे ‘मुंह-फुला’ कर बैठ जाते हैं और आप उन्हें नज़र-अंदाज़ भी नहीं कर सकते। वो कहते हैं न, ‘मुँह से लगी’ कोई भी चीज़ या लत आसानी से छूटती नहीं।

हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार नई-नवेली बहू जब घर आती है तो उसकी ‘मुंह-दिखाई’ की जाती है। आरम्भ में पति-पत्नी ‘मुंह-जोड़े’ बैठे रहते हैं और एक दूसरे की ‘मुंह-मांगी मुरादें’ पूरी करने की कोशिश में रहते हैं। अपनी ससुराल में अधिकतर पति / पत्नी शुरू शुरू में खाने पीने में बड़े नखरे दिखाते हैं। बस ‘मुंह-जुठारते’ हैं, भले ही भूखे ही क्यों न रह जाना पड़े।

हमारे कुछ रिश्ते खून के रिश्ते होते हैं, कुछ ‘मुंह-बोले’ होते हैं। मुंह बोले रिश्ते भी अधिकतर खूब निभाए जाते हैं। लेकिन जो ‘मुंह के कच्चे’ होते हैं अधिक परवाह नहीं करते। कभी भी ‘विमुख’ हो जाते हैं। अपनी बात पर टिक नहीं पाते। उनके पेट में बात पचती भी नहीं है। मुंह के कच्चे राज़ की बातें भी जल्दी उगल देते हैं। ऐसे में उन्हें अक्सर ‘मुंह की खाना’ पड़ती है और ज़लील भी होना पड़ता है सो अलग। लोग उनसे ‘मुंह-मोड़ने’ लगते हैं।

‘मुंह-बनाना’, ‘मुंह-बिगाड़ना’, ‘मुंह चिढ़ाना’ एक ही भाव के चट्टे-बट्टे हैं। सभी में ‘मुंह-बिराने’ का भाव है। लेकिन मुंह-बिराने से सामने वाला ‘मुंह-फुलाकर’ बैठ सकता है। अतः: जहां तक संभव हो मुंह-चिढ़ाने से बाज़ ही आना चाहिए।

कुछ लोग जगह जगह ‘मुंह मारते’ फिरते हैं और जो चीज़ें उन्हें मिल ही नहीं सकतीं उनके लिए भी ‘मुँह-पसारते’ हैं। वैसे तो हर व्यापारी यह चाहता ही है उसे अपनी चीज़ के अच्छे दाम मिलें लेकिन कभी कभी वे ऐसा ‘मुँह फैलाते’ है ग्राहक ‘मुँह ताकता’ रह जाता है। कभी कभी वे वस्तुएं जो हमें सहज उपलब्ध नहीं हो पातीं, उन्हें पाने के लिए देने वालों का हमें, न चाहते हुए भी, ‘मुँह-भरना’ पड़ जाता है।

मुँह को लेकर हमारी भाषा में सैकड़ों मुहावरे हैं। कितने ही शब्द हैं। मुँह क्योंकि किसी भी व्यक्ति के शिरोभाग में एक छेद के रूप में स्थित है अतः: किसी भी वस्तु में इस प्रकार के सूराख को जिससे कुछ डाला / निकाला जा सके हम मुँह या ‘मुहाना’ कहते हैं। समुद्र में नदी के नीचे गिरने का स्थान भी नदी-मुख या मुहाना ही है युवावस्था में चेहरे पर निकालने वाली फुंसियों को “मुंहासा” कहा जाता है। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि उर्दू में न जाने कितने शब्द ऐसे हैं जो मुंह से शुरू होते हैं किन्तु जिनका मुँह से कोई लेना देना नहीं है। ये शब्द अधिकतर फारसी और अरबी भाषा से लिए गए हैं। मुहकमा, मुहतरमा, मुहताज, मुहब्बत, मुहम्मद, मुहर, मुहरा, मुहर्रम, मुहर्रिर, मुहलत, मुहल्ला, आदि कुछ ऐसे ही शब्द हैं।

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--डॉ. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद २११००१

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