होली विशेष आयोजन : मंजुल भटनागर की कविताएँ

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रचना १

 

होली की सुगबुगाहट है
पेड़ों ने की खुसर पुसर है
पक्षियों संग विमर्श है
पत्ते खत सा  निमंत्रण  हैं.

टेसू ,बोगन विला रंग भरे
द्वार फैले ,छाँव  फैले
रंग फैले रहा अबीर सा
खुशबुओं के पाँव फैले
प्रकृति में आकर्षण है
पत्ते खत सा निमंत्रण है

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अंतर्मन प्रतीक्षा है
बावरी उत्सुकता है
कोई उम्मीद जग रही
कोपलें रस ले पगी
दे रही आमंत्रण है
पत्ते खत सा निमंत्रण है

हाट  सजे बाग़ सजे
पलाश हरसिंगार सजे
सूर्य रथ चल पड़ा
हांक रहे श्री कृष्ण हैं
गोपियाँ मुग्ध हैं
उधो की न सुनें
प्रेम प्रीत हर्षन  है
पत्ते खत सा निमंत्रण है .

 

रचना २


होली का आना
रंग  की बौछार  लिए
टेसू पलाश हो जाना
गुलाल रंग मुख रंगे , अबीर फैल रहा आसमानों में
कुछ गुफ्तगू कुछ सुगबुगाहट सी भी है चमन में

होली का आना
पायल खनकाती फिरे मेरी बहना
गाँव खेत मंजिरें, , खड़ ताल बज रहे
गुझिया से पकवान  ,घुट रही भाँग है
गलियां  रंगी बैंगनी लाल पीली ,रंग अमन का बेमिसाल है


होली का आना
तो मिलन का बहाना है
गोकुल में ,फाग संग ग्वालों का  हुड़दंग है
झाँक रही चूनरियों में ,ढाई आखर प्रसंग है
टेसू रंग की प्रीत जगी  ,उधौ देख दंग  है
गोपियों संग रास खेले  , कृष्ण प्रेम मलंग है


होली का आना
प्रेम प्रीत का मन्त्र  दुनिया में फैलाना
कोयल संग आम्र वृक्ष पर मीठे राग सुनना
होली का मौसम आये तो  ,नफरत छोड़ विश्व बंधुत्व में रंग जाना .

मंजुल भटनागर 

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