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डॉ. नामवर सिंह की रस-दृष्टि या दृष्टि-दोष / रमेशराज

“ जो केवल अपनी अनुभूति क्षमता के मिथ्याभिमान के बल पर नयी कविता को समझ लेने तथा समझकर मूल्य-निर्णय का दावा करते हैं, व्यवहार में उनकी अनुभूति की सीमा प्रकट होने के साथ ही यह तथ्य भी स्पष्ट हो जाता है कि काव्य-समीक्षा में सामान्य अनुभूतियों का सहारा लेना भ्रामक है | महाभारत के बाद जिस तरह अर्जुन का गाण्डीव दस्युओं के सम्मुख व्यर्थ हो गया था, उसी प्रकार नयी कविता के समक्ष पुरानी कविताओं से निर्मित सहृदयता को चाहे जितने नये शब्दों और युक्तियों से सुसज्जित किया जाये, किन्तु एक छोटी-सी नयी कविता भी सिद्धांत के गुब्बारे के लिए आलपिन हो जाती है | “

अपनी पुस्तक ‘ कविता के नये प्रतिमान ‘ के निबन्ध ‘कविता क्या है ’ के अंतर्गत डॉ. नामवर सिंह ने उक्त तथ्य रखे ही नहीं, उन्होंने अज्ञेय की ‘ सोन मछरी ’ शीर्षक कविता की, ‘ रस सिद्धांत पृष्ठ-56-57 पर की गयी रस-विवेचना ‘ की पुनः विवेचना की और कहा-“ भाषा-बोध की स्थिति यह है कि ‘ हांफती हुयी मछली ‘, ‘ थिरकती हुयी ‘ दिखायी पडती है ...ऐसे सिद्धांत [रस-सिद्धांत ] के दायरे में क्या नई कविता की हालत भी ‘ सोन मछरी ‘ की-सी नहीं होगी ? “

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‘ रस के प्रतिमान की प्रासंगानुकूलता ‘ निबन्ध के अंतर्गत कविता के नये प्रतिमानों के मूल्यांकन के सन्दर्भ में रस-सिद्धांत से मुक्ति पाते हुए बड़े ही गर्व से कहा-“ कविता के नये प्रतिमानों की चर्चा के प्रसंग में प्रायः सभी नये लेखक इस बात पर एकमत दिखायी पड़ते हैं कि नये प्रतिमानों का सम्बन्ध रस से नहीं हो सकता, क्योंकि कविता से रस का लुप्तीकरण अब विवादास्पद नहीं है | ”

यही नहीं उन्होंने एक गोष्ठी-प्रसंग की चर्चा का इस निबन्ध में जिक्र करते हुए विजयदेव नारायण साही के चुनौती और व्यंग्य-भरे अंदाज में कहे गये इस वक्तव्य को रखा-“ यह कविता रसीली है तो हम क्या करें, वह है | “

डॉ. नामवर सिंह के उक्त कथनों ने जितना पहले चौंकाया होगा, आज भी सबको उतना ही चकित करते हैं | साथ ही ऐसे कई ज्वलंत प्रश्नों को भी जन्म देते हैं, जिनका उत्तर अभी शेष है-

अगर अनुभूति की क्षमता के आधार पर नई कविता के जांचने-परखने का कार्य मिथ्याभिमान है तो इस मिथ्याभिमान के शिकार स्वयं डॉ. नामवर सिंह नहीं हैं ? उन्हें भी तो प्रतिमान के रूप में ‘ सामान्य अनुभूति ‘ के स्थान पर ‘ जटिल और प्रामाणिक अनुभूति ‘ की आवश्यकता पड़ती है | अनुभूति की प्रामाणिकता और जटिलता की ठेकेदारी का दम्भ भरने का आलम भले ही स्टील के खम्ब जैसा हो, इस दम्भ को चकनाचूर करने के लिए श्रीकांत वर्मा की ‘ बुखार में कविता ‘ की पंक्तियाँ देखिये –

मुझे दुःख नहीं मैं किसी का न हुआ

कि मैंने सारा समय

हरेक का होने की कोशिश की

मेरे साथ मैंने दगा किया |

[ कविता के नये प्रतिमान पृष्ठ 19 ]

क्या यह दुःख की तीव्रता हृदय से निकली हुयी नहीं है ? अगर कवि सहृदय नहीं होता तो सारा समय हरेक का होने में नहीं बिताता | ‘ हरेक का होने की कोशिश ‘ सामान्य अनुभूति के स्थान पर कौन-सी जटिल और प्रामाणिक अनुभूति का आभास है ? रागात्मक सम्बन्धों के आत्मविस्तार को घोर वैयक्तिकता में तब्दील कर देना ही क्या अनुभूति की प्रमाणिकता या जटिल अनुभूति के रूप में ईमानदारी और अस्मिता की खोज है ? ‘ अपने ही साथ दगा करने का ‘ यह पश्चाताप या अपराधबोध कवि-कर्म की परम अभिव्यक्ति के नाम पर पागलपन की सीमायें तोड़ने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए | श्रीकांत वर्मा की एक दूसरी कविता इसका प्रमाण है –

मगर खबरदार, मुझे कवि मत कहो

मैं बकता नहीं हूँ कविताएँ

ईजाद करता

गाली

फिर उसे बुदबुदाता हूँ

मैं कविताएँ बकता हूँ |

[ कविता के नए प्रतिमान पृष्ठ 190]

कवि की इस ‘ बुदबुदाहट ’ में भले ही भाव के रूप में गहरा ‘ आक्रोश ‘ घनीभूत है, किन्तु डॉ. नामवर सिंह द्वारा व्याख्यायित यह ‘ नयी कविता ‘ है, इसलिए इसकी भावपरक या रसपरक व्याख्या करना मिथ्याभिमान ही होगा |

अतः इस कविता के बारे में डॉ. नामवर सिंह क्या कह रहे हैं, उसे ही सुनें –“ इसे स्वयं कवि का वक्तव्य न मानकर, कविता के नाम पर ‘ मैं ’ का ही वक्तव्य मान लिया जाये, तब भी इसकी अति नाटकीयता निश्चित रूप से कविता के नाम पर एक धब्बा है | ”

गहरे आक्रोश को ‘ अति नाटकीयता ‘ बताकर, कवि के वक्तव्य को ‘ मैं ‘ का वक्तव्य बनाकर सामान्य अनुभूति किस तरह जटिल और प्रामाणिक हो जाती है, कविता की इस व्याख्या की तारीफ करते हुए कविता पर लगे धब्बे को डॉ. नामवर सिंह किस प्रकार धोते है, यह कलाकारी भी काबिले-गौर है –“निस्संदेह इस हद की स्वचेतना और आत्म-छल को तार-तार करने की ईमानदारी के कारण कविता में अनूठी पारदर्शिता आयी है जो सरल शब्दों के चयन, संक्षिप्त वाक्य-गठन और विरल संरचना में स्पष्ट होती है |”

यदि इस कविता में स्वचेतना और आत्म-छल को तार-तार करने की ईमानदारी, अनूठी पारदर्शिता, सरल शब्दों का चयन, संक्षिप्त वाक्य-गठन और विरल संरचना है तो यह कविता, ‘ कविता के नाम पर धब्बा कह देने से ‘ क्या जटिल अनुभूति की ऐसी प्रमाणिक रचना बन गयी है, जिसकी भावपरक ब्याख्या नहीं की जा सकती ?

डॉ. नामवर सिंह की रसवादियों के प्रति यह शिकायत सही ही नहीं, बेहद गम्भीर भी है कि –“ माना काव्य में अनुभूति की प्रधानता होती है, किन्तु यह काव्यानुभूति यदि गूंगे का गुड़ नहीं है तो उसे विवेक्षित करने के लिए शब्दार्थ मीमांसा के बौद्धिक व्यापार के श्रम-साध्य पथ से होकर गुजरना ही पड़ेगा | इसके आत्मपरक व्याख्याता इस कठिन पथ से भय खाते हैं | इसलिए विश्लेषण के औजारों को प्रपंच मानकर अनुभूति के सुकुमार पथ, का ही सेवन करना अभीष्ट मानते हैं | यदि यह सुरक्षित पथ निजी काव्यस्वाद तक ही सीमित रहता तो कोई बात न थी | विडम्बना यह है कि इसी आत्मपरक व्याख्या के द्वारा वे रस को ‘ एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक काव्य-प्रतिमान ‘ के रूप में प्रतिष्ठित करने का हौसला रखते हैं | एक ओर मूल्य-निर्णय देने के लिए ऐसा दंभ और दूसरी ओर अर्थमीमांसा की पद्यति से नितांत अनभिज्ञता | ”

डॉ. नामवर सिंह रस के प्रसंग में अपने तथ्यों की पुष्टि यह तर्क स्वीकारते हुए करते हैं कि “संस्कृत काव्य-शास्त्र का रस-सिद्धांत काव्य के आस्वाद की एक प्रक्रिया-मात्र है, मूल्यांकन का कोई प्रतिमान नहीं [रसास्वाद, नयी कविता : मूल्यांकन, कल्पना, जुलाई-65, डॉ. मनोहर काले का कथन ] | यदि यह कथन सही है तो प्रतिमान के रूप में रस के पुनरुद्धार या पुनर्व्याख्या का प्रश्न ही अप्रासंगिक हो जाता है, प्रासंगिक रहती है आस्वाद की प्रक्रिया |”

डॉ. नामवर सिंह अपने ‘ नये प्रतिमानों ‘ को स्थापित करने के लिए रस को ख़ारिज करने के चक्कर में जितने भी तर्क प्रस्तुत करते हैं, उन तर्कों से उनकी ‘ रस के प्रति समझ का कच्चापन ‘ उभरकर सामने आ जाता है |

कविता को केवल प्रतिमानों और उनके अर्थ के आधार पर समझने-समझाने वाले विद्वान सम्भवतः इस तथ्य से अनभिग्य हैं या जानबूझकर समझना नहीं चाहते कि काव्य का सम्पूर्ण क्षेत्र ऊर्जा का क्षेत्र है | ऊर्जा का ही दूसरा नाम भाव है | इसी कारण कविता के सन्दर्भ में रस एक सर्वकालिक और सार्वभौमिक प्रतिमान है | भले ही इसे ‘ कविता के नये प्रतिमानों ’ की तरह मूल्य न माना जाये, किन्तु प्रतिमानों का मूल्य भी बिना रस के ठीक ऐसे ही है जैसे नेत्र के बिना कोई व्यक्ति |

कविता बनाम् नयी कविता के प्रतिमानों को चुन-चुनकर के उपरांत डॉ. नामवर सिंह भले ही गर्व के साथ यह घोषणा करें कि- “ इन प्रतिमानों का सम्बन्ध रस से नहीं है |” किन्तु उनके मिथ्याभिमान को उन्हीं के द्वारा व्याख्यायित कविताओं द्वारा चकनाचूर किया जा सकता है | कविता के नये प्रतिमान ‘ विसंगति और विडम्बना ’ निबन्ध में रघवीर सहाय की कविता की यह पंक्तियाँ देखिये-

तुम उसका क्या करती हो मेरी ‘ लाडली ‘

अपनी व्यथा के संकोच से मुक्त होकर

जब में तुम्हें प्यार करता हूँ |

इस कविता में स्थायी भाव ‘ रति ‘ मौजूद है | प्रेम की यह शुद्ध कविता क्या शृंगार में उद्बुद्ध नहीं होगी | डॉ. नामवर सिंह की कविता का विवेचन करते हुए कहते हैं-“ छायावादी ‘सखि’, ‘सजनि’, ‘प्रिये’, प्राण, रानी आदि सम्बोधन के स्थान पर ‘ लाडली ‘ शब्द रखकर रघवीर सहाय ने रूमानी भावुकता को ही नहीं तोडा, बल्कि एक मीठी-सी अगम्भीरता के द्वारा प्यार में निहित अकेलेपन की व्यथा को बिजली की कौंध के समान पूरी तीव्रता के साथ उद्भाषित भी कर दिया है | ”

छायावादी ‘सखि’, ‘सजनि’, ‘प्रिये’, प्राण, रानी आदि सम्बोधन के स्थान पर ‘ लाडली ‘ शब्द रख देने भर से क्या कोई रूमानी भाव टूटकर ‘ प्रगतिशील भाव ‘ बन जाता है ? जो कविता के प्रतिमानों की चर्चा के प्रसंग में रस से कोई सम्बन्ध नहीं रखता ? एक मीठी-सी अगम्भीरता के द्वारा ‘ प्यार में निहित ‘ अकेलेपन की व्यथा का बिजली की कौंध के समान पूरी तीव्रता के साथ उद्भाषित होना अगर रस के अंतर्गत नहीं आता तो क्या प्रगतिवाद के अंतर्गत आता है ? एक उदाहरण और प्रस्तुत है -

जल रहा है

जवान होकर गुलाब

खोलकर होंठ

जैसे आग

गा रही है फाग |

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