रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

खरोंच - स्वराज सेनानी

image

खरोंच

सुधाकर का आज मन कुछ ज्यादा ही उद्विग्न  था  . दिमाग ठस और  हाथ पाँव  कड़े हो रहे थे.  शायद कल ज्यादा विगरस्ली खेल दिया था . बुढ़ापे का खयाल रखना चाहिए था. अब वह शरीर नहीं रहा कि एक चाय पी के  ४ गेम खेल देते थे.

दिमाग में एक अजीब कशमकश चलती रहती थी पहले का समय ज़्यादा अच्छा था. जब टीवी, मोबाइल , इन्टरनेट नहीं था या अब जब आदमी इन्हीं चीजों में फंसा  रहता है. पहले फिजीकली करने को बहुत था और अब सिर्फ एक जगह पर बैठे बैठे दिमाग खराब करने को बहुत  है.

दिमाग इन    मुद्दों से हटा तो सुधाकर बाबू को याद आ गईं नोन,  तेल लकड़ियां. आज कल लकड़ियों की जगह स्वच्छ ईंधन उपलब्ध  है सो स्कूटर उठा  कर घर से निकल पड़े . कैंपस के गेट से बाहर निकले ही थे  की सररर से एक बाईक सवार उन के बगल से निकल गया  स्पीड इतनी तेज़ थी कि  उन के मुंह से गाली निकल गई , “साला मर ने को निकला है क्या ?”.

कुछ सामान पड़ोस के बाज़ार में नहीं मिला सो आगे जाने का मन बना लिया . अभी मुश्किल से आधा किलोमीटर ही गए होंगे की सड़क के बाएं तरफ  बहुत  भीड़ लगी दिखाई दी जिस की वजह से  ट्रैफिक भी  जाम हो गया था . सुधाकर ने  स्कूटर एक तरफ रोक  दिया और कौतूहल वश  भीड़ में घुसकर झाँकने की कोशिश की कि माजरा क्या है ?  भीड़ में लोग तरह तरह की बात कर रहे थे ... “खुली सड़क मिल जाए तो हर कोई मोटर साइकिल को हवाई जहाज बनाना चाहता है. बहुत तेज़ चला रहा था, मैं ने खुद  अपनी आँखों से देखा . मोटर साइकिल वाले ने पीछे से बस में डैश  किया और वह भी फुल स्पीड में.  सीधा पीछे से बस में टक्कर हुआ है “. सर का भुरता बन गया है . लेकिन हेलमेट पर कोई खरोंच तक नहीं आई  हैं. सुधाकर की  उत्सुकता बढ़ती जा रही थी. सोचा कि पास जा कर देखें . भीड़ को चीर कर  मलबे के निकट पहुँचने की कोशिश की तो उन के जहन में कुछ देर पहले ही  पास से निकले  मोटर साइकिल सवार , उस की बाईक और कपड़ों का चित्र दृष्टि पटल पर अंकित  हो गया .

पीले रंग की अपाचे  मरी हुई भैंस  की तरह सड़क पर पसरी हुई थी  और उस के नीचे मोटर साइकल सवार का आधा धड़ और  एक टांग फंसी हुयी थी . हैंडिल  बार  से थोड़ी दूर पर जैसे आयुध  पूजा में  सिंदूर भरे   पेठे को  फोड़ा जाता है , उस तरह  उस का सारा सर  फटा पड़ा था जिसमें से सफेद भेजा  बाहर आ गया था. वाकई बाएं हाथ की कोहनी पर काला  हेलमेट अभी भी शोभायमान  था और उस उस पर एक खरोंच भी नहीं  आई थी .

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget