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होली विशेष आयोजन - होली की कविताएँ

 

 

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

होली की शपथ
रंजिशों ने कुछ इस तरह
तन्हा बना दिया
हर होली पर
एक कतरा प्यार के रंग को
तरसते हैं लोग।।

"तुलसी" के कहने पर
छोड़ दिया है
जाना मैंने तो अब घरों में
जाने से हर्षाते नहीं
नयनों से भी
स्नेह झराते नहीं हैं लोग।
घड़ों कंचन से भरे महलों में
सच, एक कतरा पानी को
तरसाते हैं लोग।।

शपथ है मुझे कि अब
मनाऊँगी होली तब ही
मलालों के गुलाल जब
गालों से उतारेंगे लोग
कृत्रिम रंगों और ढंगों के
शिष्टाचारों से परे
प्रेम के रंगों में सराबोर
सच में रिश्तों को
जब सँवारेंगे लोग।।

 


-------------.

वीरेन्द्र पटनायक


रंगों की रुबाइयां थी  होली,
चिथड़े बदन लुका-छीपी मोहल्ला गली ।
मांदल थाप घुसी डी जे की झोली,
तिलकों में सिमटी बिंदी बनी भोली ।।
शुभ-शुभ होली, शुभ-शुभ होली....
भांग ठंडाई मेहनत मांगे,
चखें   ड्रग   की   गोली ।
दस दिवसीय रंगोत्सव कभी,
घंटे भर मुश्किल से खेली ।।
दिन कम पड़ते  रंग को,
सांझ होत अबीर हरी-पीली ।
शुभ-शुभ होली,शुभ-शुभ होली।।
हजार रंग से रंग ले कोई,
मन बेरंग जो अब तक खाली ।
कपोल  चितेरुं   किसे,
मलता रहा हूँ हाथ खाली ।।
श्वेत-श्याम है बिन साली होली,
शुभ-शुभ होली, शुभ-शुभ होली
----.


दाढ़ी के बालों में लिपस्टिक रंग दे
आजा मेरे हमजोली,
चूने-कत्थे की पुचकार माँग पर
बरसाऊं मैं बरसाने-होली ।
गले लग जा लटकनवाली
आई होली, रंग-रंगेली ,
शुभ-शुभ होली, शुभ-शुभ होली ...
श्यामली सो गुलाल पीली,
गोरा गाल चमके काली-नीली ।
चुनरी सरकी जो उर से,
उड़ेलूं ढाक पंखुली ।।
गले लग जा मतवाली
आई होली, रंग-रंगेली ,
शुभ-शुभ होली, शुभ-शुभ होली ...
गले-शिकवे छोड़ पतेली,
नयनन ढूंढे संकरी गली ।
अमराई नित महकी चली,
आजा प्रिये खण्डहर-खोली ।।
देर न कर धर पिचकाली
आई होली, फागुन बोली,
शुभ-शुभ होली, शुभ-शुभ होली...
रेंगती कलम यदाकदा
देख तुझे मदहाली,
स्वप्न चित्र आलिंगनमय
सजाये वृहद रंगोली ।
पराग पुकारे पावन भौंरा-तितली,
बरसाऊं मैं रंग-रोगन-रोली ।
सुन जा हमजोली,
रिश्ता अपना दामन-चोली ।
शुभ-शुभ होली, शुभ-शुभ होली..

 

वीरेन्द्र पटनायक
(सारंगढ़िया),  भिलाई  
-------------.

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