रविवार, 19 मार्च 2017

शब्द संधान / रसवाद / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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प्रगतिवाद, साम्यवाद, या पूंजीवाद की तरह रसवाद कोई सिद्धांत नहीं है जिसका प्रयोग हम किसी क्षेत्र में कर सके। वस्तुत: ‘रसवाद’ बतरस हैं। गपशप और छेड़छाड़ है। महज़ आनंद के लिए वार्तालाप है। रस के साथ वाद लगाकर हम किसी बौद्धिक सिद्धांत की और संकेत नहीं करते। पर ऐसा भी नहीं है कि रस का कोई सिद्धांत ही न हो।

शब्द, ‘रस’, सामान्यत: स्वाद के लिए प्रयुक्त होता है, और जैसा की बताया गया है स्वाद या रस छ: प्रकार के हैं। मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त। स्वाद के सन्दर्भ में ‘षठरस का यह सिद्धांत’ लगभग सर्वमान्य है। किन्तु इसे ‘रसवाद’ नहीं कहा जाता। हम सबके पास स्वाद लेने के लिए एक अदद जिह्वा या जीब होती है। यह ‘रसेंद्रिय’ है। रसेंद्रिय को ‘रसमातृका’ भी कहा गया है।वही इन रसों का आस्वादन करती है|

रस है तो ‘रसोई’ है, जहां स्वादिष्ट खाना पकता है। कितनी ही खाने की स्वादिष्ट चीजें रस से जुडी हुई हैं| नारियल और आंवला रसफल कहे जाते हैं। मकई रसभरी है। बंगाल की एक मशहूर मिठाई रसगुल्ला है। रस- मलाई तो है ही, श्रीखंड को ‘रसाला’ भी कहते हैं, दक्षिण भारत में दाल की जगह ’रसम’ पकाई जाती है। गन्ने के रस से बनाई गई खीर ‘रसावर’ कहलाती है।

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रस केवल स्वाद ही नहीं है। मन में उत्पन्न होने वाले भाव भी ‘रस’ ही कहलाते हैं। इन भावों का साहित्य में बड़ा महत्त्व है। जिस तरह षठरस का सिद्धांत स्वाद के सन्दर्भ में है, उसी तरह साहित्य में ‘नवरस का सिद्धांत’ है। वे भाव, जो साहित्य में समाहित हैं और पढ़ने वाले के मन में उठते हैं, परम्परागत रूप से, कुल मिलाकर सात बताए गए हैं – श्रृंगार, हास्य, करुण, वीर, वीभत्स, रौद्र, भयानक, शांत और अद्भुत। इनमें श्रृंगार-रस को ‘रस-राज’ या ‘रस-ज्येष्ठ’ कहा गया है। साहित्य में इसने अपनी धाक जमा ली है। जिस तरह साहित्य में रस-राज का दर्जा श्रृंगार-रस को प्राप्त है उसी तरह स्वाद के मामले में रस-राज या राग-ज्येष्ठ मधुर-रस है। जो सर्वाधिक ‘स्वादिष्ट’ माना गया है।

रस का आस्वादन करने वाला ‘रसिक’ या ‘रसवादी’ है। रसिक केवल जीब से स्वाद लेने वाला व्यक्ति ही नहीं होता, वह जो आनंद के लिए छेड़-छाड़ करता रहता है, वह भी रसिक ही है। ऐसे रसिक को लोकभाषा में ‘रसिया’ भी कहा जाता है; और फागुन मास में जो आनंद वर्षा करते गीत गाए जाते हैं, उन्हें भी तो ‘रसिया’ ही कहा गया है।

रस आनंद है। आनंद में जो मग्न है, ‘रसभीना’ है। आनंद में तर, रसरंग में मस्त ‘रसबसा’ है। न जाने कितने ऐसे शब्द हैं जिनके पूर्व ‘रस’ पद लगाने से वे विलास और आनंद के वाहक बन जाते हैं -- ‘रसकेलि’ ‘ ‘रसरंग’ आदि। ‘रसमसा’ आनंद में डूबना है। ‘रसमसाना’ रसरंग के लिए व्यग्रता है। ‘रस’ शराब है। शराब बेंचने वाला ‘रसविक्रयी’ है। ‘सोमरस’ सोमलता के रस से बनी शराब है जिसका कभी पान किया जाता था। सोमरस ही नहीं, हम न जाने कितनी चीजों के रस का सेवन करते हैं और ज़रूरी नहीं कि उनमें शराब जैसा नशा ही हो। उदाहरण के लिए ‘अमरस’ आम का रस है जिसे हम बड़े शौक से पीते हैं। पका आम रस से परिपूर्ण होता है। तभी तो वह “रसाल” कहलाता है।

‘पारा’ है तो एक धातु, लेकिन यह एक ‘रसधातु’ है। धातुओं में पारा ‘रस-राज’ है, ‘रसनायक’ है। ‘रसपति’ है| पारे को शुद्ध करना ‘रस-शोधन’ है, ‘रससंरक्षण’ है। ‘रसभस्म’ पारे की भस्म है। ‘रसमर्दन’ पारे को भस्म करने या मारने की क्रिया है।

किसी भी शब्द के आगे रस लगा कर हमारी भाषा में न जाने कितने शब्द बने हैं। रसना, रसवत्ता. रसवान, रसवती, रसवंती, रसज्ञ, रसवान,रसायन, रसाल, रसावर, रसीला, आदि,आदि।

‘रसा’ शोरबा है, झोल है। भूमि या पृथ्वी को भी ‘रसा’ कहा गया है। ‘रसातल’ पृथ्वी के नीचे जो सात लोक बताए गए हैं, उनमें से एक, छटा, लोक है। ‘रसा’ नदी को भी कहते हैं। आखिर रस, नदी के जल की तरह तरल और मीठा पदार्थ ही तो है न !

रस कहें या रसा बात लगभग एक ही है। किसी वस्तु को निचोड़ कर उसका रस निकाला जाता है। लेकिन सब्जी इत्यादि, का झोल या शोरबा उसका रसा है।

उर्दू भाषा, जिसके अधिकतर शब्द अरबी और फारसी से आए हैं, में ‘रस’ और ‘रसा’ के अलग ही अर्थ हैं। ‘रस’ फारसी का एक प्रत्यय है जिसका मतलब पहुंचने वाला है। जैसे ‘फलक रस’- आकाश तक पहुंचने वाला। रस पहुँचने वाला है तो ‘रसा’ पहुंचाने वाला है। इसे ‘रसां’ भी कहा गया है – जैसे चिट्ठी-रसां, चिट्ठी पहुंचाने वाला। हिन्दुस्तानी-ज़बान में भी पहुँचने और पहुंचाने वाले “रस” और “रसां” जैसे शब्द इत्मीनान से पहुँच चुके हैं।

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--डा, सुरेन्द्र वर्मा (मो, ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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