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व्यंग्य / व्यंग्य में सरोकार / अंशु माली रस्तोगी

मैंने इस मसले पर तमाम लोगों से बात की। बीवी से लेकर गर्लफ्रेंड तक की राय ली। सभी छंटे हुए वरिष्ठ व्यंग्यकारों को पढ़ा-सुना। फेसबुक-टि्वटर तक छान मारा। किंतु व्यंग्य में सरोकार का तड़का कैसे डाला जाए- यह बताने को कोई राजी नहीं। अरे, मैं तो उस बंदे को रिश्वत तक देने को तैयार हूं, जो मुझे व्यंग्य में सरोकार पैदा करने का ज्ञान दे सके। मगर अफसोस कोई आगे नहीं आ रहा। सब कन्नी काट रहे हैं।

तो क्या मैं मान लूं, व्यंग्य में सरोकार होते ही नहीं? या व्यंग्य में सरोकारनुमी हवा का जो लोग झंडा बुलंद करते रहते हैं, ‘ठरकी’ टाइप हैं?

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कुछ तो जरूर है। अब तक मैंने इतने व्यंग्य खींच लिए मुझे ध्यान नहीं पड़ता कि किसी व्यंग्य में मैंने सरोकार का राग छेड़ा हो। या किसी ने मुझे- आपके टूथपेस्ट में नमक है- की तर्ज बोला हो- आपके व्यंग्य में सरोकार हैं? फिर भी, पता नहीं क्यों कुछ लोग व्यंग्य में सरोकार का हल्ला रात-दिन फेसबुक पर मचाते रहते हैं। जबकि बेचारा सरोकार व्यंग्य में अपने होने न होने पर कभी दुख या एतराज नहीं जताता।

आजकल के जमाने में लोग रिश्तों में परस्पर सरोकार की बात नहीं करते फिर भला व्यंग्य में सरोकार पर क्यों अपना दिमाग खपाएंगे? आज हर आदमी तो व्यस्त है अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ में। अगर वो यों ही यहां-वहां सरोकार ढूंढता फिरेगा तब तो चला लिया उसने अपना घर-परिवार। दफ्तर में बॉस की हड़काई और घर में बीवी की आंख-दिखाई के आगे न ‘सरोकार का भूत’ दो सेकेंड में उतर कर ‘उड़न-छू’ हो लेता है। दुनिया इतनी जटिल हो चुकी है, यहां न बेटे को मां-बाप के, न चचा को भतीजे के, न भाई को बहन के सरोकार से खास कोई मतलब नहीं रहता। सब अपनी-अपनी लाइफ में अपनी तरह से बिजी हैं। फिर काहे का और कौन-सा सरोकार?

चलिए, व्यंग्य में सरोकार को जाने दीजिए, कविता-कहानी-उपन्यास में कौन-सा सरोकार अब नजर आ रहा है। बदलते वक्त के साथ लेखकों की ‘सरोकारी प्राथमिकताएं’ बदल गई हैं। कभी किसी जमाने में हुआ करते थे सरोकारी टाइप लेखक-साहित्यकार। अब तो लेखक का सारा सरोकार अखबारों-पत्रिकाओं में छपने, प्रकाशक से किताब छपवाने, सम्मान-पुरस्कार पाने में ही अधिक जुड़ा रहता है। बुरा न मानिएगा, यही हकीकत है। इधर, लेखक लोग जब से फेसबुक पर सक्रिय हुए हैं, तब से सारे सरोकार ‘पोस्टनुमा’ हो गए हैं। मन में कोई सरोकार आते ही झट से फेसबुक पर पोस्ट हो जाता है।

इसीलिए तो मैं व्यंग्य में सरोकार होने न होने के चक्करों में ज्यादा नहीं पड़ता। व्यंग्य में सरोकार घुसेड़ कर मुझे कविता-कहानी वालों की दुकानें थोड़े न बंद करनी हैं। व्यंग्य तो खुद में इतना बड़ा सरोकार है कि अच्छे-अच्छे लेखक-साहित्यकार उसके आगे पानी भरते नजर आते हैं। फिर जबरन क्यों व्यंग्य में सरोकार की पैरवी की जाए?

व्यंग्य में जितना ‘कूल’ रहेंगे, उतना ही ‘आनंद’ आएगा। व्यंग्य पर एंवई किस्म-किस्म की भावनाओं-गहराईयों का बोझा लाद देंगे तो उसे बड़ी तकलीफ होगी। यहां इंसान की लाइफ में दर्दे-ओ-गम पहले ही क्या कम हैं, जो उसका असर व्यंग्य में भी बनाए रखा जाए। व्यंग्य बड़ी ही ‘ग्लैमरस’ और ‘मस्त’ विधा है, क्यों न इसे ऐसे ही बना रहने दिया जाए।

सरोकारों का अगर इतना ही शौक है तो कविता लिखिए, कहानी लिखिए, उपन्यास लिखिए, आत्मकथा लिखिए, डायरी लिखिए। पर व्यंग्य को सरोकार टाइप बहसों से दूर ही रखिए। इसी में व्यंग्य और व्यंग्यकार दोनों की भलाई है। जय श्रीराम।

(अंशु माली रस्तोगी के ब्लॉग - चिकोटी से साभार)

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