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मुक्ता वेद की कविताएँ

मुक्ता वेद

अच्छा लगता है
अच्छा लगता है
पूरब का उगता लाल सूर्य
और पश्चिम में डूबता वही सूर्य ।

अच्छा लगता है
अमराई में सूखे पत्ते बुहारती
आँखों में बौरों की खुशबू लिये षोडशी ।

अच्छी लगती है
चिकनी सड़क पर स्कूटी तेज चलाती
साँवरे चेहरे वाली षोडशी ।

अच्छा लगता है
पोखर के पानी में छप-छप करता बच्चा ।

अच्छा लगता है
टी वी पर डोरेमॉन, नोडी
के साथ दिन बिताता बच्चा ।

अच्छा लगता है
बनारस के घाट पर
बैठी वह यूरोपियन स्त्री
माथे पर लाल बिंदी साटे
पैरों में चाँदी के पायल को
रुन झुन बजाती ।

अच्छा लगता है
वैधव्य की पवित्रता
में जीती
वह स्त्री आँखें मूंदे सूर्य को अर्घ्य देती ।

अच्छा लगता है
पहाड़ की घाटी के ऊपरी सड़क पर बैठा बूढ़ा
घाटी में ढूँढता अपने जीवन का अतीत ।

अच्छा लगता है
मेट्रो स्टेशन पर भागता
यह युवा भीड़ समूह
आसमान पाने की तलाश में ।

अच्छा लगता है
घने वन की एकांत पगडण्डी
और कंक्रीट के जंगल में ऊँचा हाईवे ।

अच्छा लगता है
लोक संस्कार में लोक गीत गाती स्त्रियाँ
और वॉइस ऑफ़ इंडिया के गाते प्रतिभागी ।

हाँ, मुझे सब अच्छे लगते हैं
क्योंकि इनमें मैं खुद को पाती हूँ ।

हँसती, मुस्कुराती, रोती, सपने देखती
खुश होती
सब में मैं खुद को तलाशती।

 

पुरस्कार

कवि जब पढ़ता रहता
अपनी ही रची रचना
वो रचना थी और थी
उसका भोगा गया कल ।

खाली मन के कैनवास पर
उसकी रचना
रेखाएं गढ़तीं
आड़ी तिरछी
सरूप, कुरूप ।

सुप्त हृदय से निकली
आह के रंग भी थे उस कैनवास पर
कुछ रंगीन, कुछ उदास
कुछ बैचैन, कुछ एकांत ।

किन्तु उस कैनवास को सबने
कहाँ देखा - रेखाओं, रंगों
आकृतियों और कोरेपन सहित ।

दिखा, उन्हें उस कैनवास की तरह
जो आर्ट गैलरी में सजे हैं
लोग आते हैं, जाते हैं
कहते हुए वाह! क्या मॉडर्न आर्ट है
क्या खूबसूरत रेखाएं, आकृतियां हैं ।

कवि हँसता, रोता, सोचता
क्या दर्द उसके थे
मॉडर्न आर्ट सरीखे ?
पुरस्कृत हुआ
साहित्य जगत में ।

पर क्या वह पुरस्कार
उसकी रचना का पुरस्कार था ?
गिरने लगे आँसू उसकी आँखों से
सोचता रहा था, कोई है वहाँ उसके कल के
दर्द पर उसकी रचना के सच
पर दो आँसू गिराने वाला प्रिय।

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