गुरुवार, 2 मार्च 2017

हास्य-व्यंग्य : काश! मैं कन्हैया होता -- संजीव ठाकुर

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अगर मैं कन्हैया होता तो सीमेंट और पहियों के इस जंगल में भटकने की बजाय वृंदावन की कुंज गलिन में चैन की बंसी बजा रहा होता। इस असार-संसार की व्याधियाँ मो पे नहीं व्यापतीं। रोजी –रोटी के जुगाड़ के लिए मुझे बस या मेट्रो के धक्के नहीं खाने पड़ते। न ही बॉस की डांट मुझे खानी पड़ती। मेरा काम तो मक्खन खाने से ही चल जाता। धेनुएँ मेरे मुख में दुग्ध प्रवाहित करतीं ,गोपियाँ पैर दबातीं। ग्वाल –बाल मेरे इशारे पर नाचते। मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बांसुरी वादक होता और इसके लिए मुझे पन्नालाल घोष या हरिप्रसाद चौरसिया के घर बर्तन माँजने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

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मैं तो बस बांसुरी पकड़ता और राग –रागनियाँ उससे झड़ने लगतीं। आज भले ही मैं चौसठ कलाओं का नाम भी नहीं बता पाऊँ लेकिन कन्हैया होने पर मैं चौसठ कलाओं में माहिर होता। लेकिन उन कलाओं में चोरी (माखन चोरी छोड़कर )बेईमानी ,लुच्चई ,लफंगई जैसी आज की मशहूर कलाएं निश्चय ही नहीं होतीं। उन कलाओं में बलात्कार का भी प्रावधान नहीं होता। बलात्कार की वैसे मुझे कोई आवश्यकता भी नहीं होती। सोलह हजार कन्याओं की सुविधा वाला प्राणी बलात्कार आखिर कर भी कैसे सकता है ?मैं तो ताजमहल, बाटिनिकल गार्डन ,गेटवे ऑफ इंडिया ,जुहू –चौपाटी ,इंडिया गेट ,लोधी गार्डेन ,हुमायूँ –मकबरा जैसी जगहों में एक ही समय अलग –अलग गर्ल फ्रेंड के साथ विराज रहा होता। प्रेमी –प्रेमिका को किसी झाड़ी में गुप्त –क्रिया करते देख प्रगट हो जाने वाले किसी हिजड़े या पुलिसिए का डर भी मुझे नहीं होता। ऐसे कालिया नागों को तो मैं नचा- नचा कर नाथ देता !

कन्हैया होने पर द्वापर की तरह कलयुग में भी समाज के लिए मैं काफी कुछ करता। सालों –साल चलने वाले मेट्रो या फ्लाई ओवर के प्रोजेक्ट को मैं गोवर्धन –शैली में निबटा देता। शोषण करने वाले लोगों के सफ़ेद –खाकी –रेशमी वस्त्रों का हरण कर उन देह- धारियों को कच्छा –बनियान में सड़कों पर दौड़ा देता। गुंडे –मवालियों के बैंड बजवा देता। जमाखोरों को चौराहों पर भीख मांगने को बैठा देता। घोटालेबाजों के गले में घंटा टँगवा देता। नकली दवा बनाने वालों को कालकूट विष पिलवा देता। आज की द्रौपदियों द्वारा स्वयं किए जा रहे चीर –संकुचन को विस्तृत कर उनके चरणों तक पहुँचा देता। अमेरिका से डरने वाले अपने युधिष्ठिर को ब्रह्मास्त्र दिलवा देता। आतंकवादियों द्वारा फेंके गए हथगोलों को अपने गले में धारण कर लेता। कहने की आवश्यकता नहीं, मैं सब कुछ कर लेता। बहरहाल ! आप भी कुछ कीजिए। और अगर कुछ नहीं कर सकते ,तो प्रार्थना ही कर लीजिए कि ‘अगले जनम मोहे कन्हैया ही कीजो !’…

एस.एफ.- 22, सिद्ध विनायक अपार्टमेंट , अभय खंड -3, इन्दिरापुरम, गाजियाबाद – 201010 .

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