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शेष जो था ......(कहानी ) / अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर’

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“ सिर्फ साँसों की तपन और होठों की नमी जिंदगी के कैनवास को सार्थकता नहीं देते प्रीतिका।ये तुम्हारी भूल थी ....मैं नहीं तुम गुम हुई ,हाथ मैंन...

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“ सिर्फ साँसों की तपन और होठों की नमी जिंदगी के कैनवास को सार्थकता नहीं देते प्रीतिका।ये तुम्हारी भूल थी ....मैं नहीं तुम गुम हुई ,हाथ मैंने नहीं, तुमने छोड़ा है। मैं तो तुम्हें रिक्तहस्त मिला था। पर ,ना जाने कितने जख्म, लकीरों के साथ लेकर अलग हुआ।

तुम्हारी हदें, मेरा शरीर थीं। और मेरी हदें, तुम्हारी आत्मा तक पहुँचना चाहती थीं।मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि इतना मुश्किल होता है ,आत्मा तक पहुँचना।मेरी कल्पना के सच से इतर निकली तुम प्रीतिका।तुम मुझे खोज चुकी थी ना ?पर एक चिंगारी अभी शेष थी मुझमें, और जलने के लिए, एक चिंगारी ही काफी होती है। तुम्हारी खोज में, मैं नहीं मिला तुम्हें। या यूँ कहूँ तुम खोज ही ना सकी मेरे अन्तर्मन की अविरल धारा को ,उसके अनित्य प्रवाह को महसूस ही ना कर सकी।

जिस्म इतना सस्ता भी हो सकता है प्रीतिका ! तुमसे मिलकर जाना। और आत्मा का कोई मोल नहीं होता -ये जाना, शामली से मिलकर ......................शामली।

गुम हो गया तुम्हारा शिवेन ! सुन रही हो ना प्रीतिका ! खैर फिर कभी बताऊँगा ,ये आत्ममिलन।अभी रहने दो ....!”

“ शेष क्या लिखोगे शिवेन ?” बुदबुदाते शब्दों के साथ प्रीतिका ने पत्र से चेहरे को ढँक लिया। घंटों आकाश की तरफ बोझिल शाम निहारती रही।कितना कुछ छूट चुका था ,इस मरीचिका में।

“ मेरी आलताई आँखें आज भी तुम्हारी की बाट जोहती हैं शिवेन ! नासमझ मैं , फिर भी वक्त को लौटाने की तुतली जिदें करती रहती हूँ।जबकि जानती हूँ ,यकीं है , नहीं लौटोगे तुम ....| जानते हो ! जब हम साथ थे, तो मैंने कभी तुम्हारे इंतजार को जिया ही नहीं ,जबकि तुम कई बार कहते भी थे , इंतजार को जीने लगोगी तो पल कब गुजर जायेगा पता भी नहीं चलेगा।लेकिन तब, ये सब किताबी बातें लगती थीं।और आज इन्हीं किताबों से बातें करके ही तो जी रही हूँ। समझदार पलों की नासमझ जिदें , कहाँ से कहाँ ले आयीं मुझे ! पल भर में सब कुछ पा लेने का दुस्साहस क्यों किया मेरे मन ने ? अब बहुत बड़ा फ्लैट खरीद लिया है मैंने शिवेन ! पर, पाँव चलना ही भूल गए हैं।उस छोटे से फ्लैट में तुम्हारे साथ मैं , सदियों की दूरियाँ नाप लेती थी।धूप के टुकड़े ,बरसात के फ़ाहे और हवा की कतरनें, बटोर लेती थी उस संकरी बालकनी से भी।अब तो ये भी अजनबी से लगते हैं शिवेन।जिन कागज़ के टुकड़ों पर हम स्याहियाँ गिरा अलग हुए।उन्हीं टुकड़ों ने कभी हमें जोड़ा भी था।शायद तुम सुनकर नाराज़ होगे ! मैंने नौकरी छोड़ दी ,एक बुटीक खोल लिया है ,कभी -कभी सोचती हूँ - प्यार और विश्वास की कतरनों को जोड़ जीवन की कनातें तो ना बना सकी ,शायद इन टुकड़ों को जोड़ते –जोड़ते जीने का फ़लसफ़ा आ जाये।बहुत भागदौड़ हो जाती थी ...थक रही थी अकेले ...|

जानते हो ! आज भी मैंने दो कप चाय बना डाली थी। अक्सर भूल जाती हूँ शिवेन ! पर, अब ये भूलना सुखद होता है बनिस्बत याद करने के। ’’

शिवेन ने अपने तप्त शरीर को शामली की ठंडी बाँहों में निर्लिप्त भाव छोड़ दिया।शामली के हाथ शिवेन के माथे पर फिर रहे थे।

“ लगता है बुखार बढ़ रहा है ? ’’ शिवेन ने भारी होती हुई पलकों को उठाकर कहा। “ ठीक हो जायेगा, सोने की कोशिश करो ना !” शामली ने शिवेन की पलकों पर हाथ रखते हुए कहा। “ तुम भी सोचती होगी शामली - कि मेरे कारण तुम्हें इतनी तकलीफ़ .....” खाँसते हुए “ पा..नी पाss ..” शिवेन का इशारा समझ पानी का गिलास उस के होठों से लगाते हुए – “ ऐसा मत कहो शिवेन ! मैं तो पापमुक्त हुई हूँ , तुम्हारे पास आकर। मोक्ष मिलेगा मुझे। जिस बाज़ार से मुझे तुम मुक्त कराकर लाये हो ,उस बाज़ार में जिस्म सड़ी लाश की तरह होता है।पैसों और इत्र की महक में जिन्दा लाशों की बदबू गुम हो जाती है।लोग जिस्म की हदें बाँटते हैं।वहाँ पैसों से निवाले जरूर मिल जाते हैं , सुकून नहीं मिलता। तुमने तो मेरी आत्मा को उसके होने का एहसास दिलाया है। मैं केवल शरीर नहीं, अनंत संभावनाओं का द्वार भी हूँ, तुम्हीं ने बताया शिवेन” ...कहते- कहते शामली का गला भर आया।

शिवेन सो गया था।शामली ने शिवेन के तपते शरीर से खुद को अलग किया।शिवेन बच्चों -सा कुनमुनाया शामली मुस्कुरायी।शिवेन के चेहरे पर रूखापन ,सौम्यता के साथ चिपका हुआ था।

अभी भोर होनी शेष थी।

शामली मेज पर पड़े कागज़ी कतरनों को गौर से देखते हुए सोचने लगी ,बोझिल पलों को हल्का करने के लिए, कितने भारीमन के साथ लिखा होगा शिवेन ने ये सब ...................................

“ और .... मेरा कल कब शुरू हुआ, मुझे ठीक से याद नहीं ,पर प्रीतिका में जो शेष था, भुला नहीं सका।आत्मा और शरीर की खोज में मैं भटक रहा था| आत्मा, शरीर के इस समर में , शरीर जीतता रहा मेरा।मैं तुलता जा रहा था।प्रीतिका की मुस्कान भ्रम थी ,छलावा थी ,मरीचिका थी।प्यार के दो बोल जो मन को शीतलता दे सकते थे ,कभी नहीं मिले प्रीतिका ! तुम्हारे हिस्से से।तुमसे मिलने के बाद मैंने सिर्फ खोया था।कितनी बार भयावह ,वीरान रातें मैंने तपते शरीर के साथ गुजारीं थीं।तुम्हारे करीब होने का एहसास हमेशा तपते शरीर के ताप को दूना कर देता था ।तुमसे दूर होना सार्थकता की खोज थी ।खोज थी मन के ठौर की।मैं सूखे पत्तों- सा बिखर रहा था प्रीतिका।सहानुभूति, प्यार,समर्पण , निष्ठा ,शीतलता तुम्हारे लिए अछूते शब्द रहे।किताबी बातें थीं ये सब ,तुम्हारे लिए।जिंदगी सिर्फ़ उड़कर जीने का नाम नहीं ,तुम उड़ती रही पतंग -सा ,ठहरी कहाँ ! तुम सब कुछ जल्दी - जल्दी पाना चाहती थी और दौड़ में पीछे क्या - क्या छूटता गया, तुमने देखने की ज़हमत भी कहाँ उठायी ? मुझे आज भी याद है वो शाम -जब मैं ऑफिस से घर देर से आया था और तुमने लगभग चिल्लाते हुए कहा था- “ क्या दे देता है तुम्हें, तुम्हारा ऑफिस इस ओवरटाइम का ? दस साल की नौकरी में आज भी वन बी. एच. के. फ्लैट में पड़े हैं हम ? मुझे भी जूझना पड़ता है, इस घर को सरकाने में।”

“ तुम समझ ना सकी थी प्रीतिका , वो संघर्ष हम दोनों का था ,तो जीत भी तो हमारी ही होती ,पर तुमने तो छलांग ही लगा दी।हो सकता है ,जीवन की मरीचिका का यथार्थ तुम्हें प्राप्त हो गया हो।जीवन इतना सारहीन नहीं होता प्रीतिका , जीना आना चाहिए। धुन है जीवन ,एक लगन है। तुमसे इतना ज़रूर सीखा प्रीतिका – किसी को पाने की जद्दोजहद में मिट जाने से, कहीं बेहतर है -खुद के वज़ूद को तलाशते हुए मिट जाना।तुमसे मिली कटुता को आज भी जी रहा हूँ ,पर आज जिस सागर के किनारे पड़ा हूँ ,वहाँ अथाह शांति है।इसी नीरवता के साथ जीना चाहता हूँ। कोलाहल ,आपाधापी ,अजनबी समय के साये से सहमी आत्मा है वो .... जानती हो इस अपूर्व,निश्छल शांति का नाम शामली है। ना जाने कितनी मुर्दा आत्माओं की भीड़ में छटपटाती शामली जब मिली थी मुझे| पैसे से नहीं ,आत्मा से आत्मा का सौदा छि: .... सौदा नहीं ! मिलन, एक पवित्र - मिलन जो जिस्म की चारदीवारी के बाहर भी झांकता है।और जानती हो ? इससे मेरे अस्तित्व को कोई खतरा नहीं।मैं जीने लगा हूँ फिर से , इसे पाकर। यहाँ कोई प्रतिबद्धता नहीं,कोई लिप्सा नहीं .... आत्मीयता और सिर्फ आत्मीयता है।शरीर तो कई बार मिट चुका था इसका, पर शेष जो था –वह आत्मा थी इसकी।इसी शेष ने मुझे आज तक जिंदा रखा।मैं जानता हूँ, मेरी मौत मेरे बहुत करीब खड़ी है।पर मुझे डर नहीं लगता , मैंने कभी सोचा भी नहीं था प्रीतिका , कि जीवन का अंत इतना सुखमय होगा| मैंने तुम्हें खोकर, स्वयं को पाया और स्वयं को खोकर शामली को। लेकिन , मैं शामली को खोना नहीं चाहता।

तुम तक लौटना नामुमकिन है प्रीतिका।शामली भ्रम नहीं यथार्थ है, सिर्फ़ शरीर नहीं, आत्मा भी है, शोर ही नहीं ,शांति भी है| मरीचिका ही नहीं, सागरिका भी है।

जानता हूँ जब तुम इन शब्दों में मेरी रूह ढूंढ रही होगी, मैं मिट चुका हूँगा।लेकिन मेरे जाने के बाद भी मेरे शब्द जीवित रहेंगे .......................................|

सुबह की हलकी हवा ने कागज़ी कतरनों को बिखेरना शुरू किया। भोर का सूरज उठने लगा।शामली ने भरी हुई आँखों से शिवेन के चिरशांत चेहरे की ओर देखा।भोर की सारी सर्द हवा शिवेन के पूरे जिस्म में उतर आयी थी मानों।शामली ने अपनी मुट्ठियों को पूरी ताक़त से भींच लिया।

चीख भी ना सकी, आत्मा के बिछोह पर।

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जन्म :    1  मार्च

ग्राम- खेमीपुर, अशोकपुर , नवाबगंज जिला गोंडा , उत्तर - प्रदेश

दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान ,कादम्बनी,वागर्थ ,बया ,इरावती प्रतिलिपि डॉट कॉम , सिताबदियारा ,पुरवाई ,हमरंग आदि मेंरचनाएँ प्रकाशित

2001  में बालकन जी बारी संस्था  द्वारा राष्ट्रीय  युवा कवि पुरस्कार

2003   में बालकन जी बारी -युवा प्रतिभा सम्मान

आकाशवाणी इलाहाबाद  से कविता , कहानी प्रसारित

परिनिर्णय ’  कविता शलभ संस्था इलाहाबाद  द्वारा चयनित

मोबाईल न. 8826957462 mail- singh.amarpal101@gmail.com

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रचनाकार: शेष जो था ......(कहानी ) / अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर’
शेष जो था ......(कहानी ) / अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर’
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