बुधवार, 8 मार्च 2017

“ऊधौ कहियो जाय“ तेवरी-शतक में विरोधरस का प्रवाह / डॉ. अभिनेष शर्मा

 

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गोपियों को आमजन का प्रतिनिधि और उद्धव को कृष्णरूप में गद्दी पर बैठे कंस जैसे हर शासक का संदेशवाहक मानकर पुराने प्रसंग को नये सन्दर्भों में पिरोकर रची गयी तेवरीकार रमेशराज नयी कृति “ऊधौ कहियो जाय“ तेवरी-शतक में पाठकों के समक्ष है।

शतकों की परम्परा में प्रस्तुत यह तेवरी-शतक पठनीय ही नहीं, इस कारण भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उद्धव जो कृष्ण के दूत बनकर गोपियों के समक्ष आते हैं तो गोपियाँ उनसे कोई विरह या प्रेम-प्रसंग नहीं रखतीं बल्कि उनकी पीड़ा तो उस सिस्टम की बखिया उधेड़ती है जो जाने-अनजाने आमजन का सुख-चैन लीलने को आतुर है।

लोकतंत्र में अव्यवस्था-अनीति का विरोध करने का अधिकार हर व्यक्ति को मिला हुआ है। जनता भले ही दरिद्र और असहाय हो किन्तु आक्रोश से युक्त उसके पास नुकीले तीरों के भंडार हैं। इन्हीं नुकीले तीरों का इस्तेमाल करते हुए वे उद्धव से कहती हैं –

हम तो रहें उदास पर कैसे हैं घनश्याम

यहाँ भूख का वास पर कैसे हैं घनश्याम, बैठ गद्दी पर खुश हैं ?

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राजा कभी इतना कष्ट नहीं उठाता कि जनता के दुःख-दर्दों का आकलन खुद जनता के बीच आकर करे। इस कार्य के लिए वह जनता के बीच केवल अपने प्रतिनिधि को भेजता है। राजा की इस असम्वेदनशीलता से जनता भी अपरिचित नहीं। तभी तो वह उद्धव के समक्ष इस सत्य को उजागर करती है-

जनपथ तक आये नहीं राजपथों के लोग

है हमको आभास पर कैसे हैं घनश्याम, बैठ गद्दी पर खुश हैं ?

जनता द्वारा प्रिय नेता के रूप में चुने सांसद, विधायक के मंत्री बन जाने पर उसी जनता पर अत्याचार और वार करने की नीति जगजाहिर है। ऐसे कुशासकों से पीड़ित व्यथित गोपियों के रूप में जनता का उद्धव को दर्ज कराया गया बयान, जन-दमन का जीवंत व्याख्यान बन जाता है –

इस शोषण की मार से कब होंगे आज़ाद

ऊधौ अत्याचार से कब होंगे आजाद, कटेगा कैसे जीवन ?

उद्धव जब गोपियों को अपनी सरकार की छद्म उपलब्धियों का बखान करने लगते हैं तो गोपियाँ आक्रोशित होकर समवेत स्वर में सरकारी नीति का विरोध करती हैं-

राजनीति के आज हो तुम तो एक दलाल

कोरी देना सांत्वना ऊधौ जानो खूब, बड़े छलिया हो ऊधौ !

तेवरीकार रमेशराज की इस शतकीय रचना में नूतन रचनाधर्मिता के सभी काव्यात्मक कौशलयुक्त गुण मौजूद हैं। विरोधरस का पूर्ण प्रवाह है। इसी रस में कथन का अनूठा, सारगर्भित अनुपम अर्थ-विस्तार है। भावनाओं का आक्रोशमय मुखर ज्वार है। तेवरी-शतक का हर तेवर व्यंग्य से भरा है।

पुस्तक में जनकछंद, हाइकु, वर्णिकछंद, सर्पकुण्डली राज छंद और दुमदार दोहों के साथ प्रयुक्त हुए तेवर इस तथ्य को स्पष्ट रूप से उजागर करते है कि तेवरीकार की हर छंद पर पकड़ मजबूत है। संग्रह में विज्ञान के प्रतीकों का सहारा लेकर रची गयीं तेवरियाँ मौलिक कहन के कारण अन्य सामान्य रचनाकारों से रमेशराज को अलग खड़ा करती हैं। यथा-

अंकगणित-सी जिंदगी बीजगणित-सा प्यार

मन के भीतर सैकड़ों प्रश्नों की बौछार, हार ही लिखी भाग में।
अथवा-

हम ‘बॉयल’ के नियम से झेल रहे हैं दाब

दुःख में सुख का आयतन घट जाता हर बार।

इस तेवरी-शतक में उद्धव रुपी सत्ता के दलाल की पूरी बात आमजन की प्रतीक गोपियाँ पूरे धैर्य से सुनती हैं और अपनी ओर से यथासम्भव उत्तर भी देती हैं। किन्तु सत्ताई-सोच में किंचित परिवर्तन न देख अंततः यही कह कर संतोष करती दिखलायी देती हैं-

इन प्राणों के रोज, लेता चुम्बन दर्द अब

आलिंगन हैं शेष, ऊधौ हम किससे कहें ?

तेवरियों में की मुखर एक शतक की पीर

अभी कथन हैं शेष, ऊधौ हम किससे कहें ?

अस्तु ! आशा है एक नये तेवरी संग्रह में इन शेष कथनों को पुनः अभिव्यक्ति मिलेगी।

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डॉ.अभिनेष शर्मा, देव हॉस्पिटल, खिरनी गेट , अलीगढ़

मोबा.-9837503132

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